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न्यूज क्लिपिंग्स् | पर्यावरण की राजनीति और धरती का संकट

पर्यावरण की राजनीति और धरती का संकट

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published Published on Sep 14, 2009   modified Modified on Sep 14, 2009

खुद मनुष्य ने अपनी भावी पीढ़ियों की जिंदगी को दांव पर लगा दिया है। दुनिया भर में चिंता की लकीरें गहरी होती जा रही हैं। सवाल ल्कुल साफ है- क्या हम खुद और अपनी आगे की पीढ़ियों को बिगड़ते पर्यावरण के असर से बचा सकते हैं? और जवाब भी उतना ही स्पष्ट- अगर हम अब भी नहीं संभले तो शायद बहुत देर हो जाएगी। चुनौती हर रोज ज्यादा बड़ी होती जा रही है।

 समस्या है धरती का लगातार गरम होते जाना। धरती का तापमान हर साल बढ़ रहा है। मनुष्य की गतिविधियों की वजह से धरती का तापमान वैसे तो सदियों से बढ़ रहा है, लेकिन पिछले 100 साल में यह रफ्तार काफी तेज हो गई है।

 ·    1905 से 2005 के बीच धरती का सालाना औसत तापमान 0.76 डिग्री सेल्शियस बढ़ा।

 ·    1995 से 2006 तक के 12 साल औसतन सबसे गरम साल में रहे। *(1850 में तापमान के रिकॉर्ड रखने की शुरुआत हुई। यह आंकड़ा इसी रिकॉर्ड पर आधारित है)***

 ·         अगर धरती का तापमान मौजूद दर से ही बढ़ता रहा तो 2030 तक इसमें 2 से 2.8 डिग्री और इस सदी के अंत तक 6 डिग्री सेल्शियस तक की बढ़ोतरी हो सकती है। सन् 2100 तक 1.5 से लेकर 3.5 डिग्री सेल्शियस तक धरती का तापमान बढ़ना तो तय माना जा रहा है। *(यह अनुमान संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय समिति (**IPCC) ** का है।) *

 ·  अमेरिका के मेसाचुसेस्ट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) के अनुसंधानकर्ताओं के मुताबिक कुछ वर्ष पहले तक माना जा रहा था कि सन् 2100 तक धरती के तापमान में करीब 4 डिग्री की बढ़ोतरी होगी, लेकिन अब यह 9 डिग्री सेल्शियस तक हो सकती है। इसकी वजह है ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में अपेक्षा से ज्यादा वृद्धि। साथ ही समुद्र के कार्बन डाय-ऑक्साइड सोखने की क्षमता जितनी मानी गई थी, यह क्षमता उससे कम साबित हो रही है।आखिर धरती क्यों गरम हो रही है? इसकी वजह यह है कि धरती सूरज से जितनी ऊर्जा ग्रहण करती है, वह उससे कम अंतरिक्ष में वापस भेज पा रही है। नतीजा है-असंतुलन। यह अंसतुलन धरती के हर वर्गमीटर क्षेत्र में एक वॉट बिजली के बराबर
 है। मतलब यह कि धरती एक ऐसे कमरे की तरह हो गई है, जिसमें ताप तो लगातार पैदा हो रहा है, लेकिन खिड़कियां, दरवाजे और धत से उसी अनुपात में ऊर्जा निकल नहीं पा रही है। इसलिए कि तमाम निकास द्वारों पर गैसों की परतें जम गई हैं।

 इन गैसों को विज्ञान की भाषा में ग्रीन हाउस गैस कहते हैं। कार्बन डॉय-ऑक्साइड, पानी का वाष्प, मिथेन, ओजोन और नाइट्र्स ऑक्साइड आदि ऐसी गैसें हैं। ये गैसें धरती के निचले वातावरण में जम रही हैं। इनकी परत लगातार मोटी हो रही है। इन गैसों की मात्रा में इजाफे के लिए जिम्मेदार है- इंसान और उसकी गतिविधियां। कार्बन डाय-ऑक्साइड के मुख्य स्रोत हैं- कोयले और पेट्रोलियम जैसे जमीन के नीचे दबे ईंधन। पिछली सदियों में इस ईंधन का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा। दूसरी तरफ जंगलों की कटाई भी तेजी से हुई है और इस तरह पेड़-पौधे कम हो गए हैं, जो वातावरण से कार्बन डाय-ऑक्साइड को सोखते हैं।

 पिछले 100 साल में वातावरण में कार्बन डाय-ऑक्साइड की मात्रा 31 फीसदी बढ़ी है। अगर औद्योगिक क्रांति के बाद यानी पिछले ढाई सौ साल के आंकड़ों पर गौर करें तो पहले जहां वातावरण में कार्बन डाय-ऑक्साइड की मात्रा 280 पी पी एम (ParticlePer Million) थी, वहीं यह अब 385 पी पी एम हो गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह पिछले साढ़े छह लाख साल के इतिहास की सबसे ऊंची मात्रा है।

 ग्रीन हाउस गैसें सिर्फ वातावरण में ही नहीं, बल्कि समुद्र तल और मिट्टी पर भी इकट्ठी हो रही हैं। इन सबसे धरती का तापमान बढ़ रहा है। दरअसल, सूरज से जो ऊर्जा आती है, उसका 47 फीसदी धरती का तल यानी जमीन और समुद्र मिल कर सोख लेते हैं। इसका एक हिस्सा वातावरण सोख लेता है। बाकी हिस्सा (तकरीबन 30 प्रतिशत) धरती इन्फ्रारेड किरणों के रूप में वापस अंतरिक्ष में भेज देती है। बादल,  suspended atmospheric particles, भूतल की बनावट आदि की इस क्रिया में अहम भूमिका होती हैं। दूसरी तरफ ग्रीन हाउस गैसें धरती से वापस जा रही इन्फ्रारेड किरणों को सोखकर उसे दोबारा धरती पर लौटा देती हैं।

 ग्रीन हाउस गैसों का यह व्यवहार धरती पर ताप के संतुलन को बिगाड़ देता है।इसीलिए धरती के गरम होने की प्रक्रिया को ग्रीन हाउस वॉर्मिंग भी कहा जाता है।शायद आप सोचते हों कि आखिर इन गैसों को ग्रीन हाउस गैसें क्यों कहा जाता है? इसका एक संदर्भ है। जब वैज्ञानिकों ने धरती पर सूरज से ऊर्जा आने की प्रक्रिया को समझना शुरू किया तो उनकी राय बनी कि धरती और उस पर वातावरण की चादर एक ऐसे बक्शे की तरह हैं, जिस पर शीशे का ढक्कन लगा हुआ है। इससे सूरज के ताप का काफी हिस्सा धरती पर ही रह जाता है और इससे धरती की ऊर्जा की जरूरत पूरी होती है। ठंडे देशों में किसान इस सिद्धांत का इस्तेमाल सब्जियां, फल, फूल आदि उगाने में किया करते थे। यानी बाहर से आए ताप को रोक कर उन्होंने ग्रीन हाउस बनाए, ऐसे हाउस जहां हरी चीजें उगाई गईं। इसी क्रिया से इन गैसों को ग्रीन हाउस नाम मिला।

 यानी ग्रीन हाउस गैसों को हम उन गैसों के रूप में समझ सकते हैं, जो वातावरण में ताप को सोखने और उन्हें धरती पर लौटाने का काम करती हैं। इस क्रिया को ग्रीन हाउस प्रभाव (इफेक्ट) कहा जाता है। वातावरण में बहुत सी गैसें मौजूद हैं, लेकिन सभी ताप को धरती पर लौटाने का काम नहीं करतीं। पानी का वाष्प, कार्बनडाय-ऑक्साइड और मिथेन ऐसी भूमिका निभाती हैं, जबकि नाइट्रोजन और ऑक्सीजन ऐसा
 नहीं करतीं।

