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न्यूज क्लिपिंग्स् | एक साथ चुनावों की बढ़ती कवायद -- अनुपम त्रिवेदी

एक साथ चुनावों की बढ़ती कवायद -- अनुपम त्रिवेदी

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published Published on Dec 8, 2016   modified Modified on Dec 8, 2016
आर्थिक सुधारों के साथ मोदी सरकार चुनाव सुधार की दिशा में भी बड़ी तेजी से काम कर रही है. भविष्य में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने को लेकर अनेक गंभीर प्रयास किये जा रहे हैं और लगातार सरकार इसके संकेत भी दे रही है. संसद के वर्तमान सत्र से पूर्व हुई सर्वदलीय बैठक में भी प्रधानमंत्री मोदी ने एक साथ चुनावों की वकालत करते हुए कहा कि इस कदम से ‘सार्वजानिक जीवन में पारदर्शिता बढ़ाने और भ्रष्टाचार से लड़ने में मदद मिलेगी.'

सरकार की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जहां एक ओर प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले नीति-आयोग ने समकालिक चुनावों पर एक चर्चा-पत्र जारी किया है, जिसमें इससे जुड़े सभी पहलुओं का विश्लेषण किया गया है, वहीं दूसरी ओर गृहमंत्री राजनाथ सिंह की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रियों के एक दल ने प्रधानमंत्री की इस प्रिय योजना पर कार्य प्रारंभ कर दिया है. इससे पूर्व दिसंबर, 2015 में भी संसद की एक स्टैंडिंग कमेटी ने देश में सभी विधानसभा चुनावों को दो चरणों में संपन्न कराने की संस्तुति की थी.

प्रधानमंत्री मोदी देश में समकालिक चुनावों के बड़े हिमायती हैं और अनेक बार देश में एक साथ चुनावों को लेकर सार्वजनिक मंचों पर अपनी राय जाहिर कर चुके हैं. 2014 के चुनावों से पूर्व इस मुद्दे को भाजपा के मैनिफेस्टो में शामिल किया गया था.

उसी साल जून में एक टीवी इंटरव्यू में उन्होंने एक साथ चुनाव कराने को अत्यंत आवश्यक बताया था और चुनाव-आयोग का आह्वान किया था कि वह इसे संभव बनाने की दिशा में काम करे. प्रधानमंत्री की पहल का समर्थन चुनाव आयोग भी कर चुका है, पर वह इसके लिए सभी दलों की सहमति चाहता है. ऐसा नहीं है कि समकालिक चुनावों पर इतने बड़े स्तर पर चर्चा पहली बार हो रही है. पूर्व में वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी 1995 और 2010 में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठा चुके हैं. आप कह सकते हैं कि कम-से-कम यह एक मुद्दा ऐसा है, जिस पर आडवाणी जी और प्रधानमंत्री मोदी की राय पूरी तरह से एक है!

दरअसल, आजादी के बाद देश में चुनाव एक साथ ही होते थे. 1951-52 में पहले आम-चुनाव में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही हुए थे. यह क्रम 1967 तक निर्विघ्न चला. पर 1968 और 1969 में कुछ विधानसभाओं के समय पूर्व भंग होने और 1971 में लोकसभा के मध्यावधि चुनाव होने से यह क्रम टूट गया.

इसके बाद से सिर्फ आठवीं, दसवीं, चौदहवीं और पंद्रहवीं लोकसभा ही अपना कार्यकाल पूर्ण कर पायी हैं. अब स्थिति यह है कि देश में प्रतिवर्ष छोटे-बड़े औसतन 5-7 चुनाव होते हैं. इन लगातार होते चुनावों से न केवल बड़ा खर्च होता है, बल्कि लगातार लागू होती आचार-संहिता से शासकीय कार्य बुरी तरह प्रभावित होते हैं. नीति-आयोग के अनुसार, लगातार चुनाव होते रहने से नीति-निर्माण में स्थायित्व नहीं रहता और मतदाताओं को लुभाने के चलते संरचनात्मक सुधारों के बजाय अदूरदर्शी और लोकलुभावन निर्णयों को ज्यादा प्राथमिकता दी जाती है.

