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न्यूज क्लिपिंग्स् | खाद्य सब्सिडी का अंकगणित - अमित तिवारी

खाद्य सब्सिडी का अंकगणित - अमित तिवारी

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published Published on Jan 17, 2014   modified Modified on Jan 17, 2014

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के दूसरे कार्यकाल का बड़ा अहम फैसला 

संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में बड़ा फैसला करते हुए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक को पास कराने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। कड़ी जद्दोजहद के बाद आखिरकार विधेयक पास भी हो गया। लेकिन इसी के साथ आर्थिक संकट से जूझ रहे राजकोष पर पडऩे वाले सब्सिडी के दबाव को लेकर ऊंगलियां भी उठनी शुरू हो गईं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह फैसला यूपीए सरकार ने केवल 2014 के आम चुनाव में जीत हासिल करने के मकसद से किया है या फिर इसे लागू करने के लिए जमीनी हकीकत की तलाश भी की गई है। खाद्य सब्सिडी पर चढ़े सियासत के रंग को बेनकाब करती अमित तिवारी की खास रिपोर्ट......

यूपीए सरकार द्वारा खाद्य सुरक्षा बिल को पास किए जाने को लेकर विपक्ष से लेकर आर्थिक विश्लेषक तक सरकार के इस फैसले को आर्थिक रूप से गैर समझदारी भरा फैसला बता रहे हैं। इसके लागू होने से बजट पर पडऩे वाले एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के बोझ को सरकार कैसे व्यवस्थित करेगी, इसको लेकर आर्थिक हलके में चिंता है। यही वजह रही कि विधेयक के पास होते ही सेंसेक्स के सूचकांक में गिरावट देखी गई थी।

सवाल इतने पर भी नहीं सिमट रहे हैं। सरकार की इस रियायत पर होने वाली सियासत और भी आगे तक है। देश में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के जरिए सस्ती कीमत पर अनाज मुहैया कराने का सिलसिला कई दशक पुराना है।

लेकिन इस व्यवस्था में लगने वाली सेंध हमेशा से सवालों के दायरे में रही है। सरकारी खरीद के लिए समर्थन मूल्य तय करने से लेकर अनाज भंडारण की अनियमितता और अनाज की बर्बादी भी गंभीर मुद्दा हैं।

विश्व बैंक (जून 2000) की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय खाद्य निगम के भण्डारण में 50 फीसदी अनाज दो वर्ष पुराना, 30 फीसदी अनाज 2 से चार वर्ष पुराना और एक बड़ा हिस्सा 16 वर्ष पुराना था। रिपोर्ट के अनुसार, भण्डारण में 10 से 30 फीसदी अनाज अन्तरराष्ट्रीय गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं था।

सब्सिडी की क्यों है जरूरत
सरकार का यह दायित्व है कि देश और समाज में लोग भुखमरी जैसी किसी भी परिस्थिति के शिकार न हों। लोगों को पोषण युक्त पर्याप्त भोजन की उपलब्धता को सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी होती है। खाद्य वस्तुओं में दी जाने वाली सब्सिडी या रियायत वस्तुत: महज एक सामाजिक और आर्थिक मुद्दा भर नहीं है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की राजनीति में आज की तारीख में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

भारत में कांग्रेसनीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार की ओर से बड़े समय से लंबित खाद्य सुरक्षा बिल को आनन-फानन में पास कराने की जद्दोजहद और उस पर समर्थन के बावजूद विपक्षी दलों की ओर से सरकार पर किए गए हमले खाद्य सुरक्षा के राजनीतिक महत्व के ही परिचालक हैं। हाल ही में भारत ने वैश्विक मंच पर भी सब्सिडी को लेकर अपना पक्ष सफलता पूर्वक रखा है।

सब्सिडी का क्या है इतिहास
1960 के दशक में जब रासायनिक उर्वरक, कीटनाशक, जेनेटिकली मोडिफाइड सीड्स, कृषि व्यवस्था के मशीनीकरण के कारण जब हरित क्रांति हुई थी तब देश में उत्पादन की मात्रा में बढ़ोतरी तेजी से दर्ज की गई थी। आंकड़े गवाह हैं कि इसका लाभ ज्यादातर बड़े और संपन्न किसानों को मिला था। कीटनाशक का उपयोग करने की क्षमता संपन्न और बड़े रकबे वाले किसानों के पास ही थी।

