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छत्तीसगढ़ः पर्यावरण संरक्षण में जुटे वीरेंद्र, 35 तालाब, एक नदी और 2 कुंड किए स्वच्छ

-इंडिया वाटर पोर्टल,

छत्तीसगढ़ का नाम सुनते ही लोगों के मन में एक आदिवासी राज्य की छवि बनती है, जो विकास की दौड़ में शामिल होने के लिए संघर्ष कर रहा है, लेकिन इसी छत्तीसगढ़ में सैंकड़ों मीलों तक जंगल का इलाका फैला है, जो इस राज्य को प्राकृतिक संपदाओं से समृद्ध राज्य बनाता है। यहां सैंकड़ों नदी, तालाब और झरने आदि सहित विभिन्न जलस्रोत इंसानों सहित विभन्न जीव-जंतुओं की प्यास बुझाते हैं, लेकिन विकास की अंधी दौड़ में छत्तीसगढ़ भी स्वार्थ की भेंट चढ़ गया है। जिस कारण प्रकृति/जंगलों को नुकसान पहुंच रहा है और नदी, तालाब आदि प्रदूषित होते जा रहे हैं। भूजल स्तर भी लगातार नीचे गिरता जा रहा है। खतरे में पड़ती प्रकृति और जल संसाधनों को बचाने के लिए ही वीरेंद्र सिंह पिछले 20 सालों से कार्य कर रहे हैं। वीरेंद्र के कार्यो की सराहना जलशक्ति मंत्रालय सोशल मीडिया पर अपनी एक पोस्ट के माध्यम से भी कर चुका है। 

वीरेंद्र का जन्म बालोद जिला के दल्लीराजहरा गांव में एक सामान्य किसान परिवार में हुआ था। बचपन से ही वें प्रकृति से काफी करीब से जुड़े हुए थे। बी.काॅम, एम काॅम और अर्थशास्त्र में एमए की डिग्री लेने के बाद उन्होंने रोजी-रोटी के लिए वर्ष 2000 में निजी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया। इसी के साथ 25 बच्चों की टीम बनाकर उन्होंने पर्यावरण संरक्षण का कार्य भी करना शुरू कर दिया। बीस साल पहले घर के पास ही पीपल का एक पौधा रोपकर अपने काम की शुरूआत की। बच्चों को भी वें पढ़ाई के साथ साथ पर्यावरण का महत्व समझाते थे। 

इंडिया वाटर पोर्टल से बात करते हुए वीरेंद्र सिंह ने बताया कि ‘‘मैं बचपन से देखता था कि लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए जंगल से पेड़ व लकड़ी काटकर ले जाते थे। खनन आदि गतिविधियों से भी पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचता था। ये देखकर काफी पीड़ा होती थी। इसलिए अपना जीवन प्रकृति के प्रति समर्पित करने का निर्णय लिया और अपने वेतन का एक अंश इस कार्य में लगाता हूं।’’ 

वीरेंद्र पौधारोपण के साथ साथ स्वच्छता अभियान भी चलाते थे। जब उन्होंने कार्य की शुरूआत की तो लोग उन्हें पागल कहते थे। लोग उनके घर पर शिकायत करते थे कि ‘पेड़ लगाने और गंदगी साफ करने में कुछ नहीं रखा है। ये क्या करते रहते हो।’’ शुरुआत में वीरेंद्र के परिजनों को भी ये काम पसंद नहीं आता था, लेकिन फिर परिजनों को अपने बेटे के काम का महत्व पता चला तो वें वीरेंद्र को प्रोत्साहित करने लगे। 

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