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न्यूज क्लिपिंग्स् | हिंदी दिवस: भाषा, शब्द और साम्राज्यवाद

हिंदी दिवस: भाषा, शब्द और साम्राज्यवाद

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published Published on Sep 16, 2020   modified Modified on Sep 17, 2020

-न्यूजलॉन्ड्री,

15वीं सदी का आख़िरी दशक ख़त्म होने को था. विश्व के महासागर एक ऐसी प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार हो रहे थे जो इससे पूर्व कभी नहीं देखी गयी थी. चप्पू से चलने वाले जहाज़ों की अपनी सीमाएं थीं. उनसे छिछली तटरेखा के इलाक़ों में तो परिवहन हो सकता था लेकिन समुद्र की अपार नीली जल-राशि में घुसने के लिए साहस के अलावा उन हवाओं का भी ज्ञान ज़रूरी था जो साल की अलग-अलग अवधियों में समुद्र की सतह पर बहा करती थीं.

हिंद महासागर इसका अपवाद था. एक तो वह तीन तरफ़ से ‘लैंड-लॉक्ड’ था जिसके कारण इसमें जानलेवा भटकाव की संभावनाएं बाकी महासागरों के मुकाबले कम थीं, दूसरा अन्य महासागरों के पवन-तंत्र के उलट उसकी मानसूनी हवाएं एक सुस्थिर पैटर्न में बहा करती थीं. इसके विपरीत लम्बे समय तक अटलांटिक और प्रशांत महासागर की हवाएं दुनिया भर के नाविकों के लिए ख़ौफ़ भरे रहस्य का सबब बनी रहीं. हिंद महासागर से इतर महासागरों में जहाजों के इच्छित परिवहन के लिए तीन तरह की हवाओं का इल्म होना ज़रूरी था, पहला तीस से साठ डिग्री अक्षांस के बीच में बहने वाली पछुआ हवाएं, दूसरी दोनों अर्ध गोलार्ध में विषुवत रेखा की तरफ़ चलने वाली ‘ट्रेड’ हवाएं और तीसरी नाविकों का दुस्वप्न कही जाने वाली डोल्ड्रुम्ज़ जिसके बारे में कोलंबस ने अपनी डायरी में लिखा था- “हवाओं ने मुझे बुरी तरह निराश किया और गर्मी इतनी अधिक बढ़ गई थी कि मुझे लगा कि मेरा जहाज और साथी भस्म हो जाएंगे.”
(पेज- 207, The four voyages of Christopher Columbus, Baltimore, 1967).

जुलाई 1497 के ख़ुशुनुमा यूरोपीय मौसम में जब वास्को-डि-गामा लिस्बन से अपने भव्य स्वप्न के साथ नए जलमार्ग की खोज में बेड़ा लेकर चला तो किसी को भी ठीक-ठीक पता नहीं था कि वह अपने असंभव समझे जाने वाले गंतव्य को पा ही जाएगा. केप वेर्डेस होते हुए गिनी की खाड़ी में पहुंच कर वह उसी डोल्ड्रुम्ज़ में फंस गया जिसने कोलंबस के पसीने छुड़ा दिए थे. लेकिन वह इनसे निकलने में कामयाब रहा और अनगिनत चक्रवाती तूफ़ानों से बचता हुआ दक्षिण-पूर्वी ट्रेड पवन की मदद से हिंद महासागर में दाखिल हो गया.

दक्षिण अटलांटिक को पार करने वाला वह पहला यूरोपियन था जो इस पूरी तरह से अपरिचित पानी पर जा पहुंचा था. यह साल 1498 के मई महीने की बीस तारीख़ थी जब डिगामा के जहाज़ ने कालिकट के बंदरगाह को स्पर्श किया. तट की बालू से डिगामा के जलयान के स्पर्श का यह क्षण कंपास, जहाज़ के डेक पर लगी तोपों और ‘हवाओं’ की मदद से भारत में साम्राज्यवाद के आरम्भ का क्षण था. वह समय शुरू हो चुका था जहां यूरोपीय ‘ज्ञान’ की दिलचस्पी क्राइस्ट के मिथकीय ‘किंगडम’ की जगह दुनिया के दूर-दराज के ठेठ इलाक़ों पर क़ब्ज़ा ज़माने की
हसरतों की ओर घूम गयी थी.

