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कोसी का कहर

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published Published on Sep 10, 2009   modified Modified on Sep 10, 2009

कोसी का कहर अगस्त 2008 में बिहार के एक बड़े इलाके पर टूट पड़ा।

कोसी को कभी बिहार का शोक कहा जाता था। जब यह नदी पूर्णिया जिले में बहती थी तब एक कहावत बड़ी चर्चित थी कि ‘जहर खाओ, न माहुर खाओ, मरना है तो पूर्णिया जाओ।’ इस नदी का यह स्वभाव था कि वह अपना रास्ता बदलती रहती थी। यह कब अपना रुख बदल लेगी, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता था। इसलिए लोग इससे डरे रहते थे।

लेकिन यह तब की बात है, जब माना जाता था कि प्रकृति के कोप से बचना मुश्किल है। बाद में नदी के किनारे तटबंध बनाए गए और बाढ़ से लोगों को बचाने के इंतजाम किए गए। लेकिन 2008 में कोसी का विकराल रूप एक बार फिर देखने को मिला। और इसके साथ ही बाढ़ रोकने के लिए किए इंतजाम एक बार फिर सवालों के घेरे में आ गए। नदी को बांधने की कोशिश में इंसान नाकाम रहा है, यह बात एक बार फिर जाहिर हो गई।

बाढ़ 18 अगस्त 2008 को नेपाल में कुसहा तटबंध में दरार पड़ने से आई। इसका असर 16 जिलों में 92 ब्लॉक के 1,598 गांवों पर पड़ा। तकरीबन साढ़े चार सौ लोगों की जान गई और 30 लाख ऊपर लोग इस तबाही का शिकार हुए। लाखों लोग बेघर हो गए। लाखों लोगों की आजीविका चली गई। एक लाख छह हेक्टेयर जमीन पर खड़ी फसलें नष्ट हो गईं। नुकसान इतने बड़े पैमाने पर हुआ कि केंद्र सरकार को कोसी की बाढ़ को राष्ट्रीय आपदा घोषित करना पड़ा। बिहार सरकार ने बाढ़ के वक्त 9,000 करोड़ रुपए के नुकसान का अंदाजा लगाया। केंद्र सरकार की तरफ से भेजे गए टास्क फोर्स ने 16 सितंबर 2008 को 25,000 करोड़ रुपए के नुकसान की बात कही।

लेकिन इसमें वह नुकसान शामिल नहीं है, जो बाढ़ के दीर्घकालिक असर से होगा। कई जानकारों ने कहा है कि बाढ़ की वजह से खेत लंबे समय तक बंजर बने रहेंगे, जिससे लोगों को बदहाली का सामना करना पड़ेगा। बाढ़ के साथ आई रेत और गाद खेतों में जम गई। साथ ही इनकी वजह से सिंचाई के लिए पानी पहुंचाने के मकसद से बनाए गए रास्ते जाम हो गए। साफ है, इसका असर लंबे समय तक दिखता रहेगा।


यानी कोसी ने एक बार फिर अपना खौफनाक रूप दिखा दिया।

कोसी जो नेपाल और भारत के एक बहुत बड़े इलाके पर पसरी हुई है। यानी यह एक ऐसी नदी है, जो देशों में बहती है। इसका जलग्रहण क्षेत्र 95,646 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। यह इलाका माउंट एवरेस्ट और कंजनजंघा से होते हुए गंगा नदी तक जाता है। लेकिन गंगा में मिलने से पहले कोसी बिहार की कई प्रमुख नदियों, मसलन- कमला, बागमती, बूढी गंडक और भूतही बलान को खुद में समेट लेती है। चतरा में उतरने के पहले नदी नेपाल की तराई में 48 किलोमीटर का सफर तय कर चुकी होती है। फिर यह उत्तर बिहार में 15 धाराओं में बंट जाती है। पिछले दो सौ साल में यह नदी उत्तर बिहार में पूरब से पश्चिम की तरफ 150 किलोमीटर से ज्यादा खिसकी है।

नेपाल में सात बड़ी नदियां कोसी में मिलती हैं, इसलिए नेपाल में इसे सप्त कोसी कहा जाता है। अपने स्रोत से चलकर गंगा में मिलने तक कोसी 729 किलोमीटर की दूरी तय करती है। इसमें से 260 किलोमीटर का इलाका भारत में है।

कोसी में पानी का औसत प्रवाह 1,564 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड है। बाढ़ के समय यह प्रवाह 18 गुना बढ़ जाता है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक कोसी में सबसे भयंकर बाढ़ अगस्त 1968 में आई थी, जब जल प्रवाह 25,878 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड तक पहुंच गया था। इसके पहले एक और भयंकर बाढ़ अगस्त 1954 में आई, जब इसमें 24,200 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड का जल प्रवाह देखने को मिला था।

अगस्त 2008 में नदी की धारा इतनी तेज नहीं थी। इसके बावजूद भारी तबाही हुई। वजह थी नेपाल में कुसहा तटबंध का टूटना। इससे वहां जमा पानी तेजी से बह निकला। और नेपाल की तराई में मौजूद सुनसरी जिले से लेकर बिहार में सुपौल, मधेपुरा, सहरसा, अररिया, पूर्णिया, खगड़िया आदि जैसे जिलों पर विपत्ति टूट पड़ी। नेपाल में पचास हजार लोग इस बाढ़ से प्रभावित हुए।
 
इस बाढ़ ने तटबंधों को चर्चा के केंद्र में ला दिया। इसलिए भी कि तटबंध उस वक्त टूटा, जब नदी में पानी का बहाव अगस्त के औसत बहाव से कम था। इसीलिए अनेक जानकारों की राय है कि 2008 में कोसी की बाढ़ से हुई तबाही की वजह मानसून में आने वाली बाढ़ नहीं थी। कुदरत को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। यहां यह भी गौरतलब है कि 2008 के अगस्त के पहले पखवाड़े में कोसी के जलग्रहण क्षेत्र में मौजूद पहाड़ियों पर हुई बारिश सामान्य से कम थी। इन जानकारों का कहना है कि अगर तटबंध टूटने के समय कोसी में जल प्रवाह ऐतिहासिक रूप से सबसे ज्यादा होता, तो और भी भयानक तबाही देखने को मिलती। तटबंध टूटने के दिन कोसी में जल प्रवाह 1968 में दर्ज सर्वोच्च स्तर से तकरीबन छह गुना कम था। जब तटबंध टूटा तो नदी का पानी पुराने रास्तों से बहने लगा, प्रवाह जिधर आसानी से मुड़ सकता था मुड़ गया, और निचले इलाके डूब गए। (राजीव सिन्हा, ईपीडब्लू, 15 नवंबर 2008)

तटबंध टूटने के समय दो असामान्य घटनाएं देखी गईं। पहली यह कि नदी अपनी मौजूदा धारा से पूरब की तरफ मुड़ी, जबकि पिछले दो सौ साल से इसका रुझान पश्चिम की तरफ मुड़ने का रहा है। और दूसरी असामान्य घटना यह दिखी कि नदी की धारा ने करीब 120 किलोमीटर की दिशा बदली। यह किसी एक मौके पर धारा के इतनी दिशा बदल लेने का रिकॉर्ड है।

बाद में सामने आए तथ्यों से यह जाहिर हुआ कि कुसहा के आसपास पूर्वी तटबंध पिछले कुछ वर्षों से दबाव में था। बल्कि उपग्रह से हासिल तस्वीरों से साफ होता है कि नदी कम से कम 1979 से पूरब की तरफ मुड़ रही थी। 5 अगस्त 2008 को कुसहा तटबंध में दरार पड़ती नजर आई। अगर उसी वक्त जरूरी कदम उठा लिए गए होते, तो शायद इस विपत्ति से लाखों लोग बच जाते।

वैसे यह आठवां मौका था, जब कोसी के पूर्वी तटबंध में दरार पड़ी। हां, ऐसा पहली बार हुआ, जब बैराज के ऊपर तटबंध टूटा। 1968, 1984 और 1987 में पूर्वी तटबंध में पड़ी दरारें कम घातक नहीं थीं। तब भी बड़ी संख्या में लोगों को बाढ़ का कहर झेलना पड़ा था। ये तटबंध 1963 में बन कर तैयार हुए थे, यानी अब 46 वर्ष से ज्यादा पुराने हो चुके हैं। ऐसे में जानकारों की राय है कि इनमें दरार पड़ना आश्चर्यजनक नहीं है। (राजीव सिन्हा, ईपीडब्लू, 15 नवंबर 2008)

तटबंध बनने के साथ ही कोसी नदी के पूरब में मौजूद इलाके में सड़कें, नहर, रेल लाइनें आदि बना दी गईं। इससे नदी से पानी बहने के पुराने कुदरती रास्ते बंद हो गए। नदी बेसिन में अवरोध खड़े हो गए। पानी का बहाव नियंत्रित करने के लिए नदी पर बैराज बनाया गया। इससे नदी के ऊपरी बहाव स्थल पर गाद जमा होने लगी और कोसी नदी अपने ऊपरी इलाके में अस्थिर रूप से बहने लगी।

विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र के मुताबिक, “कोसी की विभिन्न धाराओं के नक्शे 18वीं सदी के प्रारंभ से उपलब्ध हैं। 15 अलग-अलग धाराओं में बहने वाली इस नदी के एक धारा से दूसरी धारा में बहने का कारण उसमें आने वाली गाद थी। ऐसी नदी को एक धारा में बहाने का दुस्साहस 1950 में के दशक में हमारे राजनीतिज्ञों और इंजीनियरों ने किया। जिस नदी का पानी और उसकी गाद 15 धाराओं में किसी न किसी मात्रा में बहती थी, वह एक धारा में सीमित हो गई। इस मूर्खता का परिणाम यह हुआ कि बहुत सी धाराओं में बहने वाली नदी की सिर्फ एक धारा के बीच सारा पानी और सारी गाद बहने लगी। जो नदी पहले से ही शेर थी, वह तटबंधों के बीच बंध जाने के बाद पहले से कहीं ज्यादा ताकतवर हो गई, क्योंकि अब उसकी केवल एक धारा की पेटी का स्तर बाकी सभी धाराओं और साथ की जमीन से कहीं ज्यादा ऊपर हो गया। ऐसी नदी स्थिर नहीं रह सकती थी।”

कोसी में हर साल बरसात में पानी बढ़ता है। जून से सितंबर तक मानसून के मौसम में कोसी के जल ग्रहण क्षेत्र में तेज बारिश होती है, हालांकि यह हर साल एक जैसी हालत नहीं रहती। कोसी जल ग्रहाण इलाके में बादल फटने की घटनाएं आम हैं, जिस दौरान एक दिन में 500 मिलीमीटर तक बारिश हो सकती है। जानकारों के मुताबिक जल ग्रहण क्षेत्र में दिखने वाला यह रुझान कोसी के अनोखे और खतरनाक व्यवहार का एक कारण है।

जैसाकि ऊपर कहा गया है, कोसी के अक्सर कहर ढाने का एक कारण उसके पानी में आने वाली गाद है। बादल फटने के दौरान बड़े पैमाने पर मलबा नदियों में आता है। पहाड़ में जमीन धंसने की घटनाएं आम तौर पर होती रहती हैं। इससे भी पानी और गाद नदी में आती है। ये सारी घटनाएं अचानक होती हैं और इतना वक्त नहीं होता कि संभावित बाढ़ के दायरे में आने वाले लोगों को चेतावनी दी जा सके।

पिछले साठ साल में हिमालय में ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार तेज हुई है। इससे कई बार बर्फ की झीलों में अचानक उफान आ जाता है। इससे तेज रफ्तार से पानी नदियों में पहुंचता है और इसके साथ ही पहुंचता है झीलों के टूटने से पैदा हुआ मलबा। जब इन नदियों की बाढ़ नीचे पहुंचती है, तो पानी और गाद खेतों और बस्तियों में तबाही मचा देते हैं। अध्ययनों से यह बात सामने आई है कि कोसी हर साल 12 करोड़ क्यूबिक मीटर गाद लाती है, जिनमें 95 फीसदी मानसून के दिनों में आता है। (अजय दीक्षित, ईपीडब्लू, 7 फरवरी 2009)

उपरोक्त तथ्यों की रोशनी में यह बात साफ कही जा सकती है कि कोसी ने अगस्त 2008 में जो तबाही मचाई, उसकी परिस्थितियां इंसान ने ही पैदा की थीं। तटबंध से बाढ़ रोकने की नीति से लेकर धरती के गर्म होने की वजह से हो रहा जलवायु परिवर्तन- इसके कारणों में शामिल हैं। दोहराव के बावजूद इन दो तथ्यों पर गौर किए जाने की जरूरत है- धरती के गर्म होने की वजह से ग्लेशियर पिघल रहे हैं और इसका असर नदियों से लेकर पूरे वातावरण पर पड़ रहा है। प्रकृति को टेक्नोलॉजी से जीत लेने का अंधविश्वास तटबंध पर अंधआस्था के रूप में सामने आया है, और इसका परिणाम अब भुगतना पड़ रहा है।

कोसी का तटबंध टूटने से इतनी बर्बादी झेल चुकने के बाद भी यह सवाल आखिर क्यों नहीं उठाया जाता कि अगर कुसहा तटबंध नहीं टूटता तो पानी आखिर कहां जाता? जानकारों के मुताबिक तब पानी उस रास्ते से जाता, जिसे 1950-60 के दशक में तटबंधों से रोक दिया गया। इन तटबंधों के बीच भारत में 380 और नेपाल में 34 गांव बसे हैं। भारत में करीब दस लाख और नेपाल में डेढ़ लाख की आबादी वहां रहती है। अगर तटबंध नहीं टूटता तो दुर्भाग्य से ये लोग ही तबाही का शिकार होते। पानी इन्हीं गांवों से होकर बहता। यानी तटबंध टूटें या नहीं, इंसानों के किसी न किसी हिस्से पर इनकी वजह से आपदा जरूर आएगी।

तटबंधों ने जैसी परिस्थिति खड़ी की है, उसे समझने के लिए उस कमेटी पर भी गौर करना चाहिए, जो तटबंधों के बीच फंसे लोगों की दुर्दशा पर विचार करने के लिए बनाई गई थी। चंद्रकिशोर पाठक की अध्यक्षता में बनी कमेटी ने तटबंधों के बीच रह रहे लोगों के आर्थिक पुनर्वास और उनके विकास के लिए एक प्राधिकरण बनाने की सिफारिश की। 1987 में कोसी पीड़ित विकास प्राधिकरण का गठन हुआ। इस संबंध में अपने संदेश में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी दुबे ने कहा था- “कोसी तटबंधों के बनने के बाद से लाखों लोगों ने अनकही पीड़ा झेली है। देश में शायद ही कोई और ऐसी जगह हो, जहां इतने सारे लोग नदी की धारा के सामने रहते हों। अपने दुर्भाग्य से पीछा छुड़ाने की कोशिश करते-करते इन लोगों ने अब अपनी उम्मीद खो दी है।” लेकिन वह प्राधिकरण भी इन लोगों के दुख-दर्द दूर नहीं कर सका।

दरअसल, तटबंध कोसी बेसिन के बाशिंदों के गले में लिपटे सांप की तरह बन गए हैं। अगर ये तटबंध सलामत रहते हैं, तो तटबंधों के बीच रहने वाली 12 लाख की आबादी की परेशानी की वजह बनते हैं, और अगर ये टूट जाते हैं तो पांच लाख से लेकर 30 लाख तक की आबादी पर कहर टूट पड़ता है। तटबंध टूटने की हालत में कितनी आबादी बाढ़ की चपेट में आएगी, यह इससे तय होता है कि नदी कौन से रास्ता अपना लेती है। लेकिन बर्बादी तो हर हाल में होती है। 

नेपाल का पहलू

कोसी की बाढ़ ने एक तरफ भारी तबाही मचाई तो दूसरी तरफ इसके साथ ही भारत और नेपाल के संबंधों का एक पेच भी उभर कर सामने आ गया। नेपाल में भारत पर विस्तारवादी रवैया अपनाने का आरोप लगाने वाली ताकतों को इससे अपनी मुहिम तेज करने का एक और मौका मिला। निशाने पर आया 1954 का कोसी समझौता। नेपाल की भारत विरोधी ताकतों का आरोप है कि यह समझौता असमान शर्तों पर हुआ था। इसी समझौते के तहत सीमा पर बैराज बना। यह नेपाल की जमीन पर बना। जबकि आरोप है कि बैराज का 96 फीसदी फायदा भारत को मिला। नेपाल को सिर्फ चार फीसदी लाभ मिला। 2008 की बाढ़ के समय नेपाली अखबारों में इस संबंध में काफी चर्चा रही।

वहां छपे लेखों में कहा गया कि कोसी परियोजना मुख्य रूप से बाढ़ नियंत्रण की परियोजना है, यह सिंचाई परियोजना नहीं है। नेपाल को सिंचाई का कुछ लाभ जरूर मिला, लेकिन इसकी वजह से वहां बाढ़ का खतरा बढ़ गया। इस परियोजना से नेपाल को होने वाले कथित नुकसानों की चर्चा वहां खूब बढ़ा-चढ़ा कर की गई और कोसी समझौते पर पुनर्विचार की मांग जोरदार ढंग से उठाई गई। कई टीकाकारों ने इस समझौते को नेपाल के लिए राष्ट्रघाती बताया।  राजनीतिक विश्लेषक श्याम श्रेष्ठ ने लिखा- इस समझौते से नेपाल को नुकसान के अलावा और कुछ नहीं हुआ। नेपाल की जमीन पर बांध बनाने में स्वामित्व नेपाल का होना चाहिए। लेकिन कोसी परियोजना के संचालन पर पूरा हक भारत का है। यानी इस समझौते से नेपाल की संप्रभुता में भारत का हस्तक्षेप सुनिश्चित हुआ है। इसलिए असमान एवं राष्ट्रघाती चरित्र वाले कोसी समझौते का पुनरावलोकन जरूर होना चाहिए। श्याम श्रेष्ट जैसे ही विचार कई दूसरे लोगों ने भी जताए।

कई जानकार यह मानते हैं कि कोसी नदी के दो देशों में बहने और कोसी परियोजना में दो देशों के शामिल होने की वजह से आपदा रोकने के उपाय कारगर ढंग से नहीं किए जा सके हैं। इस पहलू की अगस्त 2008 की बर्बादी में एक खास भूमिका रही। जल संसाधन विशेषज्ञ अजय दीक्षित ने इस बात का जिक्र किया है कि 1966 की संशोधित कोसी संधि में परियोजना के रखरखाव एवं इससे संबंधित अन्य कार्यों की जिम्मेदारी भारत को दी गई। नेपाल सरकार अपनी सभी सड़कों, जल मार्गों, तथा परिवहन और संचार के दूसरे रास्तों के इस्तेमाल का हक भारत को देने पर राजी हो गई, ताकि भारत बैराज और दूसरे संबंधित निर्माण एवं रखरखाव की जिम्मेदारी निभा सके। लेकिन दीक्षित का कहना है कि यह संधि बैराज और तटबंधों के नियमित रखरखाव के बारे में अस्पष्ट है। संधि में नेपाल को संचालन एवं प्रबंधन संबंधी कोई जिम्मेदारी नहीं दी गई है, जबकि बैराज के ऊपर नदी नेपाल में ही बहती है।

