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न्यूज क्लिपिंग्स् | अमीरी रेखा की जरूरत- सुनील

अमीरी रेखा की जरूरत- सुनील

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published Published on Dec 12, 2011   modified Modified on Dec 12, 2011
जनसत्ता 12 दिसंबर, 2011 : कुछ माह पहले जब योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दिया कि शहरों में बत्तीस रु. और गांवों में छब्बीस रु. प्रतिदिन खर्च करने वालों को गरीबी रेखा से ऊपर माना जाएगा, तो देश के संभ्रांत पढ़े-लिखे लोगों में और मीडिया में खलबली मच गई। अहलूवालिया से लेकर जयराम रमेश तक को सफाई में बयान देने पडे। उन्होंने यह भी कहा कि हम इस पर पुनर्विचार कर रहे हैं। देश के ज्यादातर संभ्रांत लोग यह सोचने को मजबूर हुए कि आज की महंगाई के जमाने में एक इंसान छब्बीस या बत्तीस रुपए रोज में अपना गुजारा कैसे चला सकता है? सरकार के इस बयान ने भारत के भद्रलोक की अंतरात्मा को कुछ झकझोरने का काम किया। इसके लिए उन्हें अहलूवालिया का आभारी होना चाहिए।
पर सच तो यह है कि पिछले डेढ़-दो दशक से भारत सरकार द्वारा गरीबी रेखा का निर्धारण इसी क्रूर तरीके से किया जाता रहा है। जिस वर्ष (2004-05) के लिए असंगठित क्षेत्र के बारे में बने अर्जुन सेनगुप्त आयोग ने यह बता कर सबको चौंका दिया था कि देश की सतहत्तर प्रतिशत (तिरासी करोड़) आबादी बीस रुपए रोज से कम पर गुजारा करती है, उस वर्ष के लिए सरकारी गरीबी रेखा ग्रामीण क्षेत्र में मात्र बारह रु. और शहरी क्षेत्र में अठारह रु. थी।
अगर औसतन पांच सदस्य का परिवार मान कर इन राशियों में पांच का गुणा करें, तो पाएंगे कि यह कोई असामान्य बात नहीं है। हमारे आसपास बड़ी संख्या में लोग इसी रेखा के नीचे या आसपास हैं। इन दिनों प्राथमिक शालाओं में जो पैरा-शिक्षक लगाए जा रहे हैं, उनके वेतन भी इतने ही हैं। सरकार द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी की दरें भी इसी के आसपास या इससे कुछ ही बेहतर रहती हैं। बहुप्रचारित मनरेगा में तो सरकार न्यूनतम मजदूरी भी देने को तैयार नहीं है, इसलिए उसकी मजदूरी की दर इस गरीबी रेखा के काफी करीब है। चूंकि यह जिंदा रहने के लिए काफी नहीं है, इसलिए मजबूरी में एक परिवार के दो-तीन सदस्य मजदूरी करते हैं और बच्चों को भी काम में लगाया जाता है।
सबसे शोचनीय पहलू यह है कि सरकार इसी घोर अभाव वाले जीवन-स्तर को संतोषजनक मान रही है। इतना ही नहीं, करीब-करीब सारी कल्याणकारी योजनाओं का फायदा गरीबी रेखा के नीचे के परिवारों तक सीमित करके जरूरतमंद आबादी के एक बड़े हिस्से को किसी भी तरह की सरकारी मदद से वंचित किया जा रहा है। सस्ता राशन, इंदिरा आवास योजना, मुफ्त इलाज की योजना या स्वास्थ्य बीमा, वृद्धावस्था पेंशन, राष्ट्रीय