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यहां गांव के बच्चे करते हैं अंग्रेजी में गिटपिट

नई दुनिया,जबलपुर। दूसरी क्लास में पढ़ने वाले अजय कोल की जिंदगी बदली-बदली सी है। मिट्टी में खेलते अस्त-व्यस्त से गांव के दूसरे छोटे बच्चों से वह कुछ अलग है। साफ-सुथरा। बातें भी समझदारी वाली। मजदूर माता-पिता का यह बेटा 'वाट इज योर नेम' जैसे अंग्रेजी के अन्य दूसरे सवालों के जवाब देना भी जानता है। कक्षा आठ में पढ़ रही नेहा गोंटिया ने भी अपने रहन-सहन का तरीका बदल लिया है।

पढ़ाई में ज्यादा ध्यान देती है। उसे पता है कि गांव से कुछ ही दूरी में बने इंजीनियरिंग संस्थान में किस तरह की पढ़ाई होती है। उसका लक्ष्य भी ऐसे ही किसी कॉलेज में पहुंचकर बढ़ा इंजीनियर बनने का है। सपना, रूकमणी सहित ऐसे ही कई और बचपन हैं जिनकी जिंदगी बदल रही है।

डुमना रोड पर बसे महगवां, सुअरकोल, चंडीटोला,आमानाला सहित अन्य गांव के करीब एक सैकड़ा बच्चों की जिंदगी में बदलाव लाने का काम कर रही है ट्रिपल आईटी स्टूडेंट्स की संस्था 'जागृति'।

पढ़ाई के बाद दे रहे वक्त

जागृति के माध्यम से इंजीनियरिंग स्टूडेंट्स एक तरफ गरीब स्टूडेंट्स को बेहतर शिक्षा से जोड़ रहे हैं तो खुद भी सामाजिकता का पाठ पड़ रहे हैं। स्टूडेंट्स ने बताया कि कॉलेज प्रबंधन द्वारा एक एजुकेशन सिस्टम के तहत ही संस्था का गठन किया गया है। इससे गरीब बच्चों व हमारा दोनों का भला हो रहा है।

सब कुछ सिखा रहे

बच्चों की क्लास प्रतिदिन ट्रिपल आईटी डीएम के कैम्पस में ही लगती है। गांव से बच्चों को लाने ले जाने के लिए बस की व्यवस्था की गई है। कॉलेज की पढ़ाई के बाद शाम को ही इन बच्चों की क्लास लगाई जाती है। जहां बच्चों की रुचि के अनुसार गणित, विज्ञान, अंग्रेजी की क्लास के अलावा उन्हें खेलों का भी प्रशिक्षण दिया जाता है।

हाइटैक होती है क्लास

दिन के समय में सरकारी स्कूल की टूटी बैंचों में पढ़ने वाले स्टूडेंट्स को शाम की इस क्लास का बेसब्री से इंतजार रहता है। यहां पढ़ाई प्रोजेक्टर के माध्यम से कराई जाती है। कार्टून फिल्में भी उनकी लर्निंग का हिस्सा होती हैं।

इनके लिए भी सीख

ट्रिपल आईटी के स्टूडेंट्स ने बताया कि यह व्यवस्था उन्हें भी बड़ी सीख दे रही है। जागृति में होने वाले खर्च का वहन उन्हें ही करना होता है। इसके लिए वह अपने जेब खर्च, चेरिटी व कॉलेज में आने वाले मेहमानों से डोनेशन लेते हैं। हाल ही में हुए ट्रिपल आईटी के वार्षिकोत्सव में भी अच्छा खासा फंड जमा हो गया।

पेरेन्ट्स फील कर रहे बदलाव

स्कूल के बाद की इस क्लास को पेरेन्ट्स भी गंभीरता से ले रहे हैं। ग्रामीणों सरमन कोल ने बताया कि शुरूआत में उन्हें अजीब सा लगा। वह बच्चों को भेजने तैयार नहीं थे। फिर भी कुछ लोगों ने लड़कों को भेजना शुरू किया। दो-तीन माह में ही उनके रहने, बोलने के तरीके में बदलाव आने लगा। फिर सभी लोग बच्चों को भेजने लगे। इसमें लड़कियों की संख्या भी अच्छी खासी है।

पढ़ने में आता हैं मजा

सरकारी स्कूल के अलावा ट्रिपल आईटी के स्टूडेंट से शिक्षा प्राप्त कर रहे बच्चों का कहना है कि वहां पढ़ने में मजा आता हैं। जो स्कूल में कभी नहीं आता। यहां उन्हे एबीसीडी से लेकर पढ़ने-लिखने के गुर और इससे होने वाले फायदों को समझाया जाता हैं। साथ ही मनोरंजन के लिए खेल, फिल्म आदि में भी बच्चों की संलिप्तता रखी जाती हैं।

आसानी से हल होते हैं सवाल

महगवां गांव की कक्षा सातवीं में अध्ययनरत सपना कोल और छटवी की रुकमणि गोंटिया का कहना है कि क्लास में उन्हें गणित, विज्ञान, अंग्रेजी जैसे कठिन सब्जेक्ट्स को सरलता से समझाया जाता हैं।

पढ़ने की ललक

सुअरकोल गांव के रघुनाथ चौधरी ने बताया कि जागृति में जाने से बच्चों का शिक्षा के प्रति मनोबल बढ़ा है। उनमें सीखने की ललक पैदा हुई हैं। जो पहले नहीं थी।

हमारा मकसद कॉलेज के स्टूडेंट को बेहतर एजुकेशन देने के साथ ही सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति भी प्रतिबद्ध करना है। इससे गांव के बच्चों को भी एजुकेट करने में मदद मिल रही है। - डॉ. अपराजिता ओझा, डायरेक्टर, ट्रिपलआई टी, जबलपुर