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न्यूज क्लिपिंग्स् | उत्तराखंड सरकार ने पनबिजली परियोजनाओं द्वारा कम पानी छोड़ने की वकालत की थी

उत्तराखंड सरकार ने पनबिजली परियोजनाओं द्वारा कम पानी छोड़ने की वकालत की थी

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published Published on Feb 12, 2021   modified Modified on Feb 17, 2021

-द वायर,

उत्तराखंड के चमोली जिले में बर्फ फिसलने से अचानक आई भीषण बाढ़ और इसके चलते व्यापक स्तर पर हुए नुकसान ने साल 2013 के केदारनाथ आपदा के घावों को हरा कर दिया है.

केंद्र एवं राज्य सरकार के ऊपर सवाल उठ रहे हैं कि उन्होंने पिछली आपदाओं से सबक नहीं लिया और बेहद संवेदनशील हिमालयी क्षेत्रों में बेतरतीब ‘तथाकथित’ विकास कार्य जारी है, जिसका खामियाजा आम लोगों को ही भुगतना पड़ता है जैसे मौजूदा तबाही में बहुत बड़ी संख्या में मजदूरों की मौत हुई है.

इस बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेकर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत तक ने ऐसा जताया है कि वे आमजनों के साथ हैं और समस्या का समाधान करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहे हैं. हालांकि नदियों पर पनबिजली या जलविद्युत परियोजनाओं को बनाने और इनसे पानी छोड़ने के संबंध में लिए गए फैसलों में ये कोशिश नजर नहीं आती है.

आलम ये है कि करीब दो साल पहले रावत सरकार ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर कहा था इन परियोजनाओं से पानी छोड़ने के संबंध में बनाए गए नियमों में ढील दी जानी चाहिए, क्योंकि इससे प्रोजेक्ट को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा है.

जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय (जल शक्ति मंत्रालय) ने अक्टूबर 2018 में एक नोटिफिकेशन जारी किया था, जिसके तहत हिमालयी गंगा का पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) 20 से 30 फीसदी तय किया गया. इसका मतलब है कि गंगा की ऊपरी धाराओं पर बने सभी जलविद्युत परियोजनाओं को अलग-अलग समय पर 20 से 30 फीसदी पानी नदी में छोड़ने के लिए अनिवार्य कर दिया गया.

नदी के स्वास्थ्य एवं इसके जलीय जीवों की आजीविका के लिए पर्यावरणीय प्रवाह बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृति प्राप्त है.

हालांकि जल मंत्रालय द्वारा निर्धारित इस प्रावधान का उत्तराखंड सरकार ने विरोध किया और कहा कि इस पानी छोड़ने की सीमा को और कम किया जाना चाहिए, क्योंकि इससे प्रोजेक्ट को काफी नुकसान होगा.

द वायर  द्वारा प्राप्त किए गए आधिकारिक दस्तावेजों से पता चलता है कि उत्तराखंड के मुख्य सचिव ने राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी), जो कि जल मंत्रालय की ही एक इकाई है, से कहा था कि मौजूदा पर्यावरणीय प्रवाह से राज्य की परियोजनाओं को लगभग 3500 करोड़ रुपये का नुकसान होगा.

चार जनवरी 2019 की तारीख में लिखे अपने पत्र में मुख्य सचिव ने कहा था, ‘जल संसाधन, नदी विकास एवं गंगा संरक्षण मंत्रालय द्वारा निर्धारित पर्यावरणीय प्रवाह (ई-फ्लो) के कारण परियोजनाओं को लगभग 25 प्रतिशत का घाटा होगा, जिससे ज्यादातर परियोजनाएं काम नहीं कर पाएंगी और इससे करीब 3500 करोड़ रुपये का नुकसान होगा.’

इस आधार पर उत्तराखंड सरकार ने ई-फ्लो की मात्रा पर विचार करने या पनबिजली परियोजनाओं के लिए अतिरिक्त आर्थिक सहायता देने की मांग की.

जल संसाधन मंत्रालय ने फरवरी 2017 में पर्यावरणीय प्रवाह पर एक पॉलिसी पेपर जारी किया था, जिसके आधार पर गंगा की ऊपरी धाराओं (देवप्रयाग से हरिद्वार) के लिए पर्यावरणीय प्रवाह या ई-फ्लो घोषित किया गया था.

उत्तराखंड के रूड़की स्थित राष्ट्रीय जलविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिक (जी) डॉ. शरद जैन, आईआईटी दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. एके गोसैन और केंद्रीय जल आयोग (सीडब्ल्यूसी) के निदेशक एनएन राय द्वारा लिखे गए इस पेपर में सिफारिश की गई थी कि नवंबर से मार्च के दौरान 20 फीसदी, अप्रैल-मई एवं अक्टूबर में 25 फीसदी और जून से सितंबर के बीच 30 फीसदी ई-फ्लो या पर्यावरणीय प्रवाह होना चाहिए.

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


धीरज मिश्रा, http://thewirehindi.com/158493/uttarakhand-government-hydroelectric-project-environmental-flow-ganga/


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