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न्यूज क्लिपिंग्स् | स्वास्थ्य बजट: कोरोना के भयानक दौर को क्या भूल गई सरकार?

स्वास्थ्य बजट: कोरोना के भयानक दौर को क्या भूल गई सरकार?

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published Published on Feb 10, 2022   modified Modified on Feb 10, 2022

-न्यूजक्लिक,

वित्तीय वर्ष 2022-23 के स्वास्थ्य बजट से इस क्षेत्र के जानकार आहत,दुःखित और आक्रोशित हैं। पूर्व स्वास्थ्य सचिव भारत सरकार के. सुजाता राव कहती हैं- "कोविड-19 के कारण 30 लाख लोगों की मृत्यु होने का अनुमान है जो किसी भी दृष्टि से अस्वीकार्य है। मौत का यह आंकड़ा कम हो सकता था, लोगों की अकल्पनीय पीड़ा में भी कमी लाई जा सकती थी यदि हमारा स्वास्थ्य तंत्र ठीक ठीक काम कर रहा होता।" के. सुजाता राव ने कहा -"स्वास्थ्य क्षेत्र की जैसी उपेक्षा बजट में की गई है उससे मैं हतप्रभ हूँ। 2021-22 का आर्थिक सर्वेक्षण कोविड-19 की छाया में लिखा गया है। पिछले दो वर्षों ने हमें अनेक जख्म दिए हैं। मुझे उम्मीद थी कि स्वास्थ्य पर भरपूर ध्यान दिया जाएगा किंतु बजट में देश के नाकाम स्वास्थ्य तंत्र में सुधार लाने का कोई प्रयास नहीं दिखता।"

एस एल जी हॉस्पिटल के कार्यपालक निर्देशक सोमा राजू ने कहा कि सरकार को आवश्यक रूप से स्वास्थ्य क्षेत्र में या तो स्वयं निवेश करना चाहिए अथवा निजी क्षेत्र को निवेश के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए तभी हम अर्ध शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकेंगे। 

इन्फेक्शन कंट्रोल अकादमी के अध्यक्ष रंगा रेड्डी बुर्री की राय में बजट में प्राइमरी हेल्थकेयर की उपेक्षा की गई है और इसके परिणाम स्वरूप आने वाले दिनों में लोगों पर वित्तीय भार पड़ेगा।

महामारी विशेषज्ञ चंद्रकांत लहरिया के अनुसार डेल्टा वैरिएंट की दूसरी लहर के दौरान देश बुरी तरह प्रभावित हुआ था। इस भयानक अनुभव के बाद वित्त मंत्री से स्वास्थ्य क्षेत्र को बड़ी आशाएं थीं जो पूरी नहीं हुईं।

स्वास्थ्य बजट की चर्चा से पहले बजट-पूर्व आर्थिक सर्वेक्षण में सरकार द्वारा किए गए इस दावे का परीक्षण आवश्यक है कि स्वास्थ्य पर व्यय विगत दो वर्षों में बढ़कर जीडीपी का 2.1 फीसदी हो चुका है और सरकार 2025 तक इसे जीडीपी के 2.5 प्रतिशत के स्तर पर पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है।

पिछले वित्तीय वर्ष 2021-22 के बजट में सरकार ने स्वास्थ्य सेवाओं से अप्रत्यक्ष रूप से संबंधित उन सभी हिस्सों का समावेश स्वास्थ्य व्यय में कर दिया था जो स्वास्थ्य मंत्रालय के अधीन नहीं आते थे। स्वास्थ्य सेवाओं के बजट में अलग से कोई इजाफा नहीं किया गया बल्कि पोषण, जल एवं स्वच्छता के व्यय को स्वास्थ्य व्यय में जोड़ देने के कारण ऐसा प्रतीत होने लगा कि स्वास्थ्य पर सरकार जमकर खर्च कर रही है। विगत वर्ष आयुष मिनिस्ट्री, डिपार्टमेंट ऑफ ड्रिंकिंग वॉटर एंड सैनिटेशन और कोरोना वैक्सीन पर होने वाले खर्च को भी स्वास्थ्य के खर्चे में जोड़ा गया था। इस वर्ष भी सरकार के स्वास्थ्य बजट में 135 फीसदी इजाफे के दावों को इन तथ्यों के प्रकाश में देखा जाना चाहिए। 

