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चर्चा में.... | गधों को हमारी फौरी मदद की जरुरत है, और यह मजाक कत्तई नहीं..!
गधों को हमारी फौरी मदद की जरुरत है, और यह मजाक कत्तई नहीं..!

गधों को हमारी फौरी मदद की जरुरत है, और यह मजाक कत्तई नहीं..!

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published Published on Mar 6, 2017   modified Modified on Mar 6, 2017
क्या अमिताभ बच्चन को कच्छ के गधों का साथ देना बंद कर देना चाहिए जैसा कि यूपी में जारी चुनाव प्रचार के दौरान समाजवादी पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी अखिलेश यादव ने कहा ?


और, क्या गधे को वफादार जान उससे प्रेरणा लेनी चाहिए जैसा कि अखिलेश पर जवाबी हमला बोलते हुए बीजेपी के स्टार प्रचारक और देश के गुजराती प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा ?


राजनीति के इन प्रश्नों का ठीक-ठीक जवाब तो 11 मार्च के दिन यूपी का मतदाता देगा लेकिन एक बात अभी से तय है-गधे चाहे गुजरात के हों या यूपी के उन्हें हर जगह हमारी मदद की जरुरत है !


बात बेशक मजाक की लगती है लेकिन वक्त अब हंसने का नहीं बल्कि संजीदा होने का है क्योंकि 2014 के सितंबर महीने में नई पशुगणना के आंकड़े सामने आये तो पता चला कि देश में गधों की संख्या अप्रत्याशित तेजी से कम हो रही है.(देखें नीचे दी गई लिंक्स)


जी हां, पांच साल की अवधि में गधों की कुल संख्या में तकरीबन 27 फीसद की कमी आई है. देश में गधों की संख्या 2012 के 15 अक्तूबर यानी नई पशुगणना की कटऑफ तारीख पर 3 लाख 19 हजार पायी गई जबकि पिछली पशुगणना(2007) में गधों की कुल संख्या 4 लाख 38 हजार थी.


गधों की संख्या में हो रही कमी का चलन पिछले बीस सालों से जारी है. मिसाल के लिए 1992 की पशुगणना में गधों की संख्या 9 लाख 67 हजार थी. पांच साल बाद 1997 में इस तादाद में तकरीबन 9 फीसद की कमी आई और 1997 में गधों की संख्या घटकर 8 लाख 82 हजार रह गई.


गधों की संख्या में दहाई अंकों की कमी का चलन 1997 से 2003 की अवधि में शुरु हुआ. 2003 की पशुगणना रिपोर्ट में गधों की संख्या घटकर 6 लाख 50 हजार पर आ गई. पांच साल की अवधि में यह लगभग 26 प्रतिशत की गिरावट है जबकि 2012 की पशुगणना में गधों की संख्या में 27 फीसद की कमी आई है.


अगर प्रदेशवार देखें तो स्थिति और भी ज्यादा विकट जान पड़ती है. कुछ राज्यों में गधे 1000 या इससे भी कम संख्या में बचे हैं. ऐसे राज्यों में असम(1049), पश्चिम बंगाल(566), छत्तीसगढ़(600), झारखंड(300) तथा केरल (407) की गिनती की जा सकती है. इनकी तुलना में बिहार(19491), गुजरात(28668), उत्तरप्रदेश(44984) और राजस्थान (74831) में गधों की संख्या कहीं ज्यादा संतोषजनक है.


नई पशुगणना का एक रुझान और भी गौरतलब है. दुधारु पशुओं में गाय और भैंसों की संख्या तो 2007 की पशुगणना की तुलना में 2012 की पशुगणना मे बढ़ी है लेकिन भेड़, बकरी, सुअर, ऊंट और गधों की संख्या में कमी आई है.


मिसाल के लिए दूध देने वाली गाय और भैंसों की संख्या पिछली पशुगणना(2007) के 77.04 मिलियन से बढ़कर 2012 में 80.52 मिलियन हो गई. यह 4.51 फीसद की बढ़ोत्तरी है लेकिन भेड़ और बकरियों की संख्या में कमी आई है.


देश में भेड़ों की कुल संख्या 65.06 मिलियन है जो 2007 की पशुगणना की तुलना में 9.07 फीसद कम है. इसी तरह बकरे-बकरियों की संख्या में पिछली पशुगणना की तुलना में 3.82 फीसद और सुअरों की संख्या में पिछली पशुगणना(2007) की तुलना में 7.54 प्रतिशत की कमी आई है.


