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न्यूज क्लिपिंग्स् | विकास की मरीचिका- शिवदयाल

विकास की मरीचिका- शिवदयाल

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published Published on Dec 13, 2012   modified Modified on Dec 13, 2012
जनसत्ता 12 दिसंबर, 2012: व्यापार और युद्ध-अभियान- सभ्यताओं के बीच संपर्क के यही दो प्रमुख माध्यम रहे हैं। यों, आप्रवास को भी एक माध्यम गिना जा सकता है, सबसे आदि कारण, जिसमें एक स्थान पर बसने वाला आदि मनुष्य-समूह भोजन या संसाधनों की खोज में एक स्थान से दूसरे स्थान पर विचरता था, लेकिन इसकी परिणति भी अंतत: युद्धों और समझौतों में ही होती थी। बाद में सभ्यता के विकास के साथ जरूरतों को पूरा करने के लिए आदान-प्रदान और फिर व्यापार का विकास हुआ। लेकिन इसके उलट युद्धों और लड़ाइयों ने भी नई शक्लें अख्तियार कीं। केवल भूमि के लिए नहीं, व्यापार और बाद में धर्म प्रचार के लिए भी युद्ध होने लगे, और दुनिया की सूरत लगातार बदलती चली आई। आज भी दुनिया में जो जद्दोजहद है उसके मूल में व्यापार है और इसकी जद में धरती के समस्त संसाधन हैं।
इस बीच दुनिया पूरब-पश्चिम में ही नहीं, दक्खिन-उत्तर में भी बंट गई है। दिशाएं एक-दूसरे के खिलाफ जा रही हैं, जबकि पिछले ढाई हजार साल के इतिहास पर ध्यान दें तो ऐसी फांक होनी नहीं चाहिए थी। अगर पूरब और पश्चिम के बीच सभ्यताओं का विभाजन मान भी लिया जाए, जो कि माना ही जाता है, तो 326 ई.पू. सिकंदर ने पूरब विजय के लिए नहीं, विश्व-विजय के लिए युद्ध अभियान शुरू किया था। वास्तव में यूनान के पश्चिम में था भी क्या, जिसके लिए अभियान चलाया जाता! दुनिया तो उस समय पूरब की ओर खुलती थी, फैलती गई थी। सिकंदर ने बड़े-बड़े साम्राज्यों को धूल में मिलाया, राजवंशों का नाश किया और भारतीय उपमहाद्वीप तक आ पहुंचा। यहीं पूरब के प्रताप से उसका प्रथम और वास्तविक साक्षात्कार हुआ। पूरब के ज्ञान, उसके बौद्धिक और भौतिक वैभव से ही नहीं, पराक्रम से भी, जबकि सिंधु पार करने पर राजा पोरस ने उससे लोहा लिया, जिसे सिकंदर ने हराया तो, लेकिन मित्र बना लिया।
पश्चिम का पूरब, विशेषकर भारत से यह पहला संपर्क नहीं था। आज हमें ज्ञात होता है कि सिंधु घाटी सभ्यता-काल में भी भारत के मिस्र और मेसोपोटामिया के साथ घनिष्ठ व्यापारिक संबंध थे। यह गौरतलब है कि सिकंदर का अभियान धार्मिक अभियान नहीं था। न तो धर्म-रक्षा न ही धर्म थोपने या स्थापित करने के लिए उसने विश्व-विजय की कामना की। इसके बाद रोमन साम्राज्य के उत्थान में भी धर्म-विजय की आकांक्षा या भूमिका नहीं थी। रोमन साम्राज्य पहली सदी ईसापूर्व से पांचवीं सदी ईसापूर्व तक पश्चिमी सभ्यता का केंद्र बना रहा।
लेकिन यही वह काल था जब पश्चिम पर पूर्व ने प्रभाव डालना शुरू किया, जिसका असर आज तक है, बल्कि समय बीतने के साथ मजबूत ही होता गया है। मध्यपूर्व यहूदी, ईसाई और बाद में इस्लाम धर्म का अभ्युदय केंद्र हुआ। यहूदी और ईसाई धर्म का फैलाव शुरू में पूरब की ओर उतना नहीं हुआ जितना पश्चिम की ओर। उस समय रोमन साम्राज्य उत्कर्ष पर था। शुरू में तो रोमन ईसाइयत को कुचलने में लगे रहे, लेकिन धीरे-धीरे स्वयं इसके प्रभाव में भी आते गए।
