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न्यूज क्लिपिंग्स् | असभ्य समाज का चिह्न है मृत्युदंड- आकार पटेल

असभ्य समाज का चिह्न है मृत्युदंड- आकार पटेल

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published Published on Oct 30, 2014   modified Modified on Oct 30, 2014
आजकल दो अपराधियों की नियति चर्चा में है. एक हैं गुजरात की पूर्व मंत्री मायाबेन कोडनानी, जिन्हें 2002 में राज्य में हुए नरसंहारों में से एक में अपराधी मानते हुए 28 वर्ष की कैद की सजा दी गयी है. उन्हें खराब स्वास्थ्य के आधार पर फिलहाल जमानत मिली हुई है. इस महीने गुजरात सरकार ने कहा है कि वह कोडनानी का पक्ष लेगी और उन्हें जेल भेजने पर आमादा विशेष अभियोजन पक्ष का विरोध करेगी.

दूसरा अपराधी है सुरिंदर कोली, जिसे हाल के वर्षों में सबसे भयावह अपराधों में से एक के लिए सजा दी गयी है. इसके अपराधों का विवरण देते हुए हर्ष मंदर ने द हिंदू में लिखा है कि कोली को ह्यकम-से-कम 16 बच्चों की हत्या, उनके जिंदा रहते या मरने के बाद उनका बलात्कार करने, उन्हें टुकडे़-टुकडे़ कर उनका मांस खानेह्ण के अपराध का दोषी पाया गया. सर्वोच्च न्यायालय ने कोली की फांसी की सजा 29 अक्तूबर तक स्थगित कर दी है. कोली के वकीलों का कहना है कि उससे यातना देकर अपराध कबूल कराया गया था और अगर उसके अपराध करने की बात सही भी है, तो इससे उसके मानसिक रूप से बीमार होने का पता चलता है.

मंदर ने लिखा है : क्या ऐसा व्यक्ति किसी तरह की दया का पात्र है? क्या यह ऐसा मामला नहीं हैं, जहां उसके बिना यह दुनिया बेहतर होगी? यह मामला-भले ही बहुत नृशंस है, लेकिन मृत्युदंड के मेरे दृढ़ विरोध को और मजबूत बनाता है. अगर वीभत्स अपराध किसी मनोवैज्ञानिक विकार का परिणाम है, तो मानवीय, सभ्य, सामाजिक तौर पर उदार और संवैधानिक रूप से वैध उपायों को बीमारी का उपचार करना चाहिए, न कि उस पीडि़त का उन्मूलन कर देना चाहिए. स्पष्ट रूप से कोली को अविलंब चिकित्सक की जरूरत है, न कि जल्लाद की.

मंदर की बात से मैं सहमत हूं. किसी को फांसी देने से किसी समस्या का समाधान नहीं होता. मैं यह भी कहूंगा कि 60 वर्ष से अधिक उम्र की कोडनानी को जमानत देना गलत नहीं है. भारत में दोषियों के लिए फांसी की सजा की मांग बदले की भावना से उत्प्रेरित होती है, न्याय की भावना से नहीं. यह असभ्य समाज का चिह्न है, और हमें यह स्वीकार करना पडे़गा कि शिक्षित भारतीय भी ऐसी भावना से मुक्त नहीं हैं. अपराधों की रोकथाम के लिए कुछ बर्बर समाधान इन्हीं लोगों द्वारा सुझाये जाते हैं.

हालांकि राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के कार्यकाल में भारतीय राज्य द्वारा लोगों को फांसी देने की दर बढ़ी है. मृत्युदंड के मामलों में राष्ट्रपति का निर्णय अंतिम होता है और उनके द्वारा अपीलों के ठुकराये जाने का मतलब दोषी की मौत है. 11 फरवरी, 2013 को टाइम्स ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट दी थी कि मुखर्जी ने अपने कार्यकाल के पहले सात महीनों में ही पिछले 15 वर्षों की तुलना में अधिक लोगों को जल्लाद के पास भेजा है.

हमारे समाजों में सार्वजनिक रूप से भीड़ द्वारा मार डालना कोई असाधारण घटना नहीं है. एक सदी पहले अमेरिका के अश्वेतों के साथ होनेवाली घृणित घटनाओं की तरह यहां भी चोरी की वारदात से पीडि़त या किसी व्यवहार से अपमानित होने पर भीड़ द्वारा दोषी को घायल करना या मार देना आम तौर पर स्वीकार्य है. यह बदले की भावना का परिचायक है. भीड़ तब भी उग्र हो जाती है, जब खुद पीडि़त नहीं होती.

