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न्यूज क्लिपिंग्स् | केंद्रीय बजट 2022-23 में पूंजीगत खर्च बढ़ाने के पीछे का सच

केंद्रीय बजट 2022-23 में पूंजीगत खर्च बढ़ाने के पीछे का सच

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published Published on Feb 13, 2022   modified Modified on Feb 23, 2022

-न्यूजक्लिक,

वित्त मंत्री सुश्री निर्मला सीतारमण का केंद्रीय बजट 2022-23 एक ही जुनून (obsession) पर आधारित है। यह जुनून बड़े-बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में कैपिटल एक्सपेंडिचर (कैपेक्स) बढ़ाने का है। धारणा यह है कि इस तरह के big-ticket वाले बुनियादी ढांचे के खर्च से अतिरिक्त मांग पैदा होगी और निजी निवेश का खुद ही प्रवेश होगा, और इस तरह विकास को बढ़ावा मिलेगा। 

न्यूज़क्लिक ने पूर्व वित्त सचिव श्री एस.पी. शुक्ला से केंद्रीय बजट 2022-23 के पीछे इस अंतर्निहित रणनीति पर उनके विचार जानने के लिए संपर्क किया। उन्होंने कहा, "बजट में कल्याणकारी खर्च, यानी उपभोग खर्च का प्रोत्साहन पर्याप्त नहीं है। यह आपूर्ति पक्ष (supply side) पूंजीगत व्यय उपायों और खपत पक्ष (consumption side) द्वारा कुल मांग को बढ़ाने हेतु समग्र संतुलित प्रोत्साहन (ताकि अर्थव्यवस्था में उच्च विकास हो) के बीच उचित संतुलन की समझ की कमी को दर्शाता है। 

श्री शुक्ला ने आगे कहा: "निजी निवेश सिर्फ इसलिए नहीं होता कि धन प्रवाह सरकार से सार्वजनिक पूंजी व्यय की ओर जाता है। निश्चित ही, बड़े निवेश करने से पहले निवेशक बाजार की क्षमता व संभावित मांग का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन करेंगे। भले ही आप निवेशकों को रियायतें दें, कुल मांग को प्रोत्साहन देने के अभाव में, , वे निवेश नहीं करेंगे। इसके बजाय, वे बेहतर दिनों की प्रतीक्षा करेंगे। या, तुरन्त पैसा बनाने के लिए शेयर बाजार में या वित्तीय अटकलों के लिए पैसा निवेशित करेंगे। या, बस अपने लिए लाभांश बढ़ाएँगे। वे केवल गरीब ही होते हैं जो हाथ में कुछ पैसा आते ही सारा खर्च करने लगते हैं । लेकिन, यदि आप किसानों को सहायता केवल पीएम-किसान जैसी कुछ सांकेतिक राशि तक सीमित करते हैं, तो वे इसका उपयोग केवल उन ऋणों को चुकाने के लिए करेंगे जो उन्होंने महामारी संकट के दौरान लिए थे। भूख से निपटने के लिए मुफ्त अनाज देना जरूरी है लेकिन इससे मांग नहीं बढ़ेगी। वर्तमान खपत को बढ़ाने के लिए राशि पर्याप्त होनी चाहिए, केवल इससे ही औद्योगिक वस्तुओं और सेवाओं की मांग बढ़ सकती है। सरकार को एक गलत धारणा के तहत लगता है कि बड़ी टिकट (big-ticket) परियोजनाओं पर खर्च करने से स्वतः ही गुणक प्रभाव (multiplier effect) उत्पन्न हो जाएगा। लेकिन अक्सर ऐसा नहीं होता। बल्कि, यह अक्सर केवल क्रोनी कैपिटलिस्ट्स और राजनेता-ठेकेदार-माफिया गठजोड़ को ही फायदा पहुंचाता है।”

श्री शुक्ल के शब्दों में हाल के आर्थिक इतिहास के तथ्य सत्य को प्रकट करते हुए नज़र आते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ-एक वर्षों में मामूली गिरावट के बावजूद, बाद के बजटों में पूंजीगत व्यय (capex) लगातार बढ़ रहा है, लेकिन विकास दर बढ़ने के बजाय घट रहा है।।

