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हर जिले में नहीं होती है मिट्टी की जांच

राज्य की 80 प्रतिशत जनता गांवों में रहती है और उसमें भी 80 प्रतिशत लोग सीधे तौर पर खेती से जुड़े हैं. खेती ही ऐसे लोगों की जीविका का मूल आधार है. इसके बाद भी खेती के विकास को लेकर हमारा सरकारी महकमा गंभीर नहीं है. कृषि में उत्पादकता बढ़ाने के लिए द्वितीय हरित क्रांति, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन, राष्ट्रीय कृषि विकास योजना, राष्ट्रीय बागवानी मिशन आदि कई केंद्र प्रायोजित योजनाओं के साथ-साथ राज्य सरकार की अपनी योजनाएं हैं. जिला स्तर पर कई संस्थाएं है जिन पर स्थानीय आवश्यकतानुसार नयी खोजों के जरिये कृषि उत्पादन बढ़ाने की जिम्मेदारी है. इसमें कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि प्रौधोगिकी प्रबंधन अभिकरण (आत्मा), जिला कृषि कार्यालय आदि प्रमुख हैं. ये सब आधुनिक  एवं वैज्ञानिक खेती को लेकर लंबी-चौड़ी बातें तो करते हैं. लेकिन, ये बातें महज कोरी लफ्फाजी है.

पढ़िये उमेश यादव की यह रिपोर्ट.
अच्छी खेती के लिए हर खेत की मिट्टी जांच जरूरी है. इससे खेत की मिट्टी में  विभिन्न पोषक तत्वों की कमी एवं अधिकता का पता चलता है. पोषक तत्वों की कमी या अधिकता का पता चलने के बाद विशेषज्ञ की सलाह पर मिट्टी का उपचार कर खेत को उपजाऊ बनाया जा सकता है. एक बार पोषक तत्वों की कमी का पता चल जाने पर आप आवश्यकतानुसार उचित रासायनिक खादों का प्रयोग कर कमी को दूर कर सकते हैं. इससे फसल का उत्पादन अच्छा होने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी अधिक समय तक  बनी रहती है.  इससे यह भी पता चलता है कि कौन-सा खेत किस फसल के लिए सबसे उपयुक्त है.  लेकिन, राज्य में मिट्टी जांच का प्रचलन नगण्य है. इतने सारे फायदे के बाद भी किसान मिट्टी जांच नहीं कराते हैं. इसके पीछे किसानों में जागरूकता की कमी बतायी जाती है. लेकिन, वास्तव में यह सरकार की नाकामी है.

13 साल बाद भी हर जिले में एक मिट्टी जांच प्रयोगशाला तक नहीं है. जबकि यह सुविधा ग्राम पंचायत स्तर पर होनी चाहिए. अभी पूरे राज्य में सिर्फ आठ मिट्टी जांच प्रयोगशाला से ही काम चलता है. इसमें रांची, चक्रधरपुर, गिरिडीह, गुमला, हजारीबाग, लातेहार, साहिबगंज एवं दुमका शामिल है. यानी हर प्रयोगशाला के पास औसतन तीन जिले हैं. दूरी की लिहाज से देखें तो औसतन  70 से 80 किलोमीटर की दूरी पर एक प्रयोगशाला है. इसके बाद भी इन प्रयोगशालाओं की हालत खस्ताहाल है. रांची के कांके स्थित कृषि कैंपस में जो प्रयोगशाला है उसके पास चार जिले रांची, खूंटी, लोहरदगा एवं सरायकेला है. इस प्रयोगशाला के लिए वित्तीय वर्ष 2012-13 में 11500 मिट्टी के नमूने की जांच का लक्ष्य रखा गया था. लेकिन, इसमें से महज 1701 नमूने की ही जांच हो पायी. यानी लक्ष्य की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत नमूने की ही जांच हुई. इसी तरह चालू वित्तीय वर्ष में इसके लिए 13 हजार नमूने की जांच का लक्ष्य विभाग ने निर्धारित किया है. लेकिन, अभी तक 2230 नमूने ही जांच के लिए प्राप्त हुए हैं.

