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न्यूज क्लिपिंग्स् | “मुझे पता नहीं कि भारत देश कितने दिनों तक इस रास्ते पर चलेगा”: साईबाबा को अरुंधति रॉय का पत्र

“मुझे पता नहीं कि भारत देश कितने दिनों तक इस रास्ते पर चलेगा”: साईबाबा को अरुंधति रॉय का पत्र

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published Published on Jul 24, 2020   modified Modified on Jul 25, 2020

-न्यूजलॉन्ड्री,

सेवा में, प्रोफेसर जीएन साईबाबा अंडा सेल, नागपुर सेंट्रल जेल नागपुर, महाराष्ट्र

प्रिय साई,

सबसे पहले मैं माफी मांगती हूं कि मैं अरुंधति लिख रही हूं न कि अंजुम. आपने तीन साल पहले उन्हें खत लिखा था, तो निश्चय ही उसे आपको जवाब देना बनता है लेकिन मैं क्या कह सकती हूं- वाट्सएप और ट्विटर की भागमभाग के इस दौर में भी उसके समय की समझ आपकी-मेरी समझ से बिल्कुल अलग है. वह सोचती है कि तीन साल कोई इतना भी वक्त नहीं हो गया कि एक चिट्ठी का जवाब दे ही दे (न भी दे). फिलहाल, उसने खुद को जन्नत गेस्ट हाउस के एक कमरे में बंद कर लिया है और हर समय गाती रहती है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इतने वर्षों के बाद उसने फिर से गाना शुरू कर दिया है. उसके दरवाजे के बगल से गुज़रते हुए उसका गाना सुनना जिन्दगी में सुखद एहसास देता है. हर बार जब वह ‘तुम बिन कौन खबरिया मोरी लेत’ गाती है, दिल टूटने का एहसास करा जाती है. और इसी गीत से मुझे आपकी याद भी आ जाती है. वह जब भी गाती है, मुझे यकीन है कि वह आपके बारे में सोचते हुए ही यह गाती है. इसलिए अगर वह आपके खत का जवाब नहीं दे पाई है तो यह समझ लीजिए कि वह प्रायः आपके लिए ही गाती है. अगर आप ठीक से अपना ध्यान केन्द्रित करें तो शायद आप उसे सुन भी सकते हैं.

जब मैं ‘आपके और मेरे’ समय की समझ के बारे में बोल रही थी तो निश्चित रूप से मैं यह गलत कह रही थी क्योंकि आप कुख्यात अंडा सेल में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे हैं, इसलिए आपके समय की समझ अंजुम से मेल खाती है न कि मुझसे. या ऐसा भी हो सकता है कि उसके समय की समझ बिल्कुल ही अलग हो. मुझे हमेशा से लगता रहा है कि अंग्रेजी का जो यह ‘समय कट रहा है’ मुहावरा है, उसका जिस रूप में प्रयोग किया जाता है उससे बिल्कुल अलग बहुत ही गहरा अर्थ होता है. खैर, उस अवैचारिक टिप्पणी के लिए माफी चाहती हूं. अंजुम भी अलग तरह से, अपनी कब्रगाह में, ‘कसाई की तकदीर’ मानकर आजीवन कारावास काट रही है लेकिन निश्चित रूप से, वह सलाखों के पीछे नहीं है या उसके साथ एक जीवित जेलर नहीं है. उसका जेलर जालिम है और जाकिर मियां की यादें हैं.

आप कैसे हैं, यह मैं आपसे इसलिए नहीं पूछ रही हूं क्योंकि वसंता ने मुझे आपके बारे में सब कुछ बता दिया है. मैंने आपकी सारी मेडिकल रिपोर्ट तफसील से देखी है. यह कल्पनातीत है कि उन्होंने आपको जमानत नहीं दी है या फिर पेरोल भी नहीं दिया है. हकीकत तो यह है कि कोई ऐसा दिन नहीं बीतता है जिस दिन मैं आपके बारे में सोचती नहीं हूं. क्या अब भी वे अखबार सेंसर करके देते हैं या पढ़ने के लिए किताबें नहीं देते हैं? रोज़ाना काम में जो कैदी आपकी मदद करते हैं वे क्या आपके साथ उसी सेल में रहते हैं? वे क्या शिफ्ट में आपके साथ रहते हैं? उनका व्यवहार दोस्ताना है? वे आपके व्हीलचेयर को कैसे संभालते हैं?

पूरा खत पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


अरुंधति रॉय, https://www.newslaundry.com/2020/07/24/arundhati-roy-letter-to-prof-gn-saibaba


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