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'हमारे सामने अवसर बड़ा, झोली छोटी'- योगेन्द्र यादव

डॉ योगेंद्र यादव जाने-माने चुनावी विश्लेषक रहे हैं. देश के कई जनांदोलनों में उन्होंने सक्रिय भागीदारी की है. आम आदमी पार्टी के एक प्रमुख चेहरे के रूप में वह देश के जनांदोलनों को एक मंच पर लाकर अपनी पार्टी को राष्ट्रीय स्वरूप देने की कोशिश में जुटे हैं. पेश है ‘आप’ की राष्ट्रीय राजनीति, रणनीति  और लोकसभा चुनाव में उसके लिए संभावनाओं पर डॉ योगेंद्र यादव से प्रभात खबर के संतोष कुमार सिंह की खास बातचीत.

दिल्ली के रास्ते ‘आप’ लोकसभा चुनाव में भागीदारी कर देश में अपनी जगह बनाना चाहती है. इस फैलाव के क्रम में ‘आप’ की राजनीति कैसी होगी? और, चुनावी के लिए रणनीति क्या होगी?

‘आप’ अन्य पार्टियों जैसी पार्टी नहीं है. यह एक जनांदोलन है, जन-उभार है, जो एक पार्टी की काया लेने की कोशिश कर रहा है. यूं कहिए कि पहली बार देश की आम जनता अपने लिए एक राजनैतिक औजार बना रही है.

हम तो निमित्त मात्र हैं. इसलिए, हम उस तरह की रणनीति नहीं बना सकते, जैसी कांग्रेस या भाजपा जैसी पार्टियां बनायेंगी. हमारी रणनीति यही हो सकती है कि इस जन-आवेग के साथ बहें, न तो आगे भागने की कोशिश करें, न पीछे रह जाएं.

‘आप’ वैकल्पिक राजनीति की बात करती है. लेकिन आपकी पार्टी के कामकाज व तौर-तरीकों से ऐसा लग रहा है कि आप वैकल्पिक राजनीति की बजाय राजनीतिक विकल्प बनने की ओर अग्रसर हैं?

राजनीति का विकल्प, राजनीतिक विकल्प, वैकल्पिक राजनीति- ये तीन बातें समझने की हैं. जब अन्ना आंदोलन शुरू हुआ था, तो इसमें राजनीति विरोधी स्वर उग्र था, मानो यह आंदोलन राजनीति का विकल्प बनना चाहता हो. उसमें गैर-लोकतांत्रिक होने का डर था. क्योंकि राजनीति का विरोध अक्सर लोकतंत्र के विरोध का पर्याय बन जाता है. बीच-बीच में, इस आंदोलन को एक राजनीतिक विकल्प के रूप में देखा गया है, जैसे कांग्रेस का विकल्प भाजपा, बसपा का विकल्प सपा. स्थापित राजनीति के स्थापित विकल्प.

वही चाल-चरित्र, वही नीयत, वही नीतियां. ‘आम आदमी पार्टी’ इस थके-हारे अर्थ में राजनीतिक विकल्प नहीं बनना चाहती. जब हम खुद को वैकल्पिक राजनीति का वाहक मानते हैं, तो इसका अर्थ है कि हम पूरे राजनीतिक सत्ता प्रतिष्ठान का विकल्प बनना चाहते हैं. सत्ता परिवर्तन नहीं, व्यवस्था परिवर्तन की राजनीति करना चाहते हैं.

सिर्फ सत्ताधारियों को नहीं, बल्कि सत्ता के नियम-कायदे बदलना चाहते हैं. राजनीति का चाल-चरित्र बदलना चाहते हैं. राजनीति के दलदल में आदर्श, ईमानदारी व सदाचार का खंभा गाड़ना चाहते हैं.

आदर्श की बात करनेवाली ‘आप’ को अपने एक विधायक को यह कहते हुए निलंबित करना पड़ा कि वे पद के लालची हैं?

नयी राजनीति के जन्म की प्रक्रिया आसान नहीं हैं. इसमें प्रसव पीड़ा होगी, आशा और आशंका का दबाव होगा. नवजात के साथ बहुत अपशिष्ट पदार्थ निकलते हैं, जो त्याज्य हैं. हम इसी दौर से गुजर रहे हैं. नयी राजनीति गढ़ने की कोशिश है. लेकिन कच्च माल काफी कुछ पुराना भी है. कहीं आशाओं की छलांग है, और अपेक्षाओं की अतिशयोक्ति है. इसी बीहड़ से गुजर कर नयी राजनीति की पगडंडी बनेगी.

