Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 150
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Deprecated (16384): The ArrayAccess methods will be removed in 4.0.0.Use getParam(), getData() and getQuery() instead. - /home/brlfuser/public_html/src/Controller/ArtileDetailController.php, line: 151
 You can disable deprecation warnings by setting `Error.errorLevel` to `E_ALL & ~E_USER_DEPRECATED` in your config/app.php. [CORE/src/Core/functions.php, line 311]
Warning (512): Unable to emit headers. Headers sent in file=/home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php line=853 [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 48]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 148]
Warning (2): Cannot modify header information - headers already sent by (output started at /home/brlfuser/public_html/vendor/cakephp/cakephp/src/Error/Debugger.php:853) [CORE/src/Http/ResponseEmitter.php, line 181]
न्यूज क्लिपिंग्स् | बेसहारा बच्चों की फिक्र किसे है--- विशेष गुप्ता

बेसहारा बच्चों की फिक्र किसे है--- विशेष गुप्ता

Share this article Share this article
published Published on Jan 9, 2018   modified Modified on Jan 9, 2018

आज किशोर न्याय अधिनियम के अंतर्गत सारी की सारी कवायद कानून का उल्लंघन करने वाले बच्चों की उम्र को लेकर हो रही है यानी किस उम्र तक किशोर न्याय अधिनियम लागू करना उचित होगा और किस उम्र के बाद दंड प्रक्रिया संहिता लागू होनी चाहिए। इसी सिलसिले में कुछ चर्चा अपराध की प्रकृति को लेकर भी होती रही है। पर अनाथ, बेसहारा व नशे की गिरफ्त में आने वाले बच्चों के पुनर्स्थापन के प्रति न कानून और न ही देश और समाज ज्यादा चिंतित हैं। देखने में आ रहा है कि आजकल नगरों और महानगरों की सड़कों पर अनाथ और बेसहारा बच्चों की भरमार है। ये बच्चे आपको भीख मांगते अथवा पॉलीथीन बीनते आसानी से दिखाई दे जाएंगे। अकसर ये बच्चे नगरों की तेज दौड़ती गाड़ियों के सड़कों पर रुकने पर हाथ फैला कर भीख मांगते दिखाई पड़ ही जाते हैं। इनमें केवल लड़के नहीं हैं, नाबालिग लड़कियां भी बच्चों के इस अनाथ समूह में शामिल हैं। इन गुमनाम बच्चों का न खाने का और न ही रहने का कोई ठिकाना है। ये सभी बच्चे औरों की दया परजीवन जीने को मजबूर हैं। क्या देश और समाज को इनकी कोई फिक्र नहीं होनी चाहिए!

 

 

कुछ मिल जाने की आस में सड़कों पर घूमने वाले बच्चों का अपना कोई ठौर-ठिकाना नहीं है। इनकी अपनी कोई पहचान भी नहीं है। कई बार फुटपाथ अथवा फ्लाइओवर की छत ही इनका घर होती है और सड़ा-गला खाना इनका भोजन। आंकड़े बताते हैं कि देश में ऐसे बच्चों की संख्या दस लाख से भी ऊपर है। इनमें कुछ तो वे बच्चे हैं जिन्होंने परिवार की टूटन या मां-बाप की प्रताड़ना के कारण घर छोड़ दिया। फिर, बाकी गरीब व अनाथ हैं जो या तो गरीबी या अपने मूल निवास से विस्थापित होने के बाद बेसहारा बनने को मजबूर हुए। ऐसे बच्चे या तो सड़कों पर ही रात गुजारते हैं या रेलवे प्लेटफार्म को अपना ठिकाना बनाते हैं। इन बच्चों-किशोरों का अपना परिवार न होने के कारण इनकी परवरिश भी पूरी तरह दोषपूर्ण होती है। सामाजिक ज्ञान इनका शून्य होने के कारण ये अच्छे और बुरे के बीच अंतर नहीं कर पाते। देखने में आ रहा है कि आज शातिर अपराधी ऐसे ही बच्चों को अपनी शरण में लेकर पहले उन्हें नशेड़ी बनाते हैं, फिर उनसे नशीले पदार्थों की तस्करी कराते हैं अथवा उन्हें बंधुआ बना कर या मारपीट करके उनसे अन्य अपराध कराते हैं।

 


राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश में दो तिहाई से भी अधिक बाल अपराधी सोलह से अठारह वर्ष के आयु समूह में हैं। इस मसले से जुड़े आंकड़े यह भी बताते हैं कि पिछले सालों के मुकाबले 2017 में नाबालिग किशोर अपराधियों की संख्या में अट्ठाईस फीसद का इजाफा हुआ है। खास बात यह है कि इन बाल अपराधों में (बारह से सोलह वर्ष के आयु समूह में) लड़कियां भी अच्छी-खासी संख्या में लिप्त मिलीं हैं। इन नाबालिगों के द्वारा किए जाने वाले अपराधों में चोरी, डकैती, कत्ल व बलात्कार जैसी घटनाएं प्रमुख रहींं। इसी संदर्भ में, राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो का अन्य आंकड़ा देखें। किशोरों (नाबालिगों) द्वारा अंजाम दी गई बलात्कार की घटनाओं में दिल्ली में 158 फीसद की वृद्धि हुई है। चौंकाने वाली बात यह है कि किशोरों द्वारा अंजाम दिए गए सामान्य अपराधों में यह वृद्धि मात्र चौंतीस फीसद की रही।

 

 


