Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 150
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 151
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Warning (512): Unable to emit headers. Headers sent in file=/home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php line=853 [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 48]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 148]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 181]
न्यूज क्लिपिंग्स् | जानें कैसे हवा को ठंडा करने की तकनीकें पृथ्वी को गर्म कर रही हैं?

जानें कैसे हवा को ठंडा करने की तकनीकें पृथ्वी को गर्म कर रही हैं?

Share this article Share this article
published Published on Dec 13, 2021   modified Modified on Dec 13, 2021

-इंडियास्पेंड,

क्या आप जानते हैं कि एयर कंडीशनर जैसी रेफ्रिजेरेशन और कूलिंग तकनीकें 100 करोड़ टन से अधिक कार्बन-डाइऑक्साइड उत्सर्जन (CO2) करती हैं? ये आंकड़े जापान के उत्सर्जन के बराबर हैं, जो 2018 में दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा कार्बन-डाइऑक्साइड उत्सर्जक देश था। भारत ने ऊर्जा-बचत और जलवायु-अनुकूल कूलिंग तकनीकों के लिए एक इंडिया कूलिंग एक्शन प्लान (ICAP) तैयार किया गया था, लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके लॉन्च होने के दो साल बाद भी स्थितियों में कोई खास सुधार नहीं आया है। इस दिशा में बहुत ही धीमी गति से प्रयास किए जा रहे हैं।

भारत में बढ़ती गर्म हवाओं और लू के मद्देनजर, भारत की कूलिंग डिमांड 2017-18 की तुलना में 2037-38 तक पांच से आठ गुना बढ़ने की उम्मीद है। ज़ाहिर है कूलिंग स्पेस की मांग में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी होगी, जिसे एयर कंडीशनर के जरिए पूरा किया जाएगा।

भारत ने अगस्त 2021 में, किगाली संशोधन को अपनी सहमति (माना था) दी थी, जिसके तहत तय किया गया है कि हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) की जगह पर्यावरण को नुकसान ना पहुंचाने वाले कूलेंट्स का इस्तेमाल किया जाए। यह एक अंतरराष्ट्रीय समझौता है जिसे अगर पूरी तरह लागू किया जाता है और HFCs का उत्सर्जन पूरी तरह बंद कर दिया जाता है तो इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान में होने वाली वृद्धि को 0.4 डिग्री सेल्सियस तक कम किया जा सकता है।

इस एक्सप्लेनर में हम HFCs के संभावित विकल्पों और भारत की ग्रीन कूलिंग योजनाओं के बारे में बात करेंगे।

मौजूदा रेफ्रिजरेंट कैसे ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ा रहे हैं?

एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेटर जैसी कूलिंग तकनीकें हाइड्रोफ्लोरोकार्बन (HFCs) का उपयोग करती हैं। 1990 के दशक में, क्लोरोफ्लोरो कार्बन (CFC) की जगह इनका इस्तेमाल होने लगा। CFC पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल में मौजूद ओजोन परत को नष्ट कर रहे थे। ओज़ोन परत सूर्य के हानिकारक पराबैंगनी विकिरणों से पृथ्वी पर मौजूद जीवन को बचाती है।

शक्ति सस्टेनेबल एनर्जी फाउंडेशन में जलवायु नीति कार्यक्रम के निदेशक शुभाशीष डे का कहना है, "HFCs CFC की तुलना में बहुत कम हानिकारक हैं, लेकिन वे एक और समस्या पैदा करते हैं- उनके पास एक मजबूत हीट-ट्रैपिंग इफेक्ट है, जो ग्लोबल वार्मिंग को बढ़ा रहा है।"

HFCs कार्बन डाइऑक्साइड की तुलना में कई हजार गुना अधिक गर्म होते हैं। इन गैसों को AC इकाइयों द्वारा उत्सर्जित नहीं किया जाना चाहिए, लेकिन अक्सर निर्माण, रखरखाव और विघटन के दौरान इनका रिसाव हो ही जाता है।