मौजूदा कीमतों (current prices) में, 2014-15 में पूंजीगत व्यय 1.97 लाख करोड़ रुपये था। 2015-16 में इसे बढ़ाकर 2.53 लाख करोड़ रुपये और फिर 2016-17 में 2.85 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया। 2017-18 में 2.63 लाख करोड़ रुपये की मामूली गिरावट के बाद, फिर से 3.80 लाख करोड़ रुपये की भारी वृद्धि हुई। 2019-20 में फिर से 3.36 लाख करोड़ रुपये की मामूली गिरावट आई, लेकिन 2020-21 में पूंजीगत व्यय में पुनः 4.39 लाख करोड़ रुपये की तेज वृद्धि हुई। यह 2021-22 में 8.40 लाख करोड़ रुपये (आरई) revised estimate निकला। और 2022-23 के लिए इसे 10.67 लाख करोड़ रुपये प्रस्तावित किया गया है। दूसरे शब्दों में, यह 7 वित्तीय वर्षों में पांच गुना से अधिक की वृद्धि है।

इसके विपरीत, 2014-15 में सकल घरेलू उत्पाद का वृद्धि दर 7.41%, 2015-16 में 8.00%, 2016-17 में 8.26%, 2017-18 में 6.80%, 2018-19 में 6.53%, 2019-20 में 4.04% था। और 2020-21 के चरम महामारी वर्ष में एक नकारात्मक -7.96% रहा। यह महामारी के आने से पहले ही लगातार गिरावट को दर्शाता है। दूसरे शब्दों में, पूंजीगत व्यय में वृद्धि के बावजूद भारत में सकल घरेलू उत्पाद के विकास दर में लगातार गिरावट आई है। तो, क्या अब फिर ऐसा ही करने से कुछ और बेहतर होगा?
 
केपेक्स (capex) को बजट रणनीति का एकमात्र जोर क्यों बनाया जाए?

कहीं कोई गलतफहमी न हो तो, सबसे पहले, हम यह स्पष्ट कर दें कि हम पूंजीगत व्यय को बढ़ाने के प्रति आलोचनात्मक नहीं हैं। खपत और कुल मांग को बढ़ाने हेतु किसी भी प्रोत्साहन की पूरी तरह उपेक्षा कर केवल इसे बजट रणनीति का एकमात्र बिंदु बनाने पर हम आपत्ति जता रहे हैं। दूसरे, पूंजीगत व्यय की संरचना भी एक महत्वपूर्ण अंतर पैदा कर सकती है। प्रमुख उपभोग क्षेत्रों को प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता के अभाव में एकतरफा निवेश-आधारित विकास एक कपोल कल्पना है।
 
पूंजीगत व्यय (capex) से अधिकतम प्रोत्साहन प्रभाव प्राप्त करने के लिए भी दो मूलभूत प्रश्न बहुत निर्णायक हैं।
क्या सभी पूंजीगत व्यय का पैसा लगभग 200 बड़े कॉरपोरेट घरानों के हाथों में देना है या व्यापक-आधारित निवेश को बढ़ावा देने के लिए विकेन्द्रीकृत पूंजीगत व्यय की ओर बढ़ना है?

क्या सारा पैसा बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में डालना है या विकेंद्रीकृत निवेश करना है; यानि विशेष रूप से ग्रामीण और सामाजिक बुनियादी ढांचे में उसी पैसे से अधिक प्रोत्साहन प्रभाव प्राप्त करना है ?

दोनों सवालों के जवाब से पता चलता है कि भारत में पूंजीगत व्यय बड़े व्यापारिक घरानों द्वारा बड़ी-टिकट वाली परियोजनाओं के पक्ष में अत्यधिक हो रहा है। यह इसलिए हो रहा है कि कृषि और ग्रामीण बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे और हमारी अर्थव्यवस्था की रीढ़ वाले हजारों छोटे और मध्यम निवेशकों द्वारा अर्थव्यवस्था में समग्र निवेश में इज़ाफा हेतु प्रोत्साहन बढ़ाने की उपेक्षा की जा रही है।

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


बी सिवरामन, https://hindi.newsclick.in/The-truth-behind-increasing-capital-expenditure-in-the-Union-Budget-2022-23
 

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