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न्यूज क्लिपिंग्स् | इरोम की कहानी कुछ कहती है - शशिशेखर

इरोम की कहानी कुछ कहती है - शशिशेखर

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published Published on Aug 18, 2016   modified Modified on Aug 18, 2016
आजादी' शब्द के अर्थ-अनर्थ का अगर असली मतलब समझना है, तो इरोम शर्मिला के सफरनामे को गौर से परखिए। प्याज के छिलकों की तरह परत-दर-परत सत्य अपने समस्त स्वरूपों में खुलता चला जाएगा। मुझे इरोम के प्रति सम्मानपूर्ण सहानुभूति है। गांधी के बाद वह पहली ऐसी भारतीय योद्धा हैं, जिन्होंने साबित किया कि सिर्फ अहिंसक आंदोलन लंबा चल सकता है। इरोम ने तथाकथित खूनी कानून ‘अफ्स्पा' को हटाने के लिए 16 साल पहले जब आमरण अनशन की घोषणा की, तब उस इलाके में हिंसक आंदोलन चल रहे थे। वह तमाम बार जेल गईं और इंफाल का जेएनआईएमएस अस्पताल उनका स्थायी बसेरा बन गया। वह वहां पुलिस अभिरक्षा में रहतीं। हर रोज डॉक्टर जबरन उनकी नाक से तरल पदार्थ शरीर के अंदर पहुंचाते, ताकि वह दम न तोड़ दें। एक नौजवान लड़की, जिसकी यकीनन कुछ निजी हसरतें रही होंगी, उसने जीवन के सर्वाधिक महत्वपूर्ण वर्ष इस संघर्ष को दे दिए।

इरोम शर्मिला के बारे में सोचते ही एक ऐसी महिला की आकृति उभरती है, जिसकी नाक और भोजन की नली एक-दूसरे के पर्याय हो गए थे। प्लास्टिक की वह नश्वर नली उनके संघर्ष की तरह उनके अस्तित्व का अटूट हिस्सा बन गई थी। ऐसे में, जब उन्होंने अचानक भोजन ग्रहण करने का निर्णय किया, तो मुल्क के समझदार लोगों ने इसका स्वागत किया। पर इस फैसले ने उन्हें अपने घर में पराया कर दिया। परिवार वाले रूठ गए। समर्थकों ने मुंह फेर लिया। और तो और, जब वह अस्पताल छोड़कर घर के लिए निकलीं, तो उन्हें मोहल्ले में नहीं घुसने दिया गया। अब वह उस चिकित्सालय में शरणार्थी की तरह रह रही हैं, जहां सालों-साल उन्होंने हिरासत या कैद में बिताए।

उनके अपने इतने पराए कैसे हो गए? आरोप है कि इरोम ने आयरलैंड के डेसमंड कोचिनो से प्यार कर मणिपुर की ‘महान' परंपराओं की अवमानना की है। शायद यह गुस्से का असली कारण नहीं है। दरअसल, इरोम इंसानियत के इतिहास में अहिंसक प्रतिरोध का जीता-जागता नमूना बन गई हैं। मणिपुर की नौजवान पीढ़ी को उन्हें मसीहाई अंदाज में देखने की आदत पड़ी हुई है। कुनबे वाले खुश थे कि हमारी बेटी की नामवरी से रुतबा बढ़ रहा है। शर्मिला हर रोज भूख से लड़तीं, उधर उनके परिजनों की आकांक्षाओं की प्यास दिनों दिन दमदार होती जाती। इस स्वार्थी नजरिये ने उन्हें ऐसे पुतले में तब्दील कर दिया, जिसका लोग सिर्फ निजी कारथ साधने के लिए प्रयोग करते हैं।

इरोम की समझ में यह सच समय के साथ विराट होता गया होगा। वह समझ गई थीं कि आम मणिपुरी को उनके आंदोलन से फर्क नहीं पड़ता और कुछ लोगों के हित के लिए पुतला बने रहने का कोई अर्थ नहीं। साथ ही, शायद वह अपनी कीर्ति को खुद-ब-खुद मटियामेट नहीं करना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने संसार का सबसे पुराना अनशन तो खत्म किया, पर आंदोलन नहीं। वह ‘अफ्स्पा' हटाने के लिए राज्य की मुख्यमंत्री बनना चाहती हैं। इसके लिए इरोम निर्दलीय तौर पर चुनाव लड़ेंगी। उन्हें 20 ऐसे नौजवानों की दरकार है, जो दलगत राजनीति से ऊपर उठकर चुनाव लड़़ें और जीतें।

क्या वह सफल हो पाएंगी? इस सवाल का जवाब अभी मुमकिन नहीं। राजनीति संभावनाओं का खेल है। अगर मौजूदा राजनीतिक चेतना पर नजर डालें, तो तय है कि वोटर अब प्रबुद्ध आंदोलनकारियों की इज्जत करने लगे हैं। क्या किसी ने कभी सोचा था कि अन्ना हजारे के आंदोलन के वास्तुकार अरविंद केजरीवाल सियासी दंगल में उतरेंगे और दिल्ली में अभूतपूर्व जीत हासिल करेंगे? आज उनकी पार्टी खुद को पंजाब में विकल्प के तौर पर पेश कर रही है। अगर केजरीवाल की तरह इरोम भी सफल हो जाती हैं, तो यह हिन्दुस्तानी राजनीति में बदलाव का अहम मोड़ साबित होगा।