अमेरिका-स्थित पर्यावरण संगठन, इंस्टीट्यूट फॉर गवर्नेंस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट की 2020 की रिपोर्ट के अनुसार, 2050 में, HFCs उत्सर्जन से प़ृथ्वी के तापमान में काफी वृद्धि की उम्मीद की जा रही है। यह वृद्धि वैश्विक CO2 उत्पादन के 20% के बराबर होगी।
कंडीशनिंग की मांग चीन, भारत और इंडोनेशिया में बढ़ेगी

स्त्रोत: इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी
कूलिंग तकनीकें ज्यादा बिजली खपाने वाली होती हैं। बिजली मुख्य रूप से कोयले का इस्तेमाल कर बनाई जाती है। इससे CO2 का उत्सर्जन और बढ़ता है।
HFCs कैसे काम करते हैं: ये गैसें रेफ्रिजरेटर की दीवारों में घूमती रहती हैं, फ्रिज को ठंडा रखने के लिए आसपास की गर्मी को सोख लेती हैं। जैसे ही HFCs गर्मी सोखती हैं, यह वाष्पित हो जाती हैं। ये वाष्पकण रेफ्रिजरेटर के पीछे लगी कॉइल में चले जाते हैं, जहां दबाव के चलते वापस एक तरल में संघनित हो जाते हैं। इस प्रक्रिया में फ्रिज के अंदर जो भी गर्मी होती है, उसे सोखकर कर आसपास की जगह में छोड़ दिया जाता है।

HFCs के विकल्प

HFCs के विकल्प के तौर पर हम हाइड्रोकार्बन (HC), अमोनिया, पानी आदि की तरफ देख सकते हैं। अध्ययन से पता चलता है कि इनसे वैश्विक तापमान में होने वाली वृद्धि की संभावना कम होती है। इसके अलावा CO2, जिसे एक सदी पहले रेफ्रीजेरेशन में सबसे पहले इस्तेमाल किया गया था, अब फिर से कमर्शियल रेफ्रिजरेशन में वापस लौट रहा है क्योंकि यह HFC की तुलना में तापमान को कम बढ़ाता है।

दिल्ली स्थित काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (CEEW )की सीनियर प्रोग्राम लीड शिखा भसीन ने इंडियास्पेंड को बताया, फायदे तो हैं लेकिन कुछ प्राकृतिक रेफ्रिजरेंट के साथ समस्याएं भी हैं। इनमें से कई ज्वलनशील हैं, जिनसे आग लगने का खतरा अधिक है। उन्होंने कहा, "इसलिए प्राकृतिक रेफ्रिजरेंट की ओर बढ़ने के प्रयासों से बहुत सी कंपनियों ने कदम खींचे हैं." जिससे इन गैसों के बाजार पर असर पड़ा है।

प्राकृतिक रेफ्रिजरेंट जैसे अमोनिया, प्रोपेन और CO2 में जोखिम ज्यादा हैं। प्रोपेन के रिसाव से आग लग सकती है, जबकि अमोनिया का रिसाव जानलेवा हो सकता है।

भसीन ने कहा, "प्राकृतिक रेफ्रिजरेंट की प्रासंगिकता, या कूलिंग सिस्टम में इसके इस्तेमाल से पहले जांच या परीक्षण किया जाना जरुरी है ताकि यह समझा जा सके कि इसे लेकर हमारे सामने क्या चुनौतियां आ सकती हैं और हम उन्हें कैसे सुरक्षित और प्रभावी ढंग से उपयोग कर सकते हैं।"

हालांकि हाइड्रोफ्लोरोलेफिन (HFOs) जैसे सुरक्षित विकल्प भी मौजूद हैं। इन्हें पहले से ही कई वाहनों में एयर कंडीशनिंग के लिए इस्तेमाल में लाया जा रहा है। और ये HFCs की तुलना में बहुत कम समय के लिए वातावरण में ठहरते हैं। शक्ति सस्टेनेबल एनर्जी फाउंडेशन के शुभाशीष डे ने कहा कि अमेरिकी कंपनियों ने हाइड्रोफ्लोरोलेफिन (HFOs) के लिए पेटेंट करा रखा है, इसलिए उन्होंने इसका इस्तेमाल करना शुरू कर दिया है। वह कहते हैं, "बाजार प्राकृतिक रेफ्रिजरेंट के साथ उतना आगे नहीं बढ़ा है जितना कि हाइड्रोफ्लोरोलेफिन जैसे पेटेंट वाले उत्पादों के साथ।"

