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न्यूज क्लिपिंग्स् | बंसल की कथनी, सीबीआई की करनी- बृजेश सिंह और राहुल कोटियाल

बंसल की कथनी, सीबीआई की करनी- बृजेश सिंह और राहुल कोटियाल

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published Published on Aug 30, 2013   modified Modified on Aug 30, 2013

रेलवे रिश्वत कांड में सीबीआई ने फिर से वही किया जिसके लिए वह हमेशा से मशहूर रही है. बृजेश सिंह और राहुल कोटियाल की पड़ताल.

बात है चार मई 2013 की. मीडिया में खबर आई कि सीबीआई ने कुछ लोगों को रेलवे बोर्ड के सदस्य के पद पर नियुक्ति के लिए रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार किया है. इनमें तब के रेलमंत्री पवन बंसल का भांजा विजय सिंघला भी शामिल था. चारों तरफ पवन बंसल के इसमें शामिल होने की चर्चाएं गर्म होने लगीं और लोगों का ध्यान उस वक्त मुसीबत में फंसे प्रधानमंत्री, उनके करीबी सहयोगियों और खुद सीबीआई से कुछ हद तक हटकर इस खबर पर लग गया.

उस समय कोयला आवंटन घोटाले और उसकी जांच को प्रभावित करने को लेकर प्रधानमंत्री और उनके सहयोगियों पर गंभीर आरोप लग रहे थे. कोयला घोटाले को लेकर जो स्टेटस रिपोर्ट सीबीआई को सीलबंद लिफाफे में सिर्फ उच्चतम न्यायालय को देनी थी उसे सीबीआई निदेशक रंजीत सिन्हा ने कानून मंत्री अश्विनी कुमार, अटॉर्नी जनरल गुलाम वाहनवती और प्रधानमंत्री कार्यालय के दो अधिकारियों को दिखा दिया था. सीबीआई ने इन लोगों के सुझाव पर स्थिति रिपोर्ट में कुछ परिवर्तन भी कर दिए थे जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने बेहद आपत्तिजनक माना था. चूंकि कोयला आवंटन में घोटाले के वक्त प्रधानमंत्री खुद ही कोयला मंत्रालय का कार्यभार संभाल रहे थे, इसलिए कई लोगों और विपक्ष का मानना था कि ऐसा प्रधानमंत्री को बचाने के मकसद से किया गया था. सीबीआई ने शुरुआत में कोर्ट में साफ झूठ बोल दिया कि उसने यह रिपोर्ट किसी के साथ साझा नहीं की है. बाद में मीडिया में इससे जुड़ी खबर छप जाने के बाद मजबूरी में उसे यह बात स्वीकार करनी पड़ी थी. इसे लेकर सर्वोच्च न्यायालय सीबीआई से और भी ज्यादा नाराज था और किसी को यह पता नहीं चल पा रहा था कि वह इस पर अपना अगला कदम क्या उठाने वाला है. बाद में कोर्ट ने सीबीआई को एक स्वतंत्र संस्था बनाने के लिए सरकार को एक चेतावनी भरा निर्देश भी दिया था.

ऐसे में, अपनी पूरी तरह से धुली हुई साख के बीच सीबीआई ने विजय सिंघला एंड कंपनी को गिरफ्तार करने का कारनामा कर दिया. केंद्र सरकार के इशारों पर उठक-बैठक करने की प्रतिष्ठा पा चुकी सीबीआई, उसी सरकार के एक सबसे प्रभावशाली मंत्री को ही फंसाने का काम कर रही है, यह लोगों के गले नहीं उतर पा रहा था.

पवन बंसल के इतने करीबी रिश्तेदार के फंसने और इस मामले में उनको भी फंसा सकने लायक तमाम पुष्ट-अपुष्ट खबरों के छपने और दिखाए जाने के बाद बंसल और सरकार पर इतना दबाव बना कि पवन बंसल को अंततः 10 मई को रेलमंत्री के पद से इस्तीफा देना ही पड़ा. मगर कोयला घोटाले और उसकी स्थिति रिपोर्ट में गड़बड़ी के आरोपों से अभी लोगों का ध्यान पूरी तरह से हटा नहीं था. इसलिए पवन बंसल के साथ ही प्रधानमंत्री के चहेते कानून मंत्री अश्विनी कुमार को भी अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा. इसके साथ ही प्रधानमंत्री के ऊपर का दबाव धीरे-धीरे कम होकर न के बराबर हो गया.

रेलवे बोर्ड में नियुक्ति के मामले में सीबीआई ने दो जुलाई को अदालत में आरोपपत्र दाखिल कर दिया. इसमें अभियुक्तों की सूची में पवन बंसल का नाम नहीं है. इसके स्थान पर उन्हें सिर्फ अभियोजन पक्ष का गवाह बनाया गया है.

तहलका के पास मौजूद दस्तावेज बताते हैं कि भले ही पवन बंसल के इस मामले से जुड़े होने की कितनी ही खबरें हवा में तैरती रही हों, भले ही सीबीआई ने उनके भांजे को गिरफ्तार कर लिया हो (जो रिश्वत लेकर अपने मामा के जरिए ही इतना बड़ा काम करा सकता था) और भले ही इसकी वजह से बंसल को इतने महत्वपूर्ण पद से इस्तीफा देना पड़ा हो लेकिन सीबीआई ने हमेशा उन्हें इस मामले से एक हाथ दूर रखने की कोशिश की. यहां तक कि तीन मई को उसके द्वारा लिखी एफआईआर तक में पवन बंसल का नाम सिंघला के मामा के तौर पर भी मौजूद नहीं है. इसमें सिंघला को चंडीगढ़ का रहने वाला एक निजी व्यक्ति बताया गया था, बिना यह समझाए कि यह निजी व्यक्ति रेलमंत्री और कैबिनेट के द्वारा की जाने वाली नियुक्ति में हेर-फेर करा पाने में किस प्रकार से सक्षम था.

तहलका के पास मौजूद दस्तावेज यह भी बताते हैं कि सीबीआई ने विजय सिंघला की गिरफ्तारी से पहले या बाद में चार्जशीट फाइल करने तक ऐसा कोई भी काम नहीं किया जो पवन बंसल को दोषी या निर्दोष होने पर सही तरह से निर्दोष साबित करने में मददगार हो. बंसल ने अपने बयान में जो कुछ कहा सीबीआई ने उस पर उचित सवाल तक नहीं उठाए और उनके कहे पर पूरी तरह से विश्वास कर बंसल को सरकारी गवाह बना दिया. इस मामले की जांच के दौरान सीबीआई ने घोषित तौर पर 10 लोगों के फोन टैप किए मगर इनमें वे दो लोग शामिल ही नहीं थे जो सबसे महत्वपूर्ण थे और जिनकी कुछ ही बातें सारा दूध का दूध और पानी का पानी कर सकती थीं. यानी अगर बंसल या कुछ और भी महत्वपूर्ण लोग दोषी होते तो सीबीआई के पास तब इस बात के अकाट्य प्रमाण मौजूद होते, नहीं तो आज उसकी और बंसल आदि की भूमिका पर कोई सवाल नहीं उठाया जा रहा होता. मगर सीबीआई ने ऐसा नहीं किया. तहलका के पास मौजूद दस्तावेज यह भी बताते हैं कि जब भी सीबीआई को किसी आरोपी ने ऐसा कुछ भी बताया जिससे पवन बंसल को मदद मिलती हो तो सीबीआई ने इस पर सवाल करने की वजह होते हुए भी ऐसा नहीं किया. जबकि बंसल के खिलाफ जा सकने लायक कई बातों को उसने नजरअंदाज कर दिया.

अब, अब तक लिखे गए शब्दों की पृष्ठभूमि में सारे मामले को शुरू से और पूरी तरह से जानने की कोशिश करते हैं.

तहलका ने अपनी तहकीकात के दौरान इस मामले से संबंधित तीन हजार पन्नों के लगभग सभी महत्वपूर्ण दस्तावेज हासिल किए. पड़ताल करने पर ये दस्तावेज कहीं प्रत्यक्ष तो कहीं परोक्ष रूप से खुद ही सारी कहानी कहते हैं. कहानी जो शुरू तो होती है पवन बंसल के रेल मंत्री बनने से लेकिन खत्म उनके इस्तीफे पर भी नहीं होती. यह कहानी आज भी जारी है और दिल्ली के पटियाला हाउस कोर्ट में अपना अंत लिखे जाने का इंतजार कर रही है.

इस कहानी में एक या दो नहीं बल्कि तीन परतें हैं. एक परत पर यह रेल मंत्रालय में चलती है. दूसरी परत उस खेल की है जो पश्चिमी रेलवे के तत्कालीन जीएम महेश कुमार के मित्र पूरे देश में खेल रहे थे. और इन दोनों खेलों को बिगाड़ने के बाद अपने ही खेल को बिगाड़ने का तीसरा खेल सीबीआई भी खेल रही थी.

मामला था रेलवे बोर्ड में सदस्यों के प्रभावशाली पदों पर नियुक्तियों का. मंत्रालय इन नियुक्तियों की औपचारिकताएं निभाते हुए आगे बढ़ रहा था, महेश कुमार से जुड़े खिलाड़ी इसमें करोड़ों की घूस देने-लेने का इंतजाम कर रहे थे और सीबीआई चुपचाप चार महीने तक इस सब पर नजर बनाए हुए थी. रेलवे बोर्ड में जैसे-जैसे पद खाली होने के बाद नियुक्तियों का समय नजदीक आ रहा था, वैसे-वैसे तीन स्तरों पर चल रही यह कहानी भी गति पकड़ती जा रही थी.

