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न्यूज क्लिपिंग्स् | बिलासपुर घटना से मिले सबक - डा. मनोहर अगनानी

बिलासपुर घटना से मिले सबक - डा. मनोहर अगनानी

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published Published on Nov 17, 2014   modified Modified on Nov 17, 2014
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में नसबंदी ऑपरेशन के दौरान लापरवाही के कारण एक दर्जन से ज्यादा महिलाओं की मौत हो गई। खबरों के मुताबिक औजारों को ठीक से रोगाणुहीन नहीं किया गया था या दवाइयों में कुछ मिलावट के कारण महिलाओं को विषबाधा हुई। प्राथमिक जांच में दूसरा कारण सामने आ रहा है। इस घटना से परिवार नियोजन कार्यक्रम पर प्रश्न-चिह्न लग गया है, जो मीडिया के मुताबिक न तो पारदर्शी है, न चिकित्सकीय रूप से सुरक्षित और न इससे देश की अाबादी को स्थिर करने में कोई बहुत बड़ी मदद मिल रही है। फिर हर नसबंदी ऑपरेशन पर डॉक्टरों व अधिकारियों को बोनस के भुगतान पर भी नैतिक सवाल उठाए गए हैं, क्योंकि इसमें जोर-जबर्दस्ती की गुंजाइश मौजूद है।

दुनिया में भारत एकमात्र ऐसा देश है, जहां परिवार नियोजन के विभिन्न साधनों में महिला नसबंदी ज्यादा प्रचलन में है। पिछले साल देश में नसंबदी के 42 लाख ऑपरेशन हुए, जिनमें 98 फीसदी ट्यूबेकटोमी यानी महिला नसंबदी के थे। परिवार नियोजन के प्रयास खासतौर पर महिलाओं पर ही केंद्रित है, क्योंकि हमारे यहां पुरुषों में यह गलतफहमी है कि ऐसेे ऑपरेशन से उनका पुरुषत्व प्रभावित होगा। यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि एमटीपी (मेडिकल टर्मीनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी) एक्ट में संशोधन कर गर्भपात सेवाओं का विस्तार कर सरकार ने गर्भ निरोधक सेवाएं पहुंचाने और इनके उपयोग की सीमा स्वीकार कर ली है।

यही वजह है कि उसने गर्भपात सेवा का उपयोग आबादी नियंत्रण में करना शुरू कर दिया। परिवार नियोजन कार्यक्रम की रणनीति की समीक्षा में इन सारी चिंताओं पर गौर करने की जरूरत है। हालांकि, यह उचित होगा कि ऐसा महिलाओं के चयन और प्रजनन संबंधी अधिकारों की चौखट के भीतर किया जाए। इस प्रकार सरकार को चाहिए कि वह परिवार नियोजन संबंधी स्री-पुरुषों की जरूरत और यह सेवा उपलब्ध कराने वालों की क्षमता को ध्यान में रखकर बहुद्‌देश्यीय रुख अपनाए। इसके पहले कि परिवार नियोजन रणनीतियों संबंधी सुझाव दिया जाए, कुछ अन्य तथ्यों पर भी गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है।

सबूत बताते हैं कि जल्दी विवाह (20 वर्ष से कम उम्र) और जल्दी-जल्दी गर्भधारण, माता और बच्चे दोनों के लिए जोखिम बढ़ा देते हैं , इसलिए जिन राज्यों में शिशु मृत्यु दर और प्रसूित के दौरान माता की मृत्यु की दर ऊंची हों, वहां ऊंची जन्म दर भी इसका एक कारण है। भारतीय महापंजीयक कार्यालय के मुताबिक मौजूदा सदी के पहली चौथाई यानी 2026 तक रिप्लेसमेंट लेवल की जन्म दर (प्रति महिला 2.1 बच्चे) हासिल कर ली जाएगी यानी देश की जरूरत के अनुसार जन्मदर हो जाएगी।

प्रजनन दर बताती है कि कुल प्रजनन दर में कमी 30 वर्ष और इससे ऊपर की आयु की महिलाओं में ही केंद्रित है। कुल प्रजनन दर (टीएफआर) में कमी 15 से 19 वर्ष आयु वर्ग में भी देखी गई है। इसकी एकमात्र वजह इस आयु वर्ग में विवाहितों के अनुपात में आई महत्वपूर्ण कमी है, क्योंकि गर्भनिरोधकों का उपयोग लगभग स्थिर है और आयु वर्ग में विवाहितों की प्रजनन दर में भी नगण्य गिरावट देखी गई है। ऊपर बताए गए तथ्यों और नीतिगत सिफारिशों में व्यक्त चिंताअों को ध्यान में रखते हुए परिवार कल्याण कार्यक्रम पर फिर से दृष्टि डालने की जरूरत है ताकि इसे लोकोन्मुख व संवेदनशील बनाया जा सके, जिसके केंद्र में गुणवत्तापूर्ण सेवाएं हों।