जानकारों का कहना है कि नेपाल में राजनीतिक बदलाव की चल रही प्रक्रिया ने हालात को और उलझा दिया है। राजतंत्र का खात्मा, संविधान सभा के चुनाव और उसके बाद माओवादियों एवं दूसरे राजनीतिक दलो के बीच बढ़ते टकराव ने भारत-नेपाल संधि को  एक ज्यादा ज्वलंत राजनीतिक मुद्दा बना दिया। नेपाल की राजनीति में भारत विरोध की एक धारा लंबे समय से मौजूद रही है। अगस्त 2008 में भारत विरोधी ताकतों ने यह बात जोरशोर से उछाली कि संधि से नेपाल को कितनी क्षति हुई है। इस तरफ ध्यान खींचा गया कि कोसी परियोजना से जो फायदे होने की बात कही गई थी, वे नहीं हुए या जितना फायदा बताया गया था, उसकी तुलना में बहुत कम फायदे हुए।

ये बातें भारत, खासकर उत्तर बिहार के लिए भी महत्त्वपूर्ण हैं। दरअसल, इस चर्चा से ये पहलू सामने आते हैं: 1- कोसी बैराज की वजह से सिंचाई की सुविधा तो मिली, लेकिन बहुत कम इलाके में। 2- इस परियोजना से जितनी बिजली मिलने का वादा किया गया था, उतनी बिजली कभी उपलब्ध नहीं हुई। नहर में बड़ी मात्रा में गाद जमा होने से बिजली संयंत्र संकट का शिकार हो गया। 3- कोसी परियोजना की बाढ़ नियंत्रण की क्षमता पर भी सवाल लगातार गहरा होता गया है। एक बड़ा इलाका तटबंध के दायरे से बाहर पड़ता है और उस इलाके को इस परियोजना से कोई सुरक्षा मिली है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। अगस्त 2008 में तटबंध में दरार पड़ने से बाढ़ सुरक्षा का दावा और कमजोर साबित हो गया है।

अब ऐसी आम धारणा बन गई है कि पचास साल में तटबंधों में सात बार दरार पड़ने के बावजूद कोई सबक नहीं सीखा गया है। इसकी एक मिसाल अक्टूबर 2008 में जल संसाधन के बारे में भारत-नेपाल की एक उच्चस्तरीय कमेटी की बैठक है। इस बैठक के बाद जारी विज्ञप्ति में बिहार में बाढ़ नियंत्रण के लिए सप्त कोसी परियोजना पर अमल के ऊपर खास जोर दिया गया। लेकिन इसमें दरार पड़ने की घटनाओं और अभी दो महीने पहले ही मची तबाही के बावजूद बैराज एवं तटबंधों के जरिए बाढ़ रोकने के तरीके पर पुनर्विचार की कोई जरूरत महसूस नहीं की गई।

आगे बढ़ने से पहले सप्त कोसी बहुद्देश्यीय परियोजना पर एक सरसरी नजर डाल लेना उचित होगा। इस परियोजना पर भारत और नेपाल लंबे समय से विचार-विमर्श करते रहे हैं। परियोजना का मकसद बाढ़ नियंत्रण, सिंचाई, पनबिजली पैदा करना और नौवहन (navigation) बताए गए हैं। प्रस्तावित बांध त्रिवेणी और चतरा के बीच के पहाड़ी इलाके में मौजूद बराहक्षेत्र में बनना है। बांध की संभाव्य (feasibility) रिपोर्ट 1953 में तैयार की गई थी। लेकिन तब ज्यादा लागत के अनुमान की वजह से बांध का निर्माण छोड़ दिया गया। तब इसकी जगह नेपाल के इलाके में बैराज बनाया गया और साथ ही नदी के दोनों किनारों पर तटबंध बनाए गए।

1953 में भयंकर बाढ़ आई थी। उसी से बने माहौल के बीच 1954 में कोसी परियोजना की रूपरेखा बनी। इस परियोजना के तहत ये निर्माण होने थे: 1- भीमनगर में एक बैराज, 2- बैराज के नीचे नदी के दोनों किनारों पर तटबंध, 3- पूर्वी और पश्चिमी दिशाओं में नहर, 4- पूर्वी नहर पर पनबिजली संयंत्र, और 5- बराहक्षेत्र में एक बड़ा बांध। शुरुआत में इस परियोजना का मकसद बाढ़ नियंत्रण और सिंचाई की सुविधाएं देना बताया गया। परियोजना पर काम 1959 में शुरू हुआ और 1963 में बैराज के जरिए नदी की दिशा बदल दी गई। बराहक्षेत्र में प्रस्तावित बांध को छोड़ कर परियोजना के तहत होने वाले बाकी सभी निर्माण या तो पूरे हो चुके हैं या उन पर काम चल रहा है। (राजीव सिन्हा, ईपीडब्लू, 15 नवंबर 2008)

भारत सरकार ने 1981 में बराहक्षेत्र में बांध की संभावना पर फिर से हुए अध्ययन की रिपोर्ट जारी की, जिसमें सुझाव दिया गया कि बांध की ऊंचाई 269 मीटर रखी जाए। 1984 में एक जापानी कंपनी की मदद से फिर से इस परियोजना की पड़ताल की गई, जबकि उसी साल नेपाल सरकार ने कोसी बेसिन मास्टर प्लान बनाया। 1997 नेपाल और भारत सरकार के विशेषज्ञों की एक बैठक के बाद सहमति बनी कि कोसी बांध के बारे में साझा अध्ययन किया जाए। इस सारी चर्चा का सार तत्व यह था कि कोसी पर बांध बनाना ही कोसी नदी की बाढ़ को नियंत्रित करने का कारगर तरीका है, तटबंध सिर्फ इसके फौरी उपाय हैं।

सरकारी चर्चाओं में जब कभी बिहार में बाढ़ रोकने पर चर्चा हुई है, अक्सर बड़े बांध ही उपाय बताए गए हैं। कहा गया है कि मुख्य और उनकी सहायक नदियों के बहाव के पहाड़ी और ऊपरी हिस्सों में बांध बनाए जाने चाहिए। चूंकि बिहार में बहने वाली ज्यादातर नदियां नेपाल से आती हैं, इसलिए बांध नेपाल की जमीन पर ही बन सकते हैं और इसीलिए अक्सर भारत सरकार की चर्चाओं में इस संबंध में नेपाल का सहयोग जरूरी बताया जाता रहा है। यह अनुमान जताया गया है कि कोसी नदी पर बराहक्षेत्र में प्रस्तावित बांध से 42,475 क्यूबिक मीटर प्रति सेकंड तक बहाव वाली बाढ़ के असर को कम किया जा सकेगा। साथ ही बांध गाद को रोक लेगा, जिससे नीचे नदी का बहाव ज्यादा स्थिर हो सकेगा।

लेकिन यह परियोजना तभी हकीकत में बदल सकती है, जब नेपाल सरकार का सहयोग मिले। यानी नेपाल सरकार अपनी धरती पर बांध और उससे जुड़े सभी निर्माण पर राजी हो। जब तक नेपाल में राजंतत्र था, नेपाल की तरफ से भारतीय परियोजनाओं में ज्यादा रुकावट नहीं आती थी। लेकिन अब हालात बदल गए हैं। अगस्त 2008 की बाढ़ के समय जिस तरह कोसी परियोजना का विरोध नेपाली मीडिया में हुआ, उसे देखते हुए यह नहीं लगता कि आगे नदी परियोजनाओं को कार्यरूप देना आसान है। नेपाल की जो भी सरकार इस दिशा में कदम उठाएगी, उसे भारत का पिट्ठू या भारत के आगे घुटना टेकने वाली सरकार बता दिया जाएगा।

बांध और तटबंध हैं उपाय?

वैसे सवाल सिर्फ नेपाल के पहलू का ही नहीं है। उससे बड़ा सवाल यह है कि जिस माध्यम से बाढ़ को नियंत्रित करने का सपना देखा गया है, क्या अब भी उसकी वकालत की जा सकती है। तटबंध के जरिए बिहार को कोसी के कोप से नहीं बचाया जा सका। सरकारें भले अब भी इसी माध्यम पर भरोसा करती हों, लेकिन यह साफ है कि ऐसा वो बांध और तटबंधों से जुड़े जोखिम की अनदेखी करते हुए ही कर रही हैं। उन्होंने बड़े बांध से बनने वाले जलाशय में गाद जमा होने से जुड़े खतरों पर ध्यान नहीं दिया है। भूकम्प की स्थिति में हो सकने वाले विनाश पर भी उन्होंने गौर नहीं किया है। बांधों से जुड़े पर्यावरणीय सवालों पर उन्होंने नहीं सोचा है। भारत में टिहरी और सरदार सरोवर बांधों के सिलसिले में इन सभी मुद्दों और खतरों पर खूब चर्चा हुई है। इस बारे में आज पर्याप्त अध्ययन और जानकारी उपलब्ध है। सवाल यह है कि क्या कोसी या नेपाल से आने वाली किसी दूसरी नदी पर बांध या तटबंध बनाने की योजना बनाते वक्त इन अध्ययनों और जानकारियों की उपेक्षा वाजिब और भावी पीढ़ियों के हित में है?

