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न्यूज क्लिपिंग्स् | छत्तीसगढ़ में हरियाणा- प्रियंका कौशल

छत्तीसगढ़ में हरियाणा- प्रियंका कौशल

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published Published on Sep 20, 2013   modified Modified on Sep 20, 2013
छत्तीसगढ़ में हजारों एकड़ जमीन खरीदने वाले हरियाणा के किसान आधुनिक तकनीक से खेती के जरिए एक नई मिसाल कायम कर चुके हैं. लेकिन स्थानीय किसान और सरकार इस बदलाव में कुछ खतरनाक संकेत देख रहे हैं. प्रियंका कौशल की रिपोर्ट.

सैकड़ों एकड़ में फैले फार्म हाउस और हुक्का पीते किसान. बस खेतों में काम करते आदिवासी न दिखें तो छत्तीसगढ़ के कई क्षेत्रों को देखकर एकबारगी यही लगता है कि हम हरियाणा के किसी गांव में खड़े हैं. यह पिछले सालों के दौरान छत्तीसगढ़ में विकसित हुए हरियाणा की एक तस्वीर है जिसे हरियाणवी किसान ही बना रहे हैं. इस बदलाव के कुछ नकारात्मक पक्षों के चलते इस समय राज्य सरकार भी सतर्क दिख रही है.

वैसे तो हरियाणा और छत्तीसगढ़ में कोई सांस्कृतिक-सामाजिक साम्य कभी नहीं रहा. परंतु दोनों ही प्रदेश कृषि आधारित अर्थव्यवस्था वाले रहे हैं. बावजूद इसके दोनों प्रदेशों में तीन अंतर ऐसे भी हैं जिन्होंने हरियाणा के उन्नत किसानों को छत्तीसगढ़ में बसने पर मजबूर कर दिया. इन किसानों ने न केवल छत्तीसगढ़ को अपनी कर्मभूमि बनाया, बल्कि सैकड़ों एकड़ खेतों में उन्नत खेती के जरिए करोड़ों का फायदा भी कमाया. हरियाणा के किसानों को छत्तीसगढ़ की तरफ जो अंतर आकर्षित कर रहे हैं वे हैं सस्ती और बेहिसाब उपजाऊ जमीन, सस्ती बिजली व जीरो पावर कट पॉलिसी और सस्ता श्रम.

हरियाणा में जहां जमीन के दाम आसमान छू रहे हैं, वहीं उसकी तुलना में छत्तीसगढ़ में अब भी जमीन सस्ती ही कही जाएगी. छत्तीसगढ़ में इस समय जहां खेती योग्य जमीन 4 से 5 लाख रु. प्रति एकड़ की दर से मिल रही है. वहीं हरियाणा में जमीन बहुत महंगी है. वहां जमीन के दाम 20 लाख रु. से शुरू होकर करोड़ों तक हैं. सिरसा में 20 लाख रु. प्रति एकड़ की दर से खेती योग्य जमीन मिल पाती है. जींद में प्रति एकड़ जमीन की कीमत 30 लाख रु. है तो दिल्ली से लगी हरियाणा की सीमा वाले इलाके में तो प्रति एकड़ 50 लाख से 1.30 करोड़ तक की कीमत वसूली जा रही है. यही कारण है कि 1994 से हरियाणा के किसानों के आने का सिलसिला शुरू हुआ, जो बदस्तूर जारी है. खेती के विस्तार के लिए अभी हरियाणा के मुकाबले छत्तीसगढ़ में ज्यादा जमीन उपलब्ध है. बात करें बिजली की तो छत्तीसगढ़ सरकार किसानों को पांच हॉर्स पावर तक मुफ्त बिजली दे रही है. बिजली में सरप्लस राज्य होने के कारण यहां विद्युत कटौती नहीं होती. इसके साथ ही छत्तीसगढ़िया मजदूर सस्ते श्रम के लिए मशहूर हैं.