ऊंट और गधों की संख्या में सबसे ज्यादा गिरावट आई है. 2007 के मुकाबले 2012 की पशुगणना में ऊंटों की संख्या में 22 फीसद तथा गधों की तादाद में 27 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है.( पशुओं की संख्या में गिरावट के आंकड़ों के लिए देखें एलर्ट के सबसे आखिर के तथ्य)


गाय-भैंसों की तुलना में सुअर, भेड़, बकरी, ऊंट तथा गधों की संख्या में कमी क्या इस बात का इशारा है कि देश जाति-आधारित पेशों की जकड़ से मुक्त हो रहा है या इस बात से यह अर्थ निकाला जाय कि समाज के सबसे कमजोर वर्ग के लोगों के लिए जीविका और रोजगार की स्थितियां नयी अर्थव्यवस्था में कम हुई हैं और उन्हें अपने परंपरागत पेशे को छोड़कर पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा है ?


इन प्रश्नों का उत्तर नये सिरे से शोध की मांग करता है.


पशुगणना 2007 और पशुगणना 2012 के कुछ प्रमुख तथ्य--


--- देश में गोधन, भैंस, भैंसा. भेड़, बकरी, सुअर, घोड़ा, ट्टटू, खच्चर, गदहा, ऊंट, मिथुन और याक समेत कुल पशुधन की संख्या 512.05 मिलियन है. पशुधन में 2007 की पशुगणना की तुलना में 3.33 फीसद की कमी आई है.


-- कुछ राज्यों में पशुधन की संख्या में अच्छी वृद्धि हुई है. ऐसे राज्यों में शामिल हैं गुजरात (15.36%), उत्तरप्रदेश (14.01%), असम (10.77%), पंजाब (9.57%), बिहार (8.56%); सिक्किम (7.96%), मेघालय (7.41%), और छत्तसीगढ़ (4.34%).


--- दुधारु पशुओं की कुल संख्या (गाय, भैंस, मिथुन और याक) की कुल संख्या नयी पशुगणना(2012) में 299.9 मिलियन थी. पिछली पशुगणना(2007) की तुलना में दुधारु पशुओं की संख्या में 1.57 फीसद की कमी आई है.


-- अगर दूध देने वाली और ना देने वाली दोनों ही तरह की गाय और भैंसों की गणना करें तो इनकी संख्या पिछली पशुगणना की तुलना में बढ़ी है. 2007 में ऐसी गाय-भैंसों की संख्या 111.09 मिलियन थी जो अब 6.75 फीसद बढ़कर 118.59 मिलियन हो गई है.


-- दूध देने वाली गाय और भैंसों की संख्या पिछली पशुगणना(2007) के 77.04 मिलियन से बढ़कर 2012 में 80.52 मिलियन हो गई. यह 4.51 फीसद की बढ़ोत्तरी है.


-- देश में भेड़ों की कुल संख्या 65.06 है. 2007 की पशुगणना की तुलना में भेड़ों की संख्या में 9.07 फीसद की कमी आई है.


--बकरे-बकरियों की संख्या में पिछली पशुगणना की तुलना में 3.82 फीसद की कमी आई है. देश में बकरे-बकरियों की संख्या 2012 में 135.17 थी.


--सुअरों की संख्या में पिछली पशुगणना(2007) की तुलना में 7.54 प्रतिशत की कमी आई है. 2012 में सुअरों की संख्या 10.29 मिलियन थी.


--घोड़े और टट्टू की संख्या की संख्या 2.08 फीसद बढ़ी है. 2012 की पशुगणना में इनकी संख्या 0.62 मिलियन थी.


--देश में पिछली पशुगणना के मुकाबले खच्चर की संख्या में 43.34 फीसद का इजाफा हुआ है. 2012 की गणना में खच्चर की संख्या 0.19 थी.


--पिछली पशुगणना के मुकाबले ऊंटों की संख्या में 22.28 फीसद की कमी हुई है. नई पशुगणना(2012) में ऊंटों की संख्या 0.4 मिलियन पायी गई.


--देश में पिछली पशुगणना के मुकाबले गधों की संख्या में 27.22 फीसद की कमी आई है. 2012 की पशुगणना में गधों की संख्या 0.32 मिलियन थी.

 

इस कथा के विस्तार के लिए कृपया निम्नलिखित लिंक्स खोलें--

 

19 LIVESTOCK CENSUS-2012 ALL INDIA REPORT
http://dahd.nic.in/sites/default/files/Livestock%20%205.pdf

 

Salient Features of 19th Livestock Census
http://pib.nic.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=109280

 

17 LIVESTOCK CENSUS--2003
http://dahd.nic.in/sites/default/files/17th%20Indian%20Liv
estock%20Census%20All%20India%20Summary%20Report%20%201.pd
f


 

17 LIVESTOCK CENSUS--2003
http://dahd.nic.in/sites/default/files/16th%20Indian%20Liv
estock%20Census%20All%20India%20Summary%20Report%20%201.pd
f

 

(इस पोस्ट में इस्तेमाल की गई तस्वीर के लिए हम अमर उजाला के आभारी हैं)

 

 



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