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प्लास्टिक से बनाई सड़कें !


भारतीय शहरों का ज़िक्र हो और सड़कों की बात चले तो ध्यान आती हैं टूटी-बदहाल सड़कें और बड़े-बड़े गड्ढे.

ये सड़कें न सिर्फ ज़िंदगी की रफ्तार धीमी करती हैं बल्कि शहरों और कस्बों की खूबसूरती में पैबंद की तरह खटकती हैं.

लेकिन भारत का एक शहर ऐसा भी है जहां एक शख्स ने कूड़े-कचरे और बेकार प्लास्टिक से सड़कें बनाने की नायाब पहल की.

पेश है इस अनोखी कोशिश से जुड़ी सिटीज़न रिपोर्टर अहमद खान की ये रिपोर्ट.

''मेरा नाम अहमद खान है और मैं कर्नाटक के बंगलौर शहर का रहने वाला हूं.

90 के दशक में मैंने और मेरे भाई ने बंगलौर में एक प्लास्टिक के कारखाने की शुरुआत की. कारखाना तो कुछ ही सालों में चल निकला लेकिन समय के साथ हमें एहसास हुआ कि प्लास्टिक का ये सामान आखिरकार पर्यावरण के लिए कितना नुकसानदेह साबित होगा.

कचरे से सड़कें

इस समस्या का हल ढूंढने के लिए साल 2002 में मैंने इस कचरे से सड़कें बनाने का एक सफल तरीका इजाद किया.

हमने कई प्रयोग किए और जाना कि सड़कों को बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला कोलतार और प्लास्टिक एक ही तरह के रसायनों से बनते हैं. आखिरकार हमें एक फार्मुला तैयार करने में कामयाबी मिली और हमने कर्नाटक में इसे लागू करने की पहल की.

इस नई तकनीक के ज़रिए सड़कें बनाने के लिए हर तरह के प्लास्टिक के कचरे को अलग-अलग कर छांट लिया जाता है. इसके बाद कचरे का चूरा कर उसे कोलतार के साथ मिलाया जाता है और सड़क बिछाई जा सकती है.

बेहद टिकाऊ

जल्द ही सरकार ने इस नई तकनीक पर अपनी मुहर लगा दी और बंगलौर मुनिसिपल कॉरपोरेशन के ज़रिए हमने सड़कें बनाने का काम शुरु किया.

इस प्रयोग की सबसे बड़ी सफलता ये है कि इन सड़कों के ज़रिए हर तरह का प्लास्टिक का कचरा ठिकाने लगाया जा सकता है. इसमें प्लास्टिक के थैले, पैकिंग सामग्री, टूटी बाल्टियां, चप्पलें सभी कुछ शामिल है.

कई लोगों ने हमसे पूछा कि जब कंकरीट की भारी भरकम सड़कें मौसम और बारीश की मार नहीं झेल पातीं तो क्या प्लास्टिक की ये सड़कें टिकाऊ साबित होगीं.

दरअसल 2002 से अब तक हम अलग-अलग जगहों पर 2000 किलोमीटर से ज़्यादा की सड़कें बना चुके हैं. ये सड़कें सामान्य सड़कों से कई गुना अधिक मज़बूत साबित हुई हैं. प्लास्टिक असल में बेहद टिकाऊ होती है और पानी-गर्मी की मार आसानी से झेल सकती है. यही वजह है कि इससे सड़कों की मरम्मत का खर्च बचता है और सरकार को फायदा होता है.

भारत में शहरों से हर दिन कई टन प्लास्टिक का कचरा पैदा होता है. ये पर्यावरण के लिए जानलेवा है और लाखों टन के इस कचरे को ठिकाने लगाना प्रशासन के लिए एक मुसीबत लेकिन प्लास्टिक की इन सड़कों ने उम्मीद की एक नई किरण पैदा की है.

सरकारी आनाकानी

बंगलौर में हमने कचरा इक्ट्ठा करने के लिए एक नेटवर्क तैयार किया है. हम स्कूलों, रिहाइशी अपार्टमेंट्स और कूड़ा बीनने वालों से आठ रुपए प्रति किलो की दर से प्लास्टिक का कचरा खरीददते हैं. इससे लोगों को आमदनी होती है और पर्यावरण का बचाव भी.

लेकिन अपनी इस कामयाबी को मैं आज भी अधूरा मानता हूं. मैं चाहता हूं कि इस तकनीक के ज़रिए ज़्यादा से ज़्यादा सड़कें बनाई जाएं. कई राज्यों से मुझे उन्हें इसके लिए न्योता मिला लेकिन किसी ने भी इसे लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं दिलाई.

हमने दिल्ली में, हैदराबाद में कई जगहों पर इस तकनीक को लेकर योजनाएं पेश कीं लेकिन विडम्बना ये है कि नेता अगर इस तरह की योजना लागू करने इच्छाशक्ति दिखाते भी हैं तो नौकरशाही इन पर अमल को टालती रहती है. मैं नहीं समझ पाया हूं कि इसकी क्या वजह है.

मैं अब देशभर में घूम कर राज्य सरकारों और प्रशासनिक अधिकारियों को इस तकनीक के बारे में जागरुक करने की कोशिश में जुटा हूं. उम्मीद है मेरी ये कोशिशें एक दिन नेताओं और नौकरशाही को बदलाव के लिए मजबूर कर सकेंगी.''