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न्यूज क्लिपिंग्स् | ताकि मिले बढ़ती आबादी का फायदा- प्रो.सुरेश शर्मा

ताकि मिले बढ़ती आबादी का फायदा- प्रो.सुरेश शर्मा

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published Published on Jul 11, 2019   modified Modified on Jul 11, 2019
देश-दुनिया की तमाम सरकारों और नीति-निर्माताओं के लिए आज यह याद करने का दिन है कि जनसंख्या और उससे जुड़े मसलों का हल उनकी विकास-नीतियों के मूल में होना चाहिए। भारतीय संदर्भ में देखें, तो 1920 के दशक तक हमारे हिस्से में अत्यधिक जन्म-दर और मृत्यु-दर रही है, पर उसके बाद से इसमें लगातार गिरावट देखी गई। जन्म-दर, मृत्यु-दर और जनसंख्या वृद्धि का परस्पर संबंध किसी देश की जनसंख्या का स्वरूप तय करता है। यह बदलाव विभिन्न सामाजिक-आर्थिक, राजनीतिक और तकनीकी कारणों से संभव होता है। भारत में मृत्यु और जन्म-दर में कमी की कई वजहें रहीं। मसलन, लोगों के नजरिए में आया बदलाव, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की सुधरती हालत, राजनीतिक स्थिरता, पोषण में सुधार, गर्भ-निरोधक उपायों का प्रचार-प्रसार, मेडिकल सुविधाओं में बेहतरी, परिवार नियोजन कार्यक्रम आदि। इन्हीं सब कारणों से देश में धीमी जनसंख्या वृद्धि संभव हो पाई। हाल की ‘सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) स्टैटिस्टिकल रिपोर्ट 2017' के मुताबिक तो देश में जन्म-दर 20.2 है, जबकि शहरी भारत में 16.8। इसी तरह, भारत की मृत्यु-दर 6.3 है, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा 5.3 ही है।

 

बेशक भारत की जनसंख्या को लेकर कई तरह की सकारात्मक बातें कही जाती हैं, लेकिन उन सबमें ‘जनसांख्यिकी लाभांश' को छोड़कर बाकी सब महत्वहीन हैं। जनसांख्यिकी लाभांश दरअसल वह स्थिति है, जब जनसंख्या पिरामिड में आर्थिक रूप से सक्रिय आबादी की संख्या आश्रित आबादी (बच्चे और बुजुर्ग) से अधिक हो। नया आर्थिक सर्वेक्षण यही बताता है कि देश अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का कई तरह से फायदा उठा सकता है। लेकिन जैसा आप बोते हैं, वैसा ही काटते हैं। इसीलिए यदि भारत अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का अधिकतम लाभ उठाना चाहता है, तो उसे मानव पूंजी में अच्छा-खासा निवेश करना होगा। मगर इसका यह अर्थ भी नहीं कि देश के सभी हिस्सों में इसका समान रूप से लाभ मिलेगा। इसमें क्षेत्रवार अंतर हो सकता है। लेकिन हां, इसका लाभ मिलेगा जरूर।

 

फिलहाल, कुल प्रजनन-दर में गिरावट के साथ-साथ जनसंख्या पिरामिड का आधार भी सिकुड़ रहा है। इसका अर्थ है कि देश फिर से जनसांख्यिकीय लाभांश का गवाह बन सकता है। अनुमान है कि साल 2041 तक देश की कुल आबादी में 58.9 प्रतिशत हिस्सा 20-59 आयु वर्ग के लोगों का होगा। इसके कई पहलू होंगे। जैसे, हमें कहीं अधिक रोजगार के अवसर पैदा करने होंगे, शारीरिक के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण मानसिक स्वास्थ्य मुहैया कराने होंगे, श्रम बल में अधिकाधिक भागीदारी के साथ-साथ महिलाओं को स्वायत्तता देनी होगी और श्रम कानूनों में सुधार करना होगा। यानी, सरकारों को इस रूप में सक्रिय होना होगा कि वह वक्त सिर्फ जनसांख्यिकीय परिघटना का नहीं, बल्कि एक ऊर्जावान और आकांक्षी जनसांख्यिकीय लाभांश का गवाह बने।

 