तट से लगते ही वास्को-डि-गामा का पहला काम था कालिकट के राजा जमोरिन से मुलाकात. दोनों में बात किस तरह हुई इसकी स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती. क्योंकि दोनों की भाषा बिल्कुल अपरिचित थी. बीच में कोई दुभाषिया ज़रूर रहा होगा. जमोरिन ने आने की वजह पूछी. पुर्तगाली मेहमान ने सीधा जवाब दिया, ‘ईसाइयत और मसालों की खोज में.’ मसालों का व्यापार इस देश की भाषाओं में एक अभूतपूर्व गतिकी को जन्म देने वाली थी.

साम्राज्यवाद मुनाफ़ाखोरी की एक क्रूर व्यापारिक परियोजना थी. सोने-चांदी के सिक्कों के अतिरिक्त हमें मसालों के बदले ‘शब्द’ भी मिलने थे. शब्द जो बाहर से ‘हवाओं’ के साथ आए थे. शब्द जो यहीं रच-बस गए. शब्द जो फिर यहीं के होकर रह गए. साम्राज्यवाद की क्रूर परिघटना में यदि कोई अपने निर्दोष होने का दावा पेश करे तो वह शर्तिया राजे-रजवाड़े न होंगे, देश न होंगे, वो वणिक-व्यापारी भी न होंगे, वो ज्ञान का व्यापार करने वाले शिष्ट-कुलीन भी न होंगे. इस पूरे अमानवीय घटनाक्रम में निर्दोष केवल शब्द थे. बाकी सबकि कुछ न कुछ भूमिका थी.

पुर्तगालियों के भारतीय राजाओं से ख़ूब लड़ाई-झगड़े हुए. धर्म-प्रचार की सनक में उनके अत्याचारों के पर्याप्त दस्तावेज मौजूद हैं. वह डचों से हारे और अंततः एकाध जगह को छोड़कर अंग्रेज़ों द्वारा पूरी तरह पीछे धकेल दिए गए. किंतु, मानव से मानव के सम्पर्क के रूप में शब्दों के अवशेष पीछे छूटते गए. क्या हमें पता है कि पुर्तगाली भाषा के वह अवशेष कौन से हैं जिन्हें हिंदी ने अंगीकृत कर लिया और किसी को इस अंगीकरण का शोर भी सुनाई न दिया. हालांकि पुर्तगाली भारत के जिस इलाक़े में हावी रहे वह हिंदी/हिंदुस्तानी भाषा का क्षेत्र नहीं था किंतु उस भाषा के अनगिनत शब्द टहल-घूमते उत्तर भारत तक पहुंच गए.

पुर्तगाली शब्द बल्दे से ‘बल्दी’ होती हुई जो चीज़ आज हमारे बाथरूम में पहुंची है उसे हम बाल्टी कहते है. जो ‘सबाओ’ है वो बाथरूम का साबुन है. ‘तोल्लहा’ बाथरूम की तौलिया है. जो पुर्तगाली भाषा में ‘चावे’ थी वही आज हमारे घर या कमरे की ‘चाभी’ है. ‘अलमारिओ’ घर की अलमारी बन गई है. ‘कमीसा’ आज क़मीज़ है. ‘फिता’ जूते का फ़ीता है और ‘मेअस’ उसका ‘मोज़ा’ है. दंत्य के सम्पर्क में आकर ‘तबाको’ प्रेमचंद की ‘पूस की रात’ के किसान के लिए तमाखू हो गया है.

