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न्यूज क्लिपिंग्स् | मुसहर बच्चे फर्राटे से पढ़ते हैं शेक्सपियर की अंग्रेजी के पाठ

मुसहर बच्चे फर्राटे से पढ़ते हैं शेक्सपियर की अंग्रेजी के पाठ

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published Published on Jan 21, 2013   modified Modified on Jan 21, 2013
पटना। शेक्सपियर और बिहार में समाज के हाशिए पर पड़े मुसहर समुदाय के बच्चों का क्या मेल हो सकता है आपने कभी सोचा है? राजधानी पटना में फर्राटे से मुसहर समुदाय के कक्षा आठ के बच्चों को जूलियस सीजर और मैकबेथ के पात्रों के रूप में प्रहसन प्रस्तुति (स्किट) देते हुए दांतों तले अंगुली दबा लेंगे। भारतीय पुलिस सेवा से अवकाश प्राप्त अधिकारी जेके सिन्हा की कोशिशों से पटना के आंबेडकर पथ के पास स्थित मुसहर बच्चों के लिए स्थापित आवासीय स्कूल में अंग्रेजी में शेक्सपियर और महाभारत के हिस्सों पर बच्चे आत्मविश्वास के साथ इनके नाट्य मंचन करते हैं।
कभी उपेक्षा से ग्रस्त और गरीबी में जीवनयापन करने वाले मजदूर, भूमिहीन खेतिहर दलित समुदाय के मुसहर समुदाय के 277 बच्चों को मुफ्त शिक्षा के साथ-साथ रहने और खाने की व्यवस्था के साथ गुरुजनों का प्यार मिल रहा है। पटना रेलवे स्टेशन से करीब नौ किलोमीटर दूर एक आवासीय कालोनी में 2007 से चल रहे शोषित समाधान केंद्र में विशेष तौर पर मुसहर बच्चों के लिए स्कूल में एक मौन क्रांति (साइलेंट रिवोल्यूशन) हो रही है।
केंद्रीय मंत्रिमंडल सचिवालय से विशेष सचिव के पद से सेवानिवृत्त हुए सिन्हा कहते हैं, ज्ञान ही एक मात्र तरीका है जो इन बच्चों के लिए मुक्ति का साधन साबित होगा। जो बच्चे हिंदी ठीक से नहीं बोल पाते हैं उनके बच्चों का फर्राटे से अंग्रेजी बोलते सुनना बहुत सुखद आश्चर्य है। नवंबर 2011 में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने स्कूल का दौरा किया और बच्चों से कहा कि उन्हें ‘अचीवर’ बनना है तो ज्ञान अर्जन करना होगा।
जहांगीर खां सूरी यहां बच्चों को अंग्रेजी पढ़ाते हैं। बीबीसी के लिए पत्रकारिता कर चुके सूरी कहते हैं, मुसहर समुदाय से आने वाले ये बच्चे किसी भी स्तर पर संभ्रांत वर्ग के बच्चों से कम नहीं हैं। वे अदभुत प्रतिभा के धनी हैं। जूलियस सीजर और मैकबेथ की प्रस्तुति बच्चों ने मेहनत से सीखा है। मैंने करीब से देखा है कि उनमें सीखने और ज्ञान की भूख है। केवल उनकी सामाजिक और सामुदायिक पृष्ठभूमि विकास में बाधक बन रही थी। सूरी बताते हैं कि स्कूल में आकर बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ा है। हम मुख्यधारा के अनुरूप पढ़ाई कराते हुए सीबीएसई के पाठ्यक्रम का पूरा ध्यान रखते हैं। आठवीं कक्षा के छात्र राहुल कुमार को जूलियस सीजर के पात्र मार्क एंटनी के संवाद बिल्कुल कंठस्थ हैं। इसी प्रकार आत्मविश्वास से भरे कक्षा तीन के छात्र महाभारत की घटनाओं का नाट्य रुपांतरण बिना रुके करते हैं।
यूनान, वियतनाम और जापान के राजदूत रह चुके आफताब सेठ बच्चों की स्किट प्रस्तुति देखकर कहते हैं, प्रस्तुति आत्मविश्वास से भरपूर है। दिल्ली के प्रतिष्ठित सेंट स्टीफेंस कालेज के छात्र रह चुके सेठ कहते हैं, यह तो स्टीफेनियनों के प्रस्तुत किए जाने वाले जूलियस सीजर स्किट की तरह है। इस समुदाय के बच्चों के लिए अंग्रेजी आजादी का द्वार (डोर आफ लिबरेशन) है। सेठ बच्चों से वायदा भी करते हैं कि वे दुबारा स्कूल में आएंगे और उनके साथ लंबा समय बिताएंगे।
सिन्हा के कालेज के मित्र आरिफ हुसैन कहते हैं, यह मुसहर समुदाय का सशक्तिकरण है। शिक्षा देकर आत्मसम्मान बढ़ाने का यह तरीका अनूठा है। राज्य सरकारों को इससे सीख लेनी चाहिए। हुसैन भारतीय विदेश सेवा (आईएफएस) के पूर्व अधिकारी हैं और विश्व व्यापार संगठन की स्थापना से पूर्व उन्होंने गैट वार्ताओं, तोक्यो और उरुग्वे राउंड की वार्ताओं में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा चुके हैं। पटना में जन्मे आरिफ हुसैन कहते हैं मुसहर बच्चों के लिए वे क्या कर सकते हैं इस बारे में वह गंभीरता से सोच रहे हैं। अपनी पूर्व व्यवस्तताओं को निपटाकर अगले साल वे इस संस्थान के लिए समय निकालेंगे।
