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न्यूज क्लिपिंग्स् | नयी सरकार के सामने गांव के पुराने मुद्दे- पंचायतनामा डेस्क

नयी सरकार के सामने गांव के पुराने मुद्दे- पंचायतनामा डेस्क

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published Published on May 22, 2014   modified Modified on May 22, 2014

16 मई को देश में लोकसभा चुनाव का परिणाम आ गया है. देश को भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार मिलने जा रही है. भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने चुनाव अभियान के दौरान अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर राजनीतिक हमले के साथ विकास के मुद्दे को फोकस किया. उन्होंने कृषि, ग्रामीण रोजगार, शौचालय जैसे अहम मुद्दों की चर्चा प्रचार अभियान के दौरान की. हम अपनी आमुख कथा में गांव-पंचायत के ऐसे प्रमुख एजेंडों की चर्चा कर रहे हैं, जिस पर नयी सरकार को काम करना होगा. जिससे न सिर्फ विकास के आंकड़े दुरुस्त होंगे, बल्कि मानव विकास सूचकांक में भी देश की स्थिति सुधरेगी.

कृषि अर्थव्यवस्था

कृषि अर्थव्यवस्था को दुरुस्त करना नयी सरकार के लिए एक प्रमुख चुनौती है. हालांकि कृषि पर निर्भर जनसंख्या के अनुपात में कमी आयी है. पर, जीडीपी के रूप में कृषि का घटता योगदान अब भी चिंता की बात है. रिपोर्ट बताती है कि 42 प्रतिशत किसान खेती छोड़ना चाहते हैं और देश में बीते 15 सालों में 2.90 लाख किसानों ने आत्महत्या की है. ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में कृषि की औसत विकास दर 3.7 प्रतिशत रही. नौवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कृषि की औसत विकास दर 2.5, जबकि दसवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान कृषि की औसत विकास दर 2.4 रही. हाल के सालों में कृषि की विकास दर सबसे खराब 2008-09 (0.1}) व 2009-10 (0.8}) में रही. ध्यान रहे इन वर्षो में देश में अच्छी बारिश नहीं हुई थी और सरकार ने देश के कई हिस्सों को सूखा प्रभावित घोषित किया था. यानी कृषि अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने में पानी सबसे महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है. इसके साथ तकनीकी, निवेश, फसल बीमा, स्टोरेज की व्यवस्था आदि भी इसको प्रभावित करती है. हाल में जब मौसम विज्ञानी इस बार सामान्य से कम मानसून रहने की आशंका व्यक्त कर रहे हैं, तो ऐसे में आर्थिक व कृषि मामलों के जानकार महंगाई बढ़ने की बात कर रहे हैं, क्योंकि इसके पीछे यह तर्क है कि फसल का उत्पादन कम हो सकता है, जिससे स्वाभाविक रूप से महंगाई बढ़ेगी. यानी खराब व अनियमित मानसून की चुनौतियों से निबटने के लिए बेहतर सिंचाई व्यवस्था हो तो कृषि के लिए यह लाभदायक रहेगी. जैसा कि चुनाव परिणाम से साफ हो चुका है कि एनडीए सरकार बनने वाली है, तो उसे अपने किये वादे के अनुरूप प्रधानमंत्री सिंचाई योजना का लागू करना होगा. अगर यह योजना सफलतापूर्वक क्रियान्वित होती है और कृषि के क्षेत्र में निवेश, तकनीक व आधारभूत संरचना का विस्तार होता है, तो यह कृषि के लिए लाभदायक होगा.

महिला एवं बाल विकास

देश की 70 प्रतिशत आबादी महिला एवं बच्चों की है. यानी देश में मानव संसाधन के स्तर में सुधार के लिए और विकास को रफ्तार देने के लिए इस वर्ग का विकास आवश्यक है. यह भी ज्ञात है कि इस 70 प्रतिशत आबादी का भी दो तिहाई गांव में  रहता है, जो अपेक्षाकृत सुविधाओं, योजनाओं से ज्यादा कटा हुआ है. गरीब वर्ग, अत्यंत वंचित सामाजिक व धार्मिक समुदाय, अन्य पिछड़े वर्ग, अनुसूचित जाति व जनजाति वर्ग के महिला एवं बच्चों, खानाबदोश तबके के महिलाओं व बच्चों के लिए प्रभावी कार्यक्रमों की अधिक आवश्यकता है. 12वीं पंचवर्षीय योजना में भी इस वर्ग को विशेष रूप से फोकस करने की जरूरत पर बल दिया गया है. आंकड़े बताते हैं कि देश में शून्य से 18 वर्ष के 43 करोड़ बच्चे हैं. इसमें  11.8 करोड़ बच्चे श्रमिक कार्यो में लगे हैं. नवजात मृत्यु दर प्रति हजार पर 47 है. साथ ही देश में मातृत्व मृत्यु दर भी काफी है. मातृ मृत्यु दर 2007-09 के आंकड़ों के हिसाब से प्रति लाख पर 212 है. इसे कम करना आवश्यक है. एक तिहाई महिला व किशोर युवतियों (36 प्रतिशत) का बॉडी मॉस इंडेक्स 18.5 से कम है. जिससे वे कम ऊर्जावान होती हैं.