रेलवे बोर्ड में चेयरमैन के अलावा छह सदस्य होते हैं - सदस्य (इंजीनियरिंग), सदस्य (मेकैनिकल), सदस्य (स्टाफ), सदस्य (इलेक्ट्रिकल), वित्तीय आयुक्त और सदस्य (ट्रैफिक). इनमें से तीन, सदस्य (स्टाफ), सदस्य (मेकैनिकल) और सदस्य (ट्रैफिक) 30 अप्रैल 2013 को सेवानिवृत्त हो रहे थे. लेकिन मामला इन सभी पदों पर नियुक्ति का भी नहीं था. असली मामला था सदस्य (इलेक्ट्रिकल) के पद पर नियुक्ति का. दुनिया के सबसे बड़े रेल तंत्र यानी 'भारतीय रेल' में इलेक्ट्रिकल से सम्बंधित हजारों करोड़ के ठेके पास करने की मुख्य जिम्मेदारी बोर्ड के सदस्य (इलेक्ट्रिकल) की ही होती है. इस कारण रेलवे में ठेके लेने वाले और इनको अपना उत्पाद बेचने वाले कई बड़े व्यापारी इस पद पर बैठने वाले व्यक्ति की तरफ टकटकी लगाए रहते हैं.

30 जून को तत्कालीन चेयरमैन विनय मित्तल रिटायर हो रहे थे. उनके रिटायर होने पर तत्कालीन सदस्य (इलेक्ट्रिकल) कुलभूषण को चेयरमैन बनना था. कुलभूषण जब चेयरमैन बनते तो सदस्य (इलेक्ट्रिकल) का पद खाली होता. असली लड़ाई इसी पद की थी जिसे किसी भी कीमत पर हासिल करने को आतुर थे महेश कुमार. वे उस वक्त जीएम (पश्चिम रेलवे) थे. रेलवे बोर्ड में सदस्य नियुक्त होने की शर्तों के अनुसार महेश की नियुक्ति सबसे पहले खाली होने वाले पद पर होनी तय थी. यह पद था सदस्य (ट्रैफिक) का जबकि महेश को सदस्य (इलेक्ट्रिकल) का पद चाहिए था. बिल्कुल सीधे रास्ते से उन्हें यह पद मिल नहीं सकता था इसलिए उन्होंने इस पद को हासिल करने के लिए जाल बुनना शुरू किया.

1. रेल घूसकांड के आरोपियों के बीच फोन पर हुई बातचीत के संपादित अंश:

31 मार्च, सुबह के 7.49 बजे

मंजूनाथ- मैंने मनीष बंसल और महेश कुमार के साथ डिनर किया. 

अज्ञात- हां.

मंजूनाथ- हम ये सुनिश्चित कर रहे हैं कि मेंबर इलेक्ट्रिकल का पद महेश कुमार को मिले.

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मंजूनाथ- ये गुट राहुल गांधी के बेहद करीब है.

अज्ञात- हूं.

मंजूनाथ- बंसल के बेटे मनीष और विजय लोगों का ये गुट राहुल गांधी के बेहद करीब हैं.

अज्ञात- ओके ओके.

मंजूनाथ- प्रधानमंत्री कार्यालय से जल्द ही अनुमति ले ली जाएगी. दरअसल चीजें सही लोगों के साथ सही दिशा में जानी चाहिए.

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3 अप्रैल, रात के 8.20 बजे

मंजूनाथ- आज रात वो कुलभुषण से सिगनल एंड टेलीकम्यूनिकेशन कैसे दिया जाए इसको लेकर चर्चा करेंगे.

महेश कुमार- ठीक है ठीक है.

मंजूनाथ- आज कुलभुषण को भी एमआर(रेलमंत्री) के घर पर बुलाया गया था.

महेश कुमार- अच्छा ओके.

मंजूनाथ- वो एमआर के घर चले गए हैं.

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मंजूनाथ- सर ईमानदारी से एक चीज बताइए ना?  क्या आपकी रेलमंत्री से मुलाकात हुई?

महेश कुमार- हां.

मंजूनाथ- रेलमंत्री को एमएल(सदस्य, इलेक्ट्रिकल) पोस्टिंग के बारे में पूरी जानकारी है? आप जानते हैं कि मिनिस्टर को इस सबके बारे में अच्छी तरह पता है?

महेश कुमार- हां हां.

मंजूनाथ- आप समझ सकते हैं.

महेश कुमार- हां, बिल्कुल. उन्होंने खुद मुझसे कहा था कि मैं तुम्हें वहां पहुंचाऊंगा.

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10 अप्रैल, सुबह के 7.51 बजे

संदीप- कोई चक्कर नी. पीएमओ (प्रधानमंत्री कार्यालय) से हो जाएगा, वो भी हो जाएगा.

महेश कुमार- हां, देखो मेरे को कल इन्होंने बुलाया वहां.

संदीप- किसने जी?

महेश कुमार- मेरे पास मैसेज आया कि कल आप आओ एमआर से मिलने के लिए.

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महेश कुमार को मनचाही नियुक्ति दिलाने का खेल मुख्य रूप से चंडीगढ़ से खेला गया. इसकी शुरुआत इस साल के जनवरी माह में तब हुई जब महेश ने अपने नजदीकी और बंगलुरू की एक कंपनी जीजी ट्रोनिक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड के प्रबंध निदेशक नारायण राव मंजूनाथ को अपनी मंशा बताई. इसकी भनक सीबीआई को लग गई और उसने भी गुपचुप तरीके से अपना काम शुरू कर दिया. 28 जनवरी को सीबीआई ने सबसे पहले गृह मंत्रालय से मंजूनाथ का फोन टैप करने की अनुमति लेकर उस पर नजर रखना शुरू कर दिया.

इसके बाद मंजूनाथ ने चंडीगढ़ के रहने वाले और रेलवे की जरूरत के उपकरण बनाने वाली कंपनी पिरामिड इलेक्ट्रोनिक्स के मुखिया संदीप गोयल से संपर्क साधा. गोयल तत्कालीन रेलमंत्री पवन बंसल के भांजे विजय सिंघला का अभिन्न मित्र था. महेश से जुड़े खिलाड़ियों में बाद में दिल्ली और अन्य जगहों के लोग भी शामिल हुए जिनका जिक्र कहानी में आगे है. इनके साथ ही पवन बंसल के बेटे मनीष बंसल के भी इस खेल से किसी-न-किसी रूप में जुड़े हो सकने की संभावनाओं का जिक्र भी तहलका के पास मौजूद दस्तावेजों में मिलता है.

लगभग इसी दौरान रेल मंत्रालय में रेलवे बोर्ड के खाली होने वाले पदों पर नियुक्ति के लिए योग्य लोगों की सूची तैयार की जा रही थी (नियुक्ति प्रक्रिया के लिए बॉक्स देखें). मंत्रालय के संयुक्त सचिव (गोपनीय) पी राजशेखरन ने आठ योग्य लोगों के नाम केन्द्रीय सतर्कता आयोग की अनुमति के लिए भेज दिए थे. ये आठों लोग सदस्य (स्टाफ) के पद पर नियुक्ति के योग्य थे और इनमें से तीन विशेष तौर से सदस्य (मेकैनिकल) और दो सदस्य (ट्रैफिक) बनने के योग्य थे.

कुछ दिनों की बातचीत के बाद मंजूनाथ और संदीप गोयल ने तय किया कि जल्द ही संदीप की मुलाकात सीधे महेश कुमार से करवाई जाए. इस मुलाकात के लिए 30 मार्च का दिन तय किया गया. महेश कुमार, मंजूनाथ और संदीप गोयल तय कार्यक्रम के अनुसार मुंबई के ताज होटल में मिले. उस वक्त महेश कुमार पश्चिमी रेलवे के प्रधान कार्यालय मुंबई में ही रहा करते थे. देर रात लगभग 12.30 बजे तक इन तीनों की वहां बैठक चली. इस बैठक के बाद से ही महेश और संदीप के बीच सीधी बातचीत का सिलसिला शुरू हो गया. इन बातचीतों में महेश ने संदीप को बताया कि अपनी नियुक्ति के लिए वे अहमद पटेल से भी संपर्क कर चुके हैं(तहलका के पास सीबीआई द्वारा टैप की गई इन दोनों की और आगे लिखी सभी बातचीतों के दस्तावेज हैं जिनमें से कुछ के संपादित अंश बॉक्सों में भी दिए गए हैं). संदीप ने महेश को रेलमंत्री के भांजे सिंघला से अपनी दोस्ती के बारे में बताया. साथ ही यह भी बताया कि उसकी मनचाही नियुक्ति सिंघला आसानी से करवा देगा. यह जानने के बाद महेश ने संदीप से वादा किया कि अब वे और किसी से अपनी नियुक्ति की बात नहीं करेंगे और सिर्फ उनसे ही अपना काम करवाएंगे. अब तक इस नियुक्ति के लिए पैसों के लेन-देन की कोई बात नहीं हुई थी.

इस मुलाकात के अगले ही दिन संदीप ने अपने दोस्त अजय गर्ग और विजय सिंघला को इस बारे में बताया. तीनों के बीच तय हुआ कि महेश कुमार को सिंघला से मिलवाने के लिए चंडीगढ़ बुलाया जाए. मुंबई से वापस चंडीगढ़ लौटते ही संदीप ने महेश और सिंघला की आपस में बात भी करवा दी. सिंघला से महेश कुमार की यह बात लैंडलाइन फोन पर करवाई गई. (तहलका को मिले दस्तावेजों से यह भी पता लगता है कि सिंघला अक्सर मोबाइल के बजाय लैंडलाइन का इस्तेमाल करना ही पसंद करता था और उसने कई बार लोगों को पवन बंसल के घर या ऑफिस के नंबर पर भी खुद से बात करने को कहा). अब सिंघला और महेश कुमार का मिलना बाकी थी. लेकिन इसी बीच सिंघला जर्मनी चला गया और यह मुलाकात कुछ दिनों के लिए टल गई.

उधर सीबीआई के स्तर पर भी कहानी एक कदम आगे बढ़ चुकी थी. मंजूनाथ के फोन पर हो रही बातों के जरिए उसे संदीप का पता चल चुका था और फरवरी के अंत से ही सीबीआई उसका भी फोन टैप करने लगी थी. मंजूनाथ और संदीप के फोन पर हो रही बातों के जरिये सीबीआई को उनके पूरे खेल की पल-पल की खबर मिल रही थी. लेकिन इस पूरे मामले में सीबीआई की भूमिका पर भी सवाल उठते हैं. यह सारा मामला महेश कुमार की नियुक्ति से जुड़ा था जिसके लिए वह कई लोगों से संपर्क साध रहा था. तहलका को मिले दस्तावेजों में यह भी सामने आया कि महेश कुमार के फोन से सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल को भी फोन किया गया. लेकिन सीबीआई ने कभी भी सीधे महेश कुमार का फोन टैप नहीं किया.