जो नमूने प्रयोगशाला में आये हैं उसमें रांची के 425, खूंटी के 1203, लोहरदगा के 362 एवं सरायकेला के 240 शामिल हैं.  यहां पर अब तक जो 395 नमूने की जांच हुई है उसमें रांची के 212, खूंटी के 175, लोहरदगा के आठ एवं सरायकेला का शून्य है. यह स्थिति इसलिए है क्योंकि प्रयोगशाला में आवश्यकतानुसार पर्याप्त संसाधन नहीं है. कर्मचारियों के साथ-साथ अत्याधुनिक उपकरण एवं केमिकल की कमी है. प्रयोगशाला के कर्मचारियों के मुताबिक यहां पर प्रतिदिन 08 नमूने की पूर्ण जांच संभव है. यानी प्रयोगशाला की क्षमता महीने में 240 और साल में 2880 नमूने की ही जांच की है. कर्मचारियों के मुताबिक यह क्षमता वर्षो पुरानी है और इसलिए लक्ष्य की प्राप्ति नहीं हो पाती है.

       
इसी तरह हजारीबाग जिले में जो प्रयोगशाला है उसके अंतर्गत दो जिले हैं. एक अन्य जिला रामगढ़ है. लेकिन, यहां के प्रयोगशाला की स्थिति यह है कि यहां पर एक भी स्टाफ नहीं है. बकौल जिला कृषि पदाधिकारी सुखदेव हेंब्रम स्टाफ  नहीं होने की वजह से गुमला के पौधा संरक्षक इंस्पेक्टर की प्रतिनियुक्ति मिट्टी जांच प्रयोगशाला में की गयी है. कृषि निदेशालय की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले साल इस प्रयोगशाला को सात हजार नमूना जांच का लक्ष्य मिला था. लेकिन, एक भी नमूने की जांच नहीं हुई.

हालांकि जिला कृषि पदाधिकारी श्री हेंब्रम इस बात से इंकार करते हैं और कहते हैं कि कुछ नमूनों की जांच हुई है. राज्य सरकार के नियंत्रणाधीन संचालित प्रयोगशालाओं में सिर्फ इन दोंनों जगहों की ही नहीं बल्कि सभी आठ का यही हाल है.


कृषि विज्ञान केंद्र तक नहीं है सभी की पहुंच
राज्य के सभी जिलों में एक कृषि विज्ञान केंद्र है. यह केंद्र भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद की देखरेख में संचालित होता है. इसकी फंडिंग भी वहीं से होती है. हालांकि राज्य में इसका प्रशासनिक नियंत्रण विभिन्न संस्थाओं के जिम्मे है. 18 केंद्र बिरसा कृषि विश्वविद्यालय के प्रशासनिक नियंत्रण में तो एक केंद्र देवघर वहां के  जिला प्रशासन के नियंत्रण में है. चार केंद्र हजारीबाग, गुमला, रांची एवं गोड्डा का प्रशासनिक नियंत्रण निजी संस्थाओं के हाथ है. इसमें रांची केवीके रामकृष्ण मिशन, गोड्डा केवीके ग्रामीण विकास ट्रस्ट, गुमला केवीके विकास भारती और हजारीबाग केवीके होली क्रॉस मिशन के जिम्मे है. इन सभी कृषि विज्ञान केंद्रों का उद्देश्य अपने-अपने जिले की जलवायु एवं मौसम के अनुसार कृषि तकनीक का विकास करना है. इसके लिए लगभग सभी के पास अपना-अपना एक मिट्टी जांच प्रयोगशाला भी है. लेकिन, इन प्रयोगशालाओं तक सबकी पहुंच नहीं है. ये संस्थाएं मिट्टी जांच के मामले में उन्हीं गांवों तक सीमित हैं जहां पर इनका विभिन्न प्रकार का अनुसंधान चलता है.

दुमका केवीके के समन्वयक डॉ श्रीकांत सिंह के मुताबिक उनके यहां मुख्यत: उन्हीं गांवों के मिट्टी के  नमूनों की जांच होती है जिसे केंद्र ने गोद लिया है और जहां पर विभिन्न प्रकार के रिसर्च होते हैं. उनके मुताबिक दुमका केवीके में हर महीने औसतन 25 नमूनों की जांच होती है. लोहरदगा कृषि विज्ञान केंद्र में तो अब तक मिट्टी जांच की सुविधा ही नहीं है. यहां के कार्यक्रम समन्वयक डॉ शंकर कुमार सिंह बताते हैं कि दो जिलों के चक्कर में उनके यहां अब तक मिट्टी जांच प्रयोगशाला की स्थापना नहीं हो पायी है. रांची में रामकृष्ण मिशन के प्रशासनिक नियंत्रण में संचालित दिव्यायन कृषि विज्ञान केंद्र में मिट्टी जांच प्रयोगशाला है. इसकी क्षमता भी हर साल पांच हजार नमूनों के जांच की है. लेकिन, वर्तमान में हर साल औसतन 1500 तक नमूनों की ही जांच हो पाती है. इसके पीछे यहां के वैज्ञानिक जागरूकता के अभाव में कम नमूने आने की बात कहते हैं.