बाद में छठी सदी में इस्लाम का उदय हुआ तो रोमन साम्राज्य का पतन हो रहा था, पश्चिमी भाग का पतन हो चुका था, जबकि साम्राज्य का पूर्वी भाग पुन: खड़ा होने की कोशिश कर रहा था, बाइजैनटाइन साम्राज्य के रूप में जिसकी राजधानी थी कौन्सटैनटिनोपोल। संभवत: इसी कारण इस्लाम का प्रसार जिस तेजी से पूरब की ओर हुआ, उतनी तेजी से पश्चिम की ओर नहीं। ईसाई और इस्लामी सत्ताओं के बीच चले लंबे ‘धमर्युद्ध’ का भी यही कारण रहा। यूरोप पर पूर्वी रोमन साम्राज्य या बाइजैनटाइन साम्राज्य का प्रभाव पंद्रहवीं सदी तक रहा। तब तक इस्लाम एशिया और अफ्रीका के बड़े भू-भाग का प्रमुख धर्म बन चुका था।
बौद्ध धर्म ढाई हजार साल पहले, यानी ईसा के भी पांच सौ वर्ष पहले भारत में जन्मा और बाद में विश्व-धर्म बना, लेकिन इसका प्रसार पूर्वाभिमुख हुआ। पश्चिम में यह अधिक से अधिक अफगानिस्तान तक प्रसार पा सका, जो एक जमाने में बड़ा बौद्ध केंद्र था, लेकिन बाद में इस्लाम के प्रभाव में आ गया।
‘काली आंधी’ (चंगेज खां) ने भी इसे रौंदा था। बौद्ध धर्म चीन, विएतनाम, कंबोडिया और जापान तक फैला, लेकिन पश्चिम एशिया और यूरोप को यह अपने प्रभाव में नहीं ले सका। लेकिन पूरब की पश्चिम को सबसे बड़ी देन यही है कि अमेरिका समेत समस्त यूरोप की जो धर्म-आस्था है उसका उद््भव और विकास पूरब में ही हुआ है। यह पूरब और पश्चिम का सम्मिलन बिंदु भी है और इस दृष्टि से यह फांक नकली भी लग सकती है। लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि यह सब होते हुए भी पूरब के प्रति पश्चिम की दृष्टि सदा औपनिवेशिक रही है। पश्चिम ने पूरब को सदा हीन दृष्टि से देखा, खासकर पिछले पांच सौ सालों में।
भले ही गणित और विज्ञान के सूत्र भारत और अरब में विकसित हुए हों, विज्ञान के आधार पर आज जो दुनिया का भौतिक परिवेश निर्मित हुआ है वह पूरी दुनिया को पश्चिम की देन है। इसके लिए भले ही यूरोप को ‘अंधकार युग’ से गुजरना पड़ा हो लेकिन आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का प्रकाश उसी से दुनिया भर में फैला। पश्चिम ने मनुष्य की अपनी भौतिक परिस्थितियों को बदलने की असीमित क्षमता सिद्ध की। यंत्र-शक्ति का उपयोग करके उद्योग आधारित एक नई सभ्यता का ही निर्माण पश्चिम ने कर दिखाया। यही नहीं, पश्चिम में नई चिंतन पद्धतियों और दर्शन का भी विकास हुआ। कला, स्थापत्य, राजनीति, अर्थशास्त्र, शिक्षा, चिकित्साशास्त्र, समुद्र विज्ञान और अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में भी नई और युगांतरकारी स्थापनाएं सामने आर्इं। कितने   ही नए शास्त्र विकसित हुए और ज्ञान-विज्ञान की शाखाएं पल्लवित हुर्इं।