आप’ की संस्थापक सदस्य रहीं मधु भादुड़ी ने कहा कि पार्टी में महिलाओं की बात नहीं सुनी जाती. दिल्ली के कानून मंत्री पर विदेशी महिलाओं को प्रताड़ित करने का आरोप लगा. क्या कहेंगे आप?

जैसा मैंने कहा कि आकांक्षाओं की छलांग और हड़बड़ी भी एक संकट है. ‘आप’ में सब दिशाओं से लोग आ रहे हैं. सबके विचारों का सामंजस्य करके ही यह पार्टी आगे बढ़ सकती है. नारीवादी आंदोलन से आये साथियों का इस पार्टी में विशेष स्थान है. हमें और इस पार्टी को नारीवादी आंदोलन से बहुत कुछ सीखना है.

शायद ऐसी घटनाएं हमें और सोचने को मजबूर करेंगी. लेकिन यह मान लेना कि यह पार्टी रातोरात नारीवादी आंदोलन की भाषा बोलना शुरू कर देगी, यह तर्कसंगत नहीं है. यूं भी हमारे तमाम आंदोलन एकांगी दृष्टि के शिकार रहते हैं. खिड़की एक्सटेंशन प्रकरण में व्यवस्था के दो तरह के शिकार लोग रहते हैं. एक तरफ अफ्रीकी मूल की महिलाएं हैं, जिन्हें विदेश में नस्ली भेदभाव और शारीरिक शोषण का शिकार होना पड़ता है. दूसरी तरफ उस इलाके के स्थानीय लोग हैं, जिन्हें जिस्मफरोशी और ड्रग्स के धंधे को ङोलना पड़ता है.

पता नहीं, क्यों कुछ नारीवादियों ने ऐसा मान लिया है कि इन दोनों में से एक ही शोषित है, दूसरा शोषक. क्रांतिकारी आंदोलन पहले भी इस किस्म के एकांगी समझ के शिकार रहे हैं.  जिसमें छोटे किसान को शोषक और मजदूर को शोषित मान लिया जाता था. राजनीति का काम इन दोनों वर्गो की चिंताओं और दर्द में रिश्ता बनाना है, न कि इनमें से किसी एक को चुनना.

कहा जा रहा है कि आपकी पार्टी अधिकतर सीटों पर चुनाव लड़ेगी. ऐसे में ईमानदार प्रत्याशियों के चयन की समस्या तो होगी ही?

यह बहुत बड़ी चुनौती है. अवसर बड़ा है, झोली छोटी है. देश की जनता इतना कुछ उड़ेलने को तैयार है और हमारे संगठन के बर्तन छोटे हैं. पिछले दो माह में देश में चारों तरफ से व्यक्ति, संगठनों और कार्यकर्ताओं ने संपर्क करने की कोशिश की है. हम तो उनमें से अधिकतर को जवाब भी नहीं दे पा रहे हैं. कई बार अपराधी महसूस कर रहे हैं कि हम इतिहास के साथ न्याय नहीं कर पा रहे हैं. फिर भी हमारी कोशिश है कि देश भर में ईमानदार और जमीन से जुड़े नये नेतृत्व को ढूंढ़ सकें. उसे पार्टी में जगह दे सकें. इसके लिए हमने देश भर के जनांदोलनों से संपर्क किया है. हम दिन-रात नये लोगों से मिल रहे हैं. उम्मीद करते हैं कि हम बहुत भूल नहीं करेंगे या अगर हम भूल करेंगे भी, तो जनता हमें ठीक कर देगी.

लेकिन आपने कहा है कि ज्यादातर क्रांतिकारी आंदोलन, जनांदोलन एकांगीपन के शिकार रहते है. ऐसे में मौजूदा राजनीति के मद्देनजर इनसे कितनी उम्मीद की जा सकती है?

मुङो हमेशा लगता है कि जनांदोलनों का राजनीतीकरण अनिवार्य है. जब तक जनांदोलन एक मुद्दे, एक वर्ग से बंधे रहते हैं, उनमें एकांगीपन रहता है. राजनीतीकरण का मतलब है कि किसान आंदोलन को भूमिहीन दलित के मुद्दे के साथ जोड़ना. शहरी गरीब की आकांक्षाओं को पर्यावरण के साथ जोड़ना. राजनीतीकरण ही एकांगीपन की बीमारी का इलाज है.