विवाह की वैध आयु के पूर्व बाल विवाह को रोकना सबसे महत्वपूर्ण है। इस कानून का कड़ाई से पालन जरूरी है और जो लोग इसका उल्लंघन करते हैं उन्हें ऐसा दंड देना चाहिए, जो एक मिसाल बन जाए। फिर विवाह की आयु बढ़ाने संबंधी जागरूकता के लिए सघन कार्यक्रम चलाया जाना चाहिए ताकि पहले बच्चे के जन्म के समय माता की अधिक उम्र सुनिश्चित की जा सके। इसका फायदा हमें शिशु मृत्यु दर और मातृ मृत्यु दर में गिरावट के रूप में मिलेगा।

फिर युवा माताओं में बच्चों के बीच अंतर रखने की विधियों का उपयोग सुनिश्चित करना होगा। 18 से 24 वर्ष की अपेक्षतया कम उम्र में गर्भवती होने से रोकने के लिए इन विधियों का उपयोग बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि कुल प्रजनन दर में इसी आयु वर्ग की महिलाओं का सबसे अधिक योगदान होता है। विभिन्न सर्वेक्षणों से पता चला है कि 30 वर्ष से कम आयु की एक-चौथाई महिलाओं की परिवार नियोजन की जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं, जिनमें से अधिकतर बच्चों में अंतराल रखने से संबंधित है, इसलिए यह इन सेवाओं की मांग के अभाव का प्रश्न नहीं है बल्कि आपूर्ति अत्यधिक अपर्याप्त है। जमीनी स्तर तक प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ाकर इसमें सुधार लाना चाहिए।

देखा गया है कि 30 वर्ष से कम आयु की महिलाओं में से एक-तिहाई के तीन या ज्यादा बच्चे हैं। इनमें 28 फीसदी के दो बच्चे हैं। वे और बच्चे नहीं चाहतीं। परिवार नियोजन कार्यक्रमों में इन महिलाओं को केंद्र में रखा जाना चाहिए (इसमें डिलेवरी के बाद नसबंदी, अंतराल के लिए नसबंदी, लेप्रोस्कोपी से नसबंदी और सर्जरीहीन पुरुष नसबंदी के मिश्रण का उपयोग किया जा सकता है)।

गर्भाशय के भीतर लगाए जाने वाले गर्भनिरोधकों (आईयूडी) का उपयोग बहुत कम होता है। यदि इन्हें ठीक से लगाया जाए, बाद में उचित देखभाल की जाए, साइड इफेक्ट का प्रभावी प्रबंधन हो और पर्याप्त आपूर्ति की जाए तो आईयूडी के इस्तेमाल को लोकप्रिय बनाया जा सकता है, खासतौर पर उन राज्यों में जहां शिशु मृत्युदर बहुत ऊंची है। इसमें पहले जन्म देने वाली माताओं का पता लगाकर डिलेवरी के काफी पहले उन्हें आईयूडी के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। गुणवत्ता और फालोअप पर अत्यधिक जोर देकर प्रसूित के तत्काल बाद आईयूडी एक अच्छा विकल्प हो सकता है। हालांकि, इसके उपयोग के बारे में फैली भ्रांतियाें और सेवा देने वालों की गलतफहमियां दूर करने की जरूरत है।

फिर नसबंदी ऑपरेशन में लैंगिक संतुलन कायम करने की भी जरूरत है। यह स्वीकार करना होगा कि उपरोक्त सारे कदमों के बावजूद कुल प्रजनन दर में गिरावट लाने के लिए नसबंदी की जरूरत तो रहेगी ही। दुर्भाग्य यह है कि 70 के दशक में पुरुषों की जबरन नसबंदी के नतीजों के कारण राजनीतिक दल अब भी इस विषय से बिदकते हैं, लेकिन अब मानसिकता बदलने की जरूरत है और इस संदर्भ में संतुलन कायम करने की जरूरत है।

बिलासपुर में हुई त्रासदी ने हमें सबक दिया है कि नसबंदी शिविर आयोजित करने के हमारे तरीके पर गंभीर विचार की जरूरत है। इस प्रक्रिया में ऐसी सर्जरी की जरूरत होती है, जो विशेषज्ञ डॉक्टर ही सुसज्जित अस्पतालों में अंजाम दे सकते हैं और उन्हें ही देना भी चाहिए। यह आवश्यक है कि कार्यक्रम इस तरह से बनाए जाए कि उन्हें सहारा देने के लिए पर्याप्त तंत्र हो ताकि आधारभूत ढांचा व आपूर्ति को मजबूत कर बढ़ती अपेक्षाएं पूरी करने के साथ स्वास्थ्य के क्षेत्र में देश की स्थिति में सुधार भी लाया जा सके।

डॉ. मनोहर अगनानी
वरिष्ठ आईएएस अधिकारी
manoharagnani@gmail.com


http://www.bhaskar.com/news/ABH-bhaskar-editorial-4809681-NOR.html


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