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बिना ईंधन के चलता है यह लिफ्ट एरीगेशन- उमेश यादव

भारतीय सेना से रिटायर्ड हजारीबाग के रहने वाले एक कर्नल ने जल प्रबंधन के लिए देसी पंप ईजाद किया है। यह एक ऐसा एरीगेशन सिस्टम है जिसमें बिना बिजली, डीजल, केरोसिन, पेट्रोल आदि ईंधन के पानी को पाइप के जरिये ऊपर पहुंचाया जाता है। जल प्रबंधन में कर्नल की इस नवीन खोज पर केंद्रित उमेश यादव की रिपोर्ट।

पानी का संकट, महंगे पेट्रोल-डीजल और राज्य में बिजली की बदतर स्थिति झारखंड के लिए बड़ी समस्या है। ऐसे में इसका हल तो ढूढ़ना ही पड़ेगा। इन्हीं चुनौतियों से निबटने के लिए प्रकृति जल ऊर्जा पंप का विकास किया गया है। बिना सरकारी मदद के शुरूआत में यह महंगी लगती है। लेकिन, तीन साल के ईंधन खर्च की बचत से ही इसकी लागत वसूल हो जाती है। ऐसे में यह बहुत सस्ती है। हजारीबाग जिले के मासिपिरी गांव निवासी कर्नल विनय कुमार सेना की नौकरी से रिटायर्ड होकर वर्ष 2005 में अपने गांव लौटे। यहां पर उन्होंने ग्रामीणों को जल संकट से जूझते देखा। पानी के अभाव में फसलों को होने वाली क्षति एवं लोगों के जीवन में आने वाली दिक्कतों ने उन्हें बेचैन कर दिया। सेना की नौकरी ने उन्हें वह मानसिक दृढ़ता प्रदान की थी जिसके चलते वह यथास्थितिवादी बन कर नहीं रह सकते थे। इसलिए उन्होंने इस संकट का हल निकालने की ठानी। तीन-चार साल के अथक प्रयास से जो परिणाम सामने आया वह चौकाने वाला था। एक ऐसी खोज सामने थी जो बिना किसी ईंधन के पानी का प्रबंध कर सकता था। यह खोज था प्रकृति जल ऊर्जा पंप। फिर क्या था कर्नल विनय की बांछें खिल उठी। उन्होंने इसे अपने कृषि फार्म में प्रयोग किया। प्रयोग सफल रहा। दो इंच के इस पंप में ऐसी तकनीक का प्रयोग किया गया है जिससे झरना या चेकडैम का पानी पहाड़ी या ऊंचाई वाले इलाके में बगैर तेल-बिजली खर्च के पहुंचाया जा सकता है। प्रयोग सफल होने के बाद हजारीबाग के केरेडारी प्रखंड अंतर्गत कोती टोला में उन्होंने यह पंप लगाया है। कोती टोला उरांव आदिवासियों का गांव है। यहां पर महिलाएं गांव से करीब 200 मीटर की दूरी पर स्थित कोती नाला से पानी वहां जाकर लाती थी। फिर उससे खाना बनता था। इससे उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ता था। पर, अब तसवीर बदल गयी है। अब ग्रामीणों को सीधे कोती झरना का पानी उनके घर के पास मिलता है। कोती झरने से 10 हजार लीटर पानी गांव में लगी टंकी में चढ़ाया जाता है। महिलाओं व बच्चों को अब घर के पास ही नहाने, कपड़े धोने, खाना बनाने व पशुओं को पिलाने के लिए पानी मिल रहा है। यहां पर इस पंप को लगाने में जो लागत आयी है उसे कर्नल विनय ने अपने पेंशन की राशि से दिया है। कर्नल विनय कहते हैं कि दो इंच वाला चार प्रकृति जल ऊर्जा पंप 24 घंटे में जितना पानी देता है उतना डेढ़ एचपी का केरोसिन से चलने वाला पंप नौ घंटे में देता है। लेकिन, इसे चलाने के लिए करीब नौ लीटर केरोसिन चाहिए। जबकि यही काम प्रकृति पंप से किये जाने से कोई ईंधन खर्च नहीं होता है। इससे तो किसानों को प्रति दिन 300 रुपये की बचत होती है।

अब मोटे आकार का पंप बनाया

कर्नल विनय कुमार (रिटायर्ड) ने अब बड़े प्रकृति जल उर्जा पंप ( 4''/2'' और 6''/3'' ) विकसित किया है। इसका सफलता पूर्वक प्रयोग भी वह अपने प्रकृति बायोटेक फार्म, मासिपिरी, हजारीबाग में कर चुके हैं। इन बड़े प्रकृति जल उर्जा पंप से 15 से 20 एकड़ खेत में बिना ईंधन से सिंचाई की जा सकती है। जिन पहाड़ी नदी नालों में पानी की बहुलता है और पानी छह फिट या उससे से ज्यादा ऊंचाई से गिरता है, वहां दो 6''/3'' प्रकृति जल ऊर्जा पंप लगा कर 30 से 40 एकड़ खेत में सिंचाई की जा सकती है। पहले इनका पंप 2''/ 1'' का था।