भण्डारण क्षमता कम होने से सरकार को उनके हितों के संरक्षण के लिये आगे आना पड़ा । तब सरकार ने अनाज खरीदने का कार्यक्रम शुरू किया। यह तय हुआ कि सरकार किसानों को लाभ पहुचाने के लिये खुले बाजार के भावों के आसपास ही खरीद करेगी। इस व्यवस्था का लाभ भी बड़े किसान ही उठा पाये और छोटे किसानों को अपनी फसल औने-पौने दामों पर बड़े किसानों या आढ़तियों को बेचनी पड़ी।

सरकार ने जमकर खाद्यान्न खरीदा। विश्व बैंक के निर्देशों के अनुरूप सरकार ने भारतीय खाद्य निगम की स्थापना की। ज्यादा दामों पर खरीदे गये गये अनाज का सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये उपयोग किया जायेगा और फिर गरीबों को कम कीमत पर राशन उपलब्ध कराया जाने लगा।

खरीद की अव्यवस्था
खाद्य निगम हर वर्ष कुल गेहूं उत्पादन का 15 से 20 फीसदी और चावल का 12 से 15 फीसदी हिस्सा खरीदता है। इस सबन्ध में यह साफ कर देना उचित है कि सैद्धान्तिक रूप से खाद्य निगम की स्थापना केवल गेहूं और चावल खरीदने के लिये नहीं की गई है।

बल्कि इसका दायित्व अन्य मोटे अनाजों, ज्वार, बाजरा खरीदने का भी है और वास्तविकता यह है कि चूंकि ये समाज की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली कम लाभ वाली फसलें हैं इसलिये सरकार इनका समर्थन मूल्य तो तय करती है परन्तु खरीदती नहीं के बराबर है।

यही कारण है कि इन फसलों का उत्पादन करने वाले किसानों को सरकार ने मदद न करके उन्हें बाजार के हवाले कर दिया, जहां अब वे मृतप्राय: अवस्था में हैं। ज्वार-बाजरा, कोदो-कुटकी ऐसी फसलें हैं जिनके भरोसे गरीब तबका और छोटे किसान अकाल जैसी विपदाओं से जूझकर अपना अस्तित्व बचा जाते थे।

जबसे इन फसलों का विनाश होना शुरू हुआ है तब से समाज में खाद्य असुरक्षा का संगीन वातावरण बनने लगा है और लोग भुखमरी के शिकार होने लगे हैं। यह जानना महत्वपूर्ण है कि मोटे अनाजों की उत्पादन वृद्धि दर अब शून्य के चिंतनीय स्तर पर पहुंच चुकी है।

खाद्य सब्सिडी में खामियां
भ्रष्टाचार के जरिये रियायत का दुरुपयोग होता है और अनाज मिलों को बेच दिया जाता है।
खाद्य निगम में भण्डारण बढ़ा है लेकिन तकनीक का आधुनिकीकरण समय के मुताबिक नहीं हो पाया है।
लोगों को तय सरकारी दाम से 10 से 14 फीसदी अधिक मूल्य देना पड़ता है।
सालाना 10 से 25 फीसदी अनाज भण्डारण के अभाव में खुले आसमान के नीचे रखा जाता है।

इस बिन्दु में ज्यादातर पक्ष व्यवस्था से जुड़े हुये हैं। स्पष्ट मायने
यह हैं कि भण्डारण की उपयुक्त व्यवस्था के अभाव में 12 से 20 फीसदी अनाज पूरी तरह से बेकार चला जाता है। यह पुन: उल्लेखनीय है कि रियायत का एक बड़ा हिस्सा अनियोजित और राजनीति से प्रेरित व्यवस्था के स्वार्थ के कारण परिवहन में खर्च हो जाता है।

निगम अपने विज्ञापनों में दर्ज करता है कि वह अतिरिक्त उत्पादन करने वाले राज्यों से अनाज उठाकर कम उत्पादन करने वाले राज्यों को भेजता है। परन्तु वास्तविकता यह है कि किन राज्यों से अनाज खरीदा जायेगा यह पूरी तरह से राजनीति से प्रेरित निर्णय होता है। जिस राज्य की किसान लॉबी का सरकार पर दबाव होता है, सरकार अनाज की खरीद भी वहीं से करती है।

