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‘माननीयों’ को बस अपनी चिंता-- आशुतोष चतुर्वेदी

सांसदों के वेतन, भत्तों और पेंशन में बढ़ोत्तरी के फैसले और इसके तौर तरीके पर सवाल उठ रहे हैं. देश की सर्वोच्च अदालत ने जब इस पर सवाल उठाया, तो सांसदों को यह नागवार गुजरा और कुछेक सांसदों ने तो न्यायपालिका से दो टूक शब्दों में कहा कि वह अपनी सीमा में रहे.


सांसदों की दलील थी कि अपना वेतन-पेंशन बढ़ाने का अधिकार उनके पास है और अदालतें इस विशेषाधिकार में हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं. सांसदों के साथ सरकार भी खड़ी थी और वह भी न्यायपालिका को आड़े हाथों लेने में पीछे नहीं रही.



दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने सांसदों को दी जानेवाली पेंशन और अन्य भत्तों को समाप्त करने की अपील संबंधी एक याचिका पर केंद्र और निर्वाचन आयोग से जवाब मांग लिया था. याचिका में कहा गया था कि सांसदों को पेंशन मिलना संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है.


यह अनुच्छेद देश के सभी नागरिकों को समानता का अधिकार प्रदान करता है. चूंकि रिटायरमेंट के बाद पेंशन तभी मिलती है, जब उसमें कर्मचारी और नियोक्ता का अंशदान रहा हो. सांसद अपने कार्यकाल के दौरान अपने वेतन-भत्तों में से किसी प्रकार अंशदान पेंशन के लिए नहीं देते हैं और न ही सरकार इस प्रकार का कोई योगदान देती है. सुप्रीम कोर्ट ने पेंशन के मामले में एक टिप्पणी और की कि 80 फीसदी पूर्व सांसद करोड़पति हैं, ऐसे में पेंशन का क्या औचित्य.



किसी भी मामले पर सांसदों में ऐसी एकजुटता आपको नजर नहीं आयेगी, जैसी कि इस मामले में नजर आयी. तृणमूल कांग्रेस के सौगत राय ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन से कहा कि वह सदन की संरक्षक हैं, इसलिए वह सांसदों के अधिकारों की रक्षा करें.


सभी सांसदों ने मेज थपथपा कर उनका समर्थन किया. बीजू जनता दल के तथागत सत्पथी तो एक कदम आगे बढ़ गये और उन्होंने कहा कि सांसदों के साथ ही न्यायाधीशों की भी पेंशन समाप्त कर देनी चाहिए. सांसदों ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर चिंता जाहिर करते हुए इसे सांसदों की छवि धूमिल करने का प्रयास करार दे दिया. सरकार की ओर से संसदीय कार्यमंत्री अनंत कुमार ने कहा कि वेतन और भत्ता सांसदों का विशेषाधिकार है और संविधान के अनुच्छेद 106 में इसकी गारंटी है. इस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है. वित्त मंत्री अरुण जेटली ने कहा कि यह तय करने का विशेष अधिकार संसद को है कि सरकारी पेंशन लेने का हकदार कौन है और कितनी पेंशन लेने का हकदार है. यह संवैधानिक रुख है, जिसे प्रत्येक संस्थान को स्वीकार करना होगा.



भारत में जनप्रतिनिधि को समाज सेवक के तौर पर परिभाषित किया जाता है. उन्हें सादगी की मिसाल के रूप में देखा जाता है. उन्हें मितव्ययिता के रोल मॉडल के रूप में लोग देखना पसंद करते हैं. माना जाता है कि अपने बारे में सोचने से पहले वे आम लोगों के बारे में सोचेंगे. मुझे याद है कि संसद में सीपीआइ नेता और पूर्व गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्ता सादगी की मिसाल माने जाते थे. गृह मंत्री रहते हुए भी वे ईस्टर्न कोर्ट के फ्लैट में रहते थे. सीपीएम सांसद हन्नान मुल्ला के पास कोई कार नहीं थी, वे दिल्ली में संसद से अपने आवास हमेशा सरकारी वाहन से आया-जाया करते थे. हालांकि अब सीपीएम सांसद रीताब्रत बनर्जी अपनी महंगी एप्पल घड़ी और मोंट ब्लैंक पेन के कारण चर्चा में हैं. भाजपा के दिवंगत नेता जेपी माथुर और सुंदर सिंह भंडारी जब सांसद थे, तो वे भी सादगी की मिसाल माने जाते थे.


