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न्यूज क्लिपिंग्स् | मोदीजी की सुनें या अर्थशास्त्रियों की -- रविभूषण

मोदीजी की सुनें या अर्थशास्त्रियों की -- रविभूषण

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published Published on Dec 5, 2016   modified Modified on Dec 5, 2016
विगत ढाई वर्ष में मोदी सरकार ने प्रचार पर 11 अरब से अधिक रुपये खर्च किये हैं. नोटबंदी के द्वारा भ्रष्टाचार और कालेधन की समाप्ति की जो बात की जा रही है, कैशलेस समाज और भारत बनाने पर जिस तरह बल दिया जा रहा है, उस पर स्थिरचित्त से विचार करना ज्यादा जरूरी है, क्योंकि मोदी का कोई कार्यक्रम अकेला नहीं होता.

एक स्ट्रोक से कई निशाने लगाने की ऐसी कला भारत के किसी भी राजनेता में कभी नहीं रही. नकदविहीन समाज के साथ चिंतनहीन, विचारहीन समाज बनाने पर भी बल है. लगभग एक महीने से नोटबंदी के पक्ष में जिस प्रकार सामूहिक राग गाया जा रहा है, केवल उसे सुनना जरूरी है या रघुराम राजन, अमर्त्य सेन, मनमोहन सिंह, अरुण कुमार, प्रभात पटनायक, ज्यां द्रेज, मीरा सान्याल आदि के विचारों से भी अवगत होना जरूरी है? न तो नरेंद्र मोदी, अर्थशास्त्री हैं और न अरुण जेटली.


भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था आज जिस दौर में है, उसे समझे बिना सवालों के उत्तर नहीं दिये जा सकते. भारतीय अर्थव्यवस्था पूंजीवादी है और प्रभात पटनायक ने साफ शब्दों में कहा है कि विमुद्रीकरण का निर्णय पूंजीवाद की नासमझी बताता है. कालाधन एक प्रवाह है, संचय संग्रह नहीं है. कालाधन एक व्यापार है, जिसका टैक्स चोरी से संबंध है.

 

पुरानी करेंसी के नोटों को नये नोटों में बदलने से, नोटबंदी से एक नये प्रकार के मुद्रा दलाल वर्ग का जन्म हुआ है और दलाल एक असंसदीय शब्द है. कालाधन धन का संग्रह नहीं है, काला व्यापार केवल नकदी में नहीं होता. पूंजीपति-उद्योगपित मुद्रा संग्रह नहीं करते, मोदी की योजना की प्रशंसा कई उद्योगपतियों ने की है. पूंजीपति नकदी को परिचालन में लाते हैं.

 

भारत में अधिकांश व्यापार नकद में होता है. नकद रहित भुगतान करनेवालों की संख्या मात्र 10 से 15 प्रतिशत है. कैश भ्रष्टाचार का बड़ा स्रोत नहीं है. मार्क्स ने कंजूस और पूंजीपति में अंतर किया था. कंजूस धन का संग्रह करता है, जबकि पूंजीपति उसका परिचालन करता है.



प्रभात पटनायक ने बैंक की लंबी कतारों पर ठीक कहा है कि किसी मोहल्ले में हुए अपराध के कारण वहां के सभी निवासियों को पुलिस स्टेशन नहीं बुलाया जा सकता. ब्लैक मनी और स्टॉक मनी में अंतर है. कालाधन स्टॉक मनी नहीं है. जिस हड़बड़ी से मुद्राविहीन समाज राज बनाने का प्रचार किया जा रहा है, वह सही नहीं है. उसे एक क्रमिक सामान्य प्रक्रिया के तहत संपन्न किया जाना चाहिए, न कि किसी दबाव या आदेश के तहत.
काले व्यापार के संचालक पकड़ से कोसों दूर हैं. भारत की सरकार बड़ी मछलियों को नहीं पकड़ेगी, वह उसका साथ देगी. ज्यां द्रेज इस दावे को कि विमुद्रीकरण भ्रष्टाचार और कालेधन के विरुद्ध है, अतिरंजित मानते हैं. सरकार जनता में कालेधन को लेकर भ्रम उत्पन्न कर रही है.

अर्थशास्त्र में कालाधन अवैध कार्यों से उत्पन्न धन को कहा जाता है. कालेधन के खिलाफ इस पहलकदमी को ज्यां द्रेज विपक्षी दलों को संकट में डालने के रूप में देखते हैं, क्योंकि चुनाव में कालेधन का उपयोग होता है. उत्तर प्रदेश में चुनाव होनेवाला है. ज्यां द्रेज इस निर्णय को भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रहार मानते हैं, जिसने समाज के अतिसंवेदनशील भाग (किसान, वरिष्ठ नागरिक, दैनिक मजदूर) के समक्ष एक खतरनाक स्थिति पैदा कर दी है. अमर्त्य सेन नोटबंदी को बुद्धिमतापूर्ण नहीं मानते. इस निर्णय को सेन ने निरंकुश और सत्तावादी कहा है. इसे आर्थिक आपातकाल और आफतकाल भी कहा गया है. जनता परेशान है, उसके मानस को अनुकूलित किया जा रहा है. नोटबंदी से जनता का करेंसी से विश्वास उठ रहा है. रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर द्वारा दिये गये वचन का कितना अर्थ बचा? रघुराम राजन ने मार्च 2016 में कहा था कि 500 और 1000 के नोट पर प्रतिबंध व्यवहार्य उचित नहीं है.

85 प्रतिशत नोट 500 और 1000 के ही थे. सरकार का निर्णय विश्वास के विरुद्ध है और विश्वास पूंजीवाद की कुंजी है. मनमोहन सिंह ने इसे संगठित लूट और वैध डकैती कहा है. पॉल क्रूगमैन (नोबेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री) सरकार के इस निर्णय से लंबे समय में कोई प्राप्ति नहीं देखते. उन्होंने विमुद्रीकरण काे अत्यंत विघटनकारी प्रक्रिया के रूप में देखा है. 2014 में ही रघुराम राजन ने अपने एक पब्लिक लेक्चर में विमुद्रीकरण की सार्थकता पर सवाल खड़े किये थे. प्रसिद्ध अमेरिकी अर्थशास्त्री लैरी समर्स ने नरेंद्र मोदी के निर्णय को नाटकीय कहा है.

विमुद्रीकरण को लेकर सन् 1946 और 1978 में जो निर्णय लिये गये थे, वे आज जैसी खलबली मचानेवाले नहीं थे. मोरारजी देसाई के समय में आरबीआइ के गवर्नर आइजी पटेल ने अपनी पुस्तक में हजार, पांच और 10 हजार के नोटों को समाप्त करने की घोषणा के संबंध में जो लिखा है, वह शायद आज की स्थिति को समझने में कुछ मदद करे. मोदीजी की सदिच्छा अलग बात है, पर हमें विस्तार से अर्थशास्त्रियों की बातें भी सुननी चाहिए. प्रधानमंत्री मोदी की मन की बात हम सब सुनते रहे हैं.


http://www.prabhatkhabar.com/news/columns/story/903631.html


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