कोसी परियोजना के तहत बैराज के नीचे नदी के दोनों किनारों पर बनाए गए तटबंधों का मकसद उत्तर बिहार और नेपाल में 2800 वर्ग किलोमीटर इलाके को बाढ़ से बचाना बताया गया था। परियोजना को अपने बाकी उद्देश्यों में कितनी सफलता मिली, इस पर बहस हो सकती है, लेकिन यह तो साफ है कि बाढ़ से बचाव के मकसद में कामयाबी नहीं मिली। तटबंध बनने के बाद भी भयंकर बाढ़ें आती रहीं। तटबंधों में दरार का पड़ना जारी रहा। इसके अलावा पानी निकलने के रास्तों के जाम हो जाने और खेतों में पानी जमा होने जैसे इसके दूसरे दुष्प्रभाव भी सामने आए। नदी का तल पहले से ऊंचा हो गया और नदी के पानी के साथ उपजाऊ मिट्टी के कम आने की वजह से खेतों में पैदावार भी घटी। कहने का तात्पर्य यह है कि तटबंधों से बाढ़ की समस्या का हल नहीं निकला, बल्कि इनकी वजह से कई दूसरी समस्याएं सामने आ गईं।

अगर कोसी परियोजना के पूरे इतिहास को ध्यान में रखें, खासकर तटबंधों में बार-बार हुई टूट को तो यह नहीं लगता कि 18 अगस्त 2008 को कुसहा तटबंध में पडी़ दरार कोई अनोखी घटना थी। तटबंध टूटने के बाद 80 से 85 फीसदी पानी नदी के सामान्य रास्ते से अलग पूर्वी दिशा में बह निकला। ज्यादा पानी आने से नदी की चौड़ाई बढ़ती गई। एक हफ्ते बाद यह चौड़ाई 22 किलोमीटर थी और बाद के हफ्तों में यह 35 किलोमीटर तक हो गई। जैसाकि हमने पहले भी कहा है कि कुसहा में तटबंध का टूटना उसके पहले नदी के दोनों तरफ तटबंधों में पड़ी दरारों से दो मायने में अलग था। पहला यह कि 200 साल के रुझान से उलट इस बार नदी ने पूरब की तरफ चल पड़ी और दूसरा यह कि इसने 120 किलोमीटर दिशा बदली, जो एक रिकॉर्ड है।

क्या इसकी वजह यह थी कि नदी के कुदरती प्रवाह में इंसान के दखल की इंतहा गई है? नदी का पूरब की तरफ जाना, और वह भी 120 किलोमीटर बदलाव के साथ- यह इस बात का संकेत हो सकता है कि नदी के पश्चिम की तरफ जाने की गुंजाइश खत्म हो  चुकी होगी। ज्यादातर जानकार इस बात से सहमत हैं कि तटबंधों में कोसी को बांधने से स्थिति और बदतर हुई। इससे नदी के बहाव में बदलाव आया। बैराज के नीचे के कई इलाकों से पहले नदी के तल के ऊंचा होते जाने की खबरें मिलती रही थीं। इससे निकली नहरों और पानी बहने के दूसरे रास्तों में गाद के जमा होने के निशान पहले ही दिख रहे थे। बैराज के ऊपर के इलाकों में भी ऐसा होने के निशान दिखते रहे हैं।

कोसी में बाढ़ पहले भी आती थी, लेकिन उपरोक्त तथ्यों की रोशनी में यह जरूर कहा जा सकता है कि 2008 में आई बाढ़ के पीछे इंसानी हस्तक्षेप भी एक वजह थी। इस बाढ़ ने हमें बताया कि बाढ़ नियंत्रण के जो तरीके हम सोच और अपना रहे हैं, वो पुराने प़ड़ चुके हैं। अब वह समय आ गया है, जब इन तरीकों पर पुनर्विचार किया जाए और नए तरीके सोचे जाएं।

बिहार और बाढ़

बाढ़ बिहार की एक बड़ी समस्या है। बिहार की गरीबी की एक वजह हर साल बाढ़ से होने वाली तबाही भी मानी जाती है। उत्तर बिहार का बड़ा इलाका हर साल पानी में डूबता है, लेकिन हर साल यह बाढ़ उतनी बड़ी खबर नहीं बनती। दिनेश मिश्र जैसे विशेषज्ञों का कहना है कि 2008 में कोसी की बाढ़ इसलिए उतनी बड़ी खबर बन पाई, क्योंकि एक तो नेपाल का पहलू उससे जुड़ा होने की वजह से यह एक अंतरराष्ट्रीय मसला बन गया, और दूसरे लोकसभा चुनाव करीब होने की वजह से राजनीतिक दलों को इसमें सियासी मुद्दा मिलने की संभावना नजर आई।

जानकारों की राय है कि बिहार की समस्या सिर्फ कोसी नहीं है। अगर बिहार को राहत मिलनी है तो यह तभी मिलेगी, जब उत्तर बिहार में बाढ़ से निपटने की एक संपूर्ण रणनीति बनाई जाए। उत्तर बिहार का इलाका भारत-नेपाल सीमा के मध्य पूर्वी हिस्से, पश्चिम में घाघरा नदी और पूरब में महानंदा नदी के बीच में बसा है। यह इलाका कई बड़ी नदियों का जल ग्रहण क्षेत्र है। ये नदिया हैं- घाघरा, बूढ़ी गंडक, बागमती, अधवरा समूह की नदियां, कमला बलान, कोसी और महानंदा। यह इलाका तकरीबन 56 लाख हेक्टेयर में फैला है और विशाल गांगेय क्षेत्र का हिस्सा है। इलाके की नदियां आगे चल कर गंगा में मिल जाती हैं। इमें से अधिकांश नदियां हिमालय से निकलती हैं और नेपाल में बहते हुए उत्तर बिहार पहुंचती हैं। बिहार में अक्सर ये नदियां, खासकर बरसात में धारा बदलती रहती हैं। इनका प्रबंधन आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।

बरसात में मैदानी और हिमालय के पहाड़ी इलाकों के जल ग्रहण क्षेत्रों में जोरदार बारिश होने पर इन नदियों का पानी बढ़ने लगता है। अगर बंगाल की खाड़ी में हवा का दबाव बनता है, तो उसके असर होने वाली बारिश का असर भी इन नदियों के जल स्तर पर पड़ता है। पानी बढ़ने के साथ बाढ़ की हालत बन जाती है और तटबंधों के टूटने की खबर आने लगती है। नतीजा बड़े इलाके के डूब जाने के रूप में सामने आता है। इस आपदा से लाखों लोग बेघर हो जाते हैं, फसलें तबाह हो जाती हैं, और बड़ी संख्या में पशु मारे जाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक उत्तर बिहार की ये नदियां हर साल 217 क्यूबिक मीटर पानी, जिसमें 43 करोड़ टन गाद होती है, गंगा में पहुंचाती हैं। गंगा नदी से जो पानी और गाद फरक्का तक पहुंचती है, इनमें इन नदियों से आए पानी का हिस्सा 47 फीसदी और गाद का हिस्सा 59 प्रतिशत होता है।

यहां यह गौरतलब है कि ये नदियां ताजा जल का बहुमूल्य स्रोत हैं। जल स्रोतों के बारे में संयुक्त राष्ट्र के अध्ययन से दुनिया भर में जब चिंता की लकीरें गहरी हो गई हैं, तब इन नदियों के बारे में गंभीरता से सोचने की जरूरत और शिद्दत से महसूस की जा रही है। संयुक्त राष्ट्र के इस अध्ययन के मुताबिक आने वाले वर्षों में पीने और औद्योगिक उपयोग के लिए ताजा जल की भारी कमी हो जाएगी। बिगड़ते पर्यावरण और बढ़ती आबादी की वजह से यह समस्या लगातार गंभीर हो रही है। एक अनुमान के मुताबिक धरती पर कुल जितना पानी मौजूद है, उसका सिर्फ 0.014 फीसदी ही ताजा जल के स्रोतों से आता है। उत्तरी बिहार की नदियां अनुमानतः 4 खरब 12 अरब क्यूबिक मीटर पानी उपलब्ध कराने में सक्षम हैं। इसलिए यह जरूरी है कि इस जल संसाधान के सरंक्षण और इसके सही उपयोग की वाजिब नीतियां बनाई जाएं, ताकि वर्तमान एवं भावी पीढ़ियों के हित सुरक्षित हो सकें।  (तथ्य एमबी वर्मा के आलेख से)

बहरहाल, यही नदियां बरसात के मौसम कहर बन जाती हैं। उत्तर बिहार हर साल बाढ़ से प्रभावित होने वाला इलाका है। गौरतलब है कि भारत दुनिया में बाढ़ से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में है। दुनिया भर में बाढ़ से जितनी मौते होती हैं, उसका पांचवां हिस्सा भारत में होता है। तकरीबन 4 करोड़ हेक्टेयर इलाका यानी भारत की कुल भूमि का आठवां हिस्सा ऐसा है, जहां बाढ़ आने का अंदेशा रहता है। दुनिया में जो इलाके बाढ़ से सबसे बुरी तरह प्रभावित होते हैं, उनमें गंगा के मैदानी इलाके भी हैं। बाढ़ इन इलाकों के बाशिंदों के लिए लगभग हर साल दुख और विनाश की कथा लिख जाती है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक पिछले पांच दशकों में भारत में बाढ़ नियंत्रण पर 27 खरब रुपए  खर्च किए गए, लेकिन इस दौरान बाढ़ से हर साल होने वाली क्षति 40 गुना बढ़ गई।  इसी अवधि में हर साल बाढ़ से प्रभावित होने वाले इलाकों में 1.5 फीसदी का इजाफा हुआ।  (जियोग्रैफी एंड यू, जुलाई-अगस्त 2008)