ठीक ऐसा ही सीबीआई ने विजय सिंघला के मामले में भी किया. सिंघला का फोन भी सीबीआई ने कभी टैप नहीं किया. जबकि वह इस मामले से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण लोगों में से था. इस पूरे मामले के दौरान सिंघला के फोन से कई बार पवन बंसल के घर और आवास पर फोन हुए. साथ ही सिंघला के फोन के रिकॉर्ड यह भी बताते हैं कि वह दिन में कई-कई बार पवन बंसल के ओएसडी वितुल कुमार और उनके बेटे मनीष बंसल से भी बात किया करता था. ऑफिस और सीबीआई ने महेश कुमार और विजय सिंघला के फोन क्यों टैप नहीं किए, इस पर आगे चर्चा करेंगे. अभी वापस लौटते हैं मुख्य कहानी की तरफ. अब तक सिंघला भी जर्मनी से लौट आया था.

2. रेल घूसकांड के आरोपियों के बीच फोन पर हुई बातचीत के संपादित अंश:

10 अप्रैल, सुबह के 7.51 बजे

संदीप- ठीक है न क्योंकि एमआर भी उस दिन यहीं थे.

महेश कुमार- हूं, अच्छा.

संदीप- अब वो शाम को यहीं थे तो विजय और मैंने उनसे चर्चा की.

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10 अप्रैल, सुबह के 8.06 बजे

संदीप- बाइचांस राहुल (भण्डारी) वहां पे होगा ना जी तो राहुल के सामने कोई बात मत करना कि आप हमें मिल चुके हो.

महेश कुमार- ना ना...बिलकुल भी नहीं. वो तो मैंने बात कह दी.

संदीप- अगर बंसल साहब अकेले होंगे तो बेशक कह देना, 99 फीसदी विजय कल वहां रहेगा.

महेश कुमार- अच्छा अच्छा.

संदीप- ये सिचुएशन ये ही है मतलब वो बेसिकली सारी बात कर ली है विजय ने 

एमआर से.

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11 अप्रैल, दोपहर के 3.19 बजे

महेश कुमार- अच्छा एक और बता दूं. जो एक आरसी अग्रवाल हैं, जिसका दो साल नहीं है जो मेरे ऊपर है.

संदीप- एनडब्ल्यूआर (नोर्थ वेस्ट रेलवे) वाले.

महेश कुमार- एनडब्ल्यूआर हां, तो उसका मैंने कहा, उसको कहने लगा, कहता है, लेकिन उसको कहता है एमआर ने बिलकुल मना कर दिया कि उसको कंसिडर नहीं कर रहा हूं किसी भी चीज़ के लिए.

संदीप- ठीक है.

महेश कुमार- तो मैंने कहा, जब उसको नहीं कर रहे हो तो अब तो ऑप्शन ही कुछ नहीं है, है ना ?

संदीप- हां हां. 

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महेश कुमार- तो मैंने कहा. देखो ये करना चाहें तो ये भी कर सकते हैं कि एमएस (सदस्य स्टाफ) बनाया फिर सदस्य इलेक्ट्रीकल बना दें .... दो एक दो केस तो मैं जानता हूं, जो लेटरल शिफ्ट हुआ है. 

संदीप- हुआ है, पहले भी हुआ है., हां जी हां हां हा.

महेश कुमार- अच्छा लेकिन ये बोला राहुल कि वो मिनिस्टर उसमें थोड़ा विश्वास नहीं रखते.

संदीप- वो तो हम कर लेंगे सर कनविंस. वो तो घर की बात है. वो आप मेरे पर छोड़ दो.

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संदीप- मैं एक काम और करुंगा सर. आपने विजय इंदर सिंघला का नाम सुना है?

महेश कुमार- ना ना ना.

संदीप- संगरुर से वो सांसद हैं.

महेश कुमार- हां. 

संदीप- मेंबर ऑफ पार्लियामेंट है और राहुल गांधी का राइट हैंड है बिलकुल.

महेश कुमार- हां हां

संदीप- वो मेरा फर्स्ट कज़िन है.

महेश कुमार- हां हां हां ये तुमने बताया था.

 

संदीप- मेरे बिना वो चलता नहीं है, मैं एक बार उसके कान में भी बात डाल लूंगा, वो बंसल साहब से भी बात कर लेगा और जरूरत होगी तो 10 जनपथ से भी एक हल्की सी कान में बात डलवा दूंगा मैं,कि उनको ऐसे करना हैं, वो कोई टेंशन नहीं है सर वो आप मेरे पर छोड़ दो.

सिंघला के लौटते ही दिल्ली में उसकी महेश कुमार से मुलाकात तय की गई. अप्रैल महीने के पहले हफ्ते में महेश कुमार आधिकारिक दौरे पर दिल्ली आए हुए थे. यह दौरा वैसे तो छह अप्रैल तक का ही था लेकिन सिंघला से मुलाकात के लिए सात अप्रैल का दिन तय हुआ तो महेश कुमार सात अप्रैल को भी दिल्ली में ही रुक गए. सीबीआई को दिए अपने बयान में टैक्सी चालक प्रताप सिंह का कहना है कि दिन में लगभग 12 बजे महेश रेलवे कॉलोनी से ललित होटल जाने के लिए उसकी टैक्सी में निकले. वे वहां से दिल्ली के बाराखम्बा रोड पर स्थित ललित होटल गए. यहीं महेश कुमार की मुलाकात संदीप और सिंघला से हुई. लगभग आधे घंटे की इस मुलाकात के बाद ये सभी लोग होटल से निकल कर पवन बंसल के सरकारी आवास छह-अशोक रोड पहुंचे. महेश को सदस्य (इलेक्ट्रिकल) बनाने के लिए आगे की रणनीति यहीं बनाई गई. लेकिन अब तक भी इन लोगों के बीच पैसों के लेन-देन की कोई चर्चा नहीं हुई थी. दिल्ली में इन लोगों के बीच जो कुछ भी चल रहा था उसकी सारी खबर संदीप और सिंघला अपने तीसरे दोस्त अजय गर्ग को भी दे रहे थे जो उस वक्त चंडीगढ़ में ही था. इसी दिन हुई संदीप और अजय की बातचीत से पता चलता है कि उस दिन संदीप गोयल का जन्मदिन भी था. लेकिन संदीप अपने जन्मदिन से ज्यादा यह डील करवाने को उत्सुक थे. संदीप से लगातार संपर्क में रहने के चलते सीबीआई ने अजय गर्ग का फोन भी टैप करना शुरू कर दिया. मगर जैसा कि पहले बताया जा चुका है इस बातचीत के केंद्र में जो दो लोग थे –महेश कुमार और विजय सिंघला - उनके फोन सीबीआई ने टैप किए हों इसका कोई प्रमाण नहीं है.

इसके बाद वह दिन भी आया जो इस कहानी की हर परत, इसमें हो रहे हर खेल के लिए महत्वपूर्ण था. यह दिन था 18 अप्रैल का. एक तरफ इस दिन महेश कुमार को सदस्य (इलेक्ट्रिकल) बनाने के लिए पहली बार पैसों की मांग की गई तो दूसरी तरफ मंत्रालय में भी इसी दिन महेश कुमार की नियुक्ति की फाइल पर पवन बंसल के हस्ताक्षर हुए. लेकिन हस्ताक्षर महेश कुमार के मनचाहे पद के लिए नहीं बल्कि उन्हें सदस्य (स्टाफ) बनाए जाने के लिए हुए. इस घटनाक्रम ने पूरी कहानी को एक और मोड़ दे दिया. इसलिए इस पूरे दिन को जरा नजदीक से देखते हैं.

इस दिन सुबह नौ बज कर 44 मिनट पर महेश कुमार के करीबी मंजूनाथ की संदीप गोयल से फोन पर बात हुई. संदीप ने मंजूनाथ को बताया कि महेश कुमार को सदस्य (इलेक्ट्रिकल) बनाने के लिए दस करोड़ रुपये लगेंगे. इसमें से पांच करोड़ नियुक्ति से पहले ही देने होंगे और बाकी इसके बाद. संदीप ने साथ ही यह भी कहा कि पिछली मुलाकात में महेश ने उनसे कहा था कि वे इस पद पर नियुक्त हो गए तो हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट कुछ ही दिनों में पास कर देंगे. इस तुलना में तो दस करोड़ बहुत ही छोटी रकम है.

 3. रेल घूसकांड के आरोपियों के बीच फोन पर हुई बातचीत के संपादित अंश:

12 अप्रैल, दोपहर के 2.26 बजे

विजय- क्यों डीओपीटी (कार्मिक मंत्रालय) से फाइल आनी है अभी

संदीप- किसकी

विजय- श्रीवास्तव की

संदीप- हां

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12 अप्रैल, दोपहर के 3.58 बजे

महेश कुमार- किसी को नहीं बोला. किसी को भी 100 पर्सेंट. पहले जो एक बार मैंने कहा था वो जो अपना अहमद पटेल जो बात हुई थी एक बार है ना.

संदीप- हां

महेश- अहमद पटेल से तो पहले बात हुई थी. लेकिन अब मैं रेल मंत्री और विजय के अलावा किसी और से संपर्क नहीं कर रहा हूं

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महेश कुमार- मैंने आपको कहा था एक बार शुरु-शुरु में जब मुझे कोई वो नहीं हो रहा था तो मैंने बताया था कि मैंने अहमद पटेल से सीधा (संपर्क किया) क्योंकि मेरे से बात होती है.

संदीप- मतलब वो तो एमआर को जैसे भी बोल के मतलब कर सकते हैं 

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17 अप्रैल, दोपहर के 1.50 बजे

महेश कुमार- क्योंकि  मैं बताऊं, अब तो मैंने बिलकुल बात नहीं की कि जैसे मैंने आपको बताया था बिलकुल भी. तो फिर शुरु में बात हुई थी उनसे एपी (अहमद पटेल) से. जो बात कर रहे थे है ना....