एक साथ चुनाव कराने के पक्ष में दिये जानेवाले मूलतः चार तर्क हैं. पहला- इससे बार-बार चुनाव कराने के खर्च से बचा जा सकेगा, जिससे धन और समय दोनों की बचत होगी. दूसरा- मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट अर्थात् आचार-संहिता की वजह से शासकीय कार्यों को ठप्प होने से रोका जा सकेगा और सरकारें बार-बार चुनाव के बजाय शासन करने पर ध्यान दे पायेंगी. तीसरा- सार्वजनिक जीवन में चुनाव से होनेवाले व्यवधानों को सीमित किया जा सकेगा. और चौथा- लगभग हर समय किसी-न-किसी चुनाव में तैनात हमारे सुरक्षा-बलों को सुरक्षा और कानून-व्यवस्था के रख-रखाव में लगाया जा सकेगा.

इन तर्कों के आधार पर प्रधानमंत्री की एक साथ चुनावों की योजना को व्यापक जन-समर्थन मिल रहा है. पर, क्या सुनने में अच्छी लगनेवाली और व्यापक समर्थन वाली समकालिक चुनावों की यह योजना हमारे लोकतंत्र के लिए वाकई लाभकारी है? संभवतः नहीं.

क्योंकि, इस योजना से असहमति रखनेवालों के तर्क भी कुछ कम नहीं हैं. उनका मानना है कि लोकसभा और राज्य विधानसभा के साथ-साथ होनेवाले चुनावों में राष्ट्रीय दल फायदे में रहते हैं, जबकि छोटे क्षेत्रीय दल कमजोर पड़ जाते हैं, जो कि स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं है. पूर्व मुख्य चुनाव-आयुक्त एसवाइ कुरैशी के अनुसार, साथ होनेवाले चुनाव में बड़े राजनीतिक नेताओं की लहर पैदा हो जाती है, जिसका असर चुनाव परिणामों पर पड़ता है. इससे राष्ट्रीय दल तो लाभान्वित हो जाते हैं, लेकिन छोटे क्षेत्रीय दलों के भविष्य के लिए मुश्किल पैदा हो जाती है.

विविधताओं वाले हमारे देश में, जहां पर संघीय ढांचा विद्यमान है, छोटे दलों की मौजूदगी मतदाताओं को विकल्प चुनने में सहायक साबित होती है.

रही बात बार-बार चुनावों की, तो अमेरिका जैसे शक्तिशाली लोकतंत्र में तो हमेशा ही चुनावी माहौल बना रहता है. वहां हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव और सीनेट में कमोबेश हर दो साल में चुनाव होते हैं और राष्ट्रपति चुनाव हर चार साल में. पर क्या वहां विकास कम हुआ है?

रही बात खर्च की, तो वह तो एक साथ चुनाव कराने में भी होगा. वहीं आचार संहिता से शासकीय कार्य बाधित होने की बात करनेवालों को बताना चाहिए कि सारी नयी घोषणाएं करने के लिए उन्हें चुनाव-पूर्व समय ही क्यों सबसे मुफीद लगता है? सामान्य शासकीय कार्यों को तो आचार-संहिता कभी रोकती नहीं है. इस बात की भी कोई गारंटी नहीं है कि गंठबंधन सरकारों के इस युग में सभी सरकारें अपना कार्यकाल पूरा कर पायेंगी. अगर कोई सरकार एक साल बाद ही गिर जाती है, तो क्या बाकी बचे चार साल चुनाव नहीं होंगे?

लोकतंत्र में चुनाव एक ऐसी तलवार है, जो यदि राजनेताओं के सर पर लटकी रहे तो ही अच्छा है. क्योंकि, यह मतदाताओं की नाराजगी और कभी भी उनका समर्थन खोने का भय ही शासकों को निरंकुश और दंभी होने से रोकता है. अब यदि यह भय ही समाप्त हो गया, तो लोकतंत्र कैसे बचेगा? विचार करें.

http://www.prabhatkhabar.com/news/columns/story/905467.html


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