लेकिन यह सब कुछ पश्चिम सिर्फ अपने बूते कर सका, ऐसा नहीं है। उसने अपने उद्यमों में पूरब ही नहीं, दुनिया भर के देशों के संसाधनों का दोहन और उपभोग किया। अपने कौशलों का इस्तेमाल उसने उपनिवेश बनाने में किया, एक नई तरह की गुलामी की शुरुआत की। पूरब और पश्चिम का पिछले पांच सौ सालों में अंत:क्रियात्मक संबंध बना, लेकिन यह इकतरफा और असमानता पर आधारित था, बल्कि लूट इसकी बुनियाद थी। दुनिया को ‘सभ्य’ बनाने का काम और ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार साथ-साथ चलता रहा।
उपनिवेशवाद में सभ्यता और आधुनिकता के नाम पर देसी सत्ताओं और प्रजा को अपने अधीन किया जाता रहा। इसके पीछे काल चिंतन की एक-रेखीय अवधारणा थी, जिसके आधार पर उपनिवेशों का अतीत त्याज्य, वर्तमान दयनीय, लेकिन भविष्य सुखमय था, क्योंकि उपनिवेशों का भविष्य अब वास्तव में नई सभ्यता के ध्वजवाहकों से जुड़ गया था, पूंजीवाद जिनकी सबसे बड़ी उपलब्धि बनी।
विकास का जो हल्ला द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद मचा, उसके पीछे वास्तव में उपनिवेशवादी दर्शन ही था, जिसे नई विश्व-परिस्थितियों में गरीब-पिछड़े-नवस्वतंत्र देशों में खासतौर पर आजमाना था। विकास एक ऐसा चमत्कारी शब्द था जो कल के औपनिवेशिक शासकों को अब भी अपनी पूर्व प्रजा से जोड़े रख सकता था, जिसके सहारे एशिया, अफ्रीका और बाकी दुनिया के संसाधनों तक पहुंच बनाई जा सकती थी। इस अर्थ में विकास पश्चिम और पूरब (बल्कि शेष दुनिया) के बीच का सबसे विश्वसनीय सेतु बना। नव-उपनिवेशवाद, जिसका सबसे प्रगट रूप भूमंडलीकरण है, विकास की मरीचिका पर ही खड़ा है।
यूरोप और अमेरिका का अनुगमन दुनिया के लगभग सभी देश कर रहे हैं। वे रास्ता दिखा रहे हैं, हम चल रहे हैं। कहने को दुनिया एक हो रही है, दूरियां मिट रही हैं। लेकिन वास्तव में एकाधिकार और भेदभाव इस विश्व-व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा हैं जिन्हें मुक्त बाजार की आड़ में प्रोत्साहित किया जाता है। लोकतंत्र को इस व्यवस्था की चालक शक्ति बताया जाता है, जबकि राजनीतिक संस्थाओं की इसमें कोई हैसियत नहीं, जनपक्षीय राजनीति का तो एक तरह से निषेध ही है।
लोकतांत्रिक देशों में भी नीति-निर्माता, नौकरशाह, व्यापारिक घरानों और राजनीतिक वर्ग- इनसे मिल कर वह समूह बनता है जो जनता की राजनीति को विकास की राजनीति से विस्थापित कर देता है और विकास को राष्ट्रीय जीवन का एकमात्र लक्ष्य मानता है।
उत्तर-औपनिवेशिक काल इस अर्थ में औपनिवेशिक काल का ही विस्तार है जिसमें कहने को तो पूरब-पश्चिम, उत्तर-दक्खिन मिले हुए हैं, एक हैं, लेकिन वास्तव में विकसित पश्चिम अपना वैभव बचाए और बनाए रखने के लिए अविकसित पूरब को ‘विकास’ के रास्ते ले जाने को आमादा है। इस विकास, इस मरीचिका की कीमत क्या है, अब यह गोपन बात नहीं रही। पर्यावरणीय क्षति तो है ही, मानवीय क्षति की तो माप करना भी संभव नहीं। नकली, सतही सरोकारों से मानव समाज को जोड़ दिया गया। भोग मात्र को जीवन-मूल्य और मानव-मुक्ति का साधन बना दिया गया। मानव-जीवन प्रकृति-द्रोह से होकर अब आत्मद्रोह के चरण में आ पहुंचा है। इसके आगे क्या?