यही मनोवृत्ति राजनेताओं और राजनीतिक दलों में भी है, जो खुद ऐसे व्यवहार के विरुद्ध कानून बनाते हैं, पर अपनी ऐसी भावनाओं के सामने लाचार हो जाते हैं. 2005 की एक घटना इस बात का उदाहरण है, जब एक सभा में भाजपा के रविशंकर प्रसाद को मुन्ना राय नामक व्यक्ति ने बांह में गोली मार दी थी. मंच पर मौजूद भाजपा के लोगों ने उस व्यक्ति को वहीं पीट-पीट कर अधमरा कर दिया, जिससे उसकी मौत हो गयी.

भाजपा भारत के क्रोधित मध्यवर्ग की उचित प्रतिनिधि है. वह भीड़ की मानसिकता में विश्वास करती है और उसे परिलक्षित करती है. आडवाणी से लेकर सुषमा स्वराज तक उनके नेता बलात्कारियों के लिए मृत्युदंड की मांग करते रहे हैं. इस दृष्टिकोण के अनुसार, राज्य द्वारा अधिक-से-अधिक अपराधियों को मार कर अपराध का समाधान किया जा सकता है, और अपराधियों को मार डालने की यह इच्छा व्यक्तिगत आघात की भावना से पैदा होती है. हिंसक अपराधों के विरुद्ध विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लेनेवाले मध्यवर्गीय समूहों का एक समानांतर स्वरूप सामने आ रहा है. इन्हें भीड़ नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि ये प्रत्यक्ष रूप से कम हिंसक हैं, लेकिन आंतरिक रूप से उतने ही हिंसक हैं. बलात्कारियों के लिए उनकी भी मांग फांसी और बधिया करने की है.

मृत्युदंड के लिए हमारे यहां एक अजीब शर्त है कि यह सजा सिर्फ असाधारण मामलों में ही दी जा सकती है. लेकिन यह समझना और समझाना बहुत कठिन है कि इसका मतलब क्या है और एक हत्या दूसरी हत्या से भिन्न कैसे है. मेरे मित्र और मृत्युदंड विरोधी युग मोहित चौधरी ने मिंट में लिखा है कि बच्चन सिंह मामले (1980) में सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों ने मृत्युदंड की संवैधानिक वैधता को बहाल रखा था.

उसी समय, उन्होंने इसके प्रयोग को बहुत हद तक सीमित कर दिया था और कहा था कि मृत्युदंड असाधारण मामलों में ही दिया जा सकता है, जहां आजीवन कारावास का विकल्प संभव नहीं रह गया हो, जहां गंभीरता कम करनेवाली स्थितियां न हों, और जहां मौजूद सबूत दोषी के सुधार की किसी भी संभावना को नकारते हों. न्यायालय ने यह शर्त लगा दी थी कि ह्यअगर अभियुक्त युवा या बूढ़ा हो, तो उसे मृत्युदंड नहीं दिया जायेगा. बाद के निर्णयों में गरीबी और अभियुक्त की पृष्ठभूमि (बाल शोषण, परित्याग आदि) को भी अपराध की गंभीरता को कम करनेवाला कारक माना गया और ऐसे मामलों में कम सजा देने की बात कही गयी.

चौधरी ने आगे लिखा है : आखिर मृत्युदंड से कौन सा उद्देश्य पूरा होता है? इस बात का कोई सबूत नहीं है कि उम्रकैद की जगह मृत्युदंड देने से हत्या की घटनाओं में कमी आती है. बल्कि, सबूत इसके विपरीत संकेत देते हैं. कुछ बलात्कारियों को फांसी देने से सड़कें महिलाओं के लिए अधिक सुरक्षित नहीं हो जायेंगी, या उनके घर उनके लिए अधिक सुरक्षित नहीं हो जायेंगे. इसके उलट, यह सरकारी लापरवाही पर परदा डाल देगा और महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े प्रमुख मुद्दों से भटका देगा.

यह राजनेताओं को यह कहने का मौका प्रदान करेगा कि वे महिलाओं के विरुद्ध होनेवाले अपराधों के प्रति कठोर हैं, और ऐसे अपराधों के कारणों को दूर करने की जिम्मेवारी से मुक्त हो जायेंगे. यह हमारे अंदर के न्यायसंगत क्षोभ को व्यक्त करने का अवसर भी देगा, और तब हम सभी अपने आसपास फैले स्त्री-विरोधी माहौल के साथ संतोष से जी सकेंगे. इसीलिए, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि अधिकतर नारीवादी स्त्री-विरोधी अपराधों के लिए मृत्युदंड के विरुद्ध हैं.


http://www.prabhatkhabar.com/news/columns/story/165943.html


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