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कृषि | एक छोटी सी पहल ने बचाई लाखों की फसल
एक छोटी सी पहल ने बचाई लाखों की फसल

एक छोटी सी पहल ने बचाई लाखों की फसल

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published Published on Jan 24, 2020   modified Modified on Jan 24, 2020
पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले के रंजनडीह गांव में रहने वाली 55 वर्षीय साधमणि तुडु हर सुबह अपने खेत में जाने से पहले गांव में एक घर की दीवार पर लगा चाकबोर्ड देखना नहीं भूलतीं।

तुडु कहती हैं, “पिछले चार साल से चाकबोर्ड देखना गांव से अधिकांश लोगों की आदत में शुमार हो चुका है।” यह चाकबोर्ड 2015 में कोलकाता स्थित गैर लाभकारी संगठन डेवलपमेंट रिसर्च कम्युनिकेशन एंड सर्विस सेंटर (डीआरसीएससी) ने लगाया था। इसमें लिखे बुलेटिन में पांच दिन के मौसम के पूर्वानुमान से संबंधित जानकारी जैसे, तापमान, बारिश, हवा की गति प्रदर्शित की जाती है। तुडु बताती हैं, “इसमें संभावित मौसम की जानकारी और उससे बचने के प्राकृतिक तरीके भी बताए जाते हैं।”

डाउन टू अर्थ ने अक्टूबर 2019 में जब रंजनडीह गांव का दौरा किया तब चाकबोर्ड में मौसम से संबंधित आंकड़े साफ-साफ लिखे थे। सबसे आखिर में लिखा था, “बैक्टीरियल लीफ ब्लाइट (जीवाणु पत्ती अंगमारी) धान को प्रभावित कर सकती है।” धान की फसल में लगने वाले इस रोग से बचने का तरीका भी बताया गया था। नोट में लिखा था, “तंबाकू की 500 ग्राम जड़ें लेकर उसे दो लीटर पानी में दो घंटे तक उबाल लें। यह पानी ठंडा होने के बाद उसमें 20 लीटर पानी मिला दें और साफ मौसम में इसे फसलों पर छिड़क दें।”

तुडु बताती हैं कि सही समय पर यह कदम उठाकर किसानों ने नुकसान को न्यूनतम कर दिया। वह याद करती हैं, “एक बार चाकबोर्ड के बुलेटिन में ओले पड़ने की जानकारी दी गई थी। उस मौसम में मैंने टमाटर और बैंगन की खेती की थी और फसल लगभग तैयार थी। चाकबोर्ड की जानकारी के बाद मैंने तुरंत फसल काट ली।” वह बताती हैं कि फसलों का नुकसान कम करके उनकी आमदनी चार साल में 25 हजार से बढ़कर 40 हजार रुपए हो गई है। पश्चिम बंगाल के पुरुलिया और बांकुरा जिले में इस तरह की ढेरों कहानियां हैं। इन जिलों में डीआरसीएससी ने नेशनल बैंक फॉर एग्रीकल्चर एंड रूरल डेवलपमेंट (नाबार्ड) के साथ मिलकर किसानों को जलवायु के प्रति सहनशील बनाने के लिए एक परियोजना शुरू की है। पुरुलिया में नाबार्ड के असिस्टेंट जनरल मैनेजर कंचन कुमार भट्टाचार्य बताते हैं, “इस परियोजना से किसानों को फायदा हो रहा है और हम दूसरे जिलों में इसे शुरू करने के लिए सरकार से बातचीत कर रहे हैं।”

भट्टाचार्य बताते हैं कि इस परियोजना के जरिए 20 हजार किसानों को किसी न किसी रूप में फायदा पहुंच रहा है। इससे बहुत से लोगों की खेती की लागत में 35 प्रतिशत की कमी आ गई है। बुलेटिन में प्रदर्शित उपायों को अपनाकर अधिकांश लोग प्राकृतिक खाद तैयार कर रहे हैं। इससे रासायनिक उर्वरकों पर खर्च होने वाले धन की बचत हो रही है। पुरुलिया के सूरा गांव के किसान अतुल चंद्र सरदार कहते हैं कि पूर्वानुमान के चलते उनका बिजली का बिल कम हुआ है। वह बताते हैं, “अगर बुलेटिन बोर्ड से हमें यह पता चल जाए कि अगले कुछ दिनों में बारिश होगी तो हम सिंचाई के लिए पंप का इस्तेमाल नहीं करते। इसी तरह अगर चक्रवात और तेज हवाओं की जानकारी मिलती है तो हम खेतों से हवा को बचाने का इंतजाम पहले से कर लेते हैं। रंजनडीह गांव के पशुपालक दिलीप प्रधान बताते हैं कि बुलेटिन बोर्ड में मौसम में अचानक बदलाव के कारण मवेशियों को होने वाली संभावित बीमारियों की जानकारी भी दी जाती है और इससे बचने के लिए दवा और भोजन भी सुझाया जाता है। सूरा गांव की गृहिणी रत्ना प्रधा बताती हैं, “अगर बुलेटिन बोर्ड में अगले पांच दिनों में भारी बारिश का भविष्यवाणी होती है तो हम जलावन की लकड़ी और खाद्य पदार्थों का भंडारण कर लेते हैं। इसी के हिसाब से हम अपनी या़त्राओं की भी योजना बनाते हैं।”
 
पूरी रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 

गुरविंदर सिंह, https://www.downtoearth.org.in/hindistory/agriculture/farming/A-small-initiative-saved-the-crop-of-millions-68594?fbclid=IwAR1-dTk0JKmITXHJNxpgeKjkHM30tkMjqoNfsY
 

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