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न्यूज क्लिपिंग्स् | भेदभाव में लिंग-जाति अंतर्विरोध: क्या मरीज़ डॉक्टर की सामाजिक पहचान की परवाह करते हैं?

भेदभाव में लिंग-जाति अंतर्विरोध: क्या मरीज़ डॉक्टर की सामाजिक पहचान की परवाह करते हैं?

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published Published on Jan 20, 2022   modified Modified on Jan 21, 2022

-आइ़डियाज फॉर इंडिया,

भारत में सामाजिक पहचान पर आधारित भेदभाव व्यापक रूप में फैला होने की वजह से, भेदभाव में जाति-लिंग अंतर्विरोध के अध्ययन हेतु एक अनूठी सेटिंग उपलब्ध होती है। यह लेख, उत्तर प्रदेश में किये गए एक क्षेत्रीय प्रयोग के आधार पर दर्शाता है कि मरीज द्वारा महिला डॉक्टरों की तुलना में पुरुष डॉक्टरों को पसंद किये जाने के कारण जाति-संबंधी पूर्वाग्रह इस लिंग संबंधी भेदभाव को और बढ़ा सकते हैं। भारत में निम्न-जाति के पेशेवरों की बढ़ती हिस्सेदारी को देखते हुए, यह लिंग-जाति अंतर्विरोध पेशेवरों के बीच लैंगिक असमानताओं को बढ़ा सकता है।

 

2018 के लैंगिक असमानता सूचकांक में, भारत 162 देशों (संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी), 2019) में से 122वें स्थान पर है। भारत में महिला श्रम-बल भागीदारी (एफएलएफपी) की कम दर तथा महिलाओं और पुरुषों के बीच बड़ी वेतन असमानताएं, दोनों हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में एफएलएफपी लगभग 25% है, और शहरी क्षेत्रों (लाहोटी और स्वामीनाथन 2016) में यह 20% से कम है, जिसमें 2018-2019 (चक्रवर्ती 2020) के अनुसार, महिला कर्मचारियों का औसत वेतन पुरुषों के औसत वेतन का लगभग 65% है। महिलाओं के राजनीतिक प्रतिनिधित्व में सुधार के लिए उठाए गए कदमों के अलावा, कोई ऐसा संवैधानिक अधिदेश या कानून नहीं है जिसके तहत सार्वजनिक क्षेत्र के रोजगार या शैक्षणिक संस्थानों में महिलाओं के लिए सीटें सुनिश्चित की गई हों। केवल बिहार, गुजरात, मध्य प्रदेश और पंजाब जैसे कुछ राज्यों ने पिछले दशक के दौरान सरकारी नौकरियों में महिलाओं के लिए आरक्षण की शुरुआत की है। शैक्षणिक संस्थानों के संदर्भ में, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) ने एसटीईएम (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) विषयों में महिलाओं की भागीदारी के निम्न स्तर को ठीक करने के लिए वर्ष 2018 में महिलाओं के लिए 20% सीटों का आरक्षण शुरू किया। यह उपाय महिलाओं की हिस्सेदारी को वर्ष 2018-19 में कुल सीटों के लगभग 14% से बढाकर वर्ष 2020-21 में 20% तक कराने में काफी सफल रहा है।

इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि निचली जाति के समुदायों को आज भी कलंकित और उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है (मधेश्वरन और एटवेल 2007, थोरात और एटवेल 2007, सिद्दीकी 2011, बनर्जी एवं अन्य 2009, बनर्जी एवं अन्य 2013, इस्लाम एवं अन्य 2018, इस्लाम एवं अन्य 2021)। भारत में, ऐतिहासिक रूप से वंचित वर्गों जैसे एससी (अनुसूचित जाति) और एसटी (अनुसूचित जनजाति) को सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों, शिक्षा और राजनीति (देशपांडे 2013) में समान अवसर प्रदान करने के लिए वर्ष 1950 में जाति-आधारित आरक्षण की शुरुआत की गई थी। मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद, 1990 के दशक की शुरुआत में सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरी कोटा में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) को शामिल करने के लिए अंततः इसका विस्तार किया गया था। वर्ष 2006 में किये गए 93वें संविधान संशोधन में शैक्षिक कोटा में ओबीसी को भी शामिल किया गया। जैसा कि नीचे चित्र 1 से स्पष्ट है, सरकार द्वारा वित्त पोषित शैक्षणिक संस्थानों में एसटी के लिए 7.5%, एससी के लिए 15% और ओबीसी के लिए 27% जाति-आधारित कोटा (देशपांडे 2013) के परिणामस्वरूप, विभिन्न चिकित्सा विज्ञान कार्यक्रमों में निचली जाति के छात्रों- विशेष रूप से ओबीसी के नामांकन की हिस्सेदारी में वृद्धि हुई है। यह विभिन्न जाति समूहों में प्रवेश के लिए अलग-अलग क्वालीफाइंग स्कोर रखे जाने के कारण संभव हुआ है (बर्ट्रेंड एवं अन्य 2010)।

