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‘पहले बच्चा पढ़ेगा, तब न बड़ा होके हाय-फाय चलायेगा’--

कहानी बिहार के पहले वाइ फाइ गांव बेलदारीचक की
पुष्यमित्र
बेलदारीचक (पटना)
pushyamitra@prabhatkhabar.in

जैसे ही इस संवाददाता ने तसवीर ली विनोद कुमार दौड़े-दौड़े आये. उनकी सहज जिज्ञासा थी कि उनकी दुकान की तसवीर क्यों ली जा रही है. जब उन्हें बताया गया कि उनकी दुकान की तसवीर नहीं बल्कि दुकान के पीछे लगे बीएसएनएल के टावर की तसवीर ली गयी है, जिसमें वाइ-फाइ वाली मशीन लगी है. यह सुनकर ठीक-ठाक पढ़े लिखे और युवा नजर आने वाले विनोद का अगला सवाल था, ये वाइ-फाइ क्या होता है. बिहार के पहले वाइ-फाइ गांव में किसी सजग व्यक्ति से इस तरह के सवाल की उम्मीद मैं नहीं कर रहा था.

मैं इस ख्याल से वहां गया था कि एक पखवाड़े पहले घोषित इस वाइ-फाइ ग्राम में उत्सवी माहौल होगा, लोग बड़ी उत्सुकता से केंद्र सरकार की इस सेवा का उपयोग करना सीख रहे होंगे. मगर दुर्भाग्यवश इस गांव की यात्रा के दौरान बमुश्किल चंद कॉलेज गोइंग लड़के ऐसे मिले जिन्हें पता था कि पिछले महीने की 23 तारीख को केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने बेलदारीचक को बिहार का पहला वाइ-फाइ गांव घोषित किया है.

यह सच है कि घोषणा के साथ-साथ गांव में वाइ-फाइ की सुविधा शुरू हो गयी है. गांव की सीमा में घुसते ही मेरे मोबाइल में बीएसएनएल के वाइ-फाइ का सिग्नल आने लगा था.

पहले 20 मिनट की फ्री सेवा का लुत्फ उठाने के लिए मैंने खुद को कनेक्ट भी कर लिया. हालांकि सिग्नल वीक था, मगर वाइ-फाइ काम कर रहा था. मगर ज्यादातर लोग डिजिटल इंडिया के महत्वाकांक्षी अभियान में अपने गांव की भागीदारी से अनभिज्ञ थे.
यह सोच कर कि मोबाइल दुकानदारों को इस सेवा के बारे में जानकारी होगी, मैंने एक ऐसे ही व्यक्ति से संपर्क किया. उन्होंने बताया कि हां, वाइ-फाइ तो शुरू हो गया है मगर उनके पास स्मार्ट फोन नहीं है, इसलिए वे इस सेवा का लाभ नहीं उठा पा रहे. पास ही एक हार्डवेयर संचालित करने वाले युवक ने कहा, उन्होंने भी यह खबर सुनी है, मगर उन्हें वाइ-फाइ कनेक्ट करना नहीं आता. दोनों ने एक अन्य मोबाइल दुकानदार के पास भेजा जो इस सेवा का इस्तेमाल कर चुके हैं.

उस दुकान के मालिक ने हमें अपने छोटे भाई विक्की से मिलवाया. विक्की कुमार जो एक कॉलेज के छात्र हैं, ने कहा, जिस दिन गांव में इस सेवा की शुरुआत हुई थी, उस रोज उन्होंने यूज किया था. मगर चूंकि एक नंबर पर एक ही बार 20 मिनट फ्री इस्तेमाल किया जा सकता है, इसलिए वे दुबारा यूज़ नहीं कर पाये.हालांकि विक्की के मुताबिक कुछ लोग सिम बदल-बदल कर इस सेवा का इस्तेमाल कर रहे हैं.

मगर ऐसे लोगों की संख्या बेहद कम है और यह कोई सस्ता सौदा नहीं है. कुल मिलाकर कॉलेज जाने वाले कुछ लड़कों ने एक-एक बार फ्री में वाई-फाई यूज कर लिया है, उसके बाद गांव का वाइ-फाइ उनके लिए किसी मतलब का नहीं रहा. फ्री वाई-फाई यूजर की तलाश में हमें चन्दन कुमार रौशन और राजू मिले. चंदन कॉमर्स कॉलेज, पटना में पढ़ते हैं और राजू हरियाणा के एक इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र हैं. इन दिनों छुट्टियों में घर आये हुए हैं. इन दोनों ने भी एक-एक बार वाइ-फाइ यूज किया है. चंदन तो उस कार्यक्रम के भी गवाह हैं जिसमें गांव को बिहार का पहला वाइ-फाइ गांव बताया गया था.

वे कहते हैं, 23 जून को गांव में कार्यक्रम हुआ था. कहा तो गया था कि केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद भी आयेंगे. मगर शायद किसी व्यस्तता की वजह से वे आ नहीं पाये. उन्होंने पटना में ही एक कार्यक्रम में इस बात की घोषणा कर दी. बाद में उनके ट्विटर अकाउंट से भी इस खबर की पुष्टि हुई. गांव के कार्यक्रम में दिल्ली के दो इंजीनियर आये थे.