हरियाणा के किसान उन्नत कृषि उपकरणों और ड्रिप इरीगेशन व मल्चिंग जैसी तकनीक का उपयोग करके भरपूर उत्पादन करते हैं

हरियाणा के जींद के रहने वाले 57 वर्षीय ओमप्रकाश कंदोला 2005 में छत्तीसगढ़ बनने के बाद यहां आकर बसे थे. दुर्ग संभाग के अहिवारा जनपद पंचायत में कंदोला ने 45 एकड़ जमीन खरीद कर खेती शुरू की है. उन्होंने अपने खेतों में सोयाबीन, शिमला मिर्च, केला और पपीता बोया है. इसके साथ ही कंदोला ने अहिवारा में ही किसान एग्रो इंजीनियरिंग वर्क्स के नाम से कृषि उपकरण बनाने और सुधारने की एक वर्कशॉप भी खोल रखी है. कंदोला कहते हैं, ' खेती के लिहाज से छत्तीसगढ़ अभी हरियाणा के कोसों पीछे है. ये अंतर ठीक वैसा ही है, जैसा कि किसी विकसित और किसी अविकसित राज्य के बीच में होता है. लेकिन छत्तीसगढ़ में उपलब्ध सस्ती जमीन और बिजली बाहर के किसानों को आकर्षित कर रही है.'  कंदोला कहते हैं कि जब हरियाणा में एक एकड़ जमीन बेचकर उसी दाम में यहां दस एकड़ जमीन मिल रही हो तो कोई भी ऐसा करना पसंद करेगा. वे यहां खेती के साथ-साथ स्थानीय किसानों के कृषि उपकरणों को बनाने और सुधारने का काम कर रहे हैं. उनका मानना है कि हरियाणा के किसान उपकरण की समझ के मामले में भी छत्तीसगढ़ से आगे हैं.

एक अनुमान के मुताबिक हरियाणा के किसानों ने प्रदेश में करीब दस से पंद्रह हजार एकड़ कृषि योग्य जमीन खरीदी है. हरियाणा के किसान अपने फार्म हाउसों में केले, पपीते, गन्ने, अदरक, लौकी, करेले, कपास, अरबी और शिमला मिर्च की लहलहाती फसलों से करोड़ों रुपये का टर्न ओवर ले रहे हैं. जबकि स्थानीय किसान अभी तक धान से बाहर नहीं निकल पाए हैं. इसके दो अहम कारण हैं, एक तो स्थानीय किसानों के पास खेतों में निवेश के लिए ज्यादा धन नहीं है. दूसरा, वे धान के अलावा किसी दूसरी फसल को पैदा करने के बेहतर तरीके भी नहीं जानते.  हरियाणा के किसान जहां नई-नई फसलें उगा रहे हैं वहीं उन्नत कृषि उपकरण और मल्चिंग (शिमला मिर्च के रोपों को पॉलीथिन से ढ़क कर सुरक्षा प्रदान करना) और ड्रिप सिंचाई जैसी तकनीक का भी भरपूर उपयोग कर रहे हैं.

अगल-बगल स्थित हरियाणा और स्थानीय किसानों के खेतों का अंतर साफ देखा जा सकता है. यही कारण है कि हरियाणा के किसानों के फार्म पर डस्टर और बीएमडब्ल्यू जैसी लक्जरी गाड़ियां खड़ी दिखाई देती हैं. दरअसल स्थानीय किसान केवल धान बोते हैं, जिसकी प्रति एकड़ लागत दस हजार रुपया आती है और इस पर मुनाफा केवल बीस हजार रु. ही हो पाता है. जबकि पपीता बोने के लिए प्रति एकड़ 25 से 30 हजार रु. लागत आती है. वहीं मुनाफा प्रति एकड़ एक लाख रुपये के करीब होता है. ऐसे ही शिमला मिर्च बोने में प्रति एकड़ सवा लाख रुपये लागत लगती है, लेकिन मुनाफा प्रति एकड़ चार से पांच लाख रुपये पक्का है. केला बोने के लिए भी पहले साल में करीब 60 हजार रु. लागत आती है. लेकिन मुनाफा एक लाख या उससे भी अधिक होता है. केले की लागत दूसरे साल में और भी घटकर केवल 30 हजार रु. प्रति एकड़ रह जाती है. लेकिन मुनाफा पहले जितना ही बरकरार रहता है.