अनेक विशेषज्ञों का आकलन है कि स्वास्थ्य सेवाओं के लिए वर्ष 2021-22 का वास्तविक स्वास्थ्य बजट जीडीपी का .34 प्रतिशत था जो 2022-23 में .06 प्रतिशत की मामूली वृद्धि के बाद .40 प्रतिशत हो गया है। विगत वर्ष बजट में स्वास्थ्य की हिस्सेदारी 2.35 प्रतिशत थी जो अब घटकर 2.26 प्रतिशत रह गई है। वित्तीय वर्ष 2021-22 के संशोधित अनुमान में स्वास्थ्य हेतु 85915 करोड़ रुपए का आबंटन था। वित्तीय वर्ष 2022-23 के बजट अनुमान में मामूली सी वृद्धि के साथ स्वास्थ्य के लिए 86606 करोड़ रुपए आबंटित किए गए हैं। मुद्रा स्फीति और जीडीपी के प्रभाव को समायोजित करने पर स्वास्थ्य बजट कम ही हुआ है।

स्वास्थ्य को बजट में प्राथमिकता देने के मामले में हम 189 देशों में 179वें स्थान पर हैं। स्वयं स्वास्थ्य राज्य मंत्री अनुप्रिया पटेल ने सितंबर 2019 में लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के लिखित उत्तर में विश्व के कुछ प्रमुख देशों के स्वास्थ्य व्यय संबंधी आंकड़े भी सदन के समक्ष रखे थे। इनके अनुसार वर्ष 2015-16 में अमेरिका ने स्वास्थ्य पर अपनी जीडीपी का 17.43 फीसदी,जापान ने 10.90 फीसदी, फ्रांस ने 11.67 प्रतिशत एवं चीन ने 5.88 प्रतिशत व्यय किया।

सरकार ने वर्तमान बजट में कोविड संबंधी आबंटन में भारी कटौती की है। वित्तीय वर्ष 2020-21 में कोविड विषयक व्यय 11940 करोड़ रुपए था। जबकि वित्तीय वर्ष 2021-22 हेतु संशोधित अनुमान 16545 करोड़ रुपए था। वर्ष 2022-23 में कोविड विषयक गतिविधियों हेतु केवल 226 करोड़ रुपए का आबंटन है। कोविड की तीसरी लहर अभी खत्म नहीं हुई है।

पहली एवं दूसरी लहर की विनाशकता और सरकारी प्रयासों की अपर्याप्तता को हम सबने देखा है। इन परिस्थितियों में सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि कोविड विषयक आबंटन में भारी कमी के पीछे उसका तर्क क्या है? पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के विशेषज्ञ के.श्रीनाथ रेड्डी के अनुसार ऐसा लगता है कि सरकार अपने बजट के जरिये यह संकेत दे रही है कि अब कोविड खतरनाक नहीं रहा। जन स्वास्थ्य अभियान के अमूल्य निधि, रवि दुग्गल तथा अमिताभ गुह ने कोविड टीकाकरण के लिए आबंटन में भारी कटौती पर चिंता व्यक्त करते हुए यह आशंका व्यक्त की है कि इसके कारण शत प्रतिशत आबादी के टीकाकरण के लक्ष्य को प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है। उल्लेखनीय है कि इस वर्ष कोविड टीकाकरण के लिए राज्यों को सहायता देने हेतु 5000 करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है जबकि वित्तीय वर्ष 2021-22 का संशोधित आकलन 39000 करोड़ रुपए का है। यह भारी कटौती आशंका उत्पन्न करती है कि क्या टीकाकरण में निजी क्षेत्र का प्रवेश होने वाला है?

वित्तीय वर्ष 2022-23 में चिकित्सा एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य पर सरकार का प्रस्तावित व्यय 2021-22 के संशोधित अनुमान की तुलना में 45 प्रतिशत कम है। वर्ष 2021-22 में चिकित्सा एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य पर व्यय 74820 करोड़ रुपए था जबकि वित्तीय वर्ष 2022-23 में चिकित्सा तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य पर 41,011 करोड़ रुपए का व्यय प्रस्तावित है। एक बजट दस्तावेज़ के अनुसार यह कटौती कोविड टीकाकरण की घटती आवश्यकता के कारण की गई है। 

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


डॉ राजू पांडेय, https://hindi.newsclick.in/Health-Budget-Did-the-government-forget-the-dreadful-phase-of-Corona


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