चित्र 1. जाति और वर्ष के आधार पर चिकित्सा-विज्ञान में नामांकित छात्रों का हिस्सा

टिप्पणियाँ: (i) लेखकों द्वारा की गई गणना अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण (एआईएसएचई) के आंकड़ों पर आधारित है। (ii) इस डेटा में चिकित्सा-विज्ञान के सभी कार्यक्रमों (उदाहरण के लिए, एमबीबीएस (बैचलर ऑफ मेडिसिन एंड बैचलर ऑफ सर्जरी), फार्मेसी और फार्माकोलॉजी, नर्सिंग, आदि) में नामांकित छात्र शामिल हैं।

हमारा अध्ययन

हाल के एक अध्ययन (इस्लाम एवं अन्य 2021) में, हम यह जाँच करते हैं कि क्या लिंग और जातिगत भेदभाव का सह-अस्तित्व लैंगिक असमानता को बढ़ाता है। हमने 2017 में उत्तर प्रदेश (यूपी) राज्य के कानपुर नगर जिले में 40 विभिन्न स्थानों पर 3,128 प्रतिभागियों के बीच एक यादृच्छिक क्षेत्र प्रयोग किया। प्रयोग के एक भाग के रूप में, प्रत्येक प्रतिभागी को अनुसंधान दल द्वारा आयोजित मोबाइल स्वास्थ्य क्लिनिक पर स्वास्थ्य जांच के लिए पंजीकरण करने हेतु आमंत्रित किया गया।

यह प्रयोग कई चरणों में आयोजित किया गया था: सबसे पहले, प्रत्येक प्रतिभागी को यादृच्छिक रूप से 'उपचार समूह' से महिला या पुरुष-डॉक्टर नियत किया गया। प्रत्येक प्रतिभागी को अपने पंजीकरण के समय एक विशेष लिंग (महिला या पुरुष) के चार डॉक्टरों को रैंक करने के लिए कहा गया था (नियत ‘उपचार समूह’ के आधार पर, अर्थात, प्रत्येक प्रतिभागी को महिला या पुरुष डॉक्टरों को रैंक करने के लिए कहा गया था, लेकिन दोनों को एक साथ नहीं); तथापि इसमें अलग-अलग जाति एवं अनुभव के संयोजन-सहित अपने सबसे पसंदीदा डॉक्टर (रैंक 1) से लेकर कम से कम पसंदीदा डॉक्टर (रैंक 4) तक रैंक करना था। प्रत्येक डॉक्टर की जाति एवं अनुभव भिन्न था: (1) उच्च जाति का उपनाम और उच्च स्तर का अनुभव; (2) निचली जाति का उपनाम और उच्च स्तर का अनुभव; (3) उच्च जाति का उपनाम और निम्न स्तर का अनुभव; और (4) निचली जाति का उपनाम और निम्न स्तर का अनुभव। दो उच्च जाति के डॉक्टरों के उपनाम सामान्य जाति श्रेणी (जीसी) के थे, जबकि दो निचली जाति के डॉक्टरों के उपनाम एससी, एसटी या ओबीसी समूहों के थे। उच्च स्तर के अनुभव वाले दो डॉक्टरों का अनुभव 12 साल या आठ साल का था। इसके विपरीत, निम्न स्तर का अनुभव हमेशा चार साल का होता है। तालिका-1 में प्रतिभागी द्वारा रैंक किए गए चार डॉक्टरों का उदाहरण दिया गया है।

पूूरा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


Asad Islam Debayan Pakrashi https://www.ideasforindia.in/topics/social-identity/gender-caste-intersectionality-in-discrimination-do-patients-care-about-doctor-s-social-identity-hindi.html


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