संदीप- हां

महेश- तो वो तब भी मैंने उनसे कहा था कि मुझे ये नहीं पता मतलब ये इसको छोड़ दीजिए बाकी पूछ लो

संदीप- हां

महेश कुमार- तो वो तो मेरे पीछे 4-5 दिन से, एक दिन फोन आया, क्या हुआ भाई? मैंने कहा, नहीं सर, नहीं, सब एमआर (रेल मंत्री) साहब कर रहे हैं. कोई दिक्कत नहीं है ना.

संदीप- ठीक है, ठीक है

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20 अप्रैल, दोपहर के 3.01 बजे

संदीप- सर जी, कल यहीं थे न चंडीगढ़. वो हमारी एक अमृतसर वाली गाड़ी का उदघाटन था.

महेश कुमार- मंत्री जी ?

संदीप- हां हां. कल मंत्री जी यहीं थे.

महेश कुमार- हां

संदीप- वो मोहाली तक गाड़ी में साथ ही गए सब लोग   

महेश- हां

संदीप- वो बोलते हैं कि नहीं अभी तक तो सदस्य (स्टॉफ) की फाइल ही नहीं गई संदीप

महेश- हां हां

संदीप- तो अभी सदस्य (स्टॉफ) की भी नहीं गई है अभी

महेश कुमार- ये मिनिस्टर ने कहा ?

संदीप- हां

महेश- अच्छा. फिर चलो कल बताता हूं पता करके

संदीप- मिनिस्टर ने खुद कहा है कि सदस्य (स्टॉफ) का तो अभी प्रपोजल ही नहीं बना है. हालाकि सदस्य (मैकेनिकल) का प्रपोजल उनकी टेबल पर पड़ा है.

मंजूनाथ से पैसों की मांग करने के लगभग दो घंटे बाद 11.30 बजे संदीप को अजय गर्ग का फोन आया. अजय ने संदीप को बताया कि महेश कुमार को सदस्य (इलेक्ट्रिकल) नहीं बल्कि सदस्य (स्टाफ) बनाया जा रहा है. साथ ही अजय ने यह भी कहा कि कुछ समय बाद उन्हें सदस्य (इलेक्ट्रिकल) बना दिया जाएगा. इसके लिए महेश कुमार से दस करोड़ रुपये लेने की बात भी अजय ने दोहराई. यह घटना महेश कुमार की नियुक्ति की फाइल पर रेल मंत्री के हस्ताक्षर होने से पहले की है.

इसी दिन शाम को पवन बंसल ने महेश कुमार की सदस्य (स्टाफ) पद पर नियुक्ति की फाइल पर हस्ताक्षर कर दिए. रेलवे बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति की यह प्रक्रिया इतनी गोपनीय होती है कि इसके प्रस्ताव को टाइप भी मंत्रालय के संयुक्त सचिव (गोपनीय) द्वारा किया जाता है. नियुक्ति की इस फाइल पर कोई डिस्पैच नंबर तक नहीं लिखा जाता और चेयरमैन खुद ही इस फाइल को लेकर रेल मंत्री के पास जाते हैं. यहां तक कि रेल मंत्री के निजी सचिव और जनसंपर्क अधिकारी तक को इस संबंध में कुछ पता नहीं होता. मंत्री के हस्ताक्षर होने के बाद संयुक्त सचिव (गोपनीय) इस फाइल को कैबिनेट की नियुक्ति समिति (एसीसी) के पास भेज देते हैं. स्वीकृति आने तक यह नियुक्ति गोपनीय ही बनी रहती है.

महेश कुमार की नियुक्ति के लिए भी प्रस्ताव तो संयुक्त सचिव (गोपनीय) पी राजशेखरन ने ही तैयार किया और चेयरमैन विनय मित्तल खुद इसे पवन बंसल के पास हस्ताक्षर के लिए ले गए. लेकिन इस नियुक्ति की खबर अजय को पहले ही हो गई थी.

जिस पद पर महेश की नियुक्ति हो रही थी वह उनका मनचाहा पद नहीं था. इसलिए फाइल साइन होने के अगले दिन यानी 19 अप्रैल को ही महेश कुमार ने मंजूनाथ को सारी बातें स्पष्ट करने और सिंघला से सीधी बात करने चंडीगढ़ भेजा. साथ ही महेश ने मंजुमाथ से कहा 'उनसे कहना कि सीधे ही सदस्य (इलेक्ट्रिकल) बनाएंगे. पहले सदस्य (स्टाफ) बनाके फिर सदस्य (इलेक्ट्रिकल) नहीं. उन्हें फिलहाल सदस्य (स्टाफ) की नियुक्ति स्थगित कर देनी चाहिए. फिर कुछ समय बाद सदस्य (इलेक्ट्रिकल), सदस्य (स्टाफ) और चेयरमैन तीनों को साथ में नियुक्त कर लें.'

 4. रेल घूसकांड के आरोपियों के बीच फोन पर हुई बातचीत के संपादित अंश:

संदीप- मैं दोपहर में महेश कुमार को अपने चचेरे भाई लोकसभा सांसद विजय इंदर सिंघला से मिलाने ले गया था.

मंजूनाथ- ओके ओके.

संदीप- वहां पर हम एक घंटे से अधिक समय तक रहे. 

मंजूनाथ- वेरी गुड वेरी गुड. 

संदीप- वो राहुल गांधी का खास आदमी है.

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महेश कुमार- मुझे ये रहस्य समझ में नहीं आ रहा है. सामान्य तौर पर इसमें प्रधानमंत्री कार्यालय 4 दिन का समय लेता है.

संदीप- हां जी हो गई कल साइन हो गई क्या.

महेश कुमार- हां, कल वो 6 घंटे में सब हो गया.

संदीप- सब 6 घंटे में हो गया ?

महेश कुमार- हां.

संदीप- अच्छा.

महेश कुमार- हां, तो ये कौन है इसके पीछे.

संदीप- नहीं मेरे को लगता है, रेल मंत्री साहब ने खुद ही कराया होगा सर.

महेश कुमार- अच्छा.

संदीप- हां, हां, मतलब वो मैंने आपको बतलाया था ना, वो एक सिस्टम से चले गए वो, कूदे नहीं. उन्होंने मतलब, बेसिकली करा लिया होगा अभी और कोई कॉन्ट्रोवर्सी ना क्रिएट हो.

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21 अप्रैल, शाम के 6.27 बजे

महेश- तुम कह रहे थे कि रेल मंत्री कह रहे थे प्रपोजल उनके पास है.

संदीप- हां, चला गया वो. 

महेश- हूं.

संदीप- भेज दिया फ्रायडे को.

महेश- हां, वही तो मैं भी कह रहा था, वो तो यहां कन्फर्म हो गया था लोगों से. 

संदीप- वो ऐसा है, बेसिकली ऑइ डू नॉट नो, क्यूं उन्होंने पहले ऐसा बोला बट उन्होंने आज कंफर्म कर दिया कि वो प्रपोजल चला गया है. वो कहते हैं कि पहले मैंने इसलिये नहीं बताया था कि तुम जोर डाल दोगे.

महेश- हूं हूं.

संदीप- तो हां, तो वो प्रपोजल उन्होंने भेज दिया है. और उन्होंने बेसिकली ये है कि मतलब जैसे प्रपोजल हमने प्रपोज किया है तो वैसे ही करेंगे. 

महेश- कौन कह रहे थे रेल मंत्री?

संदीप- हां.

संदीप- अच्छा जी. तो बुधवार को आप रहोगे वहां पर ?

महेश- हां. मैं रहुंगा. नहीं अभी तक तो कोई प्लान नहीं किया. पर रह लूंगा कोई दिक्कत थोड़े ही है रेल मंत्री से मिलना है तो रह ही लूंगा.

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महेश- फिर तो जुलाई के बाद दिसंबर वाला बजट आता है. सेशन आता है.

संदीप- हां हां.

महेश- तो दिसंबर तो बहुत लेट हो जाएगा.

संदीप- ये सर ऐसा है ना, ये आज जो है, आप विजय और अगर जरूरत पड़ती है तो रेल मंत्री को समझा पाने की अच्छी स्थिति में होंगे.

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24 अप्रैल, शाम के 7.52 बजे

संदीप- बात हुई थी एक्चुली. वो ज्यादा बात हो नहीं पाई वो लैंडलाइन कोई थी नहीं. उसने कहा, लैंडलाइन पे बात करेंगे. बस अभी मैं निकल रहा हूं सर दिल्ली के लिए वापस, बॉंबे एयरपोर्ट पे मैं हूं अभी.

महेश कुमार- हां, ठीक है. अच्छा अच्छा.

चंडीगढ़ में सिंघला और उनके साथियों से मुलाकात करने के बाद मंजूनाथ ने महेश कुमार को वापस फोन किया. इसमें उन्होंने महेश को बताया 'मेरी यहां विस्तार से चर्चा हुई है. दरअसल रेलमंत्री सदस्य स्टाफ का पद खाली नहीं रखना चाहते. लेकिन वो बाद में हमें सदस्य इलेक्ट्रिकल बना देंगे. ऐसा पहले भी तीन बार हो चुका है जब एक सदस्य को नियुक्त करने के बाद उसका पद बदला गया हो.'

रेलवे बोर्ड में किसी सदस्य को नियुक्त करने के बाद उसके पद को बदलने के संबंध में कुछ ही दिन पहले पवन बंसल ने तत्कालीन चेयरमैन विनय मित्तल से पूछा था. इस बात को सीबीआई को दिए अपने बयानों में मित्तल और बंसल दोनों ही स्वीकार करते हैं. यह बात विनय मित्तल ने ही पवन बंसल को बताई थी कि ऐसा पहले भी तीन बार किया जा चुका है. तीनों ही बार सदस्य (स्टाफ) को ही किसी और सदस्य के पद पर ट्रांसफर किया गया था. आश्चर्य की बात यह है कि 19 अप्रैल को ठीक यही बात मंजूनाथ चंडीगढ़ के खिलाड़ियों के हवाले से महेश कुमार को बता रहे थे.