 ग्रीन हाउस इफेक्ट पैदा करने वाली गैसों की वातावरण में मात्रा बहुत कम है। सिर्फ करीब एक फीसदी। इसीलिए इनमें मामूली बढ़ोतरी भी बड़ा फर्क डाल सकती है।लेकिन इन गैसों को खलनायक नहीं समझा जाना चाहिए। सच्चाई तो यह है कि इन गैसों का होना धरती के लिए फायदेमंद रहा है। अगर धरती पर इन गैसों की चादर नहीं होती, तो धरती का तापमान आज से 40 डिग्री सेल्शियस कम होता। जाहिर है, वैसे में यहां जिंदगी का अस्तित्व मुश्किल होता। इसलिए समस्या इन गैसों का होना नहीं, बल्कि संतुलन का बिगड़ना है। प्रकृति ने आवश्यकता के मुताबिक जितनी इन गैसों की व्यवस्था की है, उससे ज्यादा मात्रा बढ़ना हानिकारक है। यही नुकसान अब धरती को भुगतना पड़ रहा है।

 हालांकि वातावरण में 30 से ज्यादा ऐसी गैसें हैं जिन्हें ग्रीन हाउस गैसों की श्रेणी में रखा जा सकता है, लेकिन इनके बीच कार्बन डाय-ऑक्साइड और मिथेन को सबसे हानिकारक माना जाता है। इसकी वजह यह है कि बाकी गैसों की या तो मात्रा बहुत कम है, या फिर वे इन्फ्रारेड किरणों को वापस भेजने में ज्यादा भूमिका नहीं निभातीं।

 ·         हर इंसान कार्बन डाय-ऑक्साइड की मात्रा बढ़ाने में योगदान करता है। हम जो सांस छोड़ते हैं, वह कार्बन डाय-ऑक्साइड है। चूल्हा जलाने से निकलने वाला धुआं भी कार्बन डाय-ऑक्साइड है। लेकिन पेड़-पौधे सूरज की रोशनी में इस गैस को सोख लेते हैं। इसी वजह से हजारों सालों से कभी वातावरण में कार्बन डाय-ऑक्साइड बढ़ने की समस्या पैदा नहीं हुई। औद्योगिक सभ्यता यह समस्या अपने साथ लेकर आई।आज जब हम बिजली पैदा करते हैं, मोटर वाहन चलाते हैं, विमान चलाते हैं या कारखाने चलाते हैं, तो ग्रीन हाउस गैसे बड़ी मात्रा में निकलती है।

 ·         मिथेन गैस कृषि एवं पशुपालन संबंधी गतिविधियों से पैदा होती है। यह गैस ग्रीन हाउस इफेक्ट पैदा करने में भूमिका तो जरूर निभाती है, लेकिन इसे कम खतरनाक इसलिए माना जाता है, क्योंकि मिथेन का ‘जीवन-काल’ छोटा होता है- सिर्फ सात साल। इसके बाद यह गैस कार्बन डाय-ऑक्साइड और पानी में विघटित हो जाती है।

 ·         ओजोन गैस की परत खतरनाक परा-बैंगनी (अल्ट्रा-वॉयलेट) किरणों से धरती को को बचाती है। यह परत दोनों ध्रुवों के आठ किलोमीटर ऊपर से लेकर भू-मध्य रेखा के 15 किलोमीटर ऊपर तक धरती के रक्षा कवच के रूप में मौजूद है। इसी ऊंचाई पर ज्यादातर मौसम और जलवायु संबंधी परिघटनाएं होती हैं। धरती पर जलते जीवाश्म (fossil) ईंधन पर धूप की प्रतिक्रिया से ओजोन गैस पैदा होती है।

 ·         ओजोन परत में छेद होने की आशंका भी मानवता की एक बड़ी चिंता रही है। यह खतरा क्लोरोफ्लोरोकार्बन्स (सीएफसी) की बढ़ती मात्रा से पैदा हुआ। सीएफसी औद्योगिक गैसें हैं। मुख्य रूप से ये रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर्स से निकलती हैं। ये गैसें सदियों तक वातावरण में बनी रहती हैं। परा-बैंगनी किरणों की मौजूदगी में ये अति सक्रिय हो जाती हैं, जिसके असर से ओजोन परत को नुकसान पहुंचता है। इसीलिए माना जाता है कि सीएफसी गैसों का एक कण कार्बन डाय-ऑक्साइड के एक कण से दस हजार गुना ज्यादा खतरनाक होता है।

 बहरहाल, ये सारी गैसें मिल कर धरती का तापमान बढ़ा रही हैं।

 1970-80 के दशक तक इस समस्या को बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा रहा था। औद्योगिक घराने और तेल लॉबी इसे पर्यावरणवादियों की मनोगत समस्या बता कर खारिज कर देते थे। लेकिन बढ़ते वैज्ञानिक सबूत और जाहिर होते खतरों ने आखिरकार सबको यह मानने को मजबूर कर दिया कि ग्लोबल वॉर्मिंग यानी धरती का तापमान बढ़ना एक वास्तविक समस्या है और इसकी वजह से अपना यह ग्रह खतरे में है।

 *कैसे-कैसे खतरे**?*

 खतरा किन-किन रूपों में सामने आ सकता है, अब उस पर एक नजर डालते हैं-

 ·         जलवायु परिवर्तन का असर कई तरह की प्राकृतिक आपदाओं में देखने को मिल सकता है। एक अनुमान के मुताबिक अगर धरती का तापमान 2 डिग्री सेल्शियस बढ़ता है, तो तूफान और समुद्री चक्रवातों की औसत ताकत में 50 फीसदी का इजाफा होगा। यानी ये तूफान और चक्रवात ज्यादा विना शकारी हो जाएंगे। हर साल आने वाले तूफानों की संख्या भी बढ़ेगी।

 ·         वैज्ञानिकों का कहना है कि 21वीं सदी में ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से समुद्र के जल स्तर में बढ़ोतरी शायद सबसे ज्यादा घातक साबित हो सकती है। 19वीं सदी में समुद्र का जल स्तर सालाना 0.1 मिलीमीटर के हिसाब से बढ़ रहा था। 1950  के दशक में इसकी रफ्तार तेज हो गई। 1990 के दशक में यह बढ़ोतरी 2 मिलीमीटर प्रति वर्ष होने का अनुमान था। अभी अनुमान यह है कि हर साल समुद्र के जल स्तर
 में औसतन 3.7 मिलीमीटर का इजाफा हो रहा है। आज दुनिया में करोड़ों लोगों के समुद्री तूफान की वजह से आने वाली बाढ़ का शिकार होने का अंदेशा है। जानकारों का कहना है कि अगर समुद्र का जल स्तर 50 सेंटीमीटर बढ़ गया तो सवा नौ करोड़ लोग खतरे के दायरे में आ जाएंगे। अगर समुद्र का जल स्तर एक मीटर बढ़ा, तो 12 करोड़ की आबादी पर डूबने खतरा होगा। उस हालत में बहुत से छोटे द्वीप डूब जाएंगे, जबकि कई देशों में समुद्री तट वाले इलाके पानी में समा जाएंगे।

 ·         धरती का तापमान बढ़ने का एक और दुष्परिणाम ग्लेशियर्स का पिघलना है। अंटार्कटिक में बर्फ की चादरों के पिघलने की गति तेज हो गई है। ऐसा ही हिमालय में भी देखने को मिल रहा है। कुछ साल पहले तक वैज्ञानिक मानते थे कि धरती के बढ़ते ताप का ग्लेशियर्स तक असर पहुंचने में सैकड़ों साल लगेंगे। लेकिन ग्रीनलैंड और पश्चिमी अंटार्कटिक में जब बर्फ पिछलने से बनने वाली छोटी नदियां सूखने लगीं, तो वैज्ञानिक यह देख कर आवाक रह गए। तब उन्हें अहसास हुआ कि ग्लेशियर्स का पिघलना पहले ही शुरू हो चुका है और धीरे-धीरे यह खतरनाक रूप लेता जा रहा है। वैज्ञानिकों की राय है कि इस समस्या का एकमात्र हल धरती का ठंडा होना है, जो फिलहाल होता नहीं दिख रहा है। ग्लेशियर्स के पिघलने का भी एक तात्कालिक परिणाम समुद्र के जल स्तर में बढ़ोतरी के रूप में होगी, क्योंकि पिघले बर्फ का पानी आखिरकार वहीं पहुंचेगा।