दोनों नेता अलग-अलग मकानों के बजाये एक सरकारी मकान से काम चलाते थे. इसी संसद में डॉ कर्ण सिंह जैसे नेता भी हैं, जो सांसद के रूप में कोई राशि नहीं लेते. लोकसभा और राज्यसभा के सांसदों को अभी 50 हजार रुपये वेतन मिलता है. इसके अलावा एक सांसद अपने क्षेत्र में कार्य कराने के लिए 45 हजार रुपये प्रतिमाह भत्ता पाने का हकदार होता है. कार्यालयीन खर्चों के लिए एक सांसद को 45 हजार रुपये प्रतिमाह मिलता है. उसे राजधानी में मुफ्त आवास और 50 हजार यूनिट बिजली मिलती है. संसद सत्र के दौरान उपस्थित रहने पर प्रतिदिन दो हजार रुपये मिलते हैं.


उन्हें दो लाख रुपये कंप्यूटर खरीदने के लिए मिलते हैं. उन्हें तीन लैंडलाइन और दो मोबाइल की सुविधा और सालाना 1.5 लाख कॉल करने की छूट मिलती है. इसके अलावा सांसदों को हर तीन महीने में 50 हजार रुपये घर के परदे और अन्य कपड़े धुलवाने के लिए मिलते हैं. छूट के साथ एक सांसद साल भर में 34 हवाई यात्राएं कर सकता है. ट्रेन में सांसद फर्स्ट क्लास एसी में सहायक के साथ कहीं की और कितनी बार भी यात्रा कर सकता है. सांसद अपने क्षेत्र में पांच करोड़ रुपये खर्च करने की सिफारिश कर सकता है.

इतना ही नहीं यदि वह पहले विधायक भी रहा है, तो उसकी पेंशन भी उसे मिलती रहती है. पूर्व सांसद के निधन के बाद उनके आश्रित को आजीवन पारिवारिक पेंशन दी जाती है. दिलचस्प तथ्य यह है कि आमतौर पर सरकारी कर्मचारी निर्धारित आयु सीमा के बाद पेंशन का हकदार होता है. लेकिन, यदि कोई 25 वर्ष की आयु में सांसद बन जाता है और उसके बाद संसद नहीं पहुंच पाता, वह भी आजीवन पेंशन का हकदार हो जाता है.


यह स्पष्ट रूप से दोहरे मापदंड हैं. आपका वेतन है, भत्ते हैं और पेंशन है और आप ही तय करने वाले हैं कि इसमें कितनी और कब बढ़ोतरी करनी है. ऐसे में जब सभी इस बात को स्वीकार करते हैं कि संसद में बहस का स्तर गिरा है, संसद में कामकाज अक्सर बाधित रहता है.


हर स्थान पर वेतनवृद्धि कामकाज के प्रदर्शन से जुड़ी रहती है, लेकिन सांसदों के लिए ऐसा कोई नियम नहीं है. नौकरीपेशा लोग और उनका पूरा परिवार हर साल वेतनवृद्धि का बेसब्री से इंतजार करता है. गृहणियों से लेकर बच्चे तक कई तरह के सपने बुनने लगते हैं. एरियर को लेकर खास उत्सुकता रहती है. आखिरकार कुछेक फीसदी की वेतन वृद्धि से उन्हें संतोष करना पड़ता है. दोगुनी और तीन गुना वेतनवृद्धि तो सपने की बात है.


दूसरी ओर कामगारों पर नजर डालें. पिछले साल दस केंद्रीय मजदूर संघों की हड़ताल हुई थी. तब मांग की गयी थी कि अकुशल मजदूर के लिए न्यूनतम मजदूरी की दर 6,330 रुपये महीने से बढ़ाकर 15 हजार रुपये कर दी जाये. इन संगठनों का दावा है कि इनके 15 करोड़ सदस्य हैं. फिर भी 15 करोड़ लोग अपने लिए न्यूनतम मजदूरी हासिल नहीं कर सके. पिछले साल न्यूतनम मजदूरी बढ़ी, लेकिन सिर्फ 7,098 रुपये ही हुई. वैसे भी न्यूनतम मजदूरी भी कितने लोगों को मिल पाती है. सिक्योरिटी गार्ड और आसपास काम करने वाले मजदूरों से हम पूछ सकते हैं कि वे पांच से छह हजार के वेतन में कैसे परिवार चलाते हैं.


देश के सामने ये चुनौतियां हैं, लेकिन ये चुनौतियां सांसदों, विधायकों के लिए नहीं हैं. सांसदों की वेतनवृद्धि एक नजीर बन जाती है और यह मिसाल विधायकों तक जा पहुंचती है. झारखंड में भी विधायकों के वेतनवृद्धि की तैयारी है, दिल्ली से लेकर हरियाणा तक के विधायकों की पिछले कुछ वर्षों में दोगुनी-तिगुनी हो चुकी है. सांसद, विधायक तो अपना वेतन बढ़ा लेते हैं क्योंकि यह सब उनके हाथ में है. लेकिन यह विडंबना है कि 15 करोड़ मजदूर अपने न्यूनतम वेतन के लिए संघर्ष करते रहते हैं और बढ़वा पाने में सफल नहीं हो पाते हैं.