दुनिया भर में दिनोंदिन खोखली होती जाती विश्व-अर्थव्यवस्था पर चिंता जताने वालों की भी कभी नहीं। यह बात अलग है कि उनकी अभी सुनी नहीं जा रही, वे अल्पमत में हैं, और यह बात भी जरूर है कि इस भंवर से निकलने का कोई विश्वसनीय रास्ता वे नहीं सुझा पा रहे हैं। जिन देशों और समाजों से इस ढहती व्यवस्था के बदले नई व्यवस्था विकसित करने की अपेक्षा थी, और जिन पर यह जिम्मेदारी भी बनती थी, वे स्वयं इस डूबते जहाज के मस्तूल पर खड़े होकर बड़े बनने की कोशिश कर रहे हैं। चीन, भारत, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील- सब जैसे अधीरता से डूबने की अपनी पारी का इंतजार कर रहे हैं। बस भारत के एक नन्हें पड़ोसी ने अपने तर्इं इस ‘वृद्धि’ और ‘विकास’ को चुनौती दी है।
भूटान ने अपने नागरिकों के जीवन की खुशहाली मापने के लिए सकल राष्ट्रीय प्रसन्नता को कसौटी बनाया है। यह अपने आप में बहुत बड़ी पहल है, जिसमें मानव जीवन की संतुष्टि और सुख के लिए भौतिक उपलब्धियों को एकमात्र मानदंड मानने से इनकार कर दिया गया है। पर्यावरण और मनुष्य के बीच के नैसर्गिक संबंध और अंतरनिर्भरता में ही जीवन की सार्थकता है- हिमालय की गोद में बसा यह छोटा-सा बौद्ध देश पूरी दुनिया को यही संदेश दे रहा है, जिसने हाल ही में लोकतंत्र को अपनाया है। भले ही यह तूती की आवाज से अधिक न हो, लेकिन पश्चिम को पूरब का जवाब है और आह्वान भी कि आज मानव जीवन के उद््देश्यों को नए सिरे से परिभाषित करने की जरूरत आन पड़ी है।
विश्वविजयी पश्चिम के विजय रथ के लिए आगे रास्ता नहीं है। जरूरत आज वैकल्पिक विकास तक सीमित नहीं रही, क्यों वैकल्पिक विकास की अवधारणा भी विकास के विमर्शों में ही उलझ कर रह जाती है। अब तो समय आ गया है जब हम विकास का विकल्प ढूंढ़ें। यह काम आसान नहीं है लेकिन गांधीजी ने पूरब और बाकी दुनिया की तरफ से पश्चिम को जो जवाब दिया था, वह हर प्रकार से विकल्प का ही रास्ता था।
पश्चिमी औपनिवेशिक सत्ता की हिंसा के विकल्प में उन्होंने अहिंसा; झूठ और आडंबर के विकल्प में सत्य; शोषण और दमन के विकल्प में सत्याग्रह; परतंत्रता के विकल्प में स्वराज; परावलंबन के विकल्प में स्वावलंबन; आर्थिक और राजनीतिक केंद्रीकरण और एकाधिकार के खिलाफ विकेंद्रीकरण का मार्ग सुझाया था   और इस पर आगे बढ़े थे। पश्चिमी सभ्यता, पूंजीवादी अर्थतंत्र, उद्योगवाद और राज्यवाद का सबसे ठोस और विश्वसनीय विकल्प तो गांधीजी ने सुझाया। उनका योगदान भारत के स्वतंत्रता आंदोलन तक सीमित नहीं था। भारत के बाद तमाम एशियाई और अफ्रीकी देश औपनिवेशिक दासता से मुक्त हुए, लेकिन किसी ने अपनी नई राह नहीं बनाई। स्वयं गांधी के देश ने विकल्प का रास्ता नहीं चुना।

http://www.jansatta.com/index.php/component/content/article/20-2009-09-11-07-46-16/34402-2012-12-12-05-26-47


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