 ·         बढ़ते तापमान ने बारिश के पैटर्न को भी बदल दिया है। ऐसा माना जा रहा है कि 3 डिग्री सेल्शियस तापमान बढ़ने पर दुनिया भर में ज्यादा तेज बारिश होने लगेगी, क्योंकि समुद्र के पानी का ज्यादा वाष्पीकरण होगा। लेकिन इसके साथ ही मिट्टी में मौजूद जल, ताजा पानी के स्रोतों और नदियों से कहीं ज्यादा वाष्पीकरण होगा। इससे गर्म इलाके ज्यादा खुश्क हो जाएंगे। वहां पीने और सिंचाई के पानी की समस्या और गंभीर हो जाएगी।

 ·         भारत जैसे देश में, जहां खेती आज भी काफी हद तक मानसून पर निर्भर है, ग्लोबल वॉर्मिंग का खाद्य सुरक्षा पर बहुत खराब असर पड़ सकता है। जानकारों का कहना है कि भारत में मानसून की वजह से होने वाली कुल बारिश पर तो शायद धरती के तापमान बढ़ने का ज्यादा असर नहीं होगा, लेकिन बारिश के पैटर्न में बदलाव जरूर देखने को मिल सकता है। मसलन, बारिश का समय बदल सकता है, किसी इलाके में बरसात का मौसम सिकुड़ सकता है, तो कहीं बहुत ज्यादा बारिश हो सकती है। इससे सूखे और बाढ़ दोनों की स्थिति ज्यादा गंभीर हो सकती है।

 ·         वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग से पानी की समस्या और गहरी हो जाएगी। भारत में दुनिया की 16 फीसदी आबादी रहती है, लेकिन उसके पास ताजा जल के स्रोत महज 4 फीसदी हैं। आजादी के बाद से प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता घट कर एक तिहाई रह गई है और 2050 तक हर व्यक्ति को अभी मिल रहे पानी का महज लगभग 60 फीसदी ही मिल पाएगा।

 ·         विश्व बैंक ने भारत के आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे सूखा प्रभावित इलाकों और उड़ीसा जैसे बाढ़ प्रभावित इलाकों के अध्ययन के आधार पर एक रिपोर्ट निकाली है। इसके मुताबिक आंध्र प्रदेश में खुश्क जमीन पर फसलों की पैदावार में भारी गिरावट आएगी। महाराष्ट्र में गन्ने की पैदावार में 30 फीसदी तक गिरावट आ सकती है। यही हाल उड़ीसा के बाढ़ प्रभावित इलाकों में होगा, जहां चावल की पैदावार  में 12 फीसदी गिरावट आने का अंदेशा है। *(द हिंदू, 30 जून 2009)*

 *खाना-पानी दोनों मुश्किल***

 जलवायु परिवर्तन का आने वाले वर्षों में पानी की उपलब्धता पर कई तरह से असर हो सकता है। ग्लोबल वॉर्मिंग की वजह से हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं। अल्पकाल में इससे ज्यादा मात्रा में पानी नदियों में आ सकता है, जिससे पानी की उपलब्धता बढे़गी, लेकिन बाढ़ का खतरा भी बढ़ेगा। जबकि दीर्घ अवधि में निश्चित रूप से इसका परिणाम पानी की उपलब्धता घटने के रूप में सामने आएगा।

 ·         जमीन के अंदर के पानी पर भी धरती का तापमान बढ़ने का असर होगा। वाष्पीकरण का प्रकार और गति बदलने से जमीन के अंदर पानी की मात्रा के संतुलन पर फर्क पड़ सकता है।

 ·         समुद्र का जल स्तर बढ़ने से तटीय इलाकों और द्वीपों के जल स्रोतों में खारे पानी की मात्रा बढ़ सकती है।

 ·         बाढ़ की आने की घटनाएं बढ़ने से संबंधित इलाकों में जमीन के नीचे के पानी की गुणवत्ता घट सकती है।

 असंतुलित बारिश और जमीन के अंदर के पानी की गुणवत्ता घटने का सीधा असर खेती पर पड़ेगा। इसीलिए देश में खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंताएं बढ़ती जा रही हैं। देश की आबादी लगातार बढ़ रही है। इसके 2050 तक एक अरब 60 करोड़ हो जाने का अनुमान है। खेती की जमीन सीमित है और ऊपर से मौसम बदलने के असर से पैदावार पर बुरा असर पड़ने का अंदेशा बढ़ता जा रहा है।

 भारतीय वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययनों के जरिए बढ़ते तापमान और वातावरण में कार्बन डाय-ऑक्साइड की बढ़ती मात्रा का अनाज के पैदावार पर हो सकने वाले असर का अनुमान लगाने की कोशिश की है। उनके मुताबिक अगर औसत तापमान 2 डिग्री सेल्शियस बढ़ता है तो चावल और गेहूं की पैदावार 15 से 17 फीसदी गिर सकती है। तापमान के असर से अनाज में पौष्टिक तत्वों, खासकर प्रोटीन की मात्रा भी घटने की आशंका जताई गई है।

 *सेहत पर खतरा***

 धरती के गरम होने का सीधा असर इंसान की सेहत पर पड़ रहा है। हवा में ऐसे कण और गैसें हैं, जो मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकते हैं। मौसम की स्थितियों से वायु प्रदूषण का स्तर प्रभावित होता है। ताप, नमी और बारिश से इंसान का स्वास्थ्य प्रभावित होता है, यह हम सभी जानते हैं। इनकी वजह से मौसमी एलर्जी होती है।

 ऐसा माना जाता है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से संक्रामक रोक तेजी से फैलेंगे। तापमान बढ़ने से रोगों को फैलाने वाले मच्छर जैसे जीव और दूसरे जीवाणुओं में बढ़ोतरी हो सकती है या उनका जीवन काल लंबा हो सकता है। मलेरिया पहले ही अपनी वापसी कर चुका है। डेंगू अब हर साल की बात बन गया है। इसी तरह कई दूसरी बीमारियों का प्रकोप बढ़ने की भी आशंका है।

 *किस पर कितना असर**?*

 वैज्ञानिकों का कहना है कि मौसम बदलने का असर हर जगह और सभी जन समूहों पर समान रूप से नहीं होगा। कुछ भौगोलिक क्षेत्रों पर इसका असर ज्यादा घातक होगा। इसी तरह जिन जन-समूहों की आजीविका सीधे तौर पर प्राकृतिक संसाधनों से जुड़ी है, उन पर जलवायु परिवर्तन की ज्यादा मार पड़ेगी। मसलन, शुष्क इलाकों में रहने वाले छोटे और सीमांत किसान, परंपरागत तरीकों से मछली मारने वाले मछुआरे, वनवासी आदि जैसे जन समूह ज्यादा प्रभावित होंगे। दरअसल, यहां भी सबसे ज्यादा खतरे में गरीब ही हैं। जलवायु परिवर्तन की वजह से चाहे प्राकृतिक आपदाएं आएं, खाद्य संकट पैदा हो, या बीमारियां फैलें- उनकी सबसे पहली मार उन तबकों पर ही पड़ेगी, जिनके लिए सामाजिक सुरक्षा का कोई उपाय नहीं है।

 *भारत पर कितना खतरा**?*

 जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की अंतरराष्ट्रीय समिति (IPCC) की रिपोर्ट का एक प्रारूप कुछ समय पहले लीक हुआ था। इसमें भारत और पूरे दक्षिण एशिया पर जलवायु परिवर्तन के असर की बेहद गंभीर तस्वीर पेश की गई थी। हालांकि बाद इन खतरों को कम करके बताया गया, लेकिन लीक रिपोर्ट में जो बातें आईं, वो दहला देने वाली हैं। इसकी खास बातें इस प्रकार थीं-

 ·         सन् 2100 तक दक्षिण एशिया में समुद्र का जल स्तर कम से कम 40 सेंटीमीटर बढ़ जाएगा। इससे दूर-दूर तक तटीय इलाके डूब जाएंगे और कुछ सबसे घनी आबादी वाले शहरों के लोग कहीं और जाकर बसने को मजबूर हो जाएंगे। लाखों लोगों की जमीन और घरों में पानी भर जाएगा। एशिया की 88 फीसदी मूंगा चट्टानें (*coral reef**) *खत्म हो सकती हैं, जो समुद्री जीवों को निवास स्थल मुहैया कराती हैं।