अक्सर कहा जाता है कि यह गंठबंधन का दौर है. लेकिन आप लोग ‘एकला चलो की नीति’ पर चलते दिख रहे हैं?

गंठबंधन राजनीति की अनिवार्यता है. राजनीति का मतलब है अलग-अलग वर्ग, सामाजिक हित, क्षेत्र और विचार को जोड़ कर एक छतरी के नीचे लाना. इस मायने में ‘आप’ सामाजिक और वैचारिक गंठबंधन की राजनीति करेगी. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उसकी राजनीति पार्टियों के गंठबंधन पर आधारित हो. पार्टियों का गंठबंधन तब जरूरी होता है, जब या तो सब पार्टियां अपने शीर्ष तक पहुंच कर भी स्पष्ट जनादेश से नीचे रह जायें या फिर जब पार्टियां अलग-अलग वर्ग या हित का प्रतिनिधित्व करें. ‘आप’ ऐसी किसी स्थिति में नहीं है. यूं भी एक नयी पार्टी गंठबंधन की सोच भी नहीं सकती. अभी किसी को पता नहीं कि बिहार या झारखंड में हम कितने पानी में हैं. ऐसे में गंठबंधन करने का मतलब संगठन निर्माण की संभावना को शुरू में ही दफन कर देना है.

अरविंद केजरीवाल के सिवा आपके दल में और कोई बड़ा चेहरा नहीं दिखता. सीएम भी केजरीवाल, पीएम भी केजरीवाल. तो फिर अलग-अलग स्तर पर नेतृत्व कैसे उभरेगा?

अभी तो शुरुआत है. शुरू में तो पार्टी का चुनाव चिह्न् भी केजरीवाल थे. नेता भी वही थे, और प्रणोता भी. लेकिन आगे चल कर नया नेतृत्व उभरेगा. नेता आंदोलन पैदा नहीं करते, बल्कि आंदोलन नेता पैदा करते हैं. समावेशी विकास की चर्चा अक्सर होती है. मौजूदा केंद्र सरकार का भी यह नारा है. ‘आप’ वैचारिक स्तर पर किस तरह के विकास मॉडल के साथ है?

समावेशी विकास का मुहावरा बहुत पुराना है. यह स्थापित सत्ता की राजनीति का मुहावरा है. ये जरूर है कि पूंजीवाद के नग्न स्वरूप के सामने यह मुहावरा भी कुछ सुंदर लगने लगा है. नरेंद्र मोदी के विकास मॉडल के मुकाबले समावेशी विकास बहुत बेहतर चीज है, लेकिन ‘आप’ की स्वराज की समझ कहीं न कहीं विकास की स्थापित समझ से दूर ले जाती है.

सवाल सिर्फ विकास की स्थापित अवधारणा को समावेशी बनाने का नहीं, बल्कि विकास की एक वैकल्पिक अवधारणा बनाने की है. चुनौती यह नहीं है कि केंद्र सरकार अपने पैसे को गरीब, दलित और आदिवासी में बांटे. चुनौती यह है कि आर्थिक समृद्धि अंतिम व्यक्ति की खुशहाली की बुनियाद पर खड़ी हो. सच्च विकास वही है जिसमें सभी हाथों को काम मिले, काम का वाजिब दाम मिले. चुनौती यह नहीं है कि केंद्र सरकार गांव के लिए कल्याणकारी योजनाएं बनाये. चुनौती यह है कि गांव की खुशहाली के फैसले लोग खुद अपने गांव में ले सकें. यही सच्च स्वराज है.

इस सच्चे स्वराज का लक्ष्य पाने के लिए आपको बार-बार ‘अराजकतावादी’ होना पड़ेगा, मुख्यमंत्री (सरकार में) होकर भी सड़क पर उतरना होगा? मैं हैरान हूं कि गांधी के देश में हम लोग ‘अराजकतावाद’ को गाली के रूप में इस्तेमाल करने लगे हैं. हैरान हूं कि लोकतंत्र में हम लोक से इतना घबराने लगे हैं. सत्ता का रास्ता सड़क से होकर जाता है. बीच-बीच में वापस सड़क पर आ जायें, तो इसमें बुरा क्या है? खुली सड़क पर रात गुजारने से ताजा हवा भी मिलती है.