जानकारों के मुताबिक बाढ़ का आना एक कुदरती परिघटना है, जिसका नदी के प्राकृतिक रूप को बचाए रखने में अहम योगदान है। एक खास अंतराल पर नदी में ज्यादा पानी आएगा, यह बात हमें मान कर चलना चाहिए। बाढ़ दरअसल नदी के बनने और इसके कायम रहने की प्रक्रिया का हिस्सा है। बाढ़ खतरनाक इसलिए हो जाती है क्योंकि लोग उन इलाकों में रहने लगते हैं, जहां तक एक खास मौसम और स्थिति में नदी का पानी पहुंचता है। इन्हीं लोगों को बचाने के लिए बाढ़ नियंत्रण के उपाय अपनाए जाते हैं। लेकिन यह तो तय है कि बाढ़ नियंत्रण के उपाय प्रकृति में इंसान का हस्तक्षेप है।

यह भी एक तथ्य है कि पिछले तीन दशकों में भारत में सबसे ज्यादा बाढ़ उत्तर बिहार के मैदानी इलाकों में ही आई है। इसका मतलब यह हुआ कि वहां बाढ़ नियंत्रण के उपाय या तो कारगर नहीं हुए या थोड़े समय के लिए कारगर होने के बाद नाकाम हो गए। ऐसे में उत्तर बिहार और असल में पूरे देश के अनुभव के आधार पर यह जरूर स्वीकार कर लिया जाना चाहिए कि बाढ़ नियंत्रण की दोषमुक्त या संपूर्ण व्यवस्था करना लगभग असंभव है। बाढ़ को संभालने के जो भी कार्यक्रम बनाए जाएं, यह बात जरूर ध्यान में रखी जानी चाहिए कि इनसे लोगों में सुरक्षा का झूठा भरोसा भरने की कोशिश ना हो।

जानकारों का सुझाव है कि बाढ़ नियंत्रण के कार्यक्रम बनाते वक्त इन बातों पर जरूर गौर किया जाना चाहिए: 1- बाढ़ नियंत्रण कार्यक्रम स्थानीय स्थितियों के मुताबिक हो, 2- इस पर जितनी लागत आए उसकी तुलना में उससे लाभ ज्यादा हो, और 3- बाढ़ नियंत्रण के प्रतिकूल प्रभावों से बचा जाए। बाढ़ नियंत्रण के प्रतिकूल प्रभावों से मतलब वैसे असर से है, जो इन कार्यक्रमों के वजह से देखने को मिलता है। मसलन, नदी के रास्ते में बदलाव, किसी इलाके में पानी जमा होना, और बाढ़ की आशंका वाले इलाकों में बढ़ोतरी।

अगर उत्तर बिहार पर गौर करें तो वहां बाढ़ नियंत्रण के लिए तटबंधों पर सबसे ज्यादा भरोसा किया गया है। उत्तर बिहार में तटबंधों की लंबाई 3,400 किलोमीटर से ज्यादा है। इनमें से ज्यादातर तटबंध 1954 की भयंकर बाढ़ के बाद बनाए गए। इस तटबंधों की मौजूदगी के बावजूद उत्तर बिहार में बाढ़ आती रही है- कभी नदी में तटबंधों की ऊंचाई से ज्यादा पानी भर जाने की वजह से तो कभी तटबंधों में दरार पड़ जाने की वजह से।

बागमती नदी बेसिन में बाढ़ नियंत्रण के उपाय 1942 में शुरू हुए। तब से 466 किलोमीटर से ज्यादा तटबंध बनाए गए हैं। शुरुआत में नदी के निचले इलाके (डाउनस्ट्रीम) में तटबंध कारगर रहे। लेकिन जब ऊपरी इलाके (अपस्ट्रीम) में तटबंध बनाए गए तो निचले इलाकों में बाढ़ आने की घटनाएं बढ़ गईं और तटबंधों में भी बार-बार दरार पड़ने लगी। इस रूप में कहा जा सकता है कि तटबंधों ने सिर्फ इस समस्या से प्रभावित होने की जगह बदल दी है। तटबंध नदी के कुदरती प्रवाह में हस्तक्षेप करते हैं। इनकी वजह से जो इलाके बाढ़ से बच भी जाते हैं, वहां पानी और गाद जमा होने जैसी दूसरी मुश्किलें पेश आने लगती हैं। असल में तटबंधों से बाढ़ रोकने की रणनीति पर अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सवाल उठाए जा रहे हैं। अमेरिका और चीन में भी तटबंध बाढ़ से राहत दिलाने में नाकाम रहे।  (जियोग्रैफी एंड यू, जुलाई-अगस्त 2008)

तो आखिर इन अनुभवों से क्या सीख ली जाए? जानकारों का कहना है कि सबसे पहले हमें अपना नजरिया बदलने की जरूरत है। हमें नदी ‘नदी के नियंत्रण’ की रणनीति छोड़नी चाहिए और ‘नदी प्रबंधन’ के तरीकों पर सोचना चाहिए। हमें नदी बेसिन प्रबंधन की योजना बनाने पर विचार करना चाहिए। इसके लिए यह समझना जरूरी है कि नदी के बनने और सदियों से उसके कायम रहने की प्रक्रियाएं क्या रही हैं, जल संचय कैसे होता है और कैसे नदी में आने वाले अतिरिक्त पानी का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है। दुनिया भर में अब बाढ़ प्रबंधन के बारे में विचार करते हुए इस पर सोचा जा रहा है कि क्या आने वाले अतिरिक्त पानी का छोटी सिंचाई योजनाओं में उपयोग संभव है और अगर ऐसा है तो इसके लिए क्या उपाय करने होंगे।

जानकारों के मुताबिक बाढ़ से विनाश को रोकने के लिए यह जरूरी है कि नदी बेसिन में, जहां बाढ़ आने का खतरा रहता है, उनके बेहतर नक्शे तैयार किए जाएं और बाढ़ आ जाने के बाद निर्णय लेने की प्रक्रिया को सुगम और सक्षम बनाया जाए। परंपरागत रूप से ऐसे नक्शे जमीनी सर्वे और हवाई सर्वेक्षण के आधार पर तैयार किए जाते हैं। लेकिन  अब इन्हें पुराना तरीका माना जाता है। उनके मुताबिक इन तरीकों से नक्शा बनाने में जरूरत से ज्यादा समय लगता है और यह महंगा भी पड़ता है। साथ ही सही वक्त पर हवाई सर्वेक्षण संभव नहीं हो पाता, क्योंकि मौसम के मिजाज का पहले से अंदाजा लगा पाना मुश्किल होता है।

विशेषज्ञों की राय है कि अगर भौगोलिक सूचना प्रणाली (जी आई एस), रिमोट सेसिंग इमेजेज, जनसंख्या संबंधी आंकड़े और संबंधित जगहों के नक्शों का इस्तेमाल कर बाढ़ के खतरे वाले क्षेत्रों का नक्शा बनाया जाए, तो बाढ़ के प्रबंधन में वह ज्यादा सहायक होगा। साथ ही इसमें अब नदियों के जल ग्रहण क्षेत्रों में जंगल की कटाई, बारिश के इतिहास, तटबंध टूटने की घटनाओं के इतिहास आदि के पूरे आंकड़ों के इस्तेमाल पर भी जोर दिया जाता है।

अगर हाल के अनुभव देखे जाएं तो कहा जा सकता है कि भारत में सरकारें अभी ऐसी किसी पहल के प्रति जागरूक नहीं हैं। पर्यावरण में आते बदलाव से नदी का व्यवहार बदल सकता है, या तटबंध बनाने जैसे जो उपाय किए हैं, वो कभी धोखा दे सकते हैं, इन बातों का अहसास सरकारी हलकों में नजर नहीं आता। इसलिए पहले से कोई एहतियात नहीं बरती जाती। अगस्त 2008 में जब कोसी में बाढ़ आई तो ऐसे इलाके भी डूब गए, जहां काफी समय से बाढ़ का पानी नहीं पहुंचा था। अचानक आई बाढ़ से वहां के लोग सकते में रह गए। उनके पास न तो बचाव का कोई उपाय था, और ऐसी परिस्थिति से निपटने की कोई तैयारी थी। उन लाखों लोगों ने इसे तकदीर की मार समझ कर संतोष कर लिया।

लेकिन असल में यह सरकारी लापरवाही थी। इससे यह साफ हुआ कि बड़े बांध और तटबंधों को बनाने के लिए विज्ञान और आधुनिक आविष्कारों की दलील देने वाली सरकारें बाढ़ का पूर्व अनुमान लगाने और पी़ड़ितों के बचाव के लिए कुशल व्यवस्था करने की कोई तैयारी नहीं करतीं। इन मामलों में वे सब कुछ कुदरत पर छोड़ देती हैं। कुदरत से छेड़छाड़ कर वो उसका कोप भुगतने के लिए आम लोगों को असहाय छोड़ देती हैं। यही उत्तर बिहार में दशकों से हो रहा है। कोसी की बाढ़ से शोर खूब मचा। लेकिन इन हालात में कोई बदलाव होगा, ऐसी कोई उम्मीद नहीं दिखती।

आखिर बिहार की पूर्व सरकारों और राजनीतिक दलों ने पहले भी कोई सबक नहीं सीखा था। इसीलिए बिहार गरीबी और दुर्दशा का पर्याय बना हुआ है। इसके पीछे प्राकृतिक आपदाओं, खासकर बाढ़ की बड़ी भूमिका रही है। कुछ अनुमानों के मुताबिक राज्य की एक तिहाई आबादी राज्य के बाहर जाकर रोजी-रोटी कमाती है। मजबूरी में होने वाले इस पलायन की पीड़ा को समझने की कभी कोशिश नहीं की गई। अपनी जमीन से उखड़ कर जाना, अपने प्रिय लोगों से बिछोह, अपनी संस्कृति और माहौल से कट कर दूसरी जगह पर जीने की विवशता- बिहार के लाखों लोगों की कहानी है। आखिर इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या राजनीतिक दल इस बात से इनकार कर सकते हैं कि यह उनके आपराधिक कुशासन और कुप्रबंधन का परिणाम है?