1995 में रोहतक के बरौदा गांव से छत्तीसगढ़ के धमधा ब्लाक के खपरी गांव पहुंचे चौधरी आशीष सिंह खासा (40 वर्ष) को एक बार देखने पर आप अंदाज नहीं लगा पाएंगे कि ये हरियाणवी जाट हैं. पहनावा, बोलचाल और रहन-सहन में काफी अंतर आ जाने के बाद आशीष सिंह कहते हैं कि अब छत्तीसगढ़ और हरियाणा में कोई अंतर नहीं लगता. जब आशीष छत्तीसगढ़ आए थे, तब उनकी उम्र मात्र सत्रह वर्ष थी. उन्होंने धमधा में मात्र साढ़े 22 एकड़ जमीन खरीदी और खेती शुरू की. आज चौधरी आशीष सिंह के पास 400 एकड़ में फैले 4 कृषि फार्म हाउस हैं. आशीष बताते हैं कि उन्होंने सबसे पहले धान, सब्जियां, सोयाबीन और गन्ना बोकर देखा. फिर धीरे-धीरे उद्यान कृषि (हॉर्टिकल्चर) को ज्यादा बढ़ावा दिया. इन दिनों आशीष के खेतों में केला, पपीता और शिमला मिर्च की खेती हो रही है.  समय, श्रम और तकनीक, इन तीनों के संतुलन से हरियाणा के इस युवा जाट किसान ने साढ़े 22 एकड़ खेती को 400 एकड़ के फार्म हाउस में तब्दील कर दिया. छत्तीसगढ़ आने  का कारण आशीष बताते हैं, ' यहां काफी सस्ती जमीनें मिल जाती हैं. साथ ही बिजली, सड़कें और पानी की उपलब्धता कुछ ऐसी चीजें हैं जिन्होंने यहां आने पर मजबूर किया. हमारा निर्णय सही था. आज नतीजा आपके सामने है.' आशीष रोहतक में अपनी पुश्तैनी खेती को बेचकर छत्तीसगढ़ आए थे. वे बताते हैं कि उनका केला जहां स्थानीय भिलाई मंडी में ही खप जाता है वहीं उनका पपीता दिल्ली और आगरा की मंडियों में बिकने जाता है. आशीष के खेतों में लगी शिमला मिर्च भी दिल्ली, मुंबई जैसे मेट्रो शहरों में बिकने जाती है.

छत्तीसगढ़ में लघु और सीमांत किसान हैं जो दूसरों की तरह खेती में भारी लागत नहीं लगा सकते

हरियाणा के सोनीपत जिले से बेरला पहुंचे नारायण सिंह दहिया (65 वर्ष) भी उन्नत किसानों का प्रतिनिधित्व करते हैं. 1994 में सबसे पहले छत्तीसगढ़ आने वालों लोगों में दहिया भी थे. उनके बाद तो हरियाणा के किसानों का छत्तीसगढ़ आने का सिलसिला कुछ यूं चला कि इस वक्त करीब एक हजार किसान प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में जमीन खरीद कर खेती कर रहे हैं. इस वक्त दहिया के पास  150-150 एकड़ के दो कृषि फार्म हैं. वहीं उन्होंने खेती के लिए ही 175 एकड़ जमीन लीज पर भी ले रखी है. दहिया जब हरियाणा से निकले तो उनके पास वहां केवल सात एकड़ जमीन थी. उसे बेचकर उन्होंने छत्तीसगढ़ के बेमेतरा ब्लाक के बेरला में 100 एकड़ जमीन खरीदी. उस वक्त हरियाणा में उन्होंने डेढ लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से जमीन बेची थी. जबकि छत्तीसगढ़ में उन्हें मात्र नौ हजार रुपये प्रति एकड़ की दर से जमीन मिल गई. आज उनके पास खुद की 300 एकड़ और लीज पर 175 एकड़ जमीन है. दहिया कहते हैं, 'धान की खेती में प्रति एकड़ 10 हजार रुपये ही कमाई हो पाती है. जबकि केला, पपीता, शिमला मिर्च जैसी फसलें प्रति एकड़ लाखों रुपये का मुनाफा देती हैं. ऐसे में धान बोना बिल्कुल फायदेमंद नहीं है.'

अहिवारा के ही रहने वाले स्थानीय किसान ऋतुराज सिंह ठाकुर हरियाणा के किसानों की खेती के तौर-तरीकों के कायल हैं. ठाकुर कहते हैं, 'इनकी खेती के तरीके बिल्कुल आधुनिक हैं. अब तो इनसे हमारा पारिवारिक नाता-सा हो गया है. हम इनकी शादियों में मेहमान बनकर हरियाणा भी जाते हैं.' स्थानीय किसान जीपी चंद्राकर को हरियाणा के किसानों से कुछ परहेज है. वे इस बारे में अपना दर्द कुछ यूं बयान करते हैं, 'छत्तीसगढ़ के किसान मूलतः गरीब, लघु और सीमांत किसान हैं. इन किसानों के पास इतना धन नहीं होता कि ये धान के अलावा कोई खेती कर सकें. यहां की धरती की प्रकृति धान की फसल के अनुरूप हो गई है, दूसरा इसे उगाना अपेक्षाकृत सस्ता भी पड़ता है. ऐसे में अगर कोई किसान दूसरी फसल बोना भी चाहे तो वह सड़ जाती है.'