 ·         हिमालय के ग्लेशियरों का पिघलना जारी रहेगा। एक अनुमान यह है कि 2035 तक ग्लेशियर बिल्कुल खत्म हो जा सकते हैं। इसके परिणास्वरूप गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियां मौसमी नदियां बन जाएंगी, यानी ये गर्मियों में सूख जाएंगी। इनके असर से भारत में प्रति व्यक्ति जल की उपलब्धता 2050 एक तिहाई तक घट जाएगी।

 ·         तापमान बढ़ने की वजह से फसलों की उत्पादकता घटेगी।

 ·         गर्मी और लू की वजह से मौतों की संख्या में भारी इजाफा होगा।

 यानी खतरा साफ है और वजहें भी जानी-पहचानी।

 आज धरती जिस संकट में है और मनुष्य जिस खतरे में-  उसके लिए सीधे तौर पर मनुष्य ही जिम्मेदार है। औद्योगिक सभ्यता के फैलने के साथ मनुष्य ‘विकास’ के जिस रास्ते पर चला, उसी ने आज हमें यहां पहुंचा दिया है। मनुष्य को इस खतरे की पहचान करने में लंबा वक्त लगा। जब वैज्ञानिकों को इसका आभास होने लगा, तब भी बड़े निहित स्वार्थों ने उस पर परदा डालने की कोशिश की, क्योंकि हकीकत के सामने
 आने पर उनके कारोबार पर असर पड़ने की संभावना थी। धनी लोग अपने जीवन स्तर में कोई कटौती नहीं चाहते, इसलिए वे धरती की चिंता ना करने में ही अपना तात्कालिक हित देखते हैं। यही वजह है कि आज भी, जबकि खतरे साफ नजर आ रहे हैं और वैज्ञानिक इसके अकाट्य प्रमाण जुटा चुके हैं, धनी देश और हर देश के धनी तबके इस बहस को भ्रमित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। चूंकि कॉरपोरेट मीडिया पर इन तबकों का ही नियंत्रण है, इसलिए कम से कम विकासशील देशों में जलवायु परिवर्तन का सवाल कभी बड़ा मुद्दा नहीं बन पाता। लेकिन अब यह उदासीनता बर्दाश्त नहीं की जा सकती। इसलिए कि अब खतरा सीधे मानव के अस्तित्व पर है। धरती का संकट विकराल रूप लेने
 लगा है।

 अब सभी देशों और सभी समाजों को कुछ कठिन सवालों से रू-ब-रू होना पड़ेगा। उन्हें इस सवाल से उलझना होगा कि आखिर ये कैसा विकास है, जो मानव सभ्यता के भविष्य को ही खतरे में डाल रहा है? प्रकृति जो हमेशा से हमारी पालनहार रही है, उसे इंसान ने इतना नुकसान क्यों पहुंचाया? आखिर उपभोग की यह कैसी असीमित आकांक्षा है, जो हमें प्रकृति का दुश्मन बना देती है?

 इस खतरे से निपटने के कई स्तरों पर और कई उपायों पर दुनिया भर में सोच विचार हो रहा है। कार्बन डाय-ऑक्साइड और दूसरी ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा कैसे घटाई जाए, इसके लिए संधियां करने की कोशिशें हुई हैं। पर्यावरण जितना खराब हो चुका है, उसके असर को कैसे नियंत्रित किया जाए, इस पर चर्चाएं हो रही हैं। लेकिन धीरे-धीरे यह भी साफ होता जा रहा है ये सारी चर्चाएं और उपाय महज फायर-फाइटिंग
 यानी लगी आग को बुझाने की कोशिशें हैं। खतरा पैदा करने वाले तौर-तरीकों को छोड़ना और नई जीवन शैली अपनाना इन चर्चाओं के एजेंडे में कहीं नजर नहीं आता।

 कहा जा सकता है कि ऐसी चर्चाओं, सम्मेलनों और संधियों से धरती और मानव सभ्यता का भविष्य सुरक्षित नहीं होगा। ऐसा हो सके इसके लिए हमें अपना नजरिया बदलना होगा। अगर उपभोग की आकांक्षा पर काबू नहीं पाया गया तो एक तो अभी सोचे जा रहे उपाय सफल ही नहीं होंगे और अगर इनमें फौरी कामयाबी मिल भी गई तब भी रोग का स्थायी उपचार नहीं हो सकेगा। हमें इस बहस को इस समझ के साथ आगे बढ़ाना होगा। मगर पहले एक नजर दुनिया भर में धरती को बचाने के लिए जारी कोशिशों पर।

 *कैसे हो कार्बन न्याय**?*

 1970 के दशक से वैज्ञानिक जलवायु परिवर्तन और इससे जुड़े खतरों की चेतावनी देने लगे थे। 1980 के दशक तक उनके पास इसके पर्याप्त प्रमाण थे। आखिरकार दुनिया को उनकी बात सुननी पड़ी। संयुक्त राष्ट्र की देखरेख में विभिन्न देशों के बीच इस सवाल पर बातचीत शुरू हुई। इसी का परिणाम था- 1992 में रियो द जनेरो में हुआ पर्यावरण एवं विकास सम्मेलन, जिसे पृथ्वी सम्मेलन के नाम भी जाना गया। वहां
 पर्यावरण बचाने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय संधि हुई जिसे- UNFCCC (United Nations Framework Convention on Climate Change) के नाम से जाना जाता है। UNFCCC का मकसद था वातावरण में जमा ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को स्थिर करना। यानी ये गैसें वातावरण में उतनी ही मात्रा में रहें, जिससे धरती के जलवायु पर कोई असर न पड़े। इस संधि में विभिन्न देशों से यह अपेक्षा की गई कि वे अपने यहां ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन (emissions) घटाएं, लेकिन कटौती कितनी हो, इसका कोई ऐसा लक्ष्य तय नहीं किया गया, जो उन देशों के लिए मानना अनिवार्य हो।
 कटौती न करने पर किसी देश को क्या दंड दिया जाएगा, इसका कोई प्रावधान नहीं किया गया। यानी अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत यह एक ऐसी संधि थी, जिसके लक्ष्यों को मानना स्वैच्छिक था।

 इस संधि के तहत दुनिया भर के देशों को तीन भागों में बांटा गया।

 विकसित औद्योगिक देशों को पहले खंड में रखा गया, जिन्हें संधि के तहत Annex I countries कहा गया 23 औद्योगिक देशों और यूरोपीय संघ पर विकासशील देशों में कार्बन डाय-ऑक्साइड का उत्सर्जन नियंत्रित करने की लागत उठाने की जिम्मेदारी डाली गई। इन देशों को को दूसरे खंड में रखा गया। संधि में इन्हें Annex II countries कहा गया।

 तीसरा खंड विकासशील देशों का है।

 Annex I देश अपने यहां कार्बन डाय-ऑक्साइड की मात्रा घटा कर 1990 के स्तर पर लाने को सहमत हुए।

    - विकासशील देशों के बारे में कहा गया कि जब तक विकसित देश पर्याप्त धन और टेक्नोलॉजी नहीं देते हैं, ये देश कार्बन डाय-ऑक्साइड घटाने के लिए बाध्य नहीं हैं। इसकी वजह यह है कि कार्बन डॉय-ऑक्साइड का उत्सर्जन सीधे तौर पर औद्योगिक  विकास से जुड़ा हुआ है और विकासशील देशों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वो अपना यह विकास छोड़ दें।

 यह प्रावधान जरूर किया गया कि ये देश चाहें तो अपने हिस्से के कार्बन डाय-आक्साइड उत्सर्जन की मात्रा धनी देशों को उधार दे सकते हैं।

 दरअसल, UNFCCC में इन तीन बातों को जलवायु परिवर्तन पर बातचीत और भावी कदमों की पृष्ठभूमि में सिद्धांत के रूप में स्वीकार कर लिया गया-
 
1-      ऐतिहासिक रूप से और वर्तमान में भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में सबसे बड़ा हिस्सा विकसित देशों का है।

