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साक्षात्कार | पंचायत में तय हो बच्चों के विकास की योजनाएं

पंचायत में तय हो बच्चों के विकास की योजनाएं

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published Published on Dec 26, 2013   modified Modified on Dec 26, 2013

जनजातीय भाषाओं के जानकार गिरधारी राम गौंझू झारखंड की संस्कृति-परिवेश की बारीक जानकारियां रखते हैं. वे बच्चों, विशेषकर वंचित समूह के बच्चों को स्थानीय भाषा में शिक्षा देने के पैरोकार रहे हैं. इसका यह मतलब कतई नहीं है कि वे हिंदी या अंगरेजी के विरोधी है. उनका जोर त्रिस्तरीय भाषा सूत्र पर है. एक शिक्षाविद के रूप में वंचित समूह के बच्चों को विकास की मुख्यधारा में लाने की कोशिश में उनके विचार महत्वपूर्ण हैं. विभिन्न मुद्दों पर उनसे राहुल ने बातचीत की. प्रस्तुत है प्रमुख अंश :

वंचित समूह के बच्चों के अधिकार के लिए बड़ी-बड़ी बातें होती हैं. फिर भी वे अपने हक और अधिकार से अब भी दूर हैं. ऐसा क्यों?
इसका सबसे बड़ा कारण है : घर की भाषा व स्कूल की भाषा अलग-अलग होना. ऐसे बच्चे जिस भाषा को जानते-समझते हैं, उस भाषा में स्कूलों में पढ़ाई नहीं होती है. मैं अकसर इस बात को समझाने के लिए एक कहानी दोहराता हूं. एक स्कूल में अंगरेजी का एक शिक्षक बच्चे को पढ़ा रहा है कि व्हाइट मतलब उजला. लेकिन बच्च उजला नहीं समझ रहा है. शिक्षक कहता है कि इस बच्चे के दिमाग में गोबर भरा हुआ है और उसे ढांटता, फटकारता है.  इसी दौरान चपरासी आता है. वह सारा दृश्य देख कर स्थिति समझ जाता है. वह शिक्षक से अनुमति लेकर बच्चे को कहता है बाबू चरका नहीं सुना है. बच्च तुरंत हां कह कर सफेद दीवार दिखाता है. यानी बच्चों को, खासकर अनुसूचित जाति व जनजाति समूह के बच्चों के लिए स्थानीय भाषा में शिक्षा देना आवश्यक है. यह उनके लिए सहज ग्राह्य होता है.

दुनिया के सारे शिक्षा शास्त्री मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने की बात कहते हैं. महात्मा गांधी ने भी ऐसा कहा है. बच्चों को आरंभ में उनकी स्थानीय भाषा में शिक्षा दी जानी चाहिए. फिर राष्ट्रभाषा हिंदी व अंतरराष्ट्रीय भाषा अंगरेजी की ओर बच्चों को ले जाना चाहिए. 

वंचित समूह के बच्चों का स्कूल छोड़ने का प्रतिशत सबसे ज्यादा होता है. उन्हें कैसे स्कूल छोड़ने से रोका जाये?
इसका एक बड़ा कारण गरीबी है. गरीबी के कारण घर में चूल्हा नहीं जल पाता. घर वाले सोचते हैं बच्च गैरेज में काम कर लेगा, छोटी-मोटी मेहनत मजदूरी कर लेगा तो कमा-खा लेगा. सरकार उन्हें रहने-खाने की जो सुविधा देती है, उसमें गड़बड़ियां काफी ज्यादा हैं. ऊपर के लोग ज्यादातर राशि खा जाते हैं. राजीव गांधी का कहना था कि केंद्र से भेजे एक रुपये में 13 पैसा ही उनके पास पहुंचता है. मैं कहूंगा कि वंचित समूह के बीच वह 13 पैसा भी नहीं पहुंचता है. गरीबी के कारण ऐसे परिवारों को पढ़ाई का लाभ भी पता नहीं है. ऐसे समूह को इंदिरा आवास देकर समाज से बाहर कर दिया जाता है, जहां वे छोटे घरों में रहते हैं. इससे भी उनका अपने समाज व संस्कृति से कटाव होता है. समाज में रह कर बच्चे काफी कुछ सीखते हैं. सामूहिकता की सीख मिलती है. अखाड़ा में नाचते-गाते हैं तो काफी कुछ जानते-समझते हैं. इसलिए उनके लिए तैयारी की जाने वाली शिक्षा प्रणाली उनकी पारंपरिक शिक्षा व संस्कृति के अनुरूप हो. उन्हें ऐसा नहीं लगे कि उन्हें उनकी संस्कृति से काट दिया गया है. आदिवासी समुदाय में लड़कियों की काफी अहमियत है. दूसरे समुदाय में उन्हें बोझ समझ लिया जाता है. इन मूल्यों को वे अपनी संस्कृति वाली शिक्षा में ही समझ सकेंगे.