रोजगार एवं कौशल विकास

फोटो : रोजगार

देश में कृषि पर ग्रामीण मानव श्रम की निर्भरता कम हुई है. ऐसे में यह जरूरी है कि गैर कृषि क्षेत्र न केवल उन लोगों को लाभप्रद रोजगार प्रदान करने में समर्थ हो जो श्रमिक बनना चाहते हैं, बल्कि उन लोगों को भी लाभ कर रोजगार प्रदान करने में समर्थ हों जो कृषि कार्य छोड़ कर आये. कृषि कार्य छोड़ चुके ऐसे लोगों को अत्यधिक पूंजी लगने वाले क्षेत्र या कौशल वाले क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध करवाना मुश्किल होता है. अत: इनके लिए मध्यम, लघु व कम उत्पादकता वाले उद्योगों व व्यवसायों में बेहतर रोजगार उपलब्ध हो सकता है. अत: इस क्षेत्र को प्रोत्सिहत करना नयी सरकार के लिए आवश्यक है. ताकि ग्रामीण क्षेत्र के लोगों को अधिक से अधिक संख्या में रोजगार मिल सके. ग्रामीण संसाधनों के अनुरूप कौशल विकास के लिए व्यापक कार्यक्रम चलाना भी आवश्यक है. 1983 में देश में बेरोजगारी दर 9.9 प्रतिशत थी, 1993-94 में 6.06 प्रतिशत, 1999-2000 में 7.31 प्रतिशत, 2004-05 में 8.28 प्रतिशत व 2009-10 में 6.6 प्रतिशत है. योजना आयोग के एक अध्ययन में पता चला है कि अशिक्षित कामगारों का सर्वाधिक प्रतिशत कृषि (लगभग 40 प्रतिशत) में और उसके बार गैर विनिर्माण क्षेत्र (33 प्रतिशत) में है. हालांकि इस तरह के श्रमिक वर्ग भी गैर औपचारिक प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं. ऐसे में कौशल विकास कर लोगों को रोजगार से जोड़ना आवश्यक है. क्षेत्रीय संसाधन के अनुरूप अगर लोगों का कौशल विकास हो तो उससे जुड़े रोजगार से वे आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त कर सकते हैं. खाद्य प्रसंस्करण, हस्तकरघा व हस्तशिल्प आदि में बड़ी संख्या में रोजगार सृजन की संभावनाएं हैं.

शिक्षा एवं मानव संसाधन

21वीं सदी में आर्थिक और सामाजिक विकास के लिए यह आवश्यक है कि हर किसी को बेहतर शिक्षा मिल सके. शिक्षा के कारण न सिर्फ आर्थिक कल्याण के लिए कौशल व योग्यता उपलब्ध कराती है, बल्कि यह नागरिकों को शासन प्रक्रियाओं में पूर्ण रूप से सहभागी भी बनाता है. शिक्षा के स्तर पर देश ने अच्छी उपलब्धि हासिल की है, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना जरूरी है. 1983 के युवा साक्षरता दर 60 प्रतिशत के स्तर से 2009-10 में बढ़ कर 91 प्रतिशत हो गयी. युवा साक्षरता दर 2001 के 64.8 प्रतिशत से सुधर कर 2011 में 74 प्रतिशत हो गयी.  एक ओर जहां प्राथमिक शिक्षा में लैंगिक स्तर काफी कम है. वहीं, उच्च शिक्षा में इस अंतर को पाटना अब भी चुनौती है. अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अति पिछड़े वर्ग में शैक्षणिक पिछड़ापन काफी ज्यादा है. बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश में बच्चों की उपस्थिति स्कूलों में 60 प्रतिशत से कम है. 46 प्रतिशत प्राथमिक और 34 प्रतिशत उच्च प्राथमिक स्कूलों में छात्र-शिक्षक अनुपात बहुत खराब है. इन चीजों को भी दुरुस्त किये जाने की जरूरत है.