अब महेश ने एक नई मांग सामने रख दी. उनकी मांग थी कि यदि उन्हें सदस्य (स्टाफ) बनाया जाता है तो जिस जीएम (पश्चिम) के पद पर वे थे उसका चार्ज भी दो महीने तक उन्हीं के पास रहने दिया जाए. साथ ही इन दो महीनों के लिए सदस्य इलेक्ट्रिकल से लेकर सिग्नल और टेलीकॉम(एसएंडटी) का चार्ज भी उन्हें सौंप दिया जाए. महेश इन दोनों प्रभारों को अपने पास रखने की जिद पर क्यों अड़े थे इसके बारे में सीबीआई ने अपने आरोपपत्र में पेज नंबर 18 पर लिखा है कि 'अगर वे जीएम का प्रभार अपने पास रखते और साथ ही उन्हें एसएंडटी का प्रभार भी मिल जाता तो वे जीएम के तौर पर कार्यों को प्रस्तावित करते और रेलवे बोर्ड के सदस्य के तौर पर खुद ही उसे स्वीकृति भी दे देते.' सीबीआई के इस कथन की पुष्टि 20 अप्रैल को महेश और संदीप  के बीच हुई एक बातचीत से भी होती है जिसमें महेश टुकड़ों-टुकड़ों में कहते हैं, 'अगर सदस्य (स्टाफ) बनाते हैं तो दो महीने के लिए सिग्नलिंग चार्ज दिलवा दें. उसका बहुत ही स्ट्रैटेजिक धंधा है हमारा...मैं तो दो महीने में ही चार सौ करोड़ के प्रपोजल डाल दूंगा... जैसे ही सदस्य इलेक्ट्रिकल पे पहुंचे धड़ाधड़ टेंडर(पास) कर देंगे.' महेश कुमार की इन शर्तों को पूरा करने के लिए सिंघला और उनके साथी तैयार हो गए. इसके बदले में उन्होंने दो करोड़ रुपये तुरंत देने की मांग की. बाकी आठ करोड़ सदस्य (इले) बनने से पहले और बाद में दिया जाना था.

उधर मंत्रालय की बात करें तो महेश कुमार के सदस्य (स्टाफ) बन जाने पर जीएम (पश्चिम) का जो पद खाली होना था उस पर नियुक्ति के लिए समय रहते यहां कोई प्रक्रिया शुरू नहीं की गई. (जैसा कि पहले लिखा जा चुका है कि इसे अपने ही पास रखने की मांग महेश कुमार, सिंघला एंड कंपनी से कर रहे थे). सीबीआई को दिए अपने बयान में मित्तल कहते हैं, 'मैंने कई बार माननीय रेलमंत्री से इस बारे में चर्चा की लेकिन उन्होंने कहा कि वे मुझे बाद में बताएंगे.’ महेश कुमार को यही चाहिए था कि इस पद पर फिलहाल किसी को नियुक्त न किया जाए ताकि इसका प्रभार भी वही संभालें रहें. सब कुछ महेश कुमार की इच्छा के अनुरूप होने लगा था. अब वक्त था तय की गई रकम जुटाने का.

 5. रेल घूसकांड के आरोपियों के बीच फोन पर हुई बातचीत के संपादित अंश:

25 अप्रैल, सुबह के 9.04 बजे

संदीप- मतलब मेरा तो हमेशा यही कहना है कि कोई ऐसा काम नहीं करना चाहुंगा जिससे मामाजी (पवन बंसल) को शर्मिंदगी झेलनी पड़े. 

विजय- हां.

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27 अप्रैल, सुबह के 11.48 बजे

महेश कुमार- अच्छा एक तो ये है कि रेल मंत्री ने मंडे को बुलाया है.

संदीप- हां जी हां जी बुलाया है हां ?

महेश कुमार- क्या है इश्यू क्या है ?

संदीप- मेरा ख्याल तो वही आगे उसी के लिए है कि जो बात आखिर हुई थी न. 

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27 अप्रैल, सुबह के 11.50 बजे

महेश- एजेंडा क्या है ? और क्या चल रहा है ?

संदीप- ठीक है सर ठीक है.

महेश- क्योंकि वो उधर से एक वो भी बात हुई है इनकी अहमद पटेल से भी.  

संदीप- किस से ?

महेश- अहमद पटेल से बात हुई है ना इनकी, रेलमंत्री की.

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30 अप्रैल, दिन के 12.09 बजे

मंजूनाथ- सौ फीसदी काम हो जाएगा सर. मात्र एक परिस्थिति में ही काम 

नहीं हो पाएगा.

मुरली- सर.

मंजूनाथ- अगर सोनिया गांधी की कोई और जरूरत हुई, जिसकी संभावना ना के बराबर है. सामान्य तौर पर मैडम कुछ नहीं कहती क्योंकि हम राहुल गांधी की अनुमति से कर रहे हैं. 

मुरली- ओके.

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30 अप्रैल, दिन के 12.11 बजे

संदीप- ये बात भी मैं उनसे कर सकता हूं लेकिन समस्या ये है कि रेलमंत्री फाइल वापस नहीं मंगाएंगे. मैं उनसे बात कर चुका हूं. यदि महेश कुमार फाइल वापस बुला पाते हैं या फिर किसी अन्य कारण से वो वापस आ जाती है तो उसे रोक लिया जाएगा.

मंजूनाथ- ये कल ही किया जा चुका है. उन्होंने बताया है कि अहमद पटेल इसे करा चुके हैं.

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30 अप्रैल, दिन के 12.30 बजे

सुशील- कल मिनिस्टर ने इनको बोल दिया है कि तुमको हम एमएल (मेम्बर इलेक्ट्रिकल) 100 पर्सेंट बना देंगे. जो भी कमिटमेंट हुआ है इनके लड़के के साथ में वो सब मिनिस्टर को मालूम है. 

मनोज- हां.

रकम जुटाने का यह काम भी महेश ने मंजूनाथ को ही सौंपा. मंजूनाथ इसके लिए आसानी से तैयार हो गया क्योंकि उसकी कंपनी रेलवे में ठेके लिया करती है और यदि महेश अपने मनचाहे पद पर नियुक्त हो जाता तो इसका सीधा फायदा मंजूनाथ को भी होता. महेश पहले से भी मंजूनाथ की कंपनी को रेलवे में ठेके दिलवाया करता था और सदस्य (इलेक्ट्रिकल) बनने पर भी उसने मंजूनाथ को फायदा पहुंचाने का वादा किया था. इस तरह से अपनी नियुक्ति के लिए जो घूस महेश को देनी थी वह उसने मंजूनाथ से एडवांस घूस के रूप में जमा करने को कहा. रकम जुटाने के फेर में ही अब कुछ और खिलाड़ी भी इस खेल में शामिल हुए. ये नए खिलाड़ी थे राहुल यादव, सुशील डागा, सीवी वेनुगोपाल, समीर संधीर, और मुरली कृष्ण. मंजूनाथ इस बीच संदीप से बात करके यह तय कर चुका था कि अभी वह एक करोड़ ही दे पाएगा और बाकी एक करोड़ तीन-चार दिन के बाद दिए जाएंगे. इन नए खिलाडियों के साथ मिलकर मंजूनाथ ने एक करोड़ रुपये का इंतजाम करना शुरू किया. ये सभी लोग भी रेलवे में ठेके लिया करते थे या रेलवे को अपनी कम्पनियों से माल बेचा करते थे. मंजूनाथ के जरिये उसी की तरह ये सभी लोग भी मुनाफा कमाने के लिए 'अग्रिम-घूस' जमा कर रहे थे. इन सभी की आपस में हुई बातों की पड़ताल करने पर एक और दिलचस्प बात सामने आती है. किसी व्यक्ति को सदस्य (स्टाफ) नियुक्त करने के कुछ समय बाद किसी अन्य पद पर नियुक्ति देने की जो बात विनय मित्तल ने पवन बंसल को बताई थी, वही बातें इन तक भी पहुंच चुकी थीं. इन सभी लोगों को सदस्य (स्टाफ) पर नहीं बल्कि सदस्य (इलेक्ट्रिकल) पर पैसे लगाने में दिलचस्पी थी. पैसे इकट्ठा करते वक्त ये लोग एक-दूसरे को यही बता रहे थे कि रेलवे बोर्ड में पहले भी तीन बार सदस्य (स्टाफ) को किसी अन्य पद पर नियुक्त किया गया है और महेश कुमार को भी दो महीने बाद सदस्य (इलेक्ट्रिकल) बना दिया जाएगा.

यहां यह ध्यान देने वाली बात है कि इस वक्त कम से कम सात-आठ लोग केवल एक करोड़ जमा करने के खेल में शामिल थे. जबकि सिंघला को दी जाने वाली कुल रकम थी 10 करोड़ रुपये. अगर बहुत कंजूसी करके भी सोचा जाए तो भी कम से कम 20-25 लोग तो शायद इतनी रकम जुटाने में भी शामिल होते ही. इसके बाद महेश कुमार को सदस्य (इले.) बनने पर रेलवे और करदाताओं की कीमत पर इन सभी का अहसान उतारना होता. 

सीबीआई अब तक भी बस चुपचाप इस पूरे खेल पर नजर बनाए हुए थी. अप्रैल समाप्त होने तक उसने राहुल यादव और सुशील डागा का भी फोन टैप करना शुरू कर दिया था. उधर मंत्रालय में भी बातें काफी आगे बढ़ चुकी थीं. एक मई को महेश कुमार को रेलवे बोर्ड का सदस्य (स्टाफ) नियुक्त कर दिया गया. इसके साथ ही जीएम के जिस पद पर वह पहले से नियुक्त थे उसका कार्यभार भी महेश कुमार ने ही संभाले रखा. अगले ही दिन यानी दो अप्रैल से इस कहानी की तीनों परतों में और भी हलचल पैदा हो गई. 