उन्होंने फ्री वाइ-फाइ यूज करने का तरीका बताया. हालांकि उन्होंने यह नहीं बताया कि कोई व्यक्ति एक बार फ्री सेवा इस्तेमाल करने के बाद दुबारा उस सेवा का कैसे उपयोग करे. पैसे चुका कर ही सही. इसके बाद दोनों हमें गांव के दूरभाष केंद्र ले गये. एक पतली सी गली जो कीचड़ से भरी थी को पार करके हम वहां पहुंच सके. वहां कोई कर्मचारी नहीं था. केंद्र पर ताला लगा था. चंदन ने बताया कि कहा गया था वाइ-फाइ का रेंज 20 किमी का होगा. मगर यह आधे किमी के दायरे में ही पकड़ता है. पूरे गांव तक भी इसकी पहुंच नहीं है.

वैसे बेलदारीचक बहुत बड़ा गांव नहीं है. तीन हजार की आबादी वाले इस गांव में मुख्यतः दलित और अतिपिछड़ी जाति के लोग रहते हैं. ज्यादातर लोग खेती और मजदूरी के काम से जुड़े हैं.

पटना-गया हाइवे के किनारे स्थित होने के कारण एक छोटा सा बाजार भी विकसित हो गया है, जहां कई तरह की दुकानें खड़ी हो गयी हैं. मगर राजधानी से करीब और हाइवे पर होने का बहुत अधिक लाभ इस गांव को नहीं मिला. लोग बताते हैं कि यहां पानी की किल्लत रहती है. पढ़ाई-लिखाई और स्वास्थ्य सेवा का घोर अभाव है. गांव के अंदर में अच्छी सड़कें नहीं हैं.

लखना पूर्वी पंचायत के नवनिर्वाचित मुखिया द्वारिका पासवान इसी गांव में रहते हैं. वे वाई-फाई का जिक्र सुनते ही भड़क उठते हैं. कहते हैं, बच्चा पढ़ेगा तब न बड़ा होके हाई-फाई(वाइ-फाइ) करेगा. जाके स्कूल देखिये. अपर मिडिल स्कूल है, लेकिन क्लास रूम एक्के ठो है.

बताइये एक कमरा में कहीं एक से आठ क्लास का बच्चा एक साथ पढ़ सकता है? उसका कोई इंतजाम नहीं किये, लेकिन क्या मन हुआ कि हाई-फाई कर दिये. गांव का हेल्थ सेंटर प्राइवेट मकान में चलता है. लोगों को पीने के लिए पानी नहीं मिलता है. पहले इसका इंतजाम जरूरी है न.

वे मुझे गांव के उस एकमात्र असहाय उत्क्रमित मध्य विद्यालय का दर्शन कराते हैं, जहां बारिश के दिनों में पहुंचना भी मुश्किल है. स्कूल के आगे पानी जमा रहता है और बच्चे पगडंडी पर चलते हुए स्कूल पहुंचते हैं. महज एक कमरे वाले इस स्कूल में एक कक्षा कमरे में तो दूसरी बरमादे पर लगती है. और जब स्कूल नहीं चल रहा होता है तो यह सामुदायिक भवन जैसा हो जाता है. कोई यहां बैठकर जाल बुनता है तो कोई ताश खेलता है.

बाय-फाय कि फाय-फाय... मच्छड़दानी बंटे है का हो...

स्कूल देख कर लौटते वक्त एक दवा दुकान के मालिक निरंजन कुमार मिलते हैं. वे कहते हैं कि यह गलत जानकारी है कि बेलदारीचक बिहार का पहला वाई-फाई गांव है. उन्होंने फुलवारीशरीफ में अपने एक संबंधी के एक घर में भी वाई-फाई चलते हुए देखा है. इस पर साथ चल रहे राजू उन्हें समझाते हैं कि वह उनका पर्सनल वाई-फाई होगा. यहां तो पूरे गांव में वाई-फाई चलाया जा रहा है.

तभी हमारी बातचीत सुन रही एक महिला लीला देवी पूछ बैठती हैं, ई का कहत हो... बाय-फाय कि फाय-फाय... मच्छड़दानी बंटे है का हो... हम मुस्कुराते हुए उनकी बातों का जवाब दिये बगैर आगे बढ़ जाते हैं. वहां से लौट कर यह संवाददाता जब बेलदारीचक में फ्री वाई-फाई की स्थिति पर बीएसएनएल के पटना स्थित अधिकारियों से जानकारी की मांग करता है, तो अधिकारी अनभिज्ञता जाहिर करते हैं.

बीएसएनएल के जीएम ऑपरेशन सत्यानंद राजहंस कहते हैं, उनकी जानकारी में सिर्फ हाइकोर्ट परिसर को ही वाइ-फाइ किया गया है. बेलदारीचक में ट्रायल चल रहा होगा. मगर जब उन्हें केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद के ट्वीट के बारे में बताया जाता है, तो वे कहते हैं उन्हें इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं है.