 2-      विकासशील देशों में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन आज भी अपेक्षाकृत कम है।

 3-      विकासशील देशों में सामाजिक और विकास संबंधी जरूरतों को पूरा करने के क्रम में कार्बन उत्सर्जन में उनका हिस्सा बढ़ेगा।

 जैसाकि हमने ऊपर कहा है कि UNFCCC में कोई बाध्यकारी प्रावधान शामिल नहीं किए गए। लेकिन यह जरूर कहा गया कि भविष्य में संधि में ऐसे ‘प्रोटोकॉल’ जोड़े जा सकते हैं, जिनका पालन अनिवार्य होगा।

 ऐसा प्रोटोकॉल 1997 में सामने आया। चूंकि इसे जापान के शहर क्योतो में जलवायु परिवर्तन के बारे में संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन में पारित किया गया, इसलिए इसे क्योतो प्रोटोकॉल के नाम से जाना गया। इस संधि का भी मकसद वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा घटाना है। इस संधि में शामिल देशों के लिए कार्बन उत्सर्जन की अधिकतम मात्रा तय कर दी गई।

 संयुक्त राष्ट्र के तहत जलवायु परिवर्तन पर जारी बातचीत में संबंधित पक्षों के सम्मेलनों (conference of parties) का एक सिलसिला चला। ऐसा ही एक सम्मेलन जुलाई 2001 में जर्मनी के शहर बॉन में हुआ। इसमें 186 देश शामिल हुए। यहीं क्योतो प्रोटोकॉल को अंतिम रूप दिया गया।

 बड़े औद्योगिक देश इस बात पर सहमत हुए कि वो अपने यहां कार्बन उत्सर्जन की मात्रा घटा कर उसे 1990 से 5 फीसदी नीचे के स्तर पर ले आएंगे। इसके लिए 2008 से 2012 की अवधि तय की गई। क्योतो सम्मेलन में आए अमेरिका के प्रतिनिधिमंडल ने इस संधि पर दस्तखत कर दिए। लेकिन बाद में अमेरिकी सीनेट ने आर्थिक विकास की दर घटने की दलील देते हुए इसका अनुमोदन करने से इनकार कर दिया। और उसके बाद तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने 2001 में औपचारिक रूप से क्योतो प्रोटोकॉल से हटने का एलान कर दिया। रूस बहुत मान-मनौवल के बाद 2005 में इस संधि का हिस्सा बना।

 *अमेरिकी जिद का राज़*

 अमेरिका की अर्थव्यवस्था में तेल उद्योग का बहुत बड़ा निहित स्वार्थ है। ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती का इस उद्योग के मुनाफे पर सीधा असर पड़ेगा। तेल उद्योग और दूसरे निहित स्वार्थों की लॉबिंग का ही यह नतीजा था कि अमेरिका क्योतो प्रोटोकॉल में शामिल नहीं हुआ। जॉर्ज बुश जूनियर के पूरे शासनकाल में अमेरिका जलवायु परिवर्तन रोकने संबंधी हर अंतरराष्ट्रीय पहल के रास्ते में अड़ंगा डालता रहा। लेकिन अमेरिका में सियासी फिज़ा बदलने के साथ इस मामले में भी कुछ परिवर्तन देखने को मिला। 2008 के राष्ट्रपति चुनाव में बराक ओबामा ने
 अपने एजेंडे में ग्रीन मुद्दों को भी शामिल किया। उन्होंने यह माना कि जलवायु परिवर्तन का खतरा वास्तविक है और अब वह वक्त आ गया है, जब पूरी दुनिया इस खतरे को टालने के लिए मिलजुल कर कदम उठाए।

 बराक ओबामा के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका की घरेलू नीति में कुछ बदलाव देखने को जरूर मिल रहे हैं। ओबामा प्रशासन के दबाव में वहां का ऑटो-मोबाइल उद्योग को ग्रीन टेक्नोलॉजी अपनाने पर सहमत हुआ है। लेकिन निहित स्वार्थों की लॉबी कितनी मजबूत है, यह बात हाउस ऑफ रिप्रेजेन्टेटिव में जलवायु परिवर्तन पर बिल पेश किए जाने के समय जाहिर हुई। डेमोक्रेटिक पार्टी के भारी बहुमत के बावजूद यह बिल 219-212 के अंतर से ही पास हो सका। विरोधियों ने बिल पर जोरदार हमले किए। जॉर्जिया राज्य से चुने गए प्रतिनिधि पॉल ब्राउन ने तो यह कहने की जुर्रत भी दिखा दी कि जलवायु परिवर्तन की बात वैज्ञानिकों द्वारा फैलाये जा रहे एक धोखे के अलावा और कुछ नहीं है। इस पर दोनों ही पार्टियों के सांसदों ने खूब तालियां बजाईँ।

 हाउस ऑफ रिप्रेजेन्टेटिव में हुई बहस को देखने को बाद नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री पॉल क्रुगमैन ने द न्यूयॉर्क टाइम्स में अपने कॉलम में लिखा-
 “जलवायु परिवर्तन की बात से इनकार करने वालों की दलीलें सुनते हुए मैं यही सोचता रहा कि मैं एक तरह की गद्दारी देख रहा हूं- अपनी धरती से गद्दारी। जलवायु परिवर्तन की बात से इनकार करना कितना गैर-जिम्मेदारी भरा और अनैतिक है, इसे ताजा अनुसंधानों
 पर गौर करके समझा जा सकता है, जिनसे जलवायु परिवर्तन की बेहद गंभीर स्थिति सामने आई है।”

 दरअसल, ग्लोबल वॉर्मिंग और जलवायु परिवर्तन को लेकर दुनिया भर में चल रही बहस को समझने के लिए इसे विस्तार से जानना जरूरी है कि अमेरिका में क्या हो रहा है। इसकी एक वजह तो यह है कि अमेरिका सबसे बड़ा प्रदूषक है और दूसरी वजह यह है कि अमेरिका जो भी रुख लेता है या नीतियां बनाता है, उसका अंतरराष्ट्रीय संधियों का स्वरूप तय करने और इस संबंधित दूसरे प्रयासों पर निर्णायक असर पड़ता है। इसलिए अमेरिका में पास हुए विधेयक पर रोशनी डालना उचित होगा।

 इस बिल का प्रारूप हेनरी वैक्समैन और एड मार्के ने तैयार किया है, इसलिए इसे उनके ही नाम से वैक्समैन-मार्के बिल कहा जा रहा है। इस विधेयक में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 2020 तक 2005 के स्तर में 17 फीसदी कटौती का प्रावधान है। इसमें यह मान कर चला गया है कि उत्सर्जन की मात्रा घटाने वाली टेक्नोलॉजी में लगातार सुधार होगा और इसकी वजह से 2050 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 2005 के स्तर के हिसाब से 83 फीसदी की कटौती हो जाएगी। बहरहाल, इस विधेयक का प्रारूप अपने आप में कई बड़े समझौते करते हुए तैयार किया गया। यानी ग्रीन लक्ष्यों को पहले ही काफी कमजोर कर दिया गया। इसके बावजूद उद्योग जगत के लॉबिस्ट सांसदों ने इसके विरोध में अपनी पूरी ताकत झोंक दी।

वैक्समैन-मार्के विधेयक के मूल प्रारूप में cap-and-trade system की अवधारणा शामिल की गई थी। इसके मुताबिक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के साख-पत्र (credits) सबसे ज्यादा दांव लगाने वालों (bidders) को दिया जाना था। इस नीलामी से होने वाली आमदनी का इस्तेमाल ऊर्जा पर बढ़ते खर्च को पाटने के लिए किया जाना था। लेकिन पास हुए विधेयक में 85 फीसदी कार्बन उत्सर्जन की इजाजत दे दी गई है, नीलामी सिर्फ बचे 15 फीसदी उत्सर्जन की होगी।