बुनियादी सुविधा

गांव में बुनियादी सुविधाओं का अभाव है. गांव में सड़कों का जाल बिछाना जरूरी है. 60 प्रतिशत भारतीय घरों में शौचालय उपलब्ध नहीं है. बिहार, झारखंड जैसे अपेक्षाकृत विकास की दौड़ में पीछे रह गये राज्यों में यह आंकड़ा और भी बुरा है. बिजली की उपलब्धता के मामले में भी बिहार-झारखंड देश के सबसे पिछड़े राज्य हैं. ग्रामीण सड़कों की भी स्थिति यहां अच्छी नहीं है. इसके अलावा गांव व पंचायत में पंचायत भवन, सामुदायिक भवन का भी अभाव है. झारखंड इस मामले में देश के सबसे पिछड़े राज्यों में शुमार है. नयी सरकार के सामने गांव के इन मुद्दों पर पहल करना जरूरी है.

शासन व सेवा-सुविधा गुणवत्ता में सुधार

पिछले कुछ दशकों में सार्वजनिक कार्यक्रमों में खर्च होने वाली राशि में गुणात्मक ढंग से वृद्धि हुई है. ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना में 15 बड़े प्रमुख कार्यक्रमों में लगभग सात लाख करोड़ रुपये व्यय किये गये. इतनी बड़ी राशि खर्च करने का मूल उद्देश्य है कि इसे कमजोर व जरूरतमंद वर्ग के हित में खर्च किया जाये. लेकिन इस लक्ष्य को तबतक नहीं पाया जा सकता है, जबतक एक बेहतर शासन तंत्र नहीं हो.

कह सकते हैं कि खराब शासन तंत्र का सबसे ज्यादा नुकसान ग्रामीण आबादी को ही होता है. यह माना भी जाता है कि खराब शासन तंत्र जरूरतमंदों को उनके अधिकारों से वंचित कर देता है. विशेषज्ञों का मानना है कि भ्रष्टाचार को रोकने के लिए व शासन तंत्र को अधिक दुरुस्त करने के लिए ई-शासन और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल किया जाये. लोक  सेवा को लोगों को प्रदान करने की व्यवस्था में भी सुधार लाना होगा. जैसे, राशन कार्ड, जाति प्रमाण पत्र, आय प्रमाण पत्र, आवास प्रमाण पत्र आदि जैसी सेवाएं सहज ढंग से ग्रामीण समुदाय को मिले. अगर ये सेवाएं सही से नहीं मिलती हैं, तो इसे पाने के लिए भ्रष्टाचार बढ़ता है और आमलोगों के लिए सरकार से असंतुष्ट होने का यह एक प्रमुख कारण होता है. यह भी आवश्यक है कि सरकार व सिविल सोसाइटी यानी सामाजिक कार्यकर्ताओं के बीच भागीदारी को मजबूत बनाने के लिए पहल हो. पंचायती राज संस्थाओं को सौंपे गये कार्यो को अधिक गतिशीलता प्रदान करने के लिए सिविल सोसाइटी की भूमिका महत्वपूर्ण बनायी जाये. सुशासन से ही सांसाधनों का प्रभावकारी उपयोग संभव है एवं नागरिकों को सहज सेवा प्राप्त हो सकती है.

स्वास्थ्य क्षेत्र

देश के ग्रामीण क्षेत्र में स्वास्थ्य ढांच अच्छा नहीं है. बिहार-झारखंड जैसे क्षेत्र में यह ढांचा और भी अधिक खराब है. ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना के दौरान प्रति एक लाख आबादी पर देश में 45 डॉक्टर उपलब्ध थे, जबकि आदर्श संख्या 85 होनी चाहिए. इसी प्रकार प्रति एक लाख जनसंख्या पर 75 नर्स यहां उपलब्ध हैं, जबकि आदर्श संख्या 255 होनी चाहिए. सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्र की सेवा-सुविधाओं की गुणवत्ता में काफी अंतर है. अध्ययन बताते हैं कि बहुत सारे डॉक्टर प्र्याप्त अर्हता प्राप्त नहीं हैं. अब भी स्वास्थ्य उपकेंद्रों की संख्या में 20 प्रतिशत, पीएचसी में 24 प्रतिशत और सीएचसी में 37 प्रतिशत की कमी है. यह कमी विशेष रूप से बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश व उत्तरप्रदेश में है. सीएचसी को बेहतर प्रसव केंद्र के रूप में विकसित नहीं किया जा सका. अगर ऐसा हो सके तो मातृत्व व नवजात शिशु मृत्युदर में उल्लेखनीय कमी आ सकेगी. ग्रामीण स्वास्थ्य ढांचे को सुधारने के लिए आधारभूत संरचना के निर्माण के साथ स्वास्थ्य सेवा के महत्वपूर्ण कार्मिकों की भी नियुक्ति आवश्यक है.


http://www.prabhatkhabar.com/news/115221-story.html


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