इस मुद्दे और प्राकृतिक आपदा से जुड़े इस पहलू पर गंभीरता से विचार-विमर्श की जरूरत है। बिहार में दशकों से सक्रिय रहे सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता इस तरफ सरकारों का ध्यान खींचने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन सत्ताधारी और विपक्षी दलों के लिए यह सवाल आरोप-प्रत्यारोप का एक विषय होने से ज्यादा कुछ नहीं रहा है। सत्ता में चाहे कोई रहे, इससे हालात नहीं बदलते। जब ये कार्यकर्ता पटना में बाढ़ और भूख पर संवाद के लिए इकट्ठे हुए तो बिहार की विकट स्थिति कुछ ज्यादा साफ हुई। यहां हम उस संवाद के कुछ अंश प्रस्तुत कर रहे हैं-

रघुपति (सामाजिक कार्यकर्ता) - उत्तर बिहार में भूख की स्थिति बाढ़ और दक्षिण बिहार में सूखे से जुड़ी हुई है। लेकिन इस सवाल पर बिहार में सभी चुप हैं। अगर आप पिछले पांच साल में विधानसभा में हुई चर्चाओं को देखें तो पाएंगे कि भूखमरी के सवाल पर न तो कोई चर्चा हुई है, और ना ही कोई सवाल उठाया गया है। राजनीति, खासकर चुनावी राजनीति में भूखमरी कोई मुद्दा नहीं है।

पिछले साल (2008 में) वैशाली जिले वान्थु, गोरइया और परवारी गांव के बारे में एक अखबार ने खबर छापी कि दो मुसहर भाई भूख के कारण मर गए। जब हम लोगों ने ‘वादा ना तोड़ो’ की तरफ से वहां सर्वेक्षण किया तो महसूस किया कि वहां हालात इतनी खराब है कि एक क्या सभी लोग भूखमरी का शिकार हो सकते हैं।

लोग वहां आलू की जड़ और उसकी गुठली को निकाल कर खाने को मजबूर थे। जब वो लोग आलू की जड़ को उबाल रहे थे तब इतनी ज्यादा बदबू आ रही थी कि उसके सामने खड़ा रहना भी कठिन था।

हमें लगता है कि भुखमरी का एक कारण बाढ़ है, लेकिन बाढ़ न आने की स्थिति में भी भुखमरी होती है। यानी इसके कुछ दूसरे कारण भी हैं। लेकिन राजनीतिक दल इस मुद्दे पर असंवेदनशील हैं।

 मेरे विचार से भूख की समस्या को आज की राजनीति के केंद्र में लाना चाहिए। बाढ़ से उत्पन्न भुखमरी की स्थिति को भी राजनीति में लाना चाहिए। अगर संसदीय राजनीति में भूख की समस्या का हल नहीं हो सकता तो आखिर यह समस्या कैसे हल हो सकती है, इस पर चर्चा होनी चाहिए।

शिवप्रकाश राय (सामाजिक कार्यकर्ता)- भुखमरी का कारण केवल बाढ़ ही नहीं है, बल्कि सूखा पड़ने पर भी भुखमरी होती है। इसका सबसे बड़ा कारण दरअसल भ्रष्टाचार है। अगर किसी इलाके में बाढ़ आ जाए तो सरकार और दूसरे स्रोतों से मदद पहुंचाई जाती है, लेकिन वह जरूरतमंदों तक नहीं पहुंच पाती। नदियों के पानी को रोकने के लिए पैसे तो मिलते हैं, लेकिन पदाधिकारी उससे जरूरी काम नहीं कराते, खुद खा जाते हैं। जब तक ऐसा होता रहेगा, भुखमरी बनी रहेगी।

राम इकबाल ठाकुर, (सामाजिक कार्यकर्ता)- बागमती नदी पर तटबंध बनाने के लिए जो इंजीनियर निरीक्षण के लिए आए थे, उन्होंने रिपोर्ट दी थी कि बागमती नदी पर तटबंध नहीं बनाया जा सकता। लेकिन बागमती पर तटबंध बनाया गया। सबसे पहले स्थानीय नेताओं ने अपने लोगों को ठेके दिलवाए, फिर कमीशन लिया। जब इस तरह के काम होते हैं, तो भ्रष्टाचार शुरू हो जाता है। नेता बीडीओ और कलेक्टर से कमीशन लेते हैं, यहां तक कि उन्होंने इंदिरा आवास योजना में भी कमीशन लिया।

सरकारी अधिकारियों और नेताओं के बीच एक बिचौलिया तबका तैयार हो गया है। बाढ़ इन सबके लिए एक उद्योग है। यह उद्योग चलता रहे इसके लिए वो हमेश किसी न किसी समस्या को जन्म देते रहते हैं। बागमती का बांध टूटने से जगह-जगह गड्ढे बन गए, दूर-दूर तक रेत फैल गई, लेकिन इसकी जांच के लिए कोई टीम नहीं आई। ऐसे मामलों में कोई पहल ना होने से लोग खेती बाड़ी छोड़ कर दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं। इस तरह बाढ़ और भुखमरी एक दूसरे से जुड़े हुए हैँ।

राजकुमार (सुपौल)- कुसहा तटबंध टूटने से मानव निर्मित बाढ़ आई। मैंने खुद देखा कि तलाठी गांव के रामदीन शर्मा के पास भोजन का अभाव था। वह बाहर रह रहा था, लेकिन सरकारी लाभ लेने के लिए वापस आ गया। लेकिन गांव आकर उसे पता चला कि यहां इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं है। खाना न मिलने से वह व्यक्ति बुखार से पीड़ित हुआ, फिर उसकी मौत हो गई। सरकारी रिपोर्ट में कहा गया कि उसकी मौत बीमारी से हुई है, जबकि मौत की असली वजह भूख थी।

अरुण कुमार (कटिहार)- तटबंध बने या नहीं, इस पर आज भी चर्चा जारी है। बिहार और देश के लगभग 99 फीसदी बाढ़ विशेषज्ञों की रोजी-रोटी इसी मुद्दे से चल रही है। मेरी राय में सरकार से ज्यादा ये लोग बाढ़ के लिए जिम्मेदार हैं। बाढ़ के मुद्दे पर काम करने वाले जन संगठनों, आंदोलनकारियों से पूछ लिया जाए, उसका अध्ययन किया जाए तो आपको पता चलेगा कि सरकार द्वारा की गई गलतियों के लिए भी यही विशेषज्ञ जिम्मेदार हैं। इन लोगों ने बाढ़ जैसे सवाल पर बहस से आम जनता को कभी नहीं जोड़ा। बहस जितनी तकनीकी होगी, आम आदमी उससे उतना कटा रहेगा। असली सामाजिक कार्यकर्ता उससे कटे रहेंगे।

सामाजिक कार्यकर्ताओं की यह राय बाढ़ और उसके प्रबंधन से जुड़े कई पहलुओं की तरफ इशारा करती है। इससे यह उभर कर सामने आता है कि बाढ़ सिर्फ एक समस्या नहीं है, बल्कि यह भुखमरी जैसी घोर समस्या की एक वजह भी है। इससे दूसरी बात यह उभर कर सामने आती है कि बाढ़ महज एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि यह एक राजनीतिक सवाल है। जब तक इस सवाल को मुख्यधारा राजनीति के केंद्र में नहीं लाया जाएगा, बाढ़ प्रबंधन की जन पक्षीय नीतियां नहीं बन पाएंगी। तीसरी बात यह है कि बाढ़ से संबंधित बहस महज तकनीकी नहीं है, बल्कि इसके मानवीय और जन साधारण से जुड़े सवाल भी संबंधित हैं। बाढ़ प्रबंधन के वो तरीके शायद अपना मकसद हासिल नहीं कर सकें, जिन्हें अपनाने से पहले जनता की राय नहीं ली गई हो। इसलिए यह अब बेहद जरूरी हो गया है कि बाढ़ नियंत्रण एवं प्रबंधन के बारे में एक समग्र नजरिया अपनाया जाए, जिसमें सरकार, वैज्ञानिक और तकनीकी लोगों के साथ-साथ आम जन के ख्यालात भी अहमियत रखते हों।

सामाजिक कार्यकर्ताओं और पीड़ित लोगों के संवाद से यह बात भी साफ होती है कि राजनीतिक दल लोगों की दुर्दशा के लिए सीधे जिम्मेदार हैं। उनके निहित स्वार्थ और गलत फैसलो का नतीजा आम लोगों को भुगतना पड़ता है। राज्य और केंद्र- दोनों ही सरकारों के कर्ताधर्ताओं से अब सीधा सवाल है कि बाढ़ से बचाव के लिए उन्हें तटबंध के अलावा कोई और उपाय क्यों नहीं सूझता? कोसी की बाढ़ के बाद राजनीतिक नेताओं ने भोलेपन का मुखौटा पहनते हुए दलील दी कि जब नदी ने अपनी दिशा ही बदल ली तो प्रशासन क्या कर सकता था? लेकिन उन्होंने यह बताने की जरूरत नहीं समझी कि जब नदी की धारा को नियंत्रित करने के लिए तटबंध बनाए गए थे, तो उसके बावजूद नदी की दिशा कैसे बदल गई?