 किसान लॉबी को खुश करने के लिए बिल में यह प्रावधान शामिल कर दिया गया कि किसान इथेनोल बनाने के लिए जो फसलें उगा रहे हैं, उस पर ‘भूमि उपयोग के परोक्ष परिवर्तनों’ का कोई असर न पड़े। एक अन्य समझौता कार्बन समायोजन के बारे में किया गया। अब यह प्रावधान कर दिया गया है कि उत्सर्जित कार्बन के असर को निष्प्रभावी करने के लिए क्या उपाय किए जाएं, यह पर्यावरण संरक्षण एजेंसी तय
 नहीं करेगी। बल्कि यह काम कृषि विभाग को सौंप दिया गया है। मसलन, जो किसान पेड़ लगाकर या जोत की जमीन में कटौती कर कार्बन उत्सर्जन रोकेंगे, उन्हें कार्बन साख-पत्र मिल जाएगा। जबकि अगर जिम्मेदारी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के हाथ में रहती, जिसे अमेरिका में सख्ती से नियम लागू करने वाली एजेंसी माना जाता है, तो किसानों को ऐसे कदमों पर कार्बन साख-पत्र नहीं मिलते, जिन्हें वो जब चाहें वापस
 ले सकते हैं। यह माना जाता है कि अमेरिका का कृषि विभाग किसानों के प्रति ज्यादा नरम रुख रखता है।

 जाहिर है, जलवायु परिवर्तन जैसा गंभीर सवाल भी अमेरिका में आर्थिक स्वार्थों और उनके राजनीतिक प्रतिनिधियों के दांवपेच का मुद्दा बना हुआ है। लेकिन ऐसा सिर्फ अमेरिका में ही नहीं हो रहा है। असल में क्योतो प्रोटोकॉल की जगह लेने के लिए कोपेनहेगन में दिसंबर में होने वाले विश्व सम्मेलन से ठीक पहले कई देश अपने हितों की रक्षा के लिए हर तरह के तिकड़म अपना रहे हैं। रूस और जापान ने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के जो लक्ष्य घोषित किए हैं, वो यूरोपीय संघ की तरफ से तय लक्ष्यों से बहुत नीचे हैं। कहा जा सकता है कि जिस तरह की लॉबी का दबाव अमेरिकी सरकार पर है, वैसा ही दबाव ज्यादातर देशों में वहां की सरकारों पर है। इन्हीं कारणों से जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय बातचीत अक्सर दांव-पेच में फंसी रही है। सरकारें अपने यहां के निहित स्वार्थं के हित साधने में ज्यादा
 ध्यान लगाती हैं। उनकी कोशिश रहती है कि ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती का ज्यादा से ज्यादा लक्ष्य दूसरों पर थोप दिया जाए। इसके लिए कई तरह की दलीलें गढ़ी जाती हैं। कभी विकास तो कभी अर्थव्यवस्था की जरूरतों का हवाला दिया जाता है। और ऐसा करते हुए यह बात भुला दी जाती है कि अगर धरती ही सुरक्षित नहीं रही तो आखिर कौन सी अर्थव्यवस्था आगे बढ़ पाएगी और कौन सा विकास टिकाऊ हो सकेगा।

 *बातचीत में गतिरोध***

 विभिन्न देशों के इसी रवैये की वजह से जलवायु परिवर्तन पर अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं में गतिरोध लगातार बना हुआ है। जैसाकि हमने ऊपर देखा है, 1992 के UNFCCC में यह मान लिया गया था कि धरती को बचाने की जिम्मेदारी सबकी है, लेकिन जिनकी प्रदूषण फैलाने या जिनकी धरती को गरम करने में ज्यादा भूमिका रही है, उन्हें इसकी ज्यादा जिम्मेदारी लेनी होगी। सिद्धांत तौर पर यह बात सभी देशों ने स्वीकार कर ली थी, लेकिन इसे व्यवहार में उतारने को कोई सहज तैयार होता नहीं दिखा है। न तो धनी देश, और न विकासशील देशों के धनी तबके।

 सवाल धरती को बचाने का है और साथ ही न्याय का भी। आज जिन देशों को विकसित कहा जाता है, उन्होंने अपने यहां वर्तमान जीवन स्तर को प्रकृति का दोहन करते हुए हासिल किया है। अब जबकि प्रकृति खतरे में है तो यह सामान्य तर्क है कि उन्हें धरती बचाने के लिए ज्यादा बोझ उठाना चाहिए। लेकिन ये देश इसके लिए तैयार नहीं दिखते। वहां के शासक और अभिजात्य वर्ग अपने जीवन स्तर पर कोई समझौता करने को तैयार नहीं हैं। उनके कारोबारी कोई कीमत चुकाना नहीं चाहते। ऐसा ही नजरिया विकासशील देशों के शासक और अभिजात्य वर्गों का भी है। ये तबके भी अपनी जीवन शैली में कोई बदलाव नहीं लाना चाहते। बल्कि वे भी धरती पर मंडरा रहे खतरे की पूरी अनदेखी करते हुए विकसित समाजों के सबसे धनी तबकों जैसा उपभोग स्तर हासिल करने की अंधी होड़ में जुटे हुए हैं।

 गौरतलब यह है कि वातावरण में आज जितनी ग्रीन हाउस गैसें जमा हैं, उसका तीन चौथाई से भी ज्यादा उत्सर्जन धनी देशों ने किया है। क्योतो प्रोटोकॉल में यह तय किया गया था कि Annex-I में शामिल धनी देश 2005 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती कर उसे 1990 के स्तर से 5 फीसदी नीचे ले आएंगे। लेकिन हकीकत यह है कि 1992 के बाद से इन देशों ने इस गैसों का उत्सर्जन 11 फीसदी बढ़ा दिया है।

 असल में UNFCCC में जो तय हुआ था, क्योतो प्रोटोकॉल में उसे काफी ढीला कर दिया गया। क्योतो प्रोटोकॉल में स्वच्छ विकास तंत्र (CDM- Clean Development Mechanism) का प्रावधान किया गया, जिसके तहत विकसित देशों को ग्रीन हाउस गैसों का कम उत्सर्जन करने वाले विकासशील देशों से कार्बन क्रेडिट (साख पत्र) खरीदने की इजाजत दे दी गई। यह बाजार आधारित व्यवस्था है। इस व्यवस्था का परिणाम यह हुआ कि क्योतो प्रोटोकॉल में गैसों के कुल उत्सर्जन में 5 प्रतिशत कटौती का जो लक्ष्य रखा गया, व्यवहार में वह महज 2 फीसदी रह गया। उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य हासिल न करने वाले या उत्सर्जन की तय सीमा का उल्लंघन वाले देशों के लिए जुर्माना का कोई प्रावधान नहीं किया गया। इसलिए इसमें कोई हैरत की बात नहीं कि चाहे UNFCCC हो या क्योतो प्रोटोकॉल- ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की मात्रा
 घटाने में इन्हें कोई बड़ी सफलता नहीं मिली है।

 जलवायु परिवर्तन को रोकने की कोशिशें जब शुरू हुईं तो विकसित देशों से यह अपेक्षा की गई कि वो ऐसी टेक्नोलॉजी गरीब देशों को मुहैया कराएंगे, जिससे कार्बन का कम उत्सर्जन सुनिश्चित किया जा सके। यह माना गया कि यह कारोबार का क्षेत्र नहीं होगा, बल्कि धनी देश ऐसा धरती के प्रति अपनी साझा जिम्मेदारी के तहत करेंगे। लेकिन व्यवहार में यह सामने आया कि इसे भी धनी देशों ने मुनाफे का सौदा बना दिया। विकासशील देशों को निम्न-कार्बन तकनीक देने को उन्होंने प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का तरीका बना दिया। यानी मुनाफे की वही भावना फिर हावी हो गई, जिसकी वजह से आज पृथ्वी पर इतना बड़ा खतरा मंडरा रहा है।

 अब विकसित औद्योगिक देशों, खासकर अमेरिका की कोशिश कार्बन उत्सर्जन रोकने की जिम्मेदारी विकासशील देशों- खासकर चीन और भारत पर- थोप देने की है। कोपेनहेगन सम्मेलन से पहले की वार्ताओं में वे जोर दे रहे हैं कि भारत और चीन पर कार्बन उत्सर्जन में कटौती की बाध्यकारी सीमाएं लागू की जाएं। जबकि क्योतो प्रोटोकॉल के तहत इन दोनों विकासशील देशों पर ऐसी सीमाएं लागू नहीं की जा सकतीं। इन दोनों देशों में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन धनी देशों की तुलना में बहुत कम है। भारत का ग्रीन हाउस गैसों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन चीन का एक चौथाई और अमेरिका 1/15वां हिस्सा है। भारत की बहुत बड़ी आबादी बेहद कम ऊर्जा का उपभोग करते हुए अपनी जिंदगी बसर करती है।

