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न्यूज क्लिपिंग्स् | दबाव और द्वंद्व में पिसते मासूम-- ज्योति सिडाना

दबाव और द्वंद्व में पिसते मासूम-- ज्योति सिडाना

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published Published on May 2, 2017   modified Modified on May 2, 2017
आजकल युवाओं का अच्छी नौकरी और उच्च वेतन पाने से संबंधित अलग-अलग तरह के दबावों के कारण आत्महत्या करना कुछ-कुछ समझ में आता है, लेकिन स्कूल में पढ़ने वाले छोटे-छोटे बच्चों की आत्महत्याएं समझ से परे हैं, क्योंकि इनके कारण गैर-तार्किक ही नहीं, बल्कि अर्थहीन भी होते हैं। उन्हें अपनी हर समस्या का एक ही हल नजर आता है- आत्महत्या कर लेना। उपभोक्तावाद ने एक-दूसरे की समस्याएं समझने की शैली को समाप्त कर दिया है। नतीजतन, लोगों में ‘आंतरिक गुस्सा' बढ़ गया है और आक्रामकता साफ देखी जा सकती है। ऐसा इसलिए भी हुआ कि सबको हर स्थान पर केवल सफलता चाहिए। हर जगह स्वीकृति। लेकिन यह तो प्रकृति के नियम के विरुद्ध है, क्योंकि द्वंद्वात्मकता (विरोधी विशेषताओं का एक साथ होना) तो जीवन के हर पहलू में पाई जाती है। सफलता-विफलता, स्वीकृति-अस्वीकृति, सच-झूठ, अच्छा-बुरा। फिर यह कैसे संभव है कि व्यक्तित्व में केवल एक पक्ष को शामिल किया जाए और दूसरे की उपस्थिति को नकार दिया जाए।


बचपन को परिभाषित करता लोकप्रिय गीत ‘बचपन हर गम से बेगाना होता है, कोई फिक्र न चिंता, मस्ती का आलम, जीवन खेल-सा लगता है' अब अर्थहीन हो गया है। दरअसल, बचपन को खुशियों का खजाना माना जाता था। व्यक्ति अपने जीवन में बचपन की अच्छी-बुरी बातों को याद रखता है। कई बार उन्हें याद करके अकेले में भी खुश होता है और कुछ समय के लिए ही सही, अपनी वर्तमान समस्याओं को भूल जाता है। लेकिन आज की पीढ़ी के पास तो बचपन जीने का ही समय नहीं है या कहें कि उसका बचपन आया ही नहीं। वह सीधा युवा बन जाता है। बचपन की मासूमियत, भोलापन, रूठना-मनाना, दोस्तों के साथ गली-मोहल्ले में सुबह-शाम खेलना, अपने-अपने घर से खाने-पीने का सामान लाकर एक-दूसरे के साथ साझा करना, छीन कर खा लेना, त्योहारों या उत्सवों में एक दूसरे के घर जाकर सबको मुबारकबाद देने जैसी बातें अब दिखाई नहीं देतीं। यही बचपन की ‘समाप्ति' का संकेत है।


कुछ समय पहले कोलकाता में छठी कक्षा में पढ़ने वाली ग्यारह साल की एक छात्रा ने खुदकुशी कर ली। स्कूल में लड़की को पहले उसके दोस्तों ने खाने के लिए अपना टिफिन आगे किया और बाद में मजाक उड़ाते हुए टिफिन साझा करने से मना कर दिया। इस बात का बच्ची को गहरा सदमा लगा और उसने कमरे में पंखे से फांसी लगा ली। एक अन्य घटना में मुंबई में एक चौदह साल की लड़की ने अपने स्कूल की छत से कूद कर आत्महत्या कर ली। उस पर अपनी एक सहेली का नकली फेसबुक प्रोफाइल बनाने का आरोप था। एक और घटना में आठ साल के बच्चे ने स्कूल के वाशरूम में आत्महत्या कर ली, क्योंकि टेस्ट की तैयारी न होने की वजह से वह बीमारी का बहाना बना कर स्कूल जाने से बच रहा था। दादी ने जब उसे जबर्दस्ती स्कूल भेजा तो उसने स्कूल में आत्महत्या कर ली। नौवीं कक्षा में पढ़ने वाले लड़के ने अपने कुछ सहपाठियों द्वारा शिक्षक से उसकी झूठी शिकायत करने पर जहर खाकर आत्महत्या कर ली। ये सिर्फ कुछ उदाहरण हैं। ऐसी अनेक घटनाएं सामने आ रही हैं।