पुर्तगाली का ‘कदजू’ हमारी सांध्य-महफ़िलों का काजू है. क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि घर के भीतर हमारे दैनिक जीवन के हिस्सेदार शब्दों में अनगिनत पुर्तगाली मूल के हैं. ‘बोटेल्हा’ को हम बोतल कहते हैं. ‘कमारा’ कमरा है तो ‘मेसा’ उस कमरे में पड़ने वाली मेज़ है. कमरे के पीछे बनाया जाने वाला ‘गुदानो’ गोदाम बन गया. ‘लोबादा’ ओढ़े जाने वाला लबादा है. ‘अल्फिनेते’ काग़ज़ की आलपिन है. ‘पिस्तोल’ हमारी पिस्तौल है. ‘पाव’, जिसे हम भाजी के साथ खाते हैं, पुर्तगीज शब्द है. उनका ‘सिंतरा’ हमारा संतरा है. चाय और कॉफ़ी भी पुर्तगाली शब्द हैं और उनके साथ रोज़ सुबह चटकाए जाने वाला ‘बिसकोइतो’ हमारा बिस्कुट है.

पुर्तगालियों के बाद डच और फ़्रांसीसी भारत में साम्राज्यवाद के अगले हरकारे थे. दरअसल इस लड़ाई में अंग्रेज़ों के दाख़िल होने से पहले डच ही उनके सबसे बड़े प्रतिद्वंदी थे. 1618 में मुग़लों से व्यापार का फ़रमान हासिल करके 1664 तक वह पुर्तगालियों से उनका गढ़ कोचीन छीन चुके थे. व्यापार के लिए डचों और फ़्रांसीसियों दोनों ने भारतीय भाषाएं सीखीं. पुर्तगालियों के विपरीत डच विशुद्ध व्यापारी थे. उन्हें धर्म-प्रचार में कोई दिलचस्पी नहीं थी. पुर्तगालियों की बनिस्बत देशी सौदागरों से डचों के रिश्ते काफ़ी मधुर थे. केटलर नाम के एक डच द्वारा डच भाषा में एक व्याकरण लिखने की जानकारी मिलती है. एक अन्य डच रेजर बार्नार्ड द्वारा भर्तृहरि के कई छंदों का डच में अनुवाद किए जाने का भी ज़िक्र मिलता है.

फ़्रांसीसियों ने दुभाषियों का ख़ूब इस्तेमाल किया. फ़्रांसीसी गवर्नर डूप्ले का एक विश्वस्त दुभाषिया एक तमिल हिंदू आनंद रंगा पिल्लई था. पिल्लई तमिल में लिखता था, फ़्रांसीसी बोलता था और तेलुगु तथा मलयालम में लिखे पत्रों का अनुवाद करता था. वह फ़ारसी समझता था किंतु उसे पढ़ नहीं सकता था किंतु वह हिंदुस्तानी धारा प्रवाह बोलता था. (पेज-234, भारत में लोग और विदेशी भाषाएं, श्रीश चौधरी, राजकमल, 2018)

पुर्तगाली भाषा के विपरीत, मोटे तौर पर डच और फ़्रांसीसी भाषा से हिन्दी में बहुत कम शब्द आए. उसका कारण यह था कि पुर्तगाली सबसे पहले हिंदुस्तान पहुंचे थे और उन्होंने स्थानीय भाषाओं से अंतर्क्रिया के ज़रिए मिली-जुली देशज पुर्तगाली भाषा का निर्माण कर दिया था. डच और फ़्रांसीसियों ने बाद में देशी सौदागरों से बातचीत में अपनी भाषा पर ज़ोर देने की बजाय उसी भाषा का इस्तेमाल किया.

पूरा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


धर्मेंद्र सिंह, https://www.newslaundry.com/2020/09/14/hindi-diwas-development-of-hindi-in-india
 

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