बच्चों की मुश्किलों पर शोध कर रहे सोशल काउंसलर, एम हापर की ‘रेस्क्युइंग रेलवे चिल्ड्रन: रियूनाइटिंग फेमलीज फ्राम इंडियाज रेलवे प्लेटफार्म्स' नामक पुस्तक बताती है कि घर से भाग जाने वाले बच्चों का मामला वैश्विक है। इस पुस्तक में दिए गए आंकड़े भी बताते हैं कि भारत में सड़कों पर रहने वाले बच्चों की संख्या एक करोड़ से अधिक है। साथ ही, ऐसा आकलन है कि देश के पचास मुख्य रेलवे स्टेशनों के प्लेटफार्मों पर हर साल सत्तर हजार से लेकर सवा लाख तक बच्चे पहुंचते हैं। ये सभी बच्चे रेल विभाग की उदारता और वहां रेलवे की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाली पुलिस की मिलीभगत से रह रहे हैं। बाल कल्याण समिति का अध्यक्ष होने के नाते कई बार मैंने महसूस किया है कि रेलवे प्लेटफार्मों पर जलपान के बहुत-से ठेकेदार बिहार व बंगाल के गरीब परिवारों से बच्चों को लाकर उनसे यहां बंधुआ मजदूरी करवा रहे हैं। रेलवे विभाग व सुरक्षा एजेंसियां इस ओर से आंखें मूंदे हुए हैं।

 

 


इस संबंध में दिल्ली से जुड़े आंकड़े बताते हैं कि यहां पचास हजार से भी अधिक बच्चे सड़कों पर ही रह कर गुजर-बसर करते हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें बीस फीसद के करीब किशोर लड़कियां हैं। इन बच्चों की सामाजिक-शैक्षिक स्थिति के बारे में हुए सर्वेक्षणों के मुताबिक इनमें पचास फीसद के करीब अनपढ़ हैं। तकरीबन बीस फीसद कूड़ा-कचरा बीन कर तथा पंद्रह फीसद भीख मांग कर गुजारा करते हैं। फिर, बहुत सारे बच्चे चाय व खान-पान के ढाबों पर बालश्रम करने को मजबूर हैं। इसके अलावा, घरेलू नौकर के रूप में भी काम करते बहुत सारे बच्चे मिल जाएंगे। ये सारी स्थितियां बालश्रम पर कानूनन पाबंदी के बावजूद कायम हैं। और भी दुखद यह है कि इनमें से एक चौथाई नाबालिग लड़कियां व लड़के यौन शोषण के शिकार पाए गए। आज स्थिति यह है कि इन लाखों बच्चों की न तो कोई पहचान है और न ही कोई इनकी सुध लेने वाला है। हां, इतना जरूर है कि कभी-कभी कुछ सामाजिक संस्थाएं व कुछ राजनीतिक लोग इन बच्चों को कुछ किताबें अथवा तन ढकने को कुछ पुराने कपड़े वितरित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं।

 

 


मगर सवाल फिर वहीं अपनी जगह खड़ा है कि क्या इतनी-सी सहानुभूति और बस इतने से सहयोग से इनका जीवन संवर जाएगा? इनको भी जीवन में प्रेम, स्नेह व लाड़-प्यार की जरूरत है। मनोवैज्ञानिक शोध बताते हैं कि अच्छा अभिभावकत्व अथवा परिवारों के द्वारा बच्चों को दिया जाने वाला प्रेम, स्नेह व वात्सल्य बच्चों में निराशा के भाव को कम करके उनमें सुरक्षा का बोध पैदा करता है। इसके अभाव में पैदा होने वाली वंचनाएं बच्चों को मनमाना व्यवहार करने को मजबूर करती हैं। परिवारों की यही अनदेखी बेगानेपन की ओर ले जाती है और कभी-कभी उन्हें घर से भागने को बाध्य करती है। कई मुल्कों में ऐसे बच्चों की जिम्मेदारी खुद राज्य अपने ऊपर लेता है, यानी वहां उनका भरण-पोषण और देखरेख सरकार करती है। पर अपने देश में इस प्रकार के बच्चे हमेशा समाज पर भार ही समझे जाते रहे हैं।

 

 


सरकारों के साथ यह समाज की भी जिम्मेदारी है कि ऐसे अनाथ व बेसहारा बच्चों को भी एक पहचान मिले, प्यार मिले। इनके लिए बाल संरक्षण गृहों का एक रचनात्मक ढांचा विकसित हो जहां इन बच्चों की पढ़ाई-लिखाई व इनके कौशलयुक्त समाजीकरण की भरपूर व्यवस्था हो। तभी आने वाले समय में हम इन बच्चों को समाज के सक्रिय और सम्मानित सदस्य बनाने में कामयाब हो सकते हैं। इसके अभाव में ये बच्चे कब किसी आपराधिक गिरोह के सदस्य बन जाएंगे, कौन जानता है। यह सही है कि बच्चे सबसे पहले संबंधित परिवार की जिम्मेदारी हैं। पर यह तर्क बेसहारा बच्चों की बाबत नहीं चल सकता। इनकी जिम्मेदारी समाज को और सरकारों को उठानी होगी। तभी ये भविष्य में नागरिक के तौर पर अपना स्वाभाविक अंशदान कर पाएंगे। इन्हें बोझ मान कर इनके प्रति आंख मूंद लेना समाज और देश के भविष्य को बोझिल बनाना होगा।

 

 


https://www.jansatta.com/politics/opinion-prevent-misuse-water-save-pure-water/540172/


Related Articles

 

Write Comments

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

Video Archives

Archives

share on Facebook
Twitter
RSS
Feedback
Read Later

Contact Form

Please enter security code
      Close