समर्थन मूल्य की राजनीति
बाजार से सरकार किस मूल्य पर खाद्यान्न खरीदेगी इस मूल्य के निर्धारण की प्रक्रिया भी समग्र रूप से राजनैतिक अर्थशास्त्र से प्रेरित है। भारत में अनाज का मूल्य निर्धारित करने का दायित्व कृषि लागत एवं मूल्य आयोग (एग्रीकल्चर कॉस्ट्स एण्ड प्राइसेस कमीशन) को सौंपा गया है। यह दायित्व निभाते समय आयोग व्यवस्था के कुछ महत्वपूर्ण पहलुओं को नैतिक आधार बनाता है।

क्या है खाद्य सब्सिडी जब सरकार
बाजार मूल्य से कम दाम पर समाज के एक निश्चित तबके को अनाज या राशन उपलब्ध करवाती है तो वास्तविक लागत मूल्य और रियायती दर के बीच के अन्तर का भार सरकार की ओर से वहन किया जाता है। यही खाद्य सब्सिडी या रियायत कहलाती है।

सब्सिडी पर  खड़ा सवाल?
भारतीय खाद्य निगम के भण्डारों में अनाज का जमा होते जाना और क्रय क्षमता के बढऩे के अभाव में गरीबों द्वारा उसे न खरीद पाना। समर्थन मूल्य में वृद्धि के विरोध को इस नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए कि यह किसानों के विरोध की बात है।

बल्कि इस राजनीति को भली-भांति समझ लेना होगा कि रियायत (सब्सिडी) के नाम पर वास्तव में छोटे और सीमांत किसानों को छला जा रहा है। इन किसानों के पास इतने संसाधन और सुविधायें ही नहीं हैं कि वे अपनी फसल को ऐसे स्थान और समय पर बेच सकें जहां उन्हें समर्थन मूल्य का लाभ मिले।

भारत में 83 प्रतिशत छोटे और सीमांत किसान हैं जिन्हें फसल के बाद तत्काल आर्थिक सहयोग की जरूरत होती है, ऐसे में उन्हें मजबूरी में अपने खेत में ही फसल गांव या क्षेत्र के सपन्न किसानों को बेच देनी पड़ती है। अगर वास्तव में सरकार किसानों का हित सोच रही है तो किसान लगातार आत्महत्या क्यों कर रहे हैं और पंजाब में किसान अपनी जमीने क्यों बेच रहे हैं

सब्सिडी का समीकरण
: सरकारी खरीद और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये उसकी बिक्री के बीच लागत मूल्य में जो अंतर आता है उसे सरकार वहन करती है। रियायत की इस व्यवस्था को इस समीकरण से समझा जा सकता है।
: सरकारी समर्थन मूल्य + भारतीय खाद्य निगम की अनाज भण्डारण लागत + संचालन लागत + नुकसान - सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिये बिक्री मूल्य = खाद्य सब्सिडी

सरकारी समर्थन मूल्य
हर वर्ष सरकार फसल आने के बाद यह तय करती है कि वह किस न्यूनतम मूल्य पर अनाज की खरीदी करेगी। आमतौर पर समर्थन मूल्य का निर्धारण राजनीतिक व्यवस्था से प्रभावित होता है। तर्क होता है बाजार भावों की उठा-पटक से किसानों को बचाने का।

भण्डारण की लागत
किसानों से समर्थन मूल्य पर अनाज की खरीदी करके सरकार खाद्य निगम के गोदामों में अनाज का भण्डारण करती है। अब ज्यादातर जिलों में खाद्य निगम के गोदाम हैं। यहां अनाज के रख-रखाव पर मण्डी से गोदाम तक अनाज लाने के परिवहन व्यय को सरकार वहन करती है।
संचालन लागत : खाद्य निगम पर रिकॉर्ड, देख-रेख वितरण का संचालन करने की व्यवस्था पर आने वाला व्यय।

अनाज की बर्बादी
 सरकार के इन गोदामों की खराब हालत एवं चूहों की भरमार के कारण हर साल 10 से 20 फीसदी अनाज बर्बाद होता है। इतना ही नहीं जितनी मात्रा में सरकार ने अनाज खरीद कर रख लिया है उतनी भण्डारण क्षमता के गोदाम उसके पास नहीं है इसलिये भारी मात्रा में अनाज खुले आसमान के नीचे रखा जाता है। इस अनाज की बर्बादी भी सरकारी नुकसान के खाते में जाती है।