मंत्रालय में विनय मित्तल दो अप्रैल को फिर से पवन बंसल के पास पहुंचे. उन्होंने बंसल से जीएम (पश्चिम) पद पर किसी योग्य व्यक्ति को नियुक्त करने पर विचार करने को कहा. लेकिन इस बार भी बंसल ने उन्हें टाल दिया. इस पद को अपने पास रखना महेश की मांगों में से एक था जिसके लिए वे मंजूनाथ के जरिये पैसे जमा करवा रहे थे.

इधर मंजूनाथ ने 50 लाख रुपये का इंतजाम करके इन्हें कई खातों आदि में घुमाने के बाद हवाला के जरिये दिल्ली भिजवा दिया. इन रुपयों में से 25 लाख रुपये बंगलौर स्थित मंजूनाथ की कंपनी जीजी टॉनिक्स के  खाते से निकाले गए थे और 25 लाख का इंतजाम मंजूनाथ ने हैदराबाद की एक कंपनी से कर्ज लेकर किया था. सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में इस बात का खुलासा किया है कि मंजूनाथ ने संदीप से कहा था कि चूंकि उसके पास काला धन मौजूद नहीं है इसलिए उसे वाइट मनी को ब्लैक में बदलना होगा.

हवाला के जरिये दिल्ली आए रुपयों को लाने का जिम्मा समीर संधीर को सौंपा गया. इसके लिए उसे एक दस रुपये का नोट, जिसका नंबर 97W536860 था, पुरानी दिल्ली के लाहौरी गेट के एक हवाला कारोबारी को दिखाना था. राहुल, सुशील डागा, वेनुगोपाल और मंजूनाथ एक ही कंपनी में बराबर के पार्टनर थे. वेंकटेश्वर रेल निर्माण नाम की इस कंपनी के खाते से भी 10 लाख रुपये निकाले गए. 25 लाख रुपये विजयवाड़ा के मुरली कृष्ण ने दिए और 4.68 लाख रुपये सुशील डागा से लिए गए. इस तरह से सारे हाथ-पैर मारने के बाद मंजूनाथ और उनके साथियों ने कुल 89.68 लाख रुपये 2 अप्रैल की रात तक जमा किए. 

अब बारी थी इस पैसे को चंडीगढ़ पहुंचाने की. तीन अप्रैल को मंजूनाथ दिल्ली में ही था और खुद ही इस पैसे को लेकर चंडीगढ़ जाने वाला था. उसके सभी साथी और खास तौर से राहुल यादव इस बात के पक्ष में नहीं थे. राहुल को यह काम बहुत ही जोखिम भरा लग रहा था और उसका मानना था कि मंजूनाथ खुद जाने के बजाय किसी कर्मचारी को पैसे लेकर भेजे. अंत में हुआ भी यही. मंजूनाथ ने राहुल से कहा कि वह अपने किसी भरोसेमंद कर्मचारी को पैसे लेकर भेज दे. फोन पर उसने राहुल को यह भी निर्देश दिया कि पैसा दो अलग-अलग गाडियों में भेजा जाए. राहुल यादव और उसके साथियों ने इसके लिए अपने दो कर्मचारियों को चुना. धर्मेन्द्र और विवेक नाम के इन कर्मचारियों को तुरंत ही चंडीगढ़ जाने के लिए लाजपत नगर स्थित राहुल यादव के ऑफिस बुलाया गया.

इन्हीं दिनों प्रधानमंत्री, उनके कार्यालय, कानूनमंत्री और खुद सीबीआई की जान पर कोयला आवंटन की जांच को लेकर जबर्दस्त संकट आया हुआ था. चार महीने से शांत बैठ कर सब कुछ दूर से देख रही सीबीआई ने अब सीधी कार्यवाई करने का मन बना लिया. सुबह 10 बजे से कुछ पहले सीबीआई इंस्पेक्टर नीरज अग्रवाल को पुलिस अधीक्षक प्रदीप कुमार ने इस मामले से संबंधित प्रथम सूचना रिपोर्ट सौंपी. यह बस कुछ ही देर पहले लिखी गई थी. इस रिपोर्ट के अनुसार घूस का यह पैसा विजय सिंघला और उनके साथियों को चंडीगढ़ में सौंपा जाना था. तुरंत एक सीबीआई टीम का गठन हुआ जिसमें डीएसपी सुरेन्द्र मलिक, दो अन्य इंस्पेक्टर और दो सिपाही शामिल थे. लगभग 10.35 बजे यह टीम दिल्ली से चंडीगढ़ के लिए रवाना हो गई.

इधर राहुल यादव के ऑफिस पहुंचने पर 89.68 लाख रुपये को दो भागों में बांटकर धर्मेन्द्र और विवेक के हवाले कर दिया गया. चंडीगढ़ रवाना होने से पहले धर्मेन्द्र और विवेक को बस इतना ही बताया गया कि उन्हें वहां जाकर ये पैसे किसी को देने हैं.

 6. रेल घूसकांड के आरोपियों के बीच फोन पर हुई बातचीत के संपादित अंश:

संदीप- देख लेना यार वो अपने बंदे भी एडजस्ट हो जाएं.

विजय- ठीक है.

संदीप- हां...मतलब कह के रखना, डिसकस कर लेंगे तेरे नाल.

विजय- हूं हूं.

संदीप- है ना, हां उनके बारे में हुआ डिसकस ईसीजी वाला?

विजय- हुआ नी यार. अभी तो उसने कागज...देखा ही नी होगा.

संदीप- अच्छा. 

विजय- शाम को हो जाएगी बात. 

संदीप- हां फिर नजर पड़ेगी, मामाजी (पवन बंसल) से कर लेना बात. 

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30 अप्रैल, दिन के 2.56 बजे

मंजूनाथ- यह मंत्री के बेटे द्वारा किया जा चुका है.

मुरली- अच्छा, अच्छा,अच्छा.

मंजूनाथ- मिनिस्टर ने कहा कि ऐसा करो विजय और मेरे बेटे से बात करो.

मुरली- हां.

मंजूनाथ- बंसल ने सीधे तौर पर कहा कि मैं औपचारिक रुप से महेश कुमार से इस बारे में चर्चा करूंगा. कोई दिक्कत नहीं है॑.

मंजूनाथ- मिनिस्टर के लोगों को अब इस पर कायम रहना चाहिये.

मुरली- हां.

मंजूनाथ- नहीं तो वो कोई दूसरा बहाना लेकर हाजिर हो जाएंगे कि सर सोनिया (गांधी) की तरफ से (दबाव) आया है. ऐसे में हम इसमें कुछ नहीं कर सकत.

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1 मई, सुबह के 9.37 बजे

महेश कुमार- आज शाम या कल सुबह तक ये ऑर्डर आएंगे, तो मैं ये कल जाकर ज्वाइन करुंगा तो साथ में वो ऑर्डर भी निकलवा देना. 

संदीप गोयल- ठीक है सर. ठीक है. जीएम (पश्चिम) के मतलब एज-इट-इज ना आज ही ऑर्डर साथ ही निकलवा दूंगा.

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3 मई, दोपहर के 1.18 बजे

मंजूनाथ- मैं सर (महेश कुमार) से मिल कर आ रहा हूं, वो मेंबर (स्टाफ) बनने पर काफी खुश थे.

संदीप- हां हां.

मंजूनाथ- हां कल एमआर (रेल मंत्री) के साथ मीटिंग थी उनकी.

संदीप- ओक.

मंजूनाथ- एमआर ने कहा कि मेंबर स्टाफ का जो भी काम है उसे फटाफट निपटाओ क्योंकि आपके पास केवल दो महीने का समय है.

संदीप- हां हां.

मंजूनाथ- दरअसल ये बिलकुल सही संकेत है.

संदीप- हां हां.

धर्मेन्द्र और विवेक के दिल्ली से रवाना होने के बाद मंजूनाथ ने संदीप को फोन किया और पैसा भेजने की जानकारी देने के बाद कहा, 'मैं अभी महेश सर से मिला था. वो अपनी नियुक्ति से काफी खुश थे. दरअसल कल उनकी रेल मंत्री के साथ मीटिंग थी. तो रेल मंत्री ने उन्हें कहा कि सदस्य (स्टाफ) का जो भी काम है तुम फटाफट दो महीने में निपटाओ, क्योंकि तुम्हारे पास सिर्फ दो महीने का ही समय है. 'मंजूनाथ आगे यह भी कहता है, 'ये बिलकुल सही संकेत है. 'साफ है कि पवन बंसल के महेश कुमार से ऐसा कहने का सीधा मतलब उन्होंने यही लगाया था कि दो महीने बाद पवन बंसल की मदद से वे सदस्य (स्टाफ) से सदस्य (इले.) बनने वाले हैं. सीबीआई को दिए अपने बयान में पवन बंसल भी मानते हैं कि वे मेंबर स्टाफ बनने के बाद महेश कुमार से मिले थे मगर वे इसे एक शिष्टाचार भेंट भर बताते हैं. 

बहरहाल, लगभग तीन बजे सीबीआई की टीम चंडीगढ़ पहुंची. धर्मेन्द्र और विवेक अभी रास्ते में ही थे. दिल्ली में बैठे समीर और उनके साथी बार-बार फोन पर उनकी स्थिति जान रहे थे. इस बीच मंजूनाथ और उनके दिल्ली के सभी साथी काफी खुश थे कि उनका काम बस होने ही वाला है. महेश की नियुक्ति के लिए लगभग पांच लाख रुपये देने वाले सुशील डागा को राहुल यादव फोन पर बधाई देते हुए कह रहा था, 'अब तुम भी महेश कुमार को कह सकते हो कि मैंने भी तेरी पोस्टिंग के लिए पांच लाख रुपये दिए हैं.'