सच्चाई यह है कि तटबंधों के रखरखाव, उनकी ऊंचाई बढा़ने, उन्हें मजबूत करने और नए तटबंध बनाने के नाम पर लगभग हर साल बड़े पैमाने पर सरकारी पैसा आता है, जिसका फायदा राजनीतिक दलों से जुड़े ठेकेदार और दलाल उठाते हैं। ये ठेकेदार और दलाल चुनाव के वक्त पर नेताओं के काम आते हैं। इसलिए नेता चाहे किसी पार्टी का हो, वह ठेकेदारों और दलालों के हितों पर चोट करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। संभवतः इसी वजह से नेता बाढ़ रोकने की अब तक अपनाई गई नीति पर उठाए जाने वाले हर सवाल को नजरअंदाज कर देते हैं।

यहां तक कि इस बारे में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की टिप्पणियों की भी अनदेखी कर दी गई। आयोग ने मार्च 2003 में केंद्र सरकार को सौंपी अपनी रिपोर्ट में ध्यान दिलाया था कि तटबंधों की उपयोगिता का कोई व्यवस्थित अध्ययन नहीं किया गया है। सामाजिक कार्यकर्ताओं की यह पुरानी शिकायत रही है। उनकी मान्यता है कि कभी अपने समाज की सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के मुताबिक बाढ़ रोकने के उपायों की प्रभावशीलता का सर्वे नहीं किया गया। ना ही कभी आम लोगों को इस प्रक्रिया से जोड़ने की कोशिश की गई। जबकि 2004 में बाढ़ प्रबंधन एवं भू-क्षरण नियंत्रण के बारे में प्रधानमंत्री के टास्क फोर्स ने तटबंधों के रखरखाव में सामुदायिक भागीदारी को बढ़ावा देने की सिफारिश की थी।

जनता से कट कर और निहित स्वार्थों के असर में बनाई जाने वाली नीतियों का ही यह परिणाम है कि तटबंधों के दुष्परिणाम जग-जाहिर हो जाने के बावजूद सरकारी स्तर पर इन पर आज भी कोई सवाल नहीं उठाया गया है। हकीकत यह है कि सरकारी स्तर पर तटबंधों को लेकर जो विचार 1950 के दशक में मौजूद थे, वे ही आज तक प्रचलित हैं। तब माना जाता था कि तटबंधों और ऊंचे बांधों के जरिए बाढ़ को रोका जा सकता है। वह आधुनिक तकनीक और बड़े निर्माणों पर आधारित विकास नीति में पूरे भरोसे का दौर था।

लेकिन 1980 का दशक आते-आते विशेषज्ञ इस नीति पर सवाल उठाने लगे थे। उत्तर बिहार के संदर्भ में उन्होंने ध्यान दिलाया कि वहां बाढ़ रोकने के लिए हिमालय से निकलने वाली नदियों पर बांध को उपाय माना गया, जिसके तहत बड़े जलाशय बना कर नीचे ज्यादा पानी उतरने से रोकने की बात सोची गई। लेकिन विशेषज्ञों ने कहा कि उस इलाके की भूगर्भीय और भूकंपीय स्थितियों की वजह से ये बांध बड़ा खतरा पैदा कर सकते हैं। फिर संकरी घाटी की वजह से विशाल जलाशय बनाना शायद संभव भी नहीं है और नदियों में आने वाली गाद जलाशयों के दीर्घकालिक और आर्थिक फायदे को और सीमित कर देती हैं।

लेकिन इन सब बातों का सरकारों की सोच पर कोई असर नहीं हुआ। 2007 में बिहार सरकार ने बाढ़ नियंत्रण योजना के लिए केंद्र सरकार से 17 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा की विशेष सहायता मांगी। कहा गया कि यह रकम तटबंधों और नदियों से गाद निकालने पर खर्च किया जाएगा। उधर केंद्र में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार अपने कार्यकाल में विभिन्न नदियों को जोड़ कर बाढ़ और सूखे का हल निकालने की योजना लेकर आई थी। इस योजना में बिहार की भी कई नदियों को शामिल किया जाना था।

विशेषज्ञों ने ध्यान दिलाया कि अगर नदियों को जोड़ने की योजना लागू की गई तो इससे पर्यावरण को अपूरणीय क्षति पहुंचेगी। नदियों को जोड़ने की योजना इस सोच पर आधारित थी कि बाढ़ नदियों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र में ज्यादा बारिश से आती है। ऐसे में ज्यादा पानी को बड़े बांधों के जरिए रोक कर उसे उन इलाकों में पहुंचाया जा सकता है, जहां पानी की कमी है। साथ ही इकट्ठा पानी से बिजली भी पैदा की जा सकेगी।

इस योजना ने बस यही साबित किया कि हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने अतीत की भूलों से कुछ नहीं सीखा है। उसे न तो बड़ी परियोजनाओं से होने वाले विस्थापन और विस्थापितों की पीड़ा से कोई हमदर्दी है, और ना ही इन परियोजनाओं से पर्यावरण को पहुंचने वाले स्थायी नुकसान की कोई चिंता है। कई जानकारों ने ध्यान दिलाया था कि नदियों के कुदरती रूप को बदलने और कृत्रिम नदियों या नहरों का जाल बिछाने की योजना सारा प्राकृतिक संतुलन बिगाड़ देगी, जिसके परिणामस्वरूप में प्रकृति का अनसूना कोप आने वाली पीढ़ियों को झेलना पड़ सकता है। लेकिन अक्सर ऐसी समझ का उन लोगों में अभाव होता है, जिनकी निगाह सिर्फ स्वार्थ और फौरी फायदे पर होती है।

केंद्रीय जल संसाधन मंत्रालय के तहत काम करने वाले केंद्रीय जल आयोग का दावा है कि देश में बाढ़ के खतरे वाले कुल इलाके में तीन चौधाई से भी ज्यादा को बाढ़ से बचाने के इंतजाम आज मौजूद हैं। इसके बावजूद हर साल बाढ़ से तबाही होती है। जाहिर है, किसी भी बाढ़ प्रभावित इलाके में जाकर ऐसे दावों की असलियत आसानी से देखी जाती है। फिर भी ऐसे इंतजामों पर जनता का धन खर्च करने या कहें बर्बाद करने का सिलसिला जारी है। इस संबंध में जवाबदेही तय करने की कोई कोशिश कहीं होती नजर नहीं आती।

सरकारें बाढ़ जैसी आपदाओं को लेकर कितनी गंभीर हैं, इसकी पोल इससे भी खुल जाती है कि खुद सरकारी आयोगों, कमेटियों और टास्क फोर्सों ने जो सिफारिशें की हैं, उन पर कभी ठीक से अमल नहीं किया गया। खुद केंद्रीय जल आयोग ने 2005-06 की अपनी सालाना रिपोर्ट में कहा था कि विभिन्न आयोगों, कमेटियों और टास्क फोर्सों की सिफारिशों पर अमल की दिशा में ज्यादा प्रगति नहीं हुई है। यानी सरकार पुराने अनुभव से सीख लेने को तो तैयार नहीं ही है, वह पुराने ढांचे में सुझाए जाने वाले उपायों को लेकर भी गंभीर नहीं है। इसीलिए सभी बाढ़ प्रभावित इलाकों के लोग मानव निर्मित संकट को भुगतने के लिए मजबूर हैं।

कैसे मिले राहत?

तटबंधों के जरिए बाढ़ रोकने को कोशिश चूंकि दुनिया भर में नाकाम हो चुकी है, इसलिए अब इसके वैकल्पिक तरीके विकसित करने के प्रयास हो रहे हैं। बांग्लादेश में छोटी सिंचाई योजनाओं के जरिए हुई ऐसी कोशिश को काफी सफल बताया जा रहा है। गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग ने उत्तर बिहार के बागमती बेसिन के सिलसिले में ऐसे कुछ उपाय सुझाए हैं। इनमें नदी के ऊपरी बहाव इलाके में मौजूद बेलवा गांव में छोटा बांध बनाना शामिल है। साथ ही जल मार्ग में सुधार, वाटरशेड मैनेजमेंट, भूमिगत जलाशय बनाने जैसे उपायों के भी सुझाव दिए गए हैं। बहरहाल, ये सारे उपाय अभी विचार के स्तर पर ही हैं, और इनसे निकट भविष्य में लोगों को राहत मिलने की आशा नहीं की जा सकती। इसलिए जानकारों के मुताबिक कुछ फौरी उपाय जरूर किए जाने चाहिए। उनके मुताबिक-

