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न्यूज क्लिपिंग्स् | नया हिंदुस्तान: जहां बोलना मना है

नया हिंदुस्तान: जहां बोलना मना है

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published Published on Aug 21, 2020   modified Modified on Aug 22, 2020

-न्यूजलॉन्ड्री,

अगस्त 2020 की एक दोपहर. रात भर की बारिश के बाद दोपहर की गर्मी की बजाय हवा में उमस है. दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया के गेट पर लगे जामुन के पेड़ के आसपास पके जामुन बिखरे हुए हैं. कोविड-19 के आगमन के बाद से बंद पड़े प्रेस क्लब में छह महीने बाद कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई. यह प्रेस कॉन्फ्रेंस उत्तर-पूर्वी दिल्ली में कारवां पत्रिका के तीन पत्रकारों पर हुए हमले का विरोध करने के लिए हुआ. कोविड को देखते हुए प्रेस क्लब ने 25 लोगों को इस प्रेसवार्ता के लिए आमंत्रित किया था, लेकिन आए 20 से भी कम. इसमें से सात-आठ लोग तो कारवां से ही थे. बाकी वक्ता और तीन-चार पत्रकार. यह संख्या बताने के लिए काफी है कि बोलने-लिखने वालों के प्रति समाज में कितनी उदासीनता है.

इस प्रेसवार्ता में बोलने पहुंचीं दुनियाभर में अपनी लेखनी से यश कमाने वाली अरुंधति रॉय. रॉय ने यहां अपनी राय रखी उसके बाद देश के हालात पर न्यूजलॉन्ड्री से बात करते हुए उन्होंने कहा, ‘‘इस कमरे में जो लोग पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस करने के लिए आते थे. आज उसमें से आधे से ज्यादा जेल में हैं. ये लोग उस किसी भी आवाज़ को बर्दाश्त नहीं कर रहे जो मेनस्ट्रीम नैरेटिव के खिलाफ हो. उन्हें सबको कुचलना है. उन तमाम लोगों को चुप कराया जा रहा जो इनके खिलाफ बोलते थे या बोल सकते हैं. आज हमारे हाथों से हमारी सड़कें भी चली गई है.’’

प्रेस क्लब में आयोजित हुआ कार्यक्रम
इस प्रेसवार्ता में राय के साथ सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण भी थे. देर शाम ख़बर आई कि सुप्रीम कोर्ट ने एक ट्वीट के मामले में प्रशांत भूषण को कोर्ट की अवमानना का दोषी पाया है. सज़ा उन्हें 20 अगस्त को दी जाएगी. बहुत मुमकिन इस कमरे में प्रेसवार्ता करने वाला एक और शख्स जेल चला जाए.

भीमा कोरेगांव और दिल्ली दंगा

भीमा कोरेगांव मामले की तरह दिल्ली में बीते फरवरी महीने में हुए दंगे में उन तमाम लोगों को निशाना बनाया जा रहा है जो लम्बे समय से आम जनता की आवाज़ बनकर बोल और लिख रहे थे. एक जनवरी 2018 को हुए भीमा कोरोगांव विवाद में सुधा भारद्वाज और वरवर राव जैसे लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता लम्बे समय से जेल में हैं. बीमार होने के बावजूद उन्हें जमानत नहीं दी जा रही है. इधर दिल्ली दंगे में भी ऐसी ही कोशिश होती नजर आ रही है.

दिल्ली दंगे के मामले में जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों को आरोपी बनाया जा रहा है. निशाने पर कई बुद्धिजीवी और एकेडमीशियन भी हैं. हाल ही में दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर अपूर्वानंद को दिल्ली ने पुलिस पांच घंटे तक बैठाकर पूछताछ किया और आखिर में उनका फोन जब्त कर लिया. कुछ ही दिन बाद वरिष्ठ पत्रकार प्रशांत टंडन के साथ भी इसी तरीके से दिल्ली पुलिस ने पूछताछ के बाद उनका मोबाइल फोन जब्त कर लिया.

जेएनयू के छात्रनेता रहे उमर खालिद से भी पुलिस इस मामले में पूछताछ कर रही है. उन्हें पुलिस इस दंगे का मास्टरमाइंड बता रही है. योगेन्द्र यादव का नाम भी इस मामले में आ चुका है. हालांकि उनसे अभी तक कोई पूछताछ नहीं हुई है.

दिल्ली दंगे में पुलिस जांच की हर गाड़ी सीएए प्रदर्शनस्थलों से होकर गुजर रही है. प्रदर्शनों के आयोजक, सक्रिय रूप शामिल रहे सामाजिक कार्यकर्ता आदि को दिल्ली पुलिस दंगे के साजिशकर्ता के रूप में पेश कर रही है. दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच अपने अलग-अलग चार्जशीट में इन तमाम लोगों को आरोपी ठहरा रही है. पुलिस चार्जशीट का लब्बोलुआब यह कि दंगा करने के लिए ही सीएए प्रोटेस्ट की शुरुआत हुई थी.

सीएए एनआरसी प्रोटेस्ट
कई मामले में गिरफ्तार आरोपियों ने एक जैसा ही बयान दिया है कि मैं सीएए प्रोटेस्ट में शामिल होता था. वहां लोग भाषण देने आते थे और बताते थे कि इससे मुसलमानों की नागरिकता छीन जाएगी. हम सरकार से नफरत करने लगे थे और दंगे किए. यह तमाम बयान आरोपियों के कबूलनामे में है. हत्या के मामले में जेल में रहने के बाद जमानत पर आए तीन आरोपियों से न्यूजलॉन्ड्री ने मुलाकात की थी. तीनों कबूलनामे में यहीं दर्ज था.