सवा से लेकर पांच लाख तक की लागत

कर्नल विनय के इस पंप सिस्टम को लगाने में सवा लाख रुपये से लेकर पांच लाख रुपये तक की लागत आती है। 2''/ 1'' वाले दो पंप लगाने पर एक लाख 20 हजार रुपये और 4''/2'' वाले दो पंप की लागत पांच लाख रुपये आती है। इससे 98 हजार से लेकर एक लाख 96 हजार लीटर तक पानी डिस्चार्ज होता है। इससे 10 से 15 एकड़ भू-भाग की सिंचाई की जा सकती है।

कड़ी मेहनत करते हैं रिटायर्ड कर्नल

कर्नल के बारे में बताया जाता है कि वे बिना किसी साप्ताहिक अवकाश के रोजाना कम से कम 14 घंटे काम करते हैं। हजारीबाग के मिशन स्कूल से आरंभिक शिक्षा हासिल करने वाले कर्नल विनय का मिशन झारखंड के ग्रामीण हिस्सों को विकसित करना है। हालांकि उनके पास संसाधन सीमित है। सीमित संसाधनों में अपने फर्म प्रकृति बायोटेक के जरिये काम करने वाले कर्नल को फिलहाल राज्य से किसी प्रकार का सहयोग नहीं मिल रहा है। दरअसल सेना में नौकरी करने के दौरान जुझारूपन उनके व्यक्तित्व का एक अभिन्न हिस्सा बन गया। इस वजह से ही इस पंप का निर्माण कर पाये। कर्नल विनय श्रीलंका गयी भारतीय शांति सेना के सदस्य भी रहे हैं। उन्होंने पंत नगर कृषि विवि से मृदा विज्ञान में स्नातकोत्तर भी किया। इसके लिए उन्हें इंडियन काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च (आइसीएआर) नयी दिल्ली से जूनियर रिसर्च फेलोशिप मिला था। उन्होंने भारतीय सेना के बांबे सैपर्स में कमीशन प्राप्त किया। सेना ज्वाइन करने के बाद सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की। भारतीय शांति सेना व फिर जम्मू कश्मीर के बटालिक सेक्टर में ऑपरेशन विजय के दौरान इंजीनियरिंग रेजिमेंट की कमान उन्हें दी गयी। सेना में 31 वर्षों के उत्कृष्ट अभियंत्रण सेवा के लिए भारतीय इंजीनियर्स संस्थान ने इन्हें फेलो ऑफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर अवार्ड से सम्मानित किया है। अवकाश प्राप्ति के बाद मिट्टी से जुड़ाव ने कर्नल को सपत्नीक हजारीबाग स्थित अपने गांव मासिपिरी खींच लाया। इस शख्स ने मासिपिरी, हजारीबाग में प्रकृति बायोटेक फार्म स्थापित किया है। यहां पर कम खर्च वाली कृषि पद्धति व अक्षय ऊर्जा पर काम होता है। यह फॉर्म समेकित कृषि मॉडल व जलछाजन मॉडल का प्रतिरूप है। यहां लगभग 400 सागवान, 200 गम्हार, 500 टिस्सू कल्चर केला व 60 विकसित प्रजाति के आम, लीची, चीकू, नींबू, आंवला सहित बांस के पौधे लगे हैं। सिंचाई का काम स्प्रींकलर सिस्टम से होता है। बिरसा कृषि विवि के छात्र यहां अध्ययन के लिए आते हैं। इसी फॉर्म में झारखंड का सबसे बड़ा वर्मी कंपोस्ट उत्पादन केंद्र है। नाबार्ड ने इस केंद्र को मॉडल केंद्र घोषित किया है।

मिल चुका है अर्थ केयर अवार्ड

रिटायर्ड कर्नल विनय कुमार को अर्थ केयर अवार्ड 2010 से सम्मानित किया जा चुका है। जेएसडब्ल्यू- टाइम्स ऑफ इंडिया का यह पुरस्कार उन्हें प्रकृति जल ऊर्जा जल पंप की खोज करने के लिए दिया गया है। केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट ने इन्हें पुरस्कृत किया है।

सम्पर्क

कर्नल विनय कुमार (रिटायर्ड)
मोबाइल : 9431141947

(इंडियावाटर पोर्टल से साभार)