1- गाद नदियों की एक बड़ी समस्या बन गई है। ज्यादातर गाद अपस्ट्रीम बेसिन इलाके से आती है। इसकी वजह से नदी का जल मार्ग भरने लगता है और नदी में पानी इकट्ठा होने की क्षमता घट जाती है। जाहिर है, गाद बाढ़ की एक बड़ी वजह है। जानकारों का कहना है कि अगर नदी बेसिन इलाके में पेड़ लगा कर वाटरशेट मैनेजमेंट किया जाए तो नदी में गाद जमा होने की प्रक्रिया घट सकती है, जिससे अंततः बाढ़ का खतरा घटेगा।
2- अब सहायक नदियों के द्वार पर तथा नदी बेसिन इलाके में छोटे जलाशय और चेक डैम बनाने को बाढ़ रोकने का प्रभावी उपाय माना जा रहा है। इससे सहायक नदियों से आने वाले पानी को नियंत्रित किया जा सकता है, जिससे मुख्य नदी में बाढ़ आने का खतरा घटेगा। चेक डैम छोटे आकार के होते हैं, इसलिए इनसे पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचता, साथ ही इन पर लागत भी कम आती है।
3- सुझाए जा रहे कुछ अन्य उपाय इस प्रकार हैं- अतिरिक्त पानी को नहरों से दूसरी जगहों तक पहुंचाना, नदी के अपस्ट्रीम में जलाशय बनाना, नदी बेसिन इलाके में पानी जमा कर रखने के उपाय करना, कृत्रिम रूप से जमीन से नीचे के पानी को निकालना ताकि बाढ़ से आने वाले पानी को जमीन सोख ले, वगैरह।

ये दूरगामी वैकल्पिक उपाय हैं। इन पर सहमति बनाने और इन्हें अमली जामा पहनाने में अभी वक्त लगेगा। फिलहाल यह जरूरी है कि बन चुके तटबंधों का उचित रखरखाव हो और उनकी लगातार निगरानी की जाए। अगर इनमें कहीं दरार पड़ती है और उसे भरने के फौरी उपाय नहीं किए जाते हैं तो उसके लिए कौन जवाबदेह होगा, यह पहले से तय किया जाए। कुसहा की घटना से अगर फौरी सीख भी नहीं ली गई तो फिर लोगों को बाढ़ जैसी आपदाओं से बचाने की बात सोचना भी शायद मुश्किल है।

इस संदर्भ में यह गौरतलब है कि बाढ़ को परंपरागत रूप से ज्यादा बारिश से जोड़ कर देखा जाता रहा है। बाढ़ नियंत्रण को इंजीनियरों का क्षेत्र समझा जाता रहा है। इसी समझ के आधार पर बाढ़ प्रबंधन का मतलब नदी को नियंत्रित करना माना जाता है। लेकिन अब बहुत से जानकार यह स्वीकार कर रहे हैं कि ऐसी ही समझ की वजह से दुनिया भर में बाढ़ प्रबंधन की कोशिशें नाकाम रहीं।

इसे आंक़ड़ों से साबित किया जा सकता है कि बाढ़ पर काबू पाने के तमाम उपायों के बावजूद भारत में बाढ़ प्रभावित इलाके और बाढ़ से होने वाले नुकसान- दोनों में बढ़ोतरी हुई है। बाढ़ आज देश, खासकर उत्तर बिहार में सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाली प्राकृतिक आपदा है। इसलिए अब बाढ़ नियंत्रण के उपायों पर सोच बदलने की जरूरत है। अब वैकल्पिक सोच अपनाए जाने की आवश्यकता है। जानकार अब नदियों का स्वभाव समझने और उसके मुताबिक भूमि एवं जल प्रबंधन के उपाय करने की जरूरत पर जोर दे रहे हैं।

लेकिन मौजूदा राजनीतिक माहौल में क्या यह संभव है? बिहार के संदर्भ में बाढ़ मुक्ति अभियान के संयोजक और विशेषज्ञ दिनेश कुमार मिश्र की यह राय गौरतलब है- “बाढ़ से निपटने के लिए हम क्या-क्या कर सकते हैं, यह दिवा स्वप्न देखने और दिखाने से पहले हमें यह तय करना होगा कि कौन-कौन सी चीजें ऐसी हैं, जो हम नहीं कर सकते। इन चीजों पर एक नजर डालें। 1- यह सारी बहस इसलिए चल रही है कि तटबंधों पर जो हमने विश्वास किया, वह गलत था। 2- बराहक्षेत्र बांध का निर्माण हमारे हाथ में नहीं है। 3- कोसी नदी की उगाढ़ी संभव नहीं है, क्योंकि एक तो गाद/ रेत की मात्रा वहां बहुत अधिक है और उसे कहां फेंका जाएगा, यह किसी को मालूम नहीं है। इस प्रस्ताव को इंजीनियर लोग भी सिरे से खारिज करते हैं। 4- गांवों को ऊंचा करने का काम 1950 और 1960 के दशक में मुख्यतः उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य राज्यों में किया गया औऱ भारी जन प्रतिरोध के बीच उसे अव्यावहारिक मान कर छोड़ दिया गया। 5- नदी को मुक्त छोड़ कर गांवों को घेरने की योजना भी भीषण समस्याओं से ग्रस्त है। बिहार में ही निर्मली, महादेव मठ और बैरगनियां की समस्याएं किसी से छिपी नहीं हैं। 6- नदियों को आपस में जोड़ने की योजना कम से कम बिहार में पूरी तरह नेपाल पर आश्रित है और वहां भी लंबा इंतजार करना होगा। जब तक नेपाल और इस योजना के लिए कर्ज या अनुदान देने वाली संस्थाएं इसके परिणामों को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं होंगी, तब तक यह काम नहीं होगा। 7- इन सारे तकनीकी उपायों के बाद एक कानूनी रास्ता बचता है, जिसके मताबिक बाढ़ वाले इलाकों में रिहाइश के नियम और निषेधों को कड़ाई से लागू किया जाए। इसे तकनीकी भाषा में फ्लड प्लेन जोनिंग कहते हैं। बिहार में दो तिहाई जमीन पर बाढ़ की आशंका बनी रहती है और वहां इस तरह के कानून का पालन संभव नहीं है, क्योंकि तब वहां ऐसा बहुत कम क्षेत्र बचेगा, जहां कोई बड़ा निर्माण कार्य किया जा सके। यह मान कर कि फ्लड प्लेन जोनिंग कानून मान लेने से बिहार में विकास के सारे काम बाधित हो जाएंगे, खुद बिहार सरकार ने इसे खारिज किया हुआ है।

इस तरह हम देखते हैं कि बाढ़ से निपटने वाली सारी योजनाओं के रास्ते या तो बंद हैं या वे किसी अंधी गली में जाकर खत्म हो जाते हैं। तब बचता है एकमात्र रास्ता कि स्थानीय स्तर पर ही बाढ़ से निपटा जाए, क्योंकि नदी की पूरी लंबाई हमारे पास उपलब्ध नहीं है। उसका अच्छा-खासा हिस्सा नेपाल में पड़ता है और वहां कुछ करने के लिए नेपाल की रजामंदी चाहिए। वह मिल सकती है और नहीं भी मिल सकती है या बहुत देर से मिल सकती है। भलाई इसी में है कि हम वार्ताएं जरूर चलाएं, लेकिन उन्हीं के भरोसे बैठे ना रहें।”

दिनेश कुमार मिश्र के मुताबिक तकनीकी उपायों की अपनी सीमाएं हैं, इसलिए जरूरत स्थानीय लोगों से पारंपरिक ज्ञान अर्जित कर उसे आधुनिक विज्ञान से संवारने की है। शायद इसी से कोई टिकाऊ समाधान निकल सकता है। उत्तर बिहार के संदर्भ में हमारी राजनीतिक और भौगोलिक परिस्थिति ऐसी है कि हम न तो पानी और गाद को आने से रोक सकते हैं और ना ही नदी के बारे में कोई स्वतंत्र निर्णय ले सकते हैं। अगर आपको सिर्फ नदी का एक टुकड़ा ही उपलब्ध हो तो आधी इंजीनियरिंग वहीं खत्म हो जाती है। बची आधी इंजीनियरिंग की भी अपनी सीमाएं हैं।

कहा जाता है कि इंसान अपनी गलतियों से सीखता है। सभ्यता के इतने विकास के बावजूद मनुष्य अभी सीखने के ही दौर में है। बड़ी परियोजनाओं से बाढ़ पर नियंत्रण का एक प्रयोग मनुष्य ने पिछली सदी में किया। लेकिन वक्त ने साबित किया कि वह प्रयोग न सिर्फ अधूरा था, बल्कि उसके कई दुष्परिणाम भी हुए। खासकर प्रकृति के लिए कई विनाशकारी नतीजे सामने आए। इनसे सीखते हुए प्रकृति पर विजय पाने की महत्त्वाकांक्षा और उसके लिए बनाई नीतियों पर सवाल उठने लगे। पिछली सदी में जो उपाय और तरीके प्रचलन में आए, आज उन पर गंभीर सवाल हैं। इसलिए अब वैकल्पिक तरीकों और उपायों पर सोचा जा रहा है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि जिनके हाथ में सत्ता और प्रयोग के संसाधन हैं, वो अभी तक नहीं जागे हैं।

बहरहाल, अगस्त 2008 में आई बाढ़ खतरे की ऐसी घंटी है, जिसकी अनदेखी बड़े विनाश का जोखिम उठाते हुए ही की जा सकती है। हमारे राजनेता यह जोखिम उठाने को भी तैयार दिखते हैं, क्योंकि आखिरकार जान-माल का नुकसान उनका नहीं, बल्कि आम जनता का होगा। इसलिए यह आम जनता के जागने का वक्त है। यह सामाजिक संगठनों के जागने का वक्त है। अगर वे मिलजुल कर बाढ़ और इससे जुड़ी भुखमरी को राजनीतिक मुद्दा बना सकें, इसे चुनाव हारने और जीतने का सवाल बना सकें तो शायद तस्वीर कुछ बदल सकती है। यानी बाढ़ पर राजनीति का वक्त आ गया है, नेताओं के बीच राजनीति का नहीं, बल्कि नेताओं के खिलाफ जनता की राजनीति का।

 


सत्येंद्र रंजन
 

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