13 साल में नहीं हुई एक भी नये प्रयोगशाला की स्थापना
मिट्टी की जांच के लिए 13 साल में एक भी नये प्रयोगशाला की स्थापना राज्य में नहीं हुई. सरकार ने वित्तीय वर्ष 2011-12 के बजट में राज्य योजना मद से हर जिले में एक प्रयोगशाला भवन बनाने का निर्णय भी लिया. लेकिन, इसकी तकनीकी एवं प्रशासनिक स्वीकृति में ही दो साल बीत गये. 16 लाख से बनने वाले इन भवनों की वर्तमान स्थिति यह है कि कई जिलों में टेंडर की प्रक्रिया चल ही रही है. कई जिलों टेंडर ही नहीं निकला है. कई जिलों में टेंडर की प्रक्रिया पूरी कर ली गयी है. लेकिन, वहां पर अभी तक काम शुरू भी नहीं हुआ है.

       
हजारीबाग जिला कृषि पदाधिकारी सुखदेव हेंब्रम के मुताबिक उनके यहां हजारीबाग में एक एवं रामगढ़ जिले में दो प्रयोगशाला भवन का निर्माण होना है. काम ग्रामीण कार्य विभाग को आवंटित हुआ है. लेकिन, टेंडर नहीं हुआ है. इसी तरह रांची में भवन निर्माण विभाग को काम मिला है. टेंडर की प्रक्रिया पूरी कर ली गयी है. हेहल स्थित कृषि प्रसार प्रशिक्षण केंद्र में इसका निर्माण कार्य चल रहा है. लेकिन, अभी प्लींथ लेबल तक ही काम हुआ है. इसके पूरा होने में कम से कम और तीन महीने का वक्त लगेगा. इसी तरह देवघर में सदर प्रखंड मुख्यालय में इसका निर्माण होना है. लेकिन, काम शुरू नहीं हुआ है.


नहीं मिला मृदा स्वास्थ्य कार्ड
झारखंड के सभी किसानों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड देने की घोषणा 11वीं पंचवर्षीय योजना में ही की गयी थी. घोषणा के मुताबिक मिट्टी जांच के बाद किसानों को एक कार्ड दिया जाता जिसमें उनकी मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों की विवरणी होती है. लेकिन, मिट्टी जांच की सुविधा पर्याप्त नहीं होने पर यह कार्ड राज्य के किसानों को उपलब्ध नहीं कराया जा सका है. कितने लोगों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड उपलब्ध कराया गया है. इस बारे में समेती के निदेशक जटाशंकर चौधरी ने बताया कि उनके पास इससे संबंधित कोई जानकारी नहीं है. कृषि निदेशालय योजना कोषांग के पास भी इसकी जानकारी नहीं है.


अधिकारी देते थोथी दलील
राज्य में मिट्टी जांच की क्या सुविधा है. इस बारे में बात करने पर प्रभारी कृषि निदेशक राजेश कुमार शर्मा कहते हैं कि हर जिले में एक कृषि विज्ञान केंद्र और आठ जगहों पर राज्य सरकार का प्रयोगशाला है जहां पर नमूनों की जांच होती है. इसके अलावा राज्य योजना मद से 25 जिलों में नये प्रयोगशाला की स्थापना की जा रही है. सभी जगहों पर भवन बन गया है. जल्द ही इसे चालू कर दिया जायेगा. लेकिन, सच्चई यह है कि न तो भवन बने हैं और न ही यह तय हुआ है कि इन प्रयोगशालाओं का संचालन कैसे होगा. इसकी पुष्टि विभिन्न जिला कृषि पदाधिकारी एवं राज्य कृषि प्रबंधन एवं प्रसार प्रशिक्षण संस्थान (समेति) के निदेशक के बात से भी होती है. समेती राज्यस्तर पर तकनीक के प्रचार-प्रसार के लिए काम करती है. जिलों में स्थित कृषि प्रोद्यौगिकी प्रबंधन अभिकरण (आत्मा) के बीच आपसी समन्वय का कार्य भी इसके जिम्मे है. इसके निदेशक जटाशंकर चौधरी से जब मिट्टी जांच प्रयोगशाला के बारे में बात की गयी तो उन्होंने बताया कि विभिन्न प्राइवेट एजेंसियों से बात चल रही है. जल्द ही निर्णय हो जायेगा कि संचालन राज्य सरकार स्वयं करेगी या प्राइवेट एजेंसी. इस तरह देखा जाय तो सभी जगह भवन बनकर तैयार होने और संचालन प्रकिया तय होने में छह महीने से अधिक लगेंगे.