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न्यूज क्लिपिंग्स् | नये साल की यही शुभकामना !-- योगेन्द्र यादव

नये साल की यही शुभकामना !-- योगेन्द्र यादव

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published Published on Dec 29, 2017   modified Modified on Dec 29, 2017
अगर चंपारण और रूस की क्रांति के लिए प्रसिद्ध 1917 देश और दुनिया में संभावनाएं खुलने का वर्ष था, तो 2017 देश और दुनिया के सिकुड़ने का साल माना जायेगा. यह साल संभावनाओं के सिकुड़ने का साल था और संवेदनाओं के सिमटने का साल था. बीते साल में भाजपा का विस्तार और लोकतंत्र का पराभव जारी रहा.

भाजपा चुनाव भी जीती और राजनीति के खेल भी. उत्तर प्रदेश में भाजपा की बड़ी और अप्रत्याशित जीत हुई, उत्तराखंड और हिमाचल में कांग्रेस को अपदस्थ किया और अंतत: गुजरात में भी सरकार बनाने में सफल रही. गोवा और मणिपुर में भाजपा को जीत तो हासिल नहीं हुई, लेकिन जोड़-तोड़ और तिकड़म के सहारे सरकार भाजपा ने ही बनायी. इसी तरह पर्दे के पीछे खेल करके भाजपा ने जयललिता की मौत के बाद तमिलनाडु में अपनी पसंद के धड़े को कुर्सी पर बैठाया.

भाजपा तो जीती, लेकिन देश नहीं जीता. साल के शुरू में नोटबंदी का जादू सबके सर पर चढ़कर बोल रहा था, लेकिन साल ढलते-ढलते यह तिलिस्म हवा हो चुका था. जिस तरह जीएसटी को जल्दबाजी में लागू किया गया, उससे छोटे और बड़े व्यापारी सब तंग थे. उधर सालभर खेती में संकट और आत्महत्या की खबर आती रही. राष्ट्रीय स्तर पर आर्थिक वृद्धि के आंकड़े बुरी खबर ला रहे थे. ऐसे में गुजरात का उदाहरण देखकर यह आशंका बनती है कि मतदाता को लुभाने के लिए फिर हिंदू-मुसलमान का खेल होगा.

गुजरात चुनाव के बाद से कांग्रेस भले ही इस गलतफहमी में है कि उसकी वापसी की शुरुआत हो गयी है, पर हकीकत कुछ और है. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल में कांग्रेस की फजीहत हुई. गोवा और मणिपुर में बनती हुई सरकार हाथ से गयी. गुजरात भी एक बने-बनाये मौके को गंवाने की कहानी है.

ग्रामीण गुजरात में जितना असंतोष और गुस्सा था कांग्रेस उसके एक छोटे से अंश को ही अपनी दिशा में मोड़ने में समर्थ रही. राष्ट्रीय स्तर पर देखें, तो कांग्रेस के पास न तो जमीनी स्तर पर संगठन है, न ही यह पार्टी संघर्ष के मैदान में खड़ी है, और न ही इसके पास देश के लिए कोई नया सपना है. सोनिया गांधी की जगह पर अब औपचारिक रूप से राहुल गांधी का चेहरा लगा देने से कांग्रेस अमित शाह की जबर्दस्त चुनावी मशीन का मुकाबला कैसे कर पायेगी, यह समझ नहीं आता.

यह साल विपक्ष की विकल्प की संभावनाओं के बंद होने का साल भी था. साल की शुरुआत में विपक्षी एकता के सबसे कद्दावर नेता के रूप में उभर रहे नीतीश कुमार ने सत्ता के लालच के चलते भाजपा की गोद में बैठना कुबूल किया. तृणमूल कांग्रेस को छोड़कर ज्यादातर क्षेत्रीय दलों का ह्रास और वामपंथी दलों का पतन बदस्तूर जारी रहा. पंजाब में बहुत उम्मीद जगाने के बाद हारने से आम आदमी पार्टी वैकल्पिक राजनीति के हाशिये पर चली गयी है.