लगभग पांच बजे धर्मेन्द्र और विवेक चंडीगढ़ पहुंचे. पहुंचते ही उन्होंने संदीप को फोन किया, जिसने उन्हें सेक्टर 28 में विजय सिंघला के ऑफिस में आने को कहा. सीबीआई अब तक विवेक का भी फोन टैप करने लगी थी. उधर सीबीआई टीम भी दो लोगों को बतौर गवाह अपने साथ लेने के बाद लगभग 5.30 बजे सेक्टर 28 पहुंच गई. अब तक धर्मेन्द्र और विवेक यहां नहीं पहुंचे थे. लगभग 15 मिनट बाद वे दोनों भी दो कारों में यहां पहुंच गए. सेक्टर 28 पहुँच कर विवेक ने फिर से संदीप को फोन किया और बताया कि वे गंतव्य पर पहुंच चुके हैं. संदीप ने उसे कुछ देर वहीं इन्तजार करने को कहा. इस बीच विवेक ने दिल्ली में समीर को फोन करके भी बता दिया था कि वह बताई हुई जगह पर पहुंच चुका है और संदीप का इंतजार कर रहा है. कुछ ही देर बाद संदीप वहां पहुंच गया और उसने धर्मेन्द्र और विवेक को सिंघला के ऑफिस में आने को कहा. दोनों ने अपनी-अपनी गाडियों से नोटों के बैग निकाले और विजय सिंघला के ऑफिस में दाखिल हो गए. कुछ ही देर बाद सीबीआई की टीम भी सिंघला के ऑफिस पहुंच गई और इन सभी को रंगे हाथों गिरफ्तार कर लिया गया. सभी के मोबाइलों, लैपटॉपों, सिंघला के ऑफिस से मिले कई दस्तावेजों और सारे पैसों को सीबीआई ने अपने कब्जे में ले लिया. 

इधर दिल्ली से समीर और उनके बाकी साथी बार-बार चंडीगढ़ में फोन करने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन सभी के नंबर या तो बंद हो चुके थे या उन पर कोई जवाब नहीं मिल रहा था. दिल्ली में बैठे ये सभी लोग एक-दूसरे को सांत्वना दे रहे थे कि अभी कुछ देर में फोन आ जाएगा. फिर समीर ने मंजूनाथ को फोन किया और बताया कि उनके भेजे हुए लोग चंडीगढ़ तो पहुंच चुके थे लेकिन अब काफी देर से उनसे संपर्क नहीं हो पा रहा है. मंजूनाथ ने समीर को समझाते हुए कहा, 'मैं जितनी भी बार चंडीगढ़ उनसे मिलने गया हूं तो उन्होंने फोन बंद करवा दिया था. वो लोग काफी सावधानी से चलते हैं. घबराने की बात नहीं है. हो सकता है वहां पैसों की गिनती चल रही हो.' मंजूनाथ का अनुमान बिल्कुल सही था. वहां सच में पैसों की गिनती ही चल रही थी. लेकिन यह गिनती सिंघला और उनके साथी नहीं बल्कि सीबीआई और उसके गवाह कर रहे थे.

रात लगभग 9.30 बजे तक भी समीर और उनके साथियों को यह अंदाजा नहीं हुआ था कि उनका सारा खेल अब सीबीआई हाइजैक कर चुकी है. उन्हें इसका पता तब लगा जब उन्होंने टीवी पर समाचार सुना कि पवन बंसल के भांजे विजय सिंघला को सीबीआई ने घूस लेते हुए गिरफ्तार कर लिया है. इस खबर ने सभी के होश उड़ा दिए. अब तक महेश कुमार को भी गिरफ्तार किया जा चुका था. समीर और उनके साथी भी अब समझ चुके थे कि जल्द ही उनकी भी गिरफ्तारी  तय है. ऐसा ही हुआ भी. अगले ही दिन चार अप्रैल को मंजूनाथ, राहुल यादव और समीर भी गिरफ्तार हो गए. इसके कुछ दिन बाद अन्य लोगों को भी सीबीआई ने एक-एक कर गिरफ्तार कर लिया.

अब इस कहानी में सीबीआई के अलावा बाकी सभी खेल खत्म हो चुके थे. लेकिन सीबीआई के इस पूरे खेल पर नजर डालें तो समझ आता है कि उसका भी खेल कितना बिगड़ा हुआ है. गिरफ्तारी के समय जब सीबीआई ने सिंघला और संदीप से पैसों के बारे में पूछा तो पहले उनका कहना था कि ये पैसे समीर संधीर ने डेरा बस्सी की एक जमीन के सौदे के लिए भेजे हैं. लेकिन सीबीआई के सवालों के आगे उनका यह झूठ एक मिनट भी नहीं टिक पाया. उन्होंने स्वीकार कर लिया कि पैसा महेश कुमार की नियुक्ति के लिए घूस के तौर पर आया है. आगे पूछने पर संदीप ने बताया कि उसे यह जानकारी नहीं है कि यह धनराशि किस-किस में बंटनी है और इस मामले में सिंघला की पवन बंसल से कोई बात हुई है कि नहीं. सीबीआई ने संदीप के इस बयान को ऐसे ही स्वीकार भी कर लिया. जबकि इतने महीनों से उस पर नजर रख रही सीबीआई को यह मालूम था कि संदीप खुद फोन पर कई बार यह कह चुका है कि उसने इस मामले में सीधे पवन बंसल से बात की है.

ऐसा ही सिंघला के मामले में भी हुआ. सिंघला ने सीबीआई को बयान दिया कि यह पूरा पैसा वह खुद ही रखने वाला था और चूंकि पवन बंसल उसके मामा हैं तो वह उनसे इस नाते ही महेश कुमार की नियुक्ति की सिफारिश करने वाला था. सिंघला ने यह भी कहा कि उसने अभी तक पवन बंसल से महेश कुमार की नियुक्ति के बारे में बात तक नहीं की है. जबकि उसके फोन के कई वार्तालापों के रिकॉर्ड जो सीबीआई के पास पहले से ही थे, खुद ही उसकी इस बात को गलत साबित कर देते हैं. आरोप पत्र बताता है कि सीबीआई ने उससे इस बाबत आगे कोई सवाल नहीं किया.

सीबीआई के पास सिंघला की बातचीत की रिकॉर्डिंग तो है लेकिन सिर्फ उन बातचीत की, जो सिंघला की किसी ऐसे व्यक्ति से हो रही हो जिसका फोन सीबीआई टैप कर रही थी. अगर सीबीआई सीधे सिंघला का ही फोन टैप करती (जिसमें उसे कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए थी क्योंकि सीबीआई के मुताबिक वह केवल एक 'निजी व्यक्ति' ही था) तो उसे कुछ बेहद जरूरी जानकारी मिल सकती थी. मसलन सिंघला के फोन को टैप करने पर उसे बंसल और सिंघला की बातचीतों का पता चल सकता था. इस जानकारी से पवन बंसल पर लग रहे आरोपों या उनकी निर्दोषता को अंतिम सत्य की तरह प्रमाणित किया जा सकता था. अपनी गिरफ्तारी से कुछ देर पहले तक भी सिंघला के फोन से पवन बंसल के घर, उनके ऑफिस, उनके बेटे मनीष बंसल और उनके ओएसडी वितुल कुमार को कई बार फोन किया गया था. ऐसे में अगर सिंघला का फोन टैप हो रहा होता तो निश्चित ही सीबीआई को कुछ बेहद अहम जानकारियां मिलती ही मिलतीं.

अब सवाल यह उठता है कि सीबीआई ने सिंघला का फोन क्यों टैप नहीं किया. कुछ जानकारों का मानना है कि सिंघला का फोन सीबीआई ने टैप तो किया होगा. इस मामले में जब सब कुछ सिंघला के जरिये ही हो रहा था तो सीबीआई ने निश्चित तौर पर उस पर नजर रखी होगी. इन लोगों की मानें तो सिंघला के फोन पर किस-किस से क्या-क्या बातें हुईं. यह सार्वजनिक करने की हिम्मत सीबीआई में नहीं थी. इसलिए उसने सिंघला के फोन की टैपिंग की बात से ही इनकार कर दिया. और अगर सीबीआई ने सच में सिंघला का फोन कभी टैप नहीं किया तो कोई भी यह आसानी से कह सकता है कि देश की इस सबसे बड़ी जांच एजेंसी से अच्छी जांच तो मशहूर धारावाहिक सीआईडी का एसीपी प्रद्युमन भी कर सकता था. ऐसे ही कुछ कारण महेश कुमार का फोन टैप न करने के पीछे भी सोचे जा सकते हैं. 

बहरहाल, इन गिरफ्तारियों के बाद शुरू हुआ गवाहों से पूछताछ का सिलसिला. दो जुलाई को आरोपपत्र दाखिल करने तक सीबीआई ने कुल 90 गवाहों से पूछताछ की. इस पूछताछ के दौरान सामने आई बातों से भी पवन बंसल और खुद सीबीआई पर कई सवाल उठते हैं. इस पूरी कहानी में शक की सुई कई बार बंसल की तरफ घूमती है लेकिन इसके बावजूद  सीबीआई बंसल को आरोपित बनाने के बजाय सिर्फ एक गवाह बनाती है. पूछताछ के दौरान जो जवाब बंसल सीबीआई को देते हैं उससे और भी कई नए सवाल खड़े होते हैं. लेकिन सीबीआई इन सवालों पर पूरी तरह से आंख बंद कर लेती है. 

मसलन बंसल से पूछताछ में सिंघला की पवन बंसल से नजदीकियों का सवाल कई बार सामने आता है. इसके जवाब में पवन बंसल ने कहा कि सिंघला उनके पूरे कार्यकाल में सिर्फ तीन बार  उनसे दफ्तर में मिलने आया था और वह उनके बाकी रिश्तेदारों जैसा और उतना ही उनका नजदीकी भर है. लेकिन रेलवे बोर्ड के चेयरमैन से लेकर संयुक्त सचिव तक सभी सिंघला को अच्छे से पहचानते थे. विनय मित्तल और राजशेखरन दोनों ने ही सीबीआई को बताया कि सिंघला अक्सर बंसल के ऑफिस में आया करता था. विनय मित्तल ने यह भी कहा कि बंसल ने जब रेल मंत्री की शपथ ली तो वह उन गिने-चुने परिवार के सदस्यों में था जो उस दिन बंसल के साथ थे. मित्तल के मुताबिक खुद पवन बंसल ने ही सिंघला का परिचय उनसे करवाया था. इसके साथ ही बजट पेश करने के दौरान भी सिंघला पवन बंसल के साथ ही था.

