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न्यूज क्लिपिंग्स् | अब कौन कहेगा सूट-बूट की सरकार? - लॉर्ड मेघनाद देसाई

अब कौन कहेगा सूट-बूट की सरकार? - लॉर्ड मेघनाद देसाई

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published Published on Mar 3, 2016   modified Modified on Mar 3, 2016
वर्तमान राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में वित्त मंत्री अरुण जेटली द्वारा प्रस्तुत किया गया बजट बहुत ही संतुलित और सधा हुआ है। बजट में ग्रामीण भारत की चिंताओं और समस्याओं को विशेष तौर पर ध्यान में रखा गया है। ऐसा पहली बार है जब किसी वित्त मंत्री ने अपने बजट भाषण में कृषि क्षेत्र और किसानों पर विशेष ध्यान केंद्रित किया और एक तय सीमा अवधि में किसानों की आय को न सिर्फ बढ़ाने, बल्कि उसे दोगुना करने का लक्ष्य निर्धारित किया। यह एक अच्छी पहल है, क्योंकि सेवा और अन्य क्षेत्रों में देश की तमाम आर्थिक तरक्की के बावजूद किसान लगातार बदहाल हो रहे थे और खुद को उपेक्षित भी महसूस कर रहे थे।

ऐसा इसलिए भी था, क्योंकि विपक्षी दलों ने मोदी सरकार के शुरुआती दो बजटों को किसान विरोधी और गरीब विरोधी करार दिया था और इस तरह देश में सरकार के खिलाफ माहौल तैयार करने का काम किया जा रहा था। बिहार के चुनावों में मिली हार की एक वजह यह भी रही कि सरकार के तमाम अच्छे कामों के बावजूद आम लोगों को कोई खास फायदा नहीं मिला और यह कहा गया कि मोदी सरकार की चिंता के केंद्र में सिर्फ शहरी भारत है। राहुल गांधी ने भी मोदी सरकार को सूट-बूट की सरकार की संज्ञा प्रदान की। ऐसी स्थिति में यह जरूरी था कि मोदी सरकार यह साफ करती कि उसका ध्यान शहरी भारत अथवा ग्रामीण भारत पर नहीं, बल्कि समग्र भारत के विकास पर है। वर्तमान बजट से सरकार ने अपने खिलाफ बन रही धारणा को तोड़ने की कोशिश की है और इस रूप में वह देशवासियों को एक नया संदेश देने में कामयाब रही है। वैसे किसी निष्कर्ष तक पहुंचने के लिए यह जरूरी है कि मोदी सरकार के शुरुआती दो बजटों को इस बजट के साथ जोड़कर देखा जाए। शुरुआती दो बजट जहां शहरी भारत के विकास पर अधिक केंद्रित थे तो वर्तमान बजट ग्रामीण भारत के विकास के प्रति प्रतिबद्ध है और यह सही भी है, क्योंकि आज भी हमारी एक बड़ी आबादी गांवों में निवास करती है। आर्थिक विकास को और अधिक गति देने के लिए यह जरूरी है कि हम शहरी भारत और ग्रामीण भारत के बीच की दूरियों को निरंतर कम करें।

इस दिशा में कदम उठाते हुए सरकार ने ग्रामीण क्षेत्र के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। गांवों में रोजगार का एक बड़ा जरिया बनकर उभरे मनरेगा कार्यक्रम के लिए भी सरकार ने अच्छा-खासा धन उपलब्ध कराया है और इस योजना को ग्रामीण ढांचे को मजबूती प्रदान करने के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की है। इसके अलावा सिंचाई योजनाओं पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है। लगातार गिर रहे भूमिगत जल के स्तर को देखते हुए यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम है। इससे न सिर्फ असिंचित खेतों को पानी मिल सकेगा, बल्कि जल का बेहतर प्रबंधन भी किया जा सकेगा, जिसके दूरगामी परिणाम होंगे। वित्त मंत्री द्वारा पेश किए गए बजट में तमाम छोटी-छोटी बातों का भी ध्यान रखा गया है, जो दीर्घकालिक दृष्टि से बेहद अहम हैं। ऐसी ही एक योजना सभी घरों में एलपीजी उपलब्ध कराने की है। इससे पर्यावरण को तो फायदा होगा ही, महिलाओं को ईंधन के रूप में लकड़ी का इस्तेमाल करने से होने वाले तमाम रोगों से भी निजात मिलेगी। इसी तरह देश के 18,500 गांवों में 1 मई, 2018 तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। यह भी एक महत्वपूर्ण कदम है।