पीडीएस का महत्व
सरकार इस प्रणाली के जरिये समाज में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों को कम मूल्य पर राशन उपलब्ध करवाती है। यह सरकार की जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने नागरिकों के हितों का ख्याल रखे।

न्यायालय ने भी दिया है दखल
2001 अदालत ने कहा था- गरीब लोग भूख और भुखमरी से पीडि़त न हो

सूखे
और अकाल के दौर में गोदाम भरे होने के बावजूद देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग भुखमरी के शिकार हो रहे थे, सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं हो रहा था तब लोगों के संगठन ने न्यायालय की शरण ली थी।

न्यायालय ने माना कि यह बुनियादी अधिकारों के हनन की स्थिति है। 20 अगस्त 2001 को सर्वोच्च न्यायालय (एससी) ने कहा कि अदालत की चिंता यह देखना है कि गरीब लोग, दरिद्रजन, और समाज के वंचित-कमजोर वर्ग भूख और भुखमरी से पीडि़त न हों।

इसे रोकना सरकार का एक प्रमुख दायित्व है, चाहे वह केन्द्र हो या राज्य। एससी ने सरकारों को एक-एक जनकल्याणकारी योजना के बारे में आदेश देने शुरू कर दिये। स्पष्ट है कि लोगों की खाद्य सुरक्षा का सवाल केवल एक सिद्धान्त नहीं बल्कि बुनियादी अधिकार है।

तथ्य यह है कि 1999 में देश के विभिन्न हिस्से गंभीर सूखे और अकाल के संकट से जूझ रहे थे। राजस्थान, मध्यप्रदेश, ओडिशा, झारखण्ड, बिहार और आंध्रप्रदेश के कई ऐसे आदिवासी गांव थे जहां लोग खाद्यान्न के अभाव में जंगली वनस्पतियां, फल, घास, बीज और यहां तक की चूहे मारकर अपने भोजन की व्यवस्था कर रहे थे।

योजनाओं और राहत कार्यक्रम भ्रष्ट सरकारी तंत्र में उलझकर दम तोड़ रहे थे। ऐसे में राजस्थान के जन संगठनों ने पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज के बैनर के तले एससी में लोगों को भुखमरी से बचाने के लिये निर्देश लेने का प्रयास किया।


संविधान में भी है इसकी व्याख्या
47 अनुच्छेद में लिखा है कि लोगों के स्वास्थ्य सुधार का कर्तव्य सरकार का है

संविधान के नीति निर्देशक तत्वों के अन्तर्गत अनुच्छेद 47 में भी यह स्पष्ट किया गया है कि लोगों के पोषाहार के  स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करने तथा लोगों के स्वास्थ्य में सुधार करने का कर्तव्य राज्य का है और राज्य इसे अपना प्राथमिक कर्तव्य मानेगा।

हालांकि नीति निदेशक तत्व न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं है, जबकि मूल अधिकार न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय है। ये निर्देश न्यायालय द्वारा प्रवर्तित नहीं कराये जा सकते हैं और यदि तत्कालीन सरकार इन्हें क्रियान्वित करने में असफल रहती है तो कोई न्यायालय सरकार इसके क्रियान्वयन के लिए बाध्य नहीं कर सकता।

किन्तु यह घोषित किया जा चुका है कि ये सभी तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और जो सरकार जनता के मत पर टिकी है वह राज्य व्यवस्था को आकार देने में इनकी उपेक्षा नहीं कर सकती । (डॉ. भीमराव अबेडकर)। मूलत: संविधान के नीति-निदेशक तत्व देश के सामाजिक-आर्थिक विकास की दिशा को तय करने वाले सिद्धान्त हैं। ऐसे में कोशिश इस बात की होनी चाहिए कि इसका सही तरीके से क्रियान्वयन किया जा सके।

भले ही इस आधार पर सरकार को न्यायालय में चुनौती न दी जा सके परन्तु बुनियादी अधिकारों का हनन के अलावा जब जीवन के अधिकार पर प्रश्न चिन्ह लगा हो तब संविधान के चौथे भाग में दर्ज इन सिद्धान्तों को पुनर्परिभाषित किया जा सकता है। जैसे कि पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज विरुद्ध भारतीय संघ एवं अन्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल जनहित याचिका के सन्दर्भ में हुआ है।


http://business.bhaskar.com/article/BIZ-ART-food-subsidy-arithmetic-4494998-NOR.html


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