एक दूसरे किसान वृगेंद्र सिंह अपना गुस्सा जाहिर करते हुए कहते हैं, 'हरियाणा के कृषक, किसान कम व्यापारी ज्यादा हैं. वे हमारी जमीनों को निचोड़ रहे हैं. अधिक से अधिक लाभ लेने के चक्कर में वे एक दिन छत्तीसगढ़ की जमीन को अनुपजाऊ बनाकर छोड़ेंगे.' वृगेंद्र यह भी कहते हैं, 'हरियाणा के किसान कीटनाशकों का अधिकतम उपयोग कर रहे हैं, समय के साथ-साथ जमीन की गुणवत्ता खत्म हो जाएगी.' जो किसान हरियाणा से छत्तीसगढ़ आए हैं, उनमें जाटों की संख्या करीब 95 प्रतिशत है. जबकि बाकी पांच प्रतिशत में ब्राह्मण और कुछ अन्य जातियां शामिल हैं. छत्तीसगढ़ के अहिवारा, धमधा, बेमेतरा और बेरला में हरियाणा के किसानों की आमद सबसे ज्यादा है. वहीं रायपुर, सिमगा, राजनांदगांव, धमतरी और मुंगेली में भी हरियाणवी किसान खेती करते हुए देखे जा सकते हैं.

छत्तीसगढ़ आने से हरियाणा के किसानों का एक गंभीर सामाजिक संकट भी कुछ हद तक दूर हुआ है. दरअसल लड़कियों की कमी से जूझ रहे हरियाणा के किसानों में से कुछ के परिवार ने छत्तीसगढ़ में भी अपनी संतानों के शादी-ब्याह किए हैं. लेकिन इनकी संख्या अभी उंगली में गिनने लायक है. हालांकि चौधरी आशीष सिंह की मानें तो हरियाणा में लड़कियों का संकट केवल उन्हीं के लिए है, जो आर्थिक रूप से विपन्न हैं. संपन्न परिवारों के लिए ऐसी कोई कमी नहीं है. हरियाणा के दखल से छत्तीसगढ़ के हालात कितने बदलेंगे, यह कह पाना तो मुश्किल है, लेकिन हरियाणवी किसानों की उन्नत खेती ने एक बात तो साफ कर दी है कि धान के कटोरे में सब्जियों, फल और दलहन के लिए भी अकूत संभावनाएं हैं. हालांकि यह और बात है कि अभी स्थानीय किसान धान की खेती के अलावा कुछ और सोचने के मूड में तो बिल्कुल नहीं हैं.    

सरकार की तिरछी निगाहें

छत्तीसगढ़ में बाहरी व्यक्तियों द्वारा क्रय-विक्रय की जा रही कृषि भूमि पर राज्य सरकार की भी नजर है. प्रदेश के राजस्व मंत्री दयालदास बघेल कहते हैं, 'सरकार फिलहाल एक बिल पर काम कर रही है, जिसमें ऐसे प्रावधान किए जाएंगे कि प्रदेश में खेती की जमीन खरीदने के लिए मूल निवासी का प्रमाण पत्र पेश करना जरूरी हो जाएगा. ऐसे में बाहरी किसानों का प्रदेश में जमीन खरीदना नामुमकिन हो जाएगा. छत्तीसगढ़ में स्थानीय लोग ही जमीन खरीद सकेंगे. ऐसा इसलिए किया जा रहा है क्योंकि बड़े पैमाने पर दूसरे राज्यों के लोग छत्तीसगढ़ की जमीनों में निवेश कर रहे हैं.' इसके पहले राज्य सरकार ने 10 जुलाई, 2013 को छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता विधेयक की धारा 165 की उप धारा 4 में संशोधन करते हुए यह कानून तो बना ही दिया कि कोई भी भूस्वामी अपनी खेती की जमीन गैरकृषक को नहीं बेच पाएगा. इसके बाद छत्तीसगढ़ भी उन राज्यों की सूची में शामिल हो गया है, जहां कृषि भूमि को कोई किसान ही खरीद पाएगा.

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