भारत में गोदरेज एंड बॉयस एक ऐसी कंपनी है जिसने अपने AC और रेफ्रिजरेटर में नॉन-HFCs विकल्पों का रुख किया है। गोदरेज अप्लायंसेज़ के बिजनेस हेड और कार्यकारी उपाध्यक्ष कमल नंदी ने इंडियास्पेंड को बताया,

"2001 की शुरूआत में ही हम रेफ्रिजरेटर के लिए क्लोरोफ्लोरोकार्बन या CFC को छोड़ पर्यावरण के अनुकूल हाइड्रोकार्बन मिश्रण (जो प्रोपेन और आइसोब्यूटेन मिश्रण है) की तरफ चले गए थे।" उन्होंने आगे बताया, "उत्पादों में एक निश्चित तकनीकी विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है जिसे हम समय के साथ बनाते गए हैं।"

आर-600 (आइसोब्यूटेन) की ओर बदलाव में उनका 36-40 करोड़ रुपये का खर्च आया था। इस खर्च का छठा हिस्सा स्विट्ज़रलैंड और जर्मन सरकारों ने वहन किया था। साल 2010-11 में गोदरेज ने एयर कंडीशनर में R-290 (प्रोपेन) का इस्तेमाल शुरू किया। इस बदलाव में 10 करोड़ रुपये खर्च हुए जिसे जर्मन अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (GIZ) ने वहन किया।

डे ने कहा, "कूलिंग के और भी बहुत से तरीके हैं जिनमें किसी भी तरह के रेफ्रिजरेंट का इस्तेमाल नहीं किया जाता और वे जलवायु के अनुकूल भी हैं।" ये एक सिंपल लो-टेक सॉल्यूशन हैं, जिसके लिए राजस्थान का उदाहरण हमारे सामने है। राजस्थान में प्राचीन वास्तुकला का उपयोग करके एक कॉलेज की इमारत तैयार की गई है, इमारत का आधार यहां बनाया गया पानी का एक विशाल पूल था। ठंडक बनाए रखने वाली ये अवधारणा 1,500 साल पुरानी है जब रेगिस्तान की गर्मी से बचने के लिए बावड़ियों का निर्माण किया जाता था।

बचत वाली बेहतर कूलिंग

द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में, मार्च 2018 तक लगभग 8% घर एयर कंडीशंड (AC का इस्तेमाल) थे। साल 2050 तक यह बढ़कर 50% हो जाने का अनुमान है। इससे न केवल AC यूनिट से HFCs के रिसाव में वृद्धि होगी, बल्कि बिजली की खपत भी काफी बढ़ जाएगी।

डे आगे कहते हैं, "चुनौती केवल इस तरह की क्लीन तकनीक को अपनाने की नहीं है, जिनका जलवायु पर न्यूनतम प्रभाव पड़ता है, बल्कि इफिशंसी को भी ध्यान में रखना है, क्योंकि इससे (बिजली) ग्रिड पर अतिरिक्त दबाव पैदा होगा।

मई 2018 की अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में एयर कंडीशनर की ऊर्जा दक्षता बढ़ाने से 2050 तक बिजली उत्पादन के लिए निवेश और परिचालन लागत में लगभग 3,00,000 करोड़ डॉलर की बचत हो सकती है।

रॉकी माउंटेन इंस्टीट्यूट (RMI), एक अमेरिका-आधारित ऊर्जा नीति विशेषज्ञों का समूह है। इसने 2018 में, कंपनियों को अधिक कुशल एयर कंडीशनर बनाने के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद से ग्लोबल कूलिंग पुरस्कार योजना शुरू की। यह पुरस्कार संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम और भारत सरकार द्वारा समर्थित है। विजेताओं में से एक, दाइकिन इंडस्ट्रीज ने अपने कूलिंग सिस्टम के उत्पादन में HFOs का उपयोग किया था।