हम यह नहीं कह रहे कि युवाओं द्वारा की गई आत्महत्याएं तार्किक होने की वजह से जायज हैं, लेकिन किशोरों और छोटे बच्चों की आत्महत्या के पीछे क्या तर्क है? यह गंभीर चिंतन का विषय है। समाजशास्त्री दुर्खीम ने अपनी किताब ‘द सुसाइड' में चार प्रकार की आत्महत्याओं की चर्चा की, जिसमें से एक है ‘घातक आत्महत्या'। इस प्रकार की आत्महत्या वे लोग करते हैं जिन्हें सामाजिक अलगाव या खारिज किए जाने का सामना करना पड़ता है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि बच्चों की आत्महत्याएं सामाजिक अलगाव और अस्वीकृति का परिणाम हैं। इन्हें किसी भी काम के लिए ‘नहीं' सुनना सहन नहीं होता। आज का बचपन न केवल हिंसा के दौर का हिस्सा है, बल्कि उनमें असहनशीलता भी घर कर गई है। जिन आत्महत्याओं को हम व्यक्तिवादिता की चरम परिणति या सामाजिक दबावों का परिणाम मान रहे थे, वे ‘हां-ना' या ‘स्वीकृति-अस्वीकृति' के कारण मूर्त रूप ले रही हैं।
राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार 2013 में भारत में दस-चौदह वर्ष की आयु के तीन हजार पांच सौ चौरानवे बच्चों ने आत्महत्या की और 2014 में चौदह वर्ष से कम आयु के एक हजार सात सौ बीस बच्चों ने और 14-18 वर्ष के नौ हजार दो सौ तीस बच्चों ने आत्महत्या की। इसके लिए निराशा, अस्वीकृति, विफलता, अमानवीय/अपमानजनक व्यवहार और उपेक्षा को महत्त्वपूर्ण कारण माना गया। सोचने की बात यह है कि इस आयु में न तो भविष्य या नौकरी की चिंता होती है और न ही किसी प्रकार की असुरक्षा सताती है। फिर क्यों यह पीढ़ी आत्महत्या का रास्ता चुनने को बाध्य होती है!


शायद परिवारों का छोटा आकार, माता-पिता के आपसी झगड़े, उनके द्वारा बात-बात में आत्महत्या करने की धमकी देना, टीवी धारावाहिक, अपराध कथाओं पर आधारित सीरियल, कार्टून चैनल आदि ऐसी घटनाओं के लिए जिम्मेदार हैं। इन घटनाओं के लिए परिवार, पड़ोसी, नातेदार, विद्यालय सभी को समान रूप से जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए, क्योंकि इनके पास बच्चों के ‘समावेशी विकास' का कोई प्रारूप ही नहीं है। पड़ोस और नातेदार जो कभी पारिवारिकता का अहसास दिलाते थे, वे अब ऐसा नहीं करते। इसी तरह शिक्षकों ने भी अभिभावक की भूमिका को निभाना या तो कम कर दिया है या फिर बंद कर दिया है। इसलिए यह राज्य, परिवार, पड़ोस, स्कूल का दायित्व है कि वे बच्चों के आसपास सामूहिकता और भावनात्मकता के परिवेश को स्थापित करें और उसे जिंदा बनाए रखें।


आज की पीढ़ी बेचैन और असंतुष्ट है। वह अपनी हर इच्छा को पूरा करने की इच्छुक है और अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अन्य इकाइयों का दोहन करती है, लेकिन अन्य की आवश्यकताओं की पूर्ति में खुद को सम्मिलित नहीं करने की मानसिकता से ग्रसित है। इसे ‘फंडामेंटल इनजस्टिस' की संज्ञा दी जाती है। यह भी सच है कि आज के प्रतिस्पर्धामूलक समाज में बच्चे समय से पहले वयस्क बन रहे हैं। उनमें बचपन की स्वाभाविकता समाप्त हो रही है और वे तनावग्रस्त होते जा रहे हैं। स्वाभाविकता की समाप्ति उनकी सृजनात्मकता की भी समाप्ति है। अगर बच्चों में सृजनात्मकता ही खत्म हो गई तो तनाव होना स्वाभाविक है। समय से पहले बड़े होने के कारण वे अपने बचपन की शरारतों से, दादा-दादी की कहानियों से, आस-पड़ोस के बच्चों के साथ गली-मोहल्ले में खेले जाने वाले विभिन्न खेलों से वंचित होते जा रहे हैं।


इसलिए आवश्यकता है कि बच्चों की मासूमियत और स्वाभाविकता को बनाए रखने के लिए उन्हें जीवन की वास्तविकताओं से परिचित कराया जाए, उन्हें सफलता-विफलता को समान रूप से स्वीकारने के लिए तैयार किया जाए, उनसे उनकी योग्यता से अधिक अपेक्षा नहीं की जाए, परिवार में तनावरहित और सकारात्मक वातावरण बनाया जाए। उन्हें निर्भरता की संस्कृति का हिस्सा न बना कर निर्णय लेने की प्रक्रिया का भाग बनाया जाए, तभी वे अपने व्यक्तित्व का समग्र विकास कर पाएंगे।यह भी एक सीमा तक सच है कि भारत में वैश्वीकरण की प्रक्रिया के बावजूद परिवार और विद्यालय लोकतांत्रिक नहीं बन पाए हैं और वे समानता-स्वतंत्रता के मूल्यों को बच्चों के व्यक्तित्व में शामिल कर सकने में असफल सिद्ध हुए हैं। ये घटनाएं किसी भी स्थिति का परिणाम हों, पर बाल्यावस्था और किशोर पीढ़ी के विकास की प्रक्रिया में खतरे की सूचक हैं, जिन पर समाज के सभी समूहों को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। ये कल के भारत की एक भयावह तस्वीर हमारे सामने प्रस्तुत करती नजर आती हैं। हम ऐसे समाज की ओर अग्रसर हैं जहां ‘स्मार्ट टेक्नोलॉजी' पर तो हमारा ध्यान है, लेकिन ‘बचपन की स्मार्टनेस' पर नहीं, जो बच्चे में तभी आती है जब उसे उसकी उम्र के हिसाब से बढ़ने दिया जाए। जीवन की हर अवस्था यानी शैशव, बाल्यकाल, किशोरावस्था, युवावस्था... आदि का अपना महत्त्व होता है। हर अवस्था में वह जीवन जीने की कला सीखता है। एक भी पड़ाव कम हुआ तो उसके कई खतरे हो सकते हैं।

 


http://www.jansatta.com/politics/jansatta-article-of-increasing-suicide-in-youth/313370/


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