स्थापित दलों के दायरे के बाहर तमिलनाडु में जल्लीकट्टू आंदोलन और पाटीदार, मराठा, कापू या जाट समुदाय के लिए आरक्षण के आंदोलन की ऊर्जा तो दिखायी दी, लेकिन किसी सार्थक वैकल्पिक राजनीति की दिशा दिखायी नहीं देती. विकल्प की संभावना केवल दो ही छोर से आती दिखायी दी. जून के महीने में मंदसौर में किसानों पर पुलिस की गोली चलने से देशभर में जो किसान आंदोलन शुरू हुआ, वह आंदोलन कदम-दर-कदम आगे बढ़ता गया. दूसरी तरफ देश के अलग-अलग कोनों से युवाओं और विद्यार्थियों में प्रतिरोध के स्वर उभरे.

यह साल लोकतांत्रिक संस्थाओं के सिकुड़ने का साल भी था. सरकार की स्वच्छंदता पर ब्रेक लगाने की उम्मीद जिन संस्थाओं से हो सकती है, वे सब इमरजेंसी की तरह एक के बाद एक बिछती जा रही हैं. इस साल चुनाव आयोग भी सरकार के पक्ष में झुका हुआ दिखायी दिया.

इवीएम मशीनों में गड़बड़ी के आरोपों में भले ही कुछ दम नहीं है. लेकिन, चुनाव आयोग में दरबारी अफसरों की नियुक्ति और गुजरात चुनाव में चुनाव आयोग का आचरण निराश करता है. इस साल का सबसे दुखद पहलू था सुप्रीम कोर्ट का आचरण. इसमें कोई शक नहीं की प्राइवेसी और ट्रिपल तलाक के मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से संवैधानिक मर्यादा मजबूत होती है.

लेकिन, बिड़ला सहारा डायरी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह अपने ही जैन हवाला कांड के निर्णय को पलटा, वह स्तब्ध करनेवाला था. खासतौर पर इस साल सुप्रीम कोर्ट के दोनों मुख्य न्यायाधीशों पर जब उंगली उठी, तब न्यायपालिका का आचरण शक को खत्म करने की जगह शक को गहरा करनेवाला था. लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलानेवाला मीडिया या तो सत्ता के चारण और भाट का काम करता रहा, या फिर सत्ता से सवाल पूछने की जगह सिर्फ विपक्ष से सवाल पूछता रहा. जिसने सरकार के खिलाफ कुछ भी बोलने की हिमाकत की, उसकी बांह मरोड़ दी गयी.


यह साल हमारी संवेदनाओं के कुंद होने का भी साल था.

गोरखपुर मेडिकल कॉलेज में ऑक्सीजन की कमी से बच्चों का मरना दो-चार दिन की सनसनीखेज खबरों का आधार बना, लेकिन उससे सरकारी अस्पतालों के बारे में देशभर में कोई संवेदना नहीं जायेगी. गुरमीत सिंह उर्फ बाबा राम रहीम के कुकृत्य का भंडाफोड़ होने पर देश ने हनीप्रीत की कहानियां सुनकर चस्का जरूर लिया, लेकिन महिलाओं के शोषण और उनके विरुद्ध हिंसा के बारे में देश में चेतना नहीं जगी. यह साल शुरू होने से पहले ही अखलाक की हत्या हो चुकी थी.

इस साल जुनैद और पहलु खान का नंबर था. गौरी लंकेश की हत्या पर जरूर बवाल मचा, लेकिन वह तो नामी-गिरामी पत्रकार थीं, हिंदू थीं. लेकिन, जब उसके बाद अफराजुल की नृशंस हत्या और उसका वीडियो आया, तो यह राष्ट्रीय संवेदना फिर कहीं गुम हो गयी थी.

इधर देश सिकुड़ रहा था, उधर दुनिया भी सिमट रही थी. यह साल डोनाल्ड ट्रंप के दुनिया की सबसे ताकतवर कुर्सी पर बैठने का पहला साल था. झूठ के बादशाह और खड़दिमाग ट्रंप केवल एक व्यक्ति नहीं है, वह अमेरिकी दिमाग के पतन का प्रतीक है.

कल तक देश-दुनिया की नायिका आंग सान सू ची ने अपने ही देश में अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के सवाल पर जो शतुर्मुर्गी रुख अपनाया, उसने दुनिया को स्तब्ध कर दिया. नये साल के लिए यही शुभकामना हो सकती है कि देश और दुनिया इस सिकुड़न से बाहर निकले.


https://www.prabhatkhabar.com/news/columns/story/1104506.html


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