परिवार सहायता योजना, सस्ता कर्ज, छात्रवृत्ति आदि कई योजनाओं के लिए गरीबी रेखा से नीचे की सूची में नाम होना जरूरी है। इसीलिए साधारण लोगों में इस सूची में नाम डलवाने के लिए होड़ मची रहती है। देश में कई जनसंगठनों और जनांदोलनों का एक प्रमुख मुद्दा ‘बीपीएल’ रहता है। इस बार देश में जनगणना विभाग द्वारा जो सामाजिक-आर्थिक गणना हो रही है उसमें गरीब परिवारों का एक बार फिर सर्वेक्षण होगा। एक बार फिर लोगों में उम्मीद जगेगी, एक बार फिर बड़ी संख्या में लोग निराश होंगे और अपने पड़ोसियों, ग्राम पंचायत या नीचे के सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार को इसके लिए दोषी मान कर उन पर अपनी खीज  निकालेंगे।
दरअसल, बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि गरीबी रेखा से नीचे के परिवारों का सर्वे चाहे जैसा हो, चाहे पूरी ईमानदारी से हो, तो भी देश की जरूरतमंद आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा इससे बाहर ही रहेगा। विभिन्न प्रांतों में गरीबों की संख्या योजना आयोग द्वारा मनमानी गरीबी रेखा खींच कर पहले ही तय कर दी जाती है। नीचे के सर्वेक्षण से मात्र परिवारों का क्रम तय करने वाली सूची बनती है, उसमें ‘कट-आॅफ पाइंट’ कहां होगा, यह ऊपर से तय होता है।
इस गरीबी रेखा निर्धारण की बहुत आलोचना हो रही है। उत्सा पटनायक जैसे अर्थशास्त्रियों ने बताया है कि सत्तर के दशक में गरीबी रेखा का पहली बार निर्धारण करते समय एक सामान्य भारतीय के लिए जितनी कैलोरी का भोजन जरूरी माना गया था, अब गरीबी रेखा के स्तर पर उससे काफी कम कैलोरी मिल रही है। यानी गरीबी रेखा अब भुखमरी की रेखा बन गई है। फिर भी हमारे शासक ऐसे चिकने घडेÞ बन गए हैं कि उन पर इन सच्चाइयों का कोई असर नहीं होता। ऐसी ही संवेदनहीनता सर्वोच्च न्यायालय में पेश किए गए हलफनामे में दिखाई देती है।
इसका कारण साफ है। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष के निर्देशों पर हमारी सरकारें जिस वैश्वीकरण-उदारीकरण की नीति पर चल रही हैं, उसके तहत उन्हें बजट घाटा कम करना है। चूंकि कंपनियों, उद्योगपतियों और निर्यातकों को अनुदान तो वे कम नहीं कर सकतीं, इसलिए जनकल्याणकारी कामों पर खर्च और अनुदान कम करने का भारी दबाव है। अर्थव्यवस्था में सरकार का कम से कम दखल होना चाहिए, और बाजार की ताकतों को अपना काम करने देना चाहिए, यह आग्रह भी है।
इसीलिए सरकारी व्यवस्थाओं को धीरे-धीरे खत्म करने, उनका निजीकरण करने और गरीबों के लिए चलने वाली योजनाओं को ‘लक्षित’ (टारगेटेड) करने यानी थोडेÞ-से अति गरीब लोगों तक सीमित करने की प्रक्रिया 1991 के बाद से चल रही है। गरीबी रेखा से दो मकसद और पूरे होते हैं। यह सरकारों को अपनी जिम्मेदारी से बचने का मौका देती है। गरीबी को कम