भारत की नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकॉनोमिक रिसर्च (NCAER) के एक ताजा अध्ययन में यह कहा गया है कि अगर भारतीय अर्थव्यवस्था लगातार 8 फीसदी की दर से विकसित होती रहे और मौजूदा स्तर की ही तकनीकों का इस्तेमाल होता रहे, तब भी 2031 तक
 भारत में ग्रीन हाउस गैसों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 2.77 टन से ज्यादा नहीं होगा। यह अमेरिका के मौजूदा उत्सर्तन स्तर का सातवां हिस्सा होगा, जबकि ब्रिटेन के मौजूदा उत्सर्जन का एक चौथाई। NCAER ने 37 औद्योगिक क्षेत्रों के अध्ययन के आधार पर यह अनुमान लगाया है। जबकि उसका कहना है कि भारत आगे विकास का जो रास्ता अपनाएगा वह कम ऊर्जा आधारित होगा, और यहां भी ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन रोकने वाली बेहतर तकनीक का इस्तेमाल होगा। इससे कार्बन की कम मात्रा वातावरण में जाएगी। यानी वास्तव में जो उत्सर्जन भारत में होगा, वह फिलहाल लगाए अनुमान से कम होने की उम्मीद है। *(द टाइम्स ऑफ इंडिया, 30 जून 2009)*

इसलिए भारत और चीन का यह रुख उचित है कि उन पर ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की कोई बाध्यकारी सीमा न थोपी जाए। UNFCCC और क्योतो प्रोटोकॉल दोनों में उनके तर्क स्वीकार किए गए थे। विकसित देशों की कोशिश है कि कम से कम इन दोनों तेजी से विकसित हो रहे देशों के साथ कोपेनहेगन में ऐसी रियायत न बरती जाए। बहरहाल, कोपेनहेगन में जो भी तय होगा, वह बहुपक्षीय वार्ताओं से होगा। इस बीच अमेरिका ने एकतरफा कार्रवाई शुरू करने के संकेत दे दिए हैं। ठीक उसी तरह जैसे वह पहले व्यापार वार्ताओं में करता रहा है, या जैसे वह अपने कारोबारी हितों को आगे बढ़ाने के लिए मानव अधिकार या धार्मिक स्वतंत्रता जैसे सवालों को मुद्दा बनाता रहा है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा से पास जलवायु परिवर्तन विधेयक में एक प्रावधान यह भी है कि उन देशों से आयात होने वाली चीजों पर अतिरिक्त तटकर लगा दिया जाएगा, जिन्होंने अपने यहां ग्रीन हाउस गैसों में कटौती का वादा नहीं किया है। यूरोपीय संघ ऐसे प्रावधान लागू करने की धमकी पहले से देता रहा है, लेकिन अमेरिका ने इसमें उससे बाजी मार ली है।

 *बाली में नहीं बनी बात***

 दरअसल, धनी देशों का यह रुख यही जाहिर करता है कि कोपेनहेगन सम्मेलन से ज्यादा उम्मीदें नहीं जोड़ी जानी चाहिए। दिसंबर 2007 में जब इंडोनेशिया के शहर बाली में संबंधित पक्षों का 13वां सम्मेलन (COP-13) हुआ। इसमें 190 देश शामिल हुए। तब तक IPCC की चौथी जायजा रिपोर्ट (AR-4) आ चुकी थी। इसमें चेतावनी दी गई थी कि वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा खतरनाक स्तर तक पहुंचने ही वाली है।
 रिपोर्ट में जलवायु परिवर्तन के विनाशकारी परिणामों को लेकर भी आगाह किया गया था। यह तथ्य सामने आया कि 1992 में UNFCCC पर दस्तखत होने के बाद से ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में 11 फीसदी की बढ़ोतरी हो चुकी है। यह बढ़ोतरी क्योतो प्रोटोकॉल में 36 विकसित देशों के ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती करने के वादे के बावजूद हुई।

 इसीलिए बाली सम्मेलन से यह उम्मीद जोड़ी गई थी कि वहां आ रहे देश पहले वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा स्थिर करने और फिर इनमें कटौती करने के ठोस उपायों पर सहमत होंगे। बाली सम्मेलन का मुख्य एजेंडा क्योतो प्रोटोकॉल के बाद की अवधि (यानी 2013 से शुरू होने वाली अवधि) में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लक्ष्य तय करना था। इसलिए भी इस पर दुनिया भर के चिंतातुर लोगों
 की निगाहें टिकी थीं।

 लेकिन बाली में कोई बात नहीं बनी। सरकारें इस गंभीर समस्या से कितनी बेपरवाह हैं, यह इससे जाहिर हुआ कि उन्होंने फिर मिलने के अलावा कोई और ठोस फैसला नहीं किया। अमेरिका अपनी जिद पर अड़ा रहा। यूरोपीय संघ ने ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के बारे में IPCC की सिफारिशों को मंजूरी दिलाने की कोशिश जरूर की, लेकिन अमेरिका ने बात आगे नहीं बढ़ने दी। अब इसी गतिरोध की स्थिति में
 कोपेनहेगन में दुनिया भर की सरकारों के प्रतिनिधियों के मिलने की तैयारी है। सवाल है कि इस हाल में विकासशील देश, खासकर भारत और चीन क्या करें?

 *क्या करें भारत और चीन**?*

 भारत और चीन अगर विश्व मंचों पर यह वकालत करते हैं कि जिन देशों ने सबसे ज्यादा ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन किया है, वो इसे घटाने के बाध्यकारी लक्ष्य खुद के लिए तय करें और विकासशील देशों को ग्रीन टेक्नोलॉजी (ऐसी टेक्नोलॉजी जो इन गैसों को नियंत्रित करने में मददगार होती है) दें, तो उनकी यह दलील उचित भी है और नैतिक भी। मगर समस्या इससे हल नहीं होगी। समस्या कहीं ज्यादा गंभीर रूप ले
 चुकी है और उसे हल करने के लिए आज सबको अपनी भूमिका निभानी ही होगी। यह ठीक है कि विकासशील देशों का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन धनी देशों की तुलना में बहुत कम है, लेकिन विकासशील देशों से हो रहा कुल उत्सर्जन आज कम नहीं है। अनुमान लगाया गया है कि 2050 तक कुल जितनी ग्रीन हाउस गैसें वातावरण में जाएंगी, उनमें से 75 फीसदी विकासशील देशों से आएंगी। इनमें भी ज्यादातर चीन और
 भारत से। इन दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाएं बड़ी हैं और तेजी से विकसित हो रही हैं। इसके साथ ही ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में इन दोनों देशों का हिस्सा भी बढ़ रहा है।

 ऐसा माना जाता है कि अगर धरती को सुरक्षित बनाना है तो वातावरण में जमा कार्बन डाय-ऑक्साइड की मात्रा को 450 पीपीएमवी (parts per million by volume) पर रोकना होगा। वैज्ञानिकों की संस्था दिल्ली साइंस फोरम के एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि अगर चीन, भारत और दूसरी उभरती अर्थव्यवस्थाएं भी ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की मौजूदा दर में कटौती नहीं करतीं, तो यह लक्ष्य हासिल करना मुश्किल है। दरअसल, इन देशों को भी अगले दो दशकों में उत्सर्जन की कुल मात्रा में कटौती करनी होगी।