इंडियन कूलिंग एक्शन प्लान और लागू होने की स्थिति

मार्च 2019 में, पर्यावरण मंत्रालय ने ऊर्जा-कुशल और जलवायु-अनुकूल कूलिंग तकनीकों को प्राथमिकता देने और कूलिंग जरूरतों को पूरा करने के लिए ICAP की शुरुआत की थी। योजना में 2037-38 तक सभी क्षेत्रों में कूलिंग डिमांड को 20-25% तक कम करने, नॉन-रेफ्रिजरेंट कूलिंग टेक्नोलॉजी को अपनाने जैसी रणनीतियों के माध्यम से रेफ्रिजरेंट की मांग को 25-30% तक कम करने का लक्ष्य रखा गया था।

यह योजना राष्ट्रीय कौशल और प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत अनुसंधान के एक प्रमुख क्षेत्र के रूप में "कूलिंग और संबंधित क्षेत्रों" को मान्यता भी देती है। और इस तरह 2022-23 तक कूलिंग डिमांड को पूरा करने के लिए एक लाख से ज्यादा सर्विस टेक्नीशियनों को प्रशिक्षण देने की योजना है।

कूलिंग योजना के अनुसार, भारत में लगभग दो लाख AC सर्विस टेक्नीशियनों (जिनमें से अधिकांश अनौपचारिक क्षेत्र में कार्य करते हैं) को एनर्जी एफ्फिसिएंट कूलिंग तकनीकों की ओर बढ़ने के लिए प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इससे क्षेत्र में कार्यरत लोगों की संख्या भी बढ़ेगी।

योजना को तैयार करने वालों में से एक, भसीन ने कहा, "HFCs के उपयोग को कम करने के लिए योजना में लघु और दीर्घकालिक हस्तक्षेप रखे गए हैं।" उन्होंने कहा, "ICAP को लागू करने के प्रयासों को महामारी के कारण झटका लगा था, लेकिन इरादे अभी भी मजबूत हैं।"

हमने ICAP के क्रियान्वयन को लेकर पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से संपर्क करने की कोशिश की। उनकी प्रतिक्रिया मिलने पर ये आर्टिकल अपडेट किया जाएगा।

इस रिपोर्ट में बदलाव के लिए कुछ अल्पकालिक सिफारिशों की गई हैं। जिसमें-

- कम ग्लोबल वार्मिंग बढ़ाने वाले HFCs के विकल्पों के विकास,

- इन विकल्पों का मूल्यांकन करने के लिए प्रयोगशालाओं के निर्माण

- नए सौर ऊर्जा-आधारित कूलिंग समाधान आदि लाने का सुझाव दिया गया है।

इन्हें 2019 और 2024 के बीच लागू कर दिया जाना चाहिए।

मध्यम अवधि के लिए सिफारिशों में, ICAP ने नई पीढ़ी के रेफ्रिजरेंट के लिए उत्पादन सुविधाएं स्थापित करने और टॉक्सिसिटी परीक्षण करने का सुझाव दिया है। साथ ही लंबी अवधि में, वैकल्पिक रेफ्रिजरेंट के कमर्शियल उत्पादन की शुरुआत करने और कॉरपोरेट्स को ऐसे और विकल्पों पर शोध करने के लिए प्रोत्साहन के साथ-साथ एक समीक्षा तंत्र बनाए जाने की बात कही गई है। मध्यम अवधि की सिफारिशों पर 2024 से 2029 और लंबी अवधि की सिफारिशों पर 2029-38 के बीच काम करना शुरु कर देना होगा।

ICAP की प्रगति का मूल्यांकन करने वाली शक्ति सस्टेनेबल एनर्जी फाउंडेशन की 2021 में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, ICAP पर केवल धीमी प्रगति हुई है और इनमें से कोई भी सिफारिश पूरी तरह हासिल नहीं हो पाई है।

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


फ्लाविया लोपेज, https://indiaspendhindi.com/earthcheck/explained-why-air-cooling-technologies-are-heating-up-the-earth-791920
 

Write Comments

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Video Archives

Archives

share on Facebook
Twitter
RSS
Feedback
Read Later

Contact Form

Please enter security code
      Close