बता कर और असलियत को छिपा कर वैश्वीकरण नीतियों की सफलता भी बताई जाती है।
गरीबी रेखा देश की   साधारण जनता को बुनियादी जरूरतों से भी वंचित करने का औजार बन गई है। उस पर वैश्वीकरण का दोहरा हमला हो रहा है। एक ओर उसकी रोजी-रोटी छिन रही है, शोषण बढ़ रहा है, महंगाई बढ़ रही है; दूसरी ओर गरीबी रेखा खींच कर उसे सरकारी राहत और ‘सुरक्षा जाल’ (सेफ्टी नेट) से भी वंचित किया जा रहा है। इसलिए गरीबी रेखा के कारण पैदा हो रही समस्याओं के खिलाफ संघर्ष साम्राज्यवाद और नवउदारवाद के खिलाफ बडेÞ संघर्ष का हिस्सा होगा, तभी कामयाब हो सकेगा।
यह हो सकता है कि ज्यादा हो-हल्ले और सर्वोच्च न्यायालय की फटकार के बाद भारत सरकार गरीबी रेखा को थोड़ा ऊपर खिसका दे। पर इससे समस्या हल नहीं होगी। यह सोचने की बात है कि जिस देश में अस्सी-पचासी प्रतिशत लोग बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हों, वहां रेखा कहां खींची जाएगी? ऐसी हालत में गरीबी रेखा खींचने का मतलब बहुत-से जरूरतमंदों को राशन, शिक्षा, इलाज और सामाजिक सुरक्षा से वंचित करना होगा। इसलिए सस्ते राशन, पेयजल, मुफ्त शिक्षा और मुफ्त इलाज की व्यवस्था बिना भेदभाव के पूरी आबादी के लिए होनी चाहिए। इसके लिए अगर सक्षम लोगों से कोई कीमत लेनी है तो वह उनकी हैसियत के मुताबिक उनसे ज्यादा करों के रूप में ली जा सकती है।
साम्यवादी देशों में ही नहीं, यूरोप के कई पूंजीवादी देशों में भी कल्याणकारी राज्य के तहत हाल तक ऐसी व्यवस्थाएं रही हैं। इसके लिए भारत की सरकारें साधनों की कमी का रोना रोती हैं तो वह बहानेबाजी के सिवा और कुछ नहीं है। हथियारों, लड़ाकू विमानों, राष्ट्रमंडल खेलों, हवाई अड््डों, एक्सप्रेस मार्गों, विलासिता की वस्तुओं और सेवाओं के तामझाम पर विशाल राशि लुटाने के बजाय भारतवासियों की बुनियादी जरूरतों पर खर्च किया जा सकता है। अगर कंपनियों और अमीरों को दी जाने वाली मदद और करों में रियायतें बंद कर दी जाएं और दो नंबरी धन को जब्त कर लिया जाए तो कोई कमी नहीं रहेगी। दरअसल, सवाल साधनों का नहीं, प्राथमिकताओं और इच्छाशक्ति का है।
फिर भी अगर कुछ सेवाओं और सुविधाओं को प्रदान करने में कोई भेद करना है तो बेहतर है कि गरीबी रेखा खींचने के बजाय अमीरी रेखा खींची जाए। यानी अमीर लोगों को चिह्नित किया जाए, और उन्हें इन सुविधाओं से बाहर रखा जाए। ऐसा करना प्रशासनिक रूप से भी ज्यादा आसान और व्यावहारिक होगा, क्योंकि अमीरों की संख्या दस फीसद से भी कम होगी। इसकी पहचान या मापदंड भी आसान होंगे। जैसे मोटरगाड़ी रखने वालों, रेलगाड़ियों में वातानुकूलित डिब्बे में या हवाई जहाज से यात्रा करने वालों को अमीरों की सूची में डाला जा सकता है। आयकर विभाग के पास देश के सारे अमीरों और मध्यम वर्ग की आय की अद्यतन जानकारी रहती है और अब वह कंप्यूटरीकृत भी है। इसलिए जो भी अमीरी रेखा बनाई जाएगी, उसके ऊपर के परिवारों की सूची हर साल आसानी से उपलब्ध हो जाएगी। किस आय को अमीरी रेखा मानना है, इसे तय करने की जिम्मेदारी विशेषज्ञों की एक समिति को दी जा सकती है। शर्त यही होनी चाहिए कि देश का कोई भी जरूरतमंद परिवार बुनियादी सुविधाओं से वंचित न रहे। महानगरों के खर्च को देखते हुए आयकर देने वाले नीचे के तबके को भी अमीरी रेखा से नीचे रखा जा सकता है।
गरीबी रेखा की जगह अमीरी रेखा के निर्धारण के कुछ और भी फायदे होंगे। इससे देश का ध्यान देश के अमीरों और उनकी आमदनी और जायदाद में तेजी से हो रही बढ़ोतरी पर भी जाएगा। यह बढ़ोतरी कहां से हो रही है, यह जायज तरीके से हो रही है या अवैध रूप से, इस पर भी बहस चलेगी। हर जगह के अमीरों की सूची को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित भी किया जा सकता है। जिस तरह देश आजाद होने के बाद जमीन पर हदबंदी लागू की गई, उसी तरह आमदनी और संपत्ति पर भी ऊपरी सीमा लागू करने के बारे में गंभीरता से सोचा जा सकता है, जिसके पार देश के किसी नागरिक को जाने की इजाजत नहीं होगी।
आखिर हम यह नहीं भूल सकते कि गरीबी और अमीरी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। देश के अधिकतर लोग गरीब इसलिए हैं क्योंकि उनका हक मारकर मुट्ठी भर लोग चांदी कूट रहे हैं। गरीबी की समस्या का हल महज गरीबों पर ध्यान केंद्रित करने से नहीं होगा। उसके लिए अमीरों की अमीरी पर भी सवाल उठाने होंगे और बंदिशें लगानी होंगी। गैर-बराबरी और वितरण के सवाल से गरीबी के सवाल को अलग नहीं किया जा सकता।
महात्मा गांधी ने गरीबी रेखा या गरीबी निवारण पर नहीं, जीवन की सुविधाओं में बराबरी पर जोर दिया था और इस मामले में वे कोई भेदभाव बर्दाश्त करने के लिए वे तैयार नहीं थे: ‘‘मेरे सपने का स्वराज्य तो गरीबों का स्वराज्य होगा। जीवन की जिन आवश्यकताओं का उपभोग राजा और अमीर लोग करते हैं, वही गरीबों को भी सुलभ होनी चाहिए, इसमें फर्क के लिए स्थान नहीं हो सकता। गरीबों को जीवन की वे सामान्य सुविधाएं अवश्य मिलनी चाहिए, जिनका उपभोग अमीर आदमी करता है। मुझे इस बात में बिल्कुल भी संदेह नहीं है कि हमारा स्वराज्य तब तक पूर्ण स्वराज्य नहीं होगा, जब तक वह गरीबों को सारी सुविधाएं देने की पूरी व्यवस्था नहीं कर देता।’’

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/6315-2011-12-12-04-39-28


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