 ऐतिहासिक रूप से धरती के वातावरण को नुकसान पहुंचाने के लिए भले पश्चिम के धनी देश जिम्मेदार हों, लेकिन इस प्रक्रिया को आखिर कहीं न कहीं रोकना होगा और इसकी शुरुआत को अब टाला नहीं जा सकता। इसलिए भारत में इस बहस को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में लाना होगा कि आखिर भारत धरती को गरम होने से रोकने के लिए क्या कदम उठाए और इससे संबंधित विश्व वार्ताओं में क्या रुख ले? यह इसलिए भी जरूरी है कि धनी देश अब भारत और चीन को मु्द्दा बना कर विश्व वार्ताओं में गतिरोध जारी रखने के रास्ते पर चल सकते हैं। उन्हें नाकाम करने और धरती को बचाने की अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए भारत सरकार और देश के लोगों को इस सवाल पर ठोस एवं
 बारीक ढंग से विचार करना चाहिए।

 जलवायु परिवर्तन का अध्ययन और इससे जुड़ी वार्ताओं पर नज़र रखने वाले कुछ विशेषज्ञों ने इस बारे में कुछ ठोस सुझाव दिए हैं, जिन पर अब जरूर चर्चा होनी चाहिए। उनके मुताबिक,

    - भारत को खुद अपने लिए 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों में कटौती का एक लक्ष्य  घोषित करना चाहिए। भारत यह पेशकश सशर्त कर सकता है। वह कह सकता है कि अगर अमेरिका और Annex-I में आने वाले अन्य विकसित देश अगर इन गैसों में बड़ी मात्रा में कटौती का लक्ष्य स्वीकार करें और उस पर अमल करें, तो उस हालत में भारत स्वघोषित, लेकिन अबाध्यकारी लक्ष्य का पालन करेगा।
    - भारत Annex-I देशों से मांग कर सकता है कि वो ग्रीन हाउस गैसों की उत्सर्जन मात्रा में 2030 तक 1990 के स्तर से 50 प्रतिशत और 2050 तक 90 प्रतिशत  कटौती का वादा करें। इतनी कटौती उन्हें असल में करनी होगी- उत्सर्जन के अनुपात में कार्बन को निष्क्रिय करने वाले उपाय कर या कार्बन साख-पत्र खरीद कर नहीं।
    - भारत मांग कर सकता है कि Annex-I देश इस लक्ष्य को हासिल करने में जितना पिछड़ते हैं, उन्हें जलवायु कोष में उसी अनुपात में धन जमा कराने पर सहमत होना चाहिए।
    - ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन रोकने की सारी टेक्नोलॉजी सभी देशों को उपलब्ध कराई जानी चाहिए। भारत यह मांग कर सकता है कि धनी देश इस टेक्नोलॉजी को कारोबार का सामान न बनाएं, बल्कि विश्व-हित की भावना से इसे सबको मुहैया कराएँ।


 अगर भारत खुद अपने यहां ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती का वादा करता है और इसकी ठोस योजना पेश करता है, तो जाहिर है कोपेनहेगन सम्मेलन या किसी दूसरे विश्व मंच पर उसकी बात ज्यादा नैतिक वजन रखेगी। तब उलटे भारत को आईना दिखाकर उसे चुप करने या उससे सौदेबाजी करने की राह अपना पाना धनी देशों के लिए कठिन हो जाएगा। उस हाल में भारत ‘जिसका जितना दोष, उसकी उतनी जिम्मेदारी’ के सिद्धांत पर ज्यादा नैतिक बल के साथ जोर दे सकेगा और इस काम में उसे दूसरे विकासशील देशों का भी समर्थन मिल पाएगा।

 मगर बात सिर्फ इतनी नहीं है। असल सवाल उन सिद्धांतों को देश के अंदर भी लागू करने का है, जिसकी वकालत भारत और दूसरे विकासशील देश विश्व मंचों पर करते हैं। यह ठीक है कि अमेरिका और दूसरे धनी देशों ने अपने अंधाधुंध विकास एवं उपभोग क्षमता में बढ़ोतरी के लिए प्रकृति को खूब नुकसान पहुंचाया, लेकिन अगर हम अपने ही देश के अंदर देखे तो ऐसा ही यहां भी पाएंगे। देश के धनी तबके वैसे ही उपभोग की चाहत में देश के संसाधनों का अंधाधुंध दोहन कर रहे हैं। वो इस क्रम में प्रकृति में जो असंतुलन पैदा कर रहे हैं, उसकी कीमत शुरुआती तौर पर देश के गरीबों को ही चुकानी होगी।

 अगर न्याय का सवाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है तो यह देश के भीतर भी है। अगर विकासशील देशों में ग्रीन हाउस गैसों के कम उत्सर्जन की कीमत पर धनी देश अपने विकास का रास्ते पर नहीं चलते रह सकते, तो देश के भीतर भी कम ऊर्जा का उपभोग करने वाले लोगों की कीमत पर समाज के ऊपरी तबके अपने उपभोग के स्तर को नहीं बनाए रख सकते। इसलिए देश के भीतर भी जलवायु परिवर्तन रोकने की एक ऐसी नीति लागू की जानी चाहिए, जो न्याय पर आधारित हो। जिस कार्बन या पर्यावरणीय न्याय की बात विश्व मंचों पर की जा रही है, उसे देश के भीतर न सिर्फ उठाना होगा, बल्कि उसके मुताबिक नीतियां बने, इसे सुनिश्चित करना होगा।

 भारत में जलवायु परिवर्तन की समस्या को लेकर अभी जन चेतना का अभाव है। दलित-आदिवासियों के मूलभूत अधिकारों की बात उठाने वाले समूह भी मानव अस्तित्व के लिए खतरा पैदा रही इस समस्या के प्रति जागरूक नजर नहीं आते हैं। इसलिए भारत सरकार भी इस मुद्दे पर एक व्यापक दृष्टिकोण पेश करने के बजाय जलवायु परिवर्तन पर राष्ट्रीय कार्ययोजना जैसी औपचारिक पहल के साथ बच निकलती है। जानकारों ने इस सरकारी कार्ययोजना को कूड़ेदान में डाल देने लायक बताया है। इसमें सिर्फ सामान्य बातें करते हुए कोई दिशा अपनाने या वास्तविक पहल करने की जिम्मेदारी को झटक दिया गया है। अगर देश के अंदर जागरूक जनमत इस सवाल पर सरकार को कठघरे में
 खड़ा नहीं करता है, तो कोपेनहेगन में उसे देश के बड़े पूंजीपतियों, कारोबारियों और उपभोक्तावादी तबकों के हित-रक्षक की भूमिका निभाने के लिए बेलगाम छोड़ दिया जाएगा।

 *अति उपभोग और जलवायु संकट***

 विकास और समृद्धि के जो मानदंड आज दुनिया भर में प्रचलित हो गए हैं, वो जिस एक चीज पर सबसे ज्यादा आधारित हैं- वह है ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा उपभोग। जलवायु संकट से उबरने के लिए आज जो चर्चा चल रही है, उसमें इस उपभोग को घटाने पर कम से कम जोर है। ऊर्जा के ऐसे साधन आ जाएं, जिनसे ग्रीन हाउस गैसों का कम उत्सर्जन हो- ज्यादातर चर्चा इस पर ही सीमित है। यह नहीं कहा जा सकता कि यह चर्चा बिल्कुल अनुपयोगी है या ऊर्जा के पर्यावरण-सम्मत साधनों की खोज नहीं की जानी चाहिए, लेकिन अगर लक्ष्य न्याय और सब तक विकास के फायदे पहुंचाना हो, तो यह जरूर कहा जा सकता है कि यह तरीका कामयाब नहीं होगा।

 आज भी दुनिया की आबादी का ज्यादातर हिस्सा ‘उपभोक्ता समाज’ के दायरे से बाहर है। यह हिस्सा उन लोगों का है, जिनके उपभोग (जिसमें ऊर्जा का उपभोग भी शामिल है) का स्तर बेहद कम है। इन लोगों की धरती को गरम करने में कोई भूमिका नहीं है।  न्याय के किसी सिद्धांत पर इस बात की वकालत नहीं की जा सकती कि आराम और भौतिक सुख की जो सुविधाएं आबादी के मुट्ठी भर तबकों के पास हैं, उनसे बाकी हिस्सों को वंचित रखा जाए। इन सुविधाओं को पाना या इसके लिए प्रयास करना वंचित समूहों की भी वाजिब आकांक्षाओं से जुड़ा है।


सत्येंद्र रंजन
 

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