उन्होंने घोषणा कर दी है कि वह चुनाव नहीं जीतीं, तो मणिपुर छोड़ देंगी। यह एक भावुक अपील है, या फिर सियासी दांव? जो हो, मगर मणिपुर की राजनीति पर इसका असर हर हाल में पड़ने जा रहा है। जहां पूर्व आतंकी और अलगाववादी चुनावी खेल में अहम किरदार निभाते रहे हों, वहां एक अहिंसावादी महिला का सियासी रण में उतरना खासा दिलचस्प साबित होगा। अहिंसा का असर दूरगामी होता है। अगर आपको मेरी बात समझने में दिक्कत हो, तो कृपया दलाई लामा की संघर्ष यात्रा पर नजर डाल देखिए। ‘आजादी' के लिए उनकी 57 वर्ष लंबी जद्दोजहद अपने आप में अनूठी मिसाल है। वह जीते जी संसार के सर्वाधिक सम्मानित स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बन गए। इसकी अकेली वजह यह है कि ‘परम पावन' ने जतन से अपनी लड़ाई को खूनी होने से बचाया। कभी गांधी ने यही रास्ता अपनाया था, वह भी जिंदा मिसाल बन गए थे।

दक्षिण अफ्रीका के अपने तीन दौरों के दौरान मैंने हमेशा यह कोशिश की कि नेल्सन मंडेला के बारे में ज्यादा से ज्यादा जान सकूं। ‘मदीबा' आतंकवादी के तौर पर जेल गए थे। कारावास के दारुण दिनों ने उन्हें समझाया कि कानून हाथ में लेने से महज तनहाई मिल सकती है। अगर मुल्क को बचाना और बढ़ाना है, तो सबको सदैव साथ लेकर चलना होगा। इसीलिए वह गोरों और कालों, आदिवासियों और शहरियों, व्यापारियों और मजदूरों, सभी के ‘पूज्य' बन गए। दलाई लामा की तरह उनकी प्रतिष्ठा भी सरहदों की बाड़ेबंदी से परे थी। उनकी पांच साला हुकूमत में दक्षिण अफ्रीका ने उल्लेखनीय प्रगति की और तमाम विषमताओं से जूझते हुए वह उसे विकासशील देशों की अगली पंक्ति में लाने में सफल रहे। मदीबा अपने भाषणों में हमेशा खून-खराबे की निंदा करते और सबको साथ लेकर चलने की वकालत। मैं अपने को धन्य मानता हूं कि मुझे दलाई लामा और मंडेला जैसे महापुरुषों को नजदीक से देखने का अवसर मिला।
तय है, हिंसा का अंत सिर्फ हिंसा है।

सोचिए, अगर बुरहान वानी ने बंदूक की जगह इरोम शर्मिला या दलाई लामा का रास्ता अपनाया होता, तो न वह जान लेता, न देता। आज पाकिस्तान उसकी मौत को ‘शहादत' साबित कर अपना प्रतिशोध पूरा करना चाहता है। इससे पहले भी तमाम दहशतगर्द ‘शहीद' साबित किए गए, पर वक्त ने उन्हें बिसरा दिया। कश्मीर की पाक प्रेरित हिंसा ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर कोई हिंसा के रास्ते पर चलने के बाद वापसी की कोशिश करता है, तो उसे शेष जिंदगी दोनों तरफ की एजेंसियों की चाकरी में बितानी पड़ती है। यासीन मलिक और शब्बीर शाह इसके जीवंत उदाहरण हैं। उन्होंने जिनके खिलाफ बंदूक उठाई, आज उन्हीं सुरक्षा बलों की बंदूकों के साये में जिंदगी बचा रहे हैं। इनकी ‘कभी इधर की, तो कभी उधर की' सुन-सुनकर कश्मीरियों की हताशा लंबी और तकलीफदेह हरारत में बदल गई है। वे कहें कुछ भी, पर अवाम में उनके प्रति कोई सहानुभूति नहीं है। हर चुनाव में यह सच समूचे तीखेपन के साथ सामने आता है, मगर ऐसे लोग बेपर्दगी को भी परदादारी मान लेते हैं।

इसीलिए आजादी की 69वीं वर्षगांठ से एक दिन पहले अनुरोध करना चाहूंगा कि भारतीय लोकतंत्र में असहमतियों की पूरी गुंजाइश है। शर्त यही है कि उन्हें अहिंसक तरीके से व्यक्त किया जाए। आजादी कोई भावुक नारा नहीं, बल्कि एक ऐसी हकीकत है, जिसे हमारे पुरखों ने अपने खून से बोया और सींचा था। इस महान देश में सिर्फ उन्हीं की जरूरत है, जो इस अनंत गौरवगाथा का आदर करते हैं।

@shekharkahin
shashi.shekhar@livehindustan.com


http://www.livehindustan.com/news/shashi-shekhar-blog/article1-story-of-irom-sharmila-say-something--551068.html


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