Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 73
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 74
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Warning (512): Unable to emit headers. Headers sent in file=/home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php line=853 [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 48]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 148]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 181]
Notice (8): Undefined variable: urlPrefix [APP/Template/Layout/printlayout.ctp, line 8]news-clippings/हिमालय-में-हो-ग्रीन-बोनस-का-सही-उपयोग-सुरेश-भाई-8891.html"/> न्यूज क्लिपिंग्स् | हिमालय में हो ग्रीन बोनस का सही उपयोग- सुरेश भाई | Im4change.org
Resource centre on India's rural distress
 
 

हिमालय में हो ग्रीन बोनस का सही उपयोग- सुरेश भाई

स्वस्थ पर्यावरण के लिए 33 प्रतिशत क्षेत्र में वन होने चाहिए, लेकिन भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 23.69 प्रतिशत क्षेत्र में ही वन हैं। हां, भारतीय हिमालय क्षेत्र के 45 प्रतिशत से अधिक इलाके में वन मौजूद हैं।

हिमालय क्षेत्र की यह देन भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के अन्य देशों की जलवायु को नियंत्रित करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। कोपेनहेगन में 2009 में हुए जलवायु सम्मेलन के दौरान सभी देशों ने मिलकर यह निर्णय किया था कि जहां वन क्षेत्र पर्यावरण के स्वस्थ मानकों के अनुसार है, वहां पर विकसित राष्ट्र हरियाली को बनाए रखने के लिए सहायता करेंगे।

इसके बाद यूपीए सरकार के वन और पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने सन 2009 के शिमला सम्मेलन में हिमालयी राज्यों को इको सर्विस (पर्यावरणीय सेवा) के रूप में ग्रीन बोनस देने की बात स्वीकार की थी। ग्रीन बोनस का लाभ ऑक्सीजन के उत्पादन को बढ़ाने में हो सकता है, जिसमें खासकर उस समाज को विशेष लाभ पहुंचाने की बात उठाई गई है, जिन्होंने वर्षों से वनों को सहेजकर रखा हुआ है।

उत्तराखंड में यह मांग सन 1997 से प्रारंभ हुई, जिसमें कहा गया था कि पर्यावरण में शुद्ध ऑक्सीजन देने वाले हिमालयी राज्यों को रॉयल्टी मिलनी चाहिए। इस बार हिमालय दिवस पर यह मांग उठ रही है, ताकि लोगों का जुड़ाव वन संरक्षण के साथ बना रहे।

यह इसलिए भी जरूरी है कि वन अधिनियम-1988 के बाद हिमालय क्षेत्र पर बेवजह पर्यावरण का बोझ बनाकर समाज के बीच एक ऐसी धारणा बनाई गई कि जंगल बचाने से विकास रुकता है। इसके बावजूद हिमालय के ग्रामीण अपने जंगल बचाकर रखे हुए हैं।

उत्तराखंड के लोगों ने जंगलों को बचाने के लिए पेड़ों पर चिपको और रक्षा-सूत्र आंदोलन चलाया। कई गांवों के लोग अपने पाले हुए जंगलों से चारा-पत्तियां तौलकर लाते हैं। आज भी गांव के लोगों ने अपने मिश्रित वन पाले हुए हैं, जिनकी सुरक्षा ग्राम चौकीदारी प्रथा से होती है। हिमालय क्षेत्र पर्यावरण सेवा के रूप में लगभग 944 अरब रुपये के बराबर लाभ देता है, जिसमें ऑक्सीजन, पानी, मिट्टी जलवायु नियंत्रण आदि को आंका गया है।

इन सबको ध्यान में रखकर उत्तराखंड ने भी लगभग 36,000 करोड़ रुपये के बराबर ग्रीन बोनस की मांग की है। पिछली सरकार ने इसे स्वीकार किया था और वर्तमान सरकार ने भी अकेले उत्तराखंड को 4,400 करोड़ रुपये ग्रीन बोनस के रूप में देना स्वीकार किया है। वैसे जरूरी यह भी है कि इस ग्रीन बोनस का इस्तेमाल हिमालयी प्रदेशों की सरकारें वनीकरण को बढ़ावा देने के लिए करें। उस परंपरागत व्यवस्था को मजबूत करने के लिए इस राशि का इस्तेमाल करें, जिसने अभी तक ये जंगल बचाकर रखे हैं। यह इसलिए जरूरी है कि कहीं इन प्रदेशों में ग्रीन बोनस से आने वाला धन कार्बन उत्सर्जन बढ़ाने वाले कार्यक्रमों पर न खर्च होने लगे।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)