सीबीआई की पूछताछ में यह भी सामने आया कि रेलवे के सबसे बड़े अधिकारियों से लेकर बंसल के आधिकारिक ड्राइवर तक सिंघला को पहचानते थे. बंसल के ड्राइवर रमेश कुमार ने भी सीबीआई को दिए अपने बयान में कहा है कि सिंघला हर महीने एक-दो बार दिल्ली में उनके घर आया करता था और वह खुद भी दो-तीन बार सिंघला को रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट तक पहुंचाने गया है. 

दूसरा अहम सवाल था बंसल का कई नियुक्तियों पर कोई भी फैसला न लेना जो सीधे तौर से महेश कुमार की मांगों को पूरा कर रहा था. सीबीआई ने बंसल से पूछा कि क्यों उन्होंने जीएम (पश्चिम) के पद पर किसी को नियुक्त करने का फैसला नहीं लिया और इसका कार्यभार महेश कुमार के पास ही रहने दिया. इसके जवाब में बंसल ने कहा कि उन्हें इसका समय ही नहीं मिला क्योंकि एक मई को ही यह पद खाली हुआ और इसके दो-तीन दिन बाद ही महेश कुमार को निलंबित कर दिया गया था. साथ ही बंसल ने यह भी कहा कि मैं किसी को भी अतिरिक्त कार्यभार देने के पक्ष में नहीं था और अरुणेन्द्र कुमार की पदोन्नति के बाद दो दिन में ही उन्होंने अरुणेंद्र का पुराना कार्यभार वापस ले लिया था.

अपने इस जवाब में बंसल खुद ही फंसते नज़र आते हैं. अरुणेन्द्र कुमार और महेश कुमार की पदोन्नति एक ही साथ हुई थी. फिर जब अरुणेन्द्र से दो ही दिन में उनके पुराने पद का कार्यभार ले लिया गया तो महेश कुमार से क्यों नहीं लिया गया. जीएम के पद पर नियुक्ति की भी एक प्रक्रिया होती है और इस नियुक्ति का प्रस्ताव रेलमंत्री की अनुमति से ही बनता है. अरुणेन्द्र कुमार जिस पद से पदोन्नत हो रहे थे उस पर किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त करने के लिए बंसल ने ही प्रस्ताव बनाने की अनुमति दी होगी. लेकिन महेश कुमार के मामले में बंसल ने चेयरमैन के कई बार बोलने पर भी ऐसा नहीं किया.

इस सबसे इतर एक और महत्वपूर्ण पहलू है जिस पर सीबीआई ने बिल्कुल भी ध्यान देना जरूरी नहीं समझा. विजय सिंघला और उनके दोस्त सिर्फ एक महेश कुमार की ही नियुक्ति के बारे में बात नहीं कर रहे थे बल्कि उनके बीच कई अन्य अधिकारियों की नियुक्तियों, पदोन्नति और ट्रांसफर की बातें भी हो रही थीं. मंत्रालय में होने वाली हर छोटी-बड़ी और अति गोपनीय बातों की भी इन लोगों को सारी खबर थी. इससे जाहिर है कि रेल मंत्रालय में इनका बहुत ही मजबूत हस्तक्षेप था. पवन बंसल का भांजा होने के अलावा विजय सिंघला की ऐसी कोई काबिलियत नहीं थी कि उनका मंत्रालय में इस स्तर पर दखल हो सके. जिस तरह से मंत्रालय के बड़े-बड़े अधिकारी भी उनको पहचानते थे और हर रोज कई-कई बार उनके फ़ोन से बंसल के ऑफिस, वितुल कुमार और मनीष बंसल को फोन किए जाते थे इससे किसी को भी लग सकता है कि अपना खेल वे मंत्रालय में बिना किसी मजबूत समर्थन के नहीं खेल रहे थे.

सवाल उठता है कि इतना सब जानने के बाद भी सीबीआई सिर्फ सिंघला तक ही सीमित क्यों रही जबकि आगे बढ़ने की कई राहें नजर आती थीं. क्यों सीबीआई ने कभी भी सिंघला, महेश कुमार या मनीष बंसल (एक और निजी व्यक्ति) का फोन टैप नहीं किया? क्यों पवन बंसल और अन्य कइयों के ऐसे जवाबों को भी सीबीआई ने खामोशी से स्वीकार कर लिया जो पहली नजर में ही गलत प्रतीत होते थे? इन सारे सवालों के जवाब में राजनीतिक दबाव भी तलाशा जा सकता है और सीबीआई की नाकाबिलियत भी.

अगर दूर की सोची जाए तो इसकी एक संभावित व्याख्या यह भी हो सकती है कि सीबीआई का मकसद पवन बंसल को फंसाना कभी था ही नहीं. वे तो एक समय-विशेष में सीबीआई से लेकर प्रधानमंत्री तक की साख बचाने का एक माध्यम बन गए थे. जैसे ही यह कार्य कुछ सध-सा गया उनके फंसे होने की उपयोगिता खत्म हो गई जिसका नतीजा आज हमारे सामने है.

नियुक्ति प्रक्रिया

भारतीय रेलवे बोर्ड में चेयरमैन के अलावा छह सदस्य होते हैं- 1. सदस्य (इंजीनियरिंग) 2. सदस्य (मैकेनिकल) 3. सदस्य (स्टाफ) 4. सदस्य (इलेक्ट्रिकल), 5. फाइनेंशियल कमिश्नर और 6. सदस्य (ट्रैफिक).  देश में कुल 17 रेलवे जोन हैं. प्रत्येक जोन का प्रमुख जीएम (जनरल मैनेजर) होता है, जो जीएम (ओपन लाइन) कहलाता है. 

रेलवे बोर्ड के सदस्य का पद भारत सरकार के सचिव और चेयरमैन के प्रमुख सचिव के बराबर का होता है. इसलिए बोर्ड के सदस्यों की नियुक्ति पर अंतिम मोहर कैबिनेट की अपॉइंटमेंट कमिटी (एसीसी) लगाती है. 

रेलवे बोर्ड के सदस्य की नियुक्ति प्रक्रिया चेयरमैन और रेल मंत्री के बीच मंत्रणा से शुरु होती है. चेयरमैन, रेल मंत्री से बोर्ड में खाली हो रही या हो चुकी जगह के बारे में चर्चा करता है. रेल मंत्री से भर्ती प्रक्रिया शुरु करने की अनुमति मिलने के बाद बोर्ड अध्यक्ष अपने संयुक्त सचिव (गोपनीय) को उन तमाम अधिकारियों की लिस्ट तैयार करने के लिए कहता है जो खाली हो रहे सदस्य के पद के लिए योग्य हैं.

बोर्ड सदस्य बनने के लिए सबसे बुनियादी योग्यता यह है कि 

(1) संबंधित अधिकारी के पास बोर्ड में जगह खाली होने के समय कम से कम 2 साल की सर्विस बची होनी चाहिए.

(2) अधिकारी ने कम से कम 1 साल बतौर जीएम (ओपन लाइन) काम किया हो. वहीं फाइनेंशियल कमिश्नर के लिए यह नियम है कि उसने कम से कम बतौर जीएम, इंडियन रेलवे एकाउंट्स सर्विस में काम किया हो. 

अगर अधिकारियों में कोई ऐसा न हो जिसकी बोर्ड में जगह खाली होने के समय दो साल की नौकरी बची हो तो उस समय सबसे वरिष्ठ जीएम ( ओपन लाइन) जिसकी कम से कम एक साल की सर्विस बची हो, बोर्ड की सदस्यता के योग्य माना जाएगा.

उपरोक्त आधार पर योग्य अधिकारियों की सूची तैयार करने के बाद संयुक्त सचिव (गोपनीय) चयनित अधिकारियों की सूची क्लीयरेंस के लिए सलाहकार (विजिलेंस) के माध्यम से सीवीसी के पास भेजता है. सीवीसी से हरी झंडी मिलने के बाद संयुक्त सचिव (गोपनीय), चेयरमैन के दिशानिर्देश में प्रपोजल तैयार करता है. उसमें योग्य उम्मीदवारों की पूरी जानकारी, उनका सर्विस रिकॉर्ड, वरिष्ठता सूची, विजिलेंस क्लियरेंस की कॉपी, पद पर भर्ती से संबंधित नियम आदि को शामिल किया जाता है.

यह सारा मामला इतना गोपनीय होता है कि टाइपिंग से लेकर फाइल तैयार करने तक का सारा काम संयुक्त सचिव (गोपनीय) बोर्ड अध्यक्ष के दिशानिर्देश में खुद करता है. प्रस्ताव तैयार हो जाने के बाद चेयरमैन इसे लेकर रेल मंत्री के पास जाता है. रेल मंत्री के हस्ताक्षर के बाद बोर्ड अध्यक्ष फाइल पर अपना हस्ताक्षर करके उसे कैबिनेट सेक्रेटरी के पास एसीसी के अनुमोदन के लिए भेज देता है. रेलवे में नियुक्ति से संबंधित एसीसी में प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और रेल मंत्री सदस्य होते हैं. 

बोर्ड के सदस्यों का चुनाव आठ क्षेत्रों से किया जाता है. जैसे सदस्य (इंजीनिरिंग) का इंडियन रेलवे सर्विस ऑफ इंजीनियर्स (आईआरएसई) से तो सदस्य इलेक्ट्रिकल का इंडियन रेलवे सर्विस ऑफ इलेक्ट्रिकल इंजीनियरर्स (आईआरएसईई) से.

सदस्य (स्टाफ) और रेलवे बोर्ड का चैयरमैन, ये दो ही ऐसे पद हैं जिन पर सभी आठों में से किसी भी क्षेत्र से जुड़ा व्यक्ति काबिज हो सकता है. यही कारण है कि सदस्य (स्टाफ) को आगे जाकर उसकी योग्यता के मुताबिक किसी दूसरे क्षेत्र के सदस्य का पद भी दिया जा सकता है. 1986 से लेकर अब तक इस तरह की कम से कम तीन लेटरल शिफ्टिंग हुई हैं. सीबीआई के मुताबिक महेश कुमार की नजर इसी तरह की शिफ्टिंग के जरिये सदस्य (इलेक्ट्रिकल) बनने पर थी.


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