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हलमा: सामुदायिक भागीदारी से सूखे का हल निकालते झाबुआ के आदिवासी

मोंगाबे हिंदी, 02 मई

मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के सूखे पहाड़ गर्मी की शुरुआत में ही आग उगल रहे हैं। साढ़ गांव की बाड़ी बोदरी फलिया की एक बेहद जर्जर झोपड़ी में 12 साल की गली अपने से छोटे दो भाई-बहनों के लिए चूल्हे पर रोटी सेक रही है। गली, संता और केतन के माता-पिता दिवाली पर मजदूरी के लिए गए थे। तब से वापस नहीं लौटे हैं। पड़ोस में रहने वाले रूपसिंह ने बताया, “गली और उसके भाई-बहन गांव में अकेले रहते हैं। गली के पिता बहादुर बाखड़ा के खेत पर सिंचाई की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। इससे खेती में भारी नुकसान हुआ और उन्हें कर्ज लेना पड़ा। इसी कर्ज को चुकाने के लिए वे मजदूरी के लिए गुजरात गए हुए हैं।”

दरअसल, जल संकट झाबुआ जिले में रहने वाले आदिवासियों की प्रमुख चिंता है। ये संकट उनके लिए कई समस्याएं लेकर आता है। पीने के पानी समस्या तो इनमें सबसे विकराल है। फसलों को पानी देने का संकट अलग से है। इससे वे साल में सिर्फ एक ही फसल ले पाते हैं। इसके चलते पलायन, मजदूरी, भुखमरी और शोषण का कुचक्र शुरू होता है।
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