जहां तक सवाल इस बजट के लोकप्रिय अथवा सुधारवादी होने का है तो मैं इसे एक राजनीतिक बजट के तौर पर देखता हूं। यह बजट सामान्य बजट से भिन्न् प्रकार का है, जिसमें आम लोगों की जरूरतों से जुड़ी छोटी-छोटी बातों तक का ध्यान रखा गया है। हालांकि यह भी सही है कि बजट में सुधार का कोई बहुत बड़ा कदम नहीं उठाया गया है। श्रम बाजार में सुधार को लेकर कुछ अपेक्षाएं थीं कि सरकार कोई कदम उठाएगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया गया। जीएसटी के मामले में भी कोई स्पष्ट समय सीमा नहीं बताई गई, सिवाय इसके कि सरकार इस विधेयक को पारित कराने के लिए प्रतिबद्ध है।

जहां तक बैंकों में सुधार के लिए कदम उठाने और 25000 करोड़ रुपए मुहैया कराने की बात है तो यह पर्याप्त नहीं। वास्तव में देखा जाए तो सरकार ने बैंकों की हालत में सुधार लाने के लिए कोई बड़ा कदम उठाने के बजाय रीस्ट्रक्चरिंग करने का ही काम किया है। इसी तरह रोजगार सृजन की गति तेज करने के लिए स्टार्टअप इंडिया पर बल दिया गया है, जो एक सही कदम है। इस समय सरकार के लिए सर्वाधिक प्राथमिकता का मामला युवाओं के लिए रोजगार अवसरों का सृजन है। इस दिशा में मोदी सरकार ने निजी उद्यमिता को बढ़ावा देने की नीति का अनुसरण किया है और इसके लिए नव उद्यमियों को तमाम वित्तीय सुविधाओं के साथ कर में छूट देने का निर्णय लिया गया है। यदि उद्योग जगत की बात करें तो उम्मीद थी कि सरकार कॉर्पोरेट टैक्स में कमी करेगी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। काले धन के संदर्भ में सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन यह घरेलू काले धन के मामले में ही कारगर होगा, न कि विदेशों में जमा काले धन के लिए। स्वास्थ्य बीमा कार्ड, इंश्योरेंस आदि के क्षेत्र में दी गई सहूलियतों से मध्यम वर्ग समेत आम लोगों को लाभ होगा।

जहां तक टैक्स दरों की बात है तो इस दिशा में सरकार ने कोई खास घोषणा नहीं की है, सिवाय इसके कि पांच लाख तक आय सीमा वाले लोगों को कुछ छूट हासिल होगी। इस बारे में मेरा मानना है कि सरकार को आयकर के बजाय उपभोक्ता करों के बारे में विचार करना चाहिए। यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि तमाम प्रयासों और उपायों के बावजूद भी कराधार बढ़ाने में कोई खास सफलता नहीं मिल सकी है और हमारी कुल आबादी में से तीन फीसद से भी कम लोग आयकर देते हैं। कुल मिलाकर देखा जाए तो यह एक अच्छा और अलग प्रकार का बजट है। बजट तैयार करते समय सरकार ने आगामी विधानसभा चुनावों को भी ध्यान में रखा है, जिसमें असम, पश्चिम बंगाल के साथ उत्तर प्रदेश के चुनाव मुख्य हैं। इन तीनों ही राज्यों में भाजपा जूनियर पार्टनर की भूमिका में है, लेकिन उसे उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनावों में बेहतर नतीजों की उम्मीद है।

(लेखक लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में प्रोफेसर रहे हैं। ये उनके निजी विचार हैं


http://naidunia.jagran.com/editorial/expert-comment-now-who-will-say-sootboot-govt-680606


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