जब हमने उनसे पुछा कि सीएए प्रदर्शन में जाते थे तो दोनों उन्होंने ना में सर हिलाया था. हालांकि यह कबूलनामा सीआरपीसी की धारा 161 के तहत दर्ज है. यह कोर्ट में मान्य नहीं होगा, लेकिन मीडिया का एक बड़ा तबका इसे ही अंतिम सत्य मानकर खबरें चला रहा है और एक संदेश देने की कोशिश कर रहा है कि दिल्ली दंगा सीएए विरोधी करने वालों की साजिश है.

सवाल उठता है कि भीमा कोरेगांव की तर्ज पर दिल्ली दंगे में लेखकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों और प्रोफेसरों को दिल्ली पुलिस क्यों निशाना बना रही है. इसका जवाब अरुंधति रॉय के बयान में छिपा है जिसमें वो कहती हैं कि वर्तमान की सत्ता किसी भी तरह के विरोध की आवाज़, चाहे वो व्यक्तिगत हो या सामूहिक बर्दाश्त नहीं कर रही है.

बुद्धिजीवियों से इस सरकार को दिक्कत है..

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जब से केंद्र में सरकार बनी तब से सेकुलर और बुद्धिजीवी जैसे शब्दों का मज़ाक बनाया गया है. ऐसा सिर्फ सामान्य नागरिकों द्वारा नहीं किया बल्कि कई बड़े नेताओं, मंत्रियों और सत्ताधारी दल से जुड़े विचारकों ने भी किया है. रंग बदलकर मैदान में आए कुछ पत्रकारों ने भी इस शब्द को गालीनुमा बनाने में भूमिका निभाई. लेकिन ऐसा सिर्फ 2014 के बाद हुआ ये नहीं कहा जा सकता है.

प्रोफेसर अपूर्वानंद बताते हैं कि अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के समय में भी बुद्धिजीवियों को निशाना बनाया गया था. तत्कालीन मानव संसाधन मंत्री और बीजेपी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी ने तब कहा था, ‘‘सारे बुद्धिजीवी दरअसल इंटेलेक्चुअल टेरेरिस्ट है. ये मुरली मनोहर जोशी के शब्द है.’’

अपूर्वानंद आगे कहते हैं, ‘‘मुरली मनोहर जोशी ने जो कहा उसी लॉजिक को आगे बढ़ाया जा रहा है. आप 2015 से संसद में दिए गए बयान या बाहर दिए गए बयान को सुन लीजिए जिसमें बार-बार यह कहा जा रहा है कि छात्रों का काम सिर्फ क्लास में पढ़ना और परीक्षा देना. इससे अधिक उनको कुछ नहीं करना चाहिए. मास्टरों का भी काम है सिर्फ क्लास में पढ़ा देना. उनका काम खत्म. उससे अधिक अगर आप करते हैं तो आप दूसरी श्रेणी में चले जाते है. बुद्धिजीवी का काम सिर्फ विश्लेषण करना नहीं है वो यह भी बताता है कि आगे क्या हो सकता है. वह आगे के बारे में बताता है. जैसे धूमिल ने कहा है कि अगर सड़क जिंदा नहीं रहेगी तो संसद समाप्त हो जाएगी. सड़क और संसद के बीच सीधे रिश्ता है. सड़क ही संसद को ऑक्सीजन देती है. अगर आप सड़कों को खामोश कर देंगे तो संसद निर्जीव हो जाएगी. जो बुद्धिजीवी सड़क से जरा सा जुड़ता है वो सत्ता के निगाह में खतरनाक हो जाता है.’’

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर रहे पुरुषोत्तम अग्रवाल कहते हैं, ‘‘बुद्धिजीवियों को बीते छह-सात साल से परेशान तो किया ही जा रहा है. इसमें सबसे चिंता की बात यह है कि मीडिया में पुलिस अपने ढंग से चीजें लिखकर देती है और मीडिया का एक हिस्सा उसे अपने तरीके से दिखाता-बताता है. फिर देशद्रोही का टैग लगा दिया जाता है. साल 1962 के दिनों में नेहरूजी का काफी विरोध हुआ. कृष्णा मेनन को इस्तीफा देना पड़ा, लेकिन मुझे याद नहीं पड़ता की तब के कांग्रेसियों ने अपने विरोधियों को देशद्रोही कहा हो. जो आपसे सहमत नहीं वो देशद्रोही कैसे हो सकता है. इस सरकार को बुद्धिजीवियों से समस्या है.’’

एनएएलएसआर हैदराबाद की प्रोफेसर मनीषा सेठी बताती हैं, ‘‘वर्तमान सरकार को हर सोचने-समझने वाले से परेशानी है. क्योंकि उनकी बात वहीं मांगेगे जो अपनी बुद्धि को निकालकर सोचेंगे. इस सरकार से बड़ा बुद्धिजीवी विरोधी सरकार मुझे तो नहीं लगता की आज तक हिंदुस्तान में बनी है. इसका एजेंडा ही एंटी बुद्धिजीवी है.’’

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


बसंत कुमार, https://www.newslaundry.com/2020/08/19/new-india-where-not-allowed-to-speak-apoorvanand


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