बुजुर्ग होती आबादी का बढ़ना भारत की एक अन्य सच्चाई है। इसको लेकर कारगर नीति बनाने की जरूरत है। बुजुर्ग आबादी की जरूरतों को पूरा करने, उन्हें जरूरी सामाजिक सुरक्षा देने और उनसे जुड़े तमाम मसलों के निपटारे के लिए देश को तैयार होना होगा। अभी भारत में 60 या उससे अधिक उम्र के लोगों की संख्या 10.42 करोड़ है। साल 2041 तक इसके 23.94 करोड़ होने का अनुमान है। साफ है, आने वाले दशकों में जनसंख्या के लिहाज से भारत की वही स्थिति होगी, जो अभी चीन की है।

 

सुखद बात है कि आर्थिक सर्वेक्षण में इस बाबत तीन महत्वपूर्ण नीतियों का जिक्र किया गया है। पहली, प्राथमिक शिक्षा पर खास ध्यान इस सोच के साथ दिया गया है कि स्कूल जाने वाले विद्यार्थियों की संख्या में गिरावट आने से स्कूल गैर-उत्पादक हो जाएंगे और संसाधनों की बर्बादी होगी। नामांकन घटने से दुनिया भर में स्कूल बंद हुए हैं, और यह खासतौर से उन देशों की सच्चाई है, जो अभी बुजुर्ग होती अधिकाधिक आबादी का सामना कर रहे हैं। लिहाजा सर्वशिक्षा अभियान की शुरुआत बेशक देश के शैक्षणिक ढांचे की कमी को दूर करने के उद्देश्य से हुई थी, लेकिन अब इसमें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा-व्यवस्था को शामिल करना होगा। यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व्यवस्था के संकेतकों में सुधार नहीं हो रहा, तो स्कूलों की संख्या बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं है। आंकड़े भी यही बताते हैं कि मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में प्राथमिक स्कूलों की संख्या भले ही काफी अधिक हो, लेकिन छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मुहैया कराने में वे नाकाम रहे हैं।

 

देश के प्रमुख राज्यों में 5-14 आयु वर्ग की संख्या में अनुमानित गिरावट का भी यही संकेत है कि वहां स्कूलों में कम नामांकन हो रहा है। ऐसी सूरत में, प्रत्येक स्कूल में बच्चों की संख्या अपेक्षाकृत कम होगी। इससे या तो कुछ शिक्षण संस्थान मिलकर एक हो जाएंगे या फिर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सेवा की उपलब्धता बेहतर होगी। सरकारों को ऐसे जिलों की पहचान करनी होगी, जहां एक से तीन किलोमीटर के दायरे में मौजूद स्कूलों में नामाकन दर अधिक होने के बाद भी कक्षा में 50 से कम बच्चे हैं। इन स्कूलों का भार उन्हें उठाना होगा। यह स्कूलों के मजबूत एकीकरण को बढ़ावा देगा, जिससे संसाधनों के संतुलित वितरण में आसानी होगी और स्कूलों में छात्रों की आमद भी प्रभावित नहीं होगी।

 

आने वाले दशकों में ‘बुजुर्ग देश' की चुनौतियों से पार पाने के लिए हमें सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी को भी तत्काल दूर करना होगा। भारत ने कई विशिष्ट कार्यक्रमों के कारण मातृ और बाल स्वास्थ्य के क्षेत्र में शानदार नतीजा हासिल किया है। लिहाजा, अब प्रौढ़ आबादी की देखभाल संबंधी योजनाओं में न सिर्फ निवेश किए जाएं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं तक उनकी सम्मानजनक पहुंच सुनिश्चित की जाए। वैसे बुजुर्गियत से पार पाने का एक रास्ता सेवानिवृत्ति की आयु में वृद्धि भी है। सही रूपरेखा के साथ इस बदलाव का स्वागत किया जा सकता है। जीवन प्रत्याशा में बढ़ोतरी कई देशों में सेवानिवृत्ति आयु में वृद्धि की मुख्य वजह रही है। लिहाजा यह कहना गलत नहीं होगा कि जनसंख्या के मौजूदा परिदृश्य में जनसांख्यिकी लाभांश और बुजुर्ग होती आबादी ही हमारे विकास के दो ऐसे चरमराते पहिए हैं, जिनको सबसे अधिक ग्रीस यानी चिकनाई की जरूरत है।

(साथ में वंदना शर्मा)


https://www.livehindustan.com/blog/story-opinion-hindustan-column-on-11-july-2621334.html


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