अंग्रेजी के शिक्षक सूरी कहते हैं कि बच्चों को शिक्षा के साथ संस्कार भी सिखाए जाते हैं। वे इन बच्चों को अपने भतीजों की तरह पढ़ाते हैं। बच्चों से भी काफी प्यार मिलता है। इस स्कूल के बच्चों को धीरे धीरे अंतरराष्ट्रीय ख्याति मिलने लगी है। इसी महीने स्कूल के 11वीं कक्षा के छात्र मनोज कुमार ने अभिनेता अमिताभ बच्चन द्वारा प्रस्तुत किये जाने वाले चर्चित क्विज शो कौन बनेगा करोड़पति :केबीसी: में 25 लाख रुपऐ की इनाम की राशि जीती और इसे अपने स्कूल को यह राशि दान में दे दी।
केबीसी विजेता मनोज के मुताबिक, शोषित समाधान केंद्र के खुलने से उसके जैसे कई उपेक्षितों का भाग्य खुला है। इसलिए उसने अमिताभ बच्चन के हाथों प्राप्त राशि को स्कूल में दान करने का फैसला किया है। पटना सहित विभिन्न जिलों के मुसहर समुदाय से आने वाले बच्चों में स्कूल ने काफी आत्मविश्वास जगाया है। जमसौत निवासी महेश मांझी का पुत्र पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाला अनुज एक आईपीएस बनना चाहता है। वह फर्राटे से अंग्रेजी बोलता है और अपने बारे में परिचय देता है। किसी बच्चे में इंजीनियर बनने की कामना है तो किसी में डाक्टर। कुछ बच्चे आईएएस बनना चाहते हैं।
पांचवीं के ही छात्र चंदन के कविताओं का संकलन अमेरिका के फिलाडेल्फिया में प्रकाशित हुआ है। वह बहुत खुश है। स्कूल के केयर टेकर मनोज कुमार कहते हैं कि तीन मंजिला दो मकानों को आवासीय स्कूल का स्वरूप दिया गया है। बच्चों के लिए कंप्यूटर रूम, प्रयोगशालाएं और एसेंबली सब की व्यवस्था है। बच्चों को सुबह का नाश्ता और शाम के रिफ्रेशमेंट के अलावा दोपहर और रात का भोजन दिया जाता है। दूध अनिवार्य है। सीमित संसाधनों में स्पांसरशिप के तहत चल रहे शोषित समाधान केंद्र के लिए धन जुटाना भी चुनौती भरा काम है। हर साल मुसहर समुदाय के 45 से 50 बच्चों का चयन होता है और वे यूकेजी कक्षा में स्कूल में भर्ती होते हैं।
जेके सिन्हा कहते हैं कि इन्हीं बच्चों पर अपने समुदाय का पिछड़ापन दूर करने का दारोमदार है। केंद्र, राज्य सरकारों, एनजीओ और परोपकारी व्यक्तियों से आग्रह है कि वे इस अभियान से जुड़ें। समाधान केंद्र का सालाना बजट एक करोड़ रुपए  बैठ रहा है हर बच्चे पर 3100 से 3200 रुपए प्रतिमाह खर्च आता है। स्कूल को 12वीं तक बढ़ाना है और आगे भी उनके लिए पढ़ाई की व्यवस्था करनी है। सीबीएसई की मान्यता लेने के लिए बिहटा के पास 12.5 करोड रुपए की लागत से एक बड़े स्कूल का निर्माण भी किया जा रहा है।
स्कूल में गणित पढ़ाने वाले शिक्षक अभिषेक कुमार कहते हैं कि आईआईटी और आईआईएम के छात्रों ने यहां के बच्चों की केस स्टडी में रुचि ली है। स्कूल में भ्रमण के दौरान बच्चे आत्मविश्वास से परिपूर्ण दिखे। सिन्हा के मुताबिक एक अंग्रेजी स्कूल में दाखिला पाने की खुशी मुसहर मां बाप के लिए ठीक उसी प्रकार है जैसी प्रसन्नता संभ्रांत परिवार के अभिभावक को उनके बच्चों को आईआईटी में दाखिला के लिए। वे कहते हैं कि शिक्षा का महत्त्व मुसहर समुदाय भी समझने लगे हैं। स्कूल में पढ़ने के लिए वे अपने बच्चों को खुशी से भेजते हैं। 45 साल पहले मुसहर समुदाय की दुर्दशा देखकर उनके लिए कुछ करने का विचार आया था।
शोषित समाधान केंद्र के शिक्षक अब अररिया, पूर्णिया, कटिहार, रोहतास जैसे जिलों में भी जाकर वहां के मुसहर बच्चों मुख्यधारा में जोड़ने के लिए केंद्र में लेकर आएंगे। इन बच्चों के लिए सभी हाथ बंटा सकते हैं। बिहार में मुसहर दलितों में अत्यंत गरीब भूमिहीन मजदूर हैं। परिवार के लोग भूख शांत करने के लिए चूहों को मारकर खाते हैं। राज्य सरकार भी उन्हें समाज की मुख्यधारा में लाने के लिए कई काम कर रही है। सरकार इस वर्ग के लोगों को महादलित वर्ग में रखा है।

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