अभी जो विकास का मॉडल है, वह कहां तक प्रभावी है. वंचित समूह के बच्चों के लिए बनायी गयी योजनाएं उनके लिए कितनी प्रभावी हैं?
सरकार की राशि अगर गांव व पंचायतों को सीधे दी जाती तो वे मालामाल हो जाते. गांव के बच्चों के लिए विकास नीतियां, योजनाएं ग्राम पंचायत व गांव स्तर पर तय हो. वर्तमान व्यवस्था में उन्हें ब्लॉक का चक्कर लगाना होता है. ब्लॉक दलालों का अड्डा है. कोई गांव ऐसा नहीं होगा, जहां एक-दो दलाल किस्म के लोग नहीं होंगे, जो सरकारी कार्यालयों में काम करवाते हैं.

दिल्ली, रांची के एसी कमरों में बनायी गयी योजनाएं प्रभावी नहीं होंगी. राज्य में कई ऐसे गांव हैं जो पहाड़ियों पर बसे हैं. ग्रामीण कई पहाड़ियों को पार कर ब्लॉक या थाने तक पहुंचते हैं. इसलिए योजनाएं पंचायत स्तर पर तैयार होनी चाहिए.

झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य में अनुसूचित जनजाति आयोग नहीं है, और न ही यहां अनुसूचित जाति आयोग है. क्या इन आयोगों का गठन किया जाता तो ये जिन जातीय समूहों का प्रतिनिधित्व करते  उनके विकास व उत्थान में मददगार साबित नहीं होते?

अभिजात्य वर्ग के लोग नहीं चाहते हैं कि ये समुदाय होशियार हों. उनकी इच्छा है कि ये मंगरा-बुधिया बने रहें, ताकि इन्हें अपने अनुरूप चलाया जा सके. लोभ-लालच की चीजें इन्हें बांटी जाये. मछली इन्हें दे दो तालाब नहीं बताओ. पैसा दे दो, अक्ल नहीं दो. गांव में कहा जाता है गरीब को जेल, धनी को बेल. बड़ी संख्या में जेलों में वंचित समूह के लोग बंद हैं, जबकि प्रभावशाली लोग जेल से मुक्त हो जा रहे हैं.

तो सरकार के स्तर पर कैसी पहल होनी चाहिए?
गांव में जितने स्कूल खोले गये हैं, उसमें शिक्षक नहीं हैं. स्थानीय भाषाओं के शिक्षक नहीं हैं. शिक्षकों की बड़ी रिक्तियों का नुकसान बच्चों को हो रहा है. पद्मश्री रामदयाल मुंडा की एक कविता है, जिसका अर्थ कुछ इस तरह है : तुम्हारा राज कैसे चलेगा, स्कूल खोल देते हो वहां शिक्षक नहीं होते; अस्पताल खोल देते हो, वहां डॉक्टर नहीं होते हैं. वास्तव में यही स्थिति है. यहां के नीति निर्धारक कॉरपोरेट घराने के दलाल बने हुए हैं. अगर कोई विवेक का प्रयोग करता है, तो उसे जेल जाना पड़ेगा.

वंचित समूह के बच्चों में कुपोषण भी बड़ी समस्या है. जबकि उनके लिए बहुत सारी योजनाएं चलायी जा रही हैं. जो योजनाएं चल रही हैं, उनमें कमियां कहां हैं?
मध्याह्न् भोजन, आंगनबाड़ी केंद्र सभी जगह गड़बड़ियां हैं. कभी सुनने में आता है कि खाना में छिपकली निकली तो कभी सुनने में आता है कि बच्चे सब्जी-दाल में जल गये. उनके लिए चलायी जा रही योजनाओं की देखरेख की व्यवस्था नहीं है. कोई माई-बाप नहीं है. स्कूलों में अगर उपस्थिति 100 है, तो उसकी जगह 200 का बिल बनाया जा रहा है. अगर लोग अपनी जिम्मेवारी व कर्तव्य समझ कर ईमानदारी से काम करें तो सुधार हो सकता है.

आप बतौर एक शिक्षाविद शैक्षणिक ढांचे को दुरुस्त करने क्या सुझाव देंगे, ताकि वह वंचित समूह के बच्चों के लिए ज्यादा फायदेमंद हो?
बच्चों को शुरुआती शिक्षा उनकी मातृभाषा में दें. त्रिस्तरीय भाषा सूत्र लागू हो. बच्चों को नयी चीजें सिखायें, लेकिन स्कूल में प्रताड़ना नहीं दें. शिक्षित करें. बच्चों को राष्ट्र भाषा हिंदी व अंतरराष्ट्रीय भाषा अंगरेजी कुछ कक्षाओं के बाद सिखायें-बतायें. योजनाएं गांव-पंचायत में बने. संस्कृति के अनुरूप शिक्षा दें. हमारे बीच से आइएएस बनते हैं, लेकिन उसके बाद वे जमीनी सच्चाई भूल जाते हैं. अखड़ा बच्चों के सांस्कृतिक विकास में मददगार हैं. उसे सहेजें. इससे समाज में समता का भाव आता है. पाठ्यक्रम स्थानीय परिप्रेक्ष्य में बने. फिर अगली कक्षाओं में पाठ्यक्रम में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य को भी समाहित किया जाये.


http://www.prabhatkhabar.com/news/74538-story.html


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