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न्यूज क्लिपिंग्स् | सबके लिए पैसा है, पर किसानों के लिए नहीं - देविंदर शर्मा

सबके लिए पैसा है, पर किसानों के लिए नहीं - देविंदर शर्मा

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published Published on Oct 26, 2015   modified Modified on Oct 26, 2015
मानसून खत्म हो चुका है। 14 प्रतिशत कम बारिश हुई है और देश में फसल वाले ऐसे करीब 39 फीसद इलाके हैं, जहां बिलकुल सूखा है। उम्मीद थी कि रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन किसानों के लिए वित्तीय लाभों और ऋण भुगतानों में छूट की श्रंखला की घोषणा करेंगे। इसकी जगह रघुराम राजन ने पिछले हफ्ते व्यावसायिक बैंकों के उधार देने की ब्याज दरों में काफी कटौती करने वाली वित्तीय नीति प्रस्तुत करते हुए कृषि की बिलकुल ही अनदेखी की। इस कदम से बाजार में उछाल आने की उम्मीद है और बैंकों को अपनी बैलेंस शीट ठीक-ठाक रखने में मदद मिलेगी। एक माह पहले ही सरकार ने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर वित्तीय हालत सुधारने में मदद के लिए 20,000 करोड़ रुपए उड़ेले थे। यह बैंकों के लिए बेलआउट पैकेज के सिवा कुछ भी नहीं है। रेपो रेट में कटौती उन लोगों के लिए मासिक किस्तों को कम करने में मदद पहुंचाएगी, जिन्होंने घरों और कारों के लिए ऋण लिए हैं।

60 करोड़ किसानों को लेकर लगातार जारी बेरुखी यहीं नहीं रुकती। उच्चतम न्यायालय में एक शपथ पत्र के जरिए सरकार ने साफ कर दिया है कि वह स्वामीनाथन कमेटी की सिफारिश के अनुरूप 50 प्रतिशत लाभ उपलब्ध कराते हुए फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाने की स्थिति में नहीं है। लेकिन केंद्र सरकार कर्मचारियों को अतिरिक्त छह फीसदी डीए किस्त और वह भी तब जब थोक मुद्रास्फीति दर शून्य हो, जारी करते हुए एक बार भी नहीं झिझकी। यह फैसला हर साल 10,879 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च बढ़ाएगा। इस पर कहीं से कोई सवाल नहीं उठाया गया कि यह राशि कहां से आएगी।

गेहूं और चावल, दोनों के मामले में खरीद मूल्य में 50 रुपए प्रति क्विंटल तक बढ़ोतरी से किसानों को पिछले साल मिले पैसों में सिर्फ 3.25 प्रतिशत की वृद्धि होगी। यह इस साल कर्मचारियों को दी गई डीए किस्त का सिर्फ आधा है। कर्मचारी हर साल दो डीए किस्त पाते हैं। पूर्व सैनिकों को भी वन रैंक वन पेंशन का वादा कर दिया गया है, जिससे हर साल 8500 करोड़ का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा। लेकिन बात जब किसानों की आती है तो सरकार बराबर इस खेद के साथ सामने आती है कि उसके पास पैसे नहीं हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसानों को यह भरोसा देने का कोई अवसर नहीं चूकते कि उनकी सरकार गरीबों और किसानों के लिए है, लेकिन यह सच्चाई बनी हुई है कि किसानों के साथ सौतेला व्यवहार हो रहा है। सातवें वेतन आयोग की बहुप्रतीक्षित रिपोर्ट अगले कुछ महीनों में जारी की जाएगी। अनुमान है कि वेतन आयोग की रिपोर्ट जनवरी से लागू की जाएगी। केंद्र सरकार के कर्मचारियों और पूर्व कर्मचारियों की मूल वेतन संरचना में 30 फीसद की बढ़ोतरी होगी। इससे केंद्र सरकार पर करीब 2 लाख करोड़ रुपयों का अतिरिक्त बोझ आएगा। राज्य सरकारों की वित्तीय स्थिति अपने कर्मचारियों पर वेतन में अतिरिक्त खर्च से और झुक जाएगी। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने देश को पहले ही भरोसा दिलाया है कि बढ़े हुए वेतन का भारी बोझ वित्तीय रुकावट का कारण नहीं बनेगा। सरकार अतिरिक्त खर्च ढोने की स्थिति में है। आश्चर्य है कि सरकार किसानों को बढ़े हुए एमएसपी के भुगतान में क्यों अक्षम है?

खरीद मूल्य में 100 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी से सिर्फ 1500 करोड़ रुपए अतिरिक्त खर्च होंगे। समझ नहीं आता कि जब किसानों की बात आती है तो सरकार हाथ खड़े क्यों कर देती है? किसानों के लिए खरीद मूल्य में इस तरह की बढ़ोतरी लाखों परिवारों को मौत के चंगुल से बाहर ले आएगी। नई सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण इलाकों के 67 करोड़ लोग 33 रुपए रोजाना से भी कम में किसी तरह जीवन-यापन करते हैं। ग्रामीण इलाकों में रहने वाली 70 प्रतिशत आबादी में बहुमत किसानों का है, इससे किसानों की दुर्दशा साफ तौर पर सामने आती है।

उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र में मराठवाड़ा और विदर्भ, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में रिकॉर्ड संख्या में किसानों ने आत्महत्या की है। इस साल जनवरी की शुरुआत से किसानों के साथ हर चीज बुरी हो रही है। पहले तो अप्रैल-मई के महीनों में कटाई के वक्त खड़ी फसलों को लगातार बारिश और ओलावृष्टि झेलनी पड़ी। इसके बाद अगस्त-सितंबर के महीनों में सूखा आ गया। सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट पर अमल से जीडीपी में लगभग 2 प्रतिशत की बढ़ोतरी का अनुमान है। सरकार तब जीडीपी में वृद्धि को अपनी उपलब्धि बताएगी।

मेरा इरादा सरकारी कर्मचारियों के विरोध का नहीं है। उन्हें बेहतर वेतन पैकेज के साथ बढ़े हुए भत्ते देने चाहिए। लेकिन किसानों के साथ भेदभाव क्यों? वे भी आजाद भारत के नागरिक हैं। उन्हें भी अपने परिवार की देखभाल करनी है। उन्हें भी जीवन-यापन के लिए धन की जरूरत है। इसलिए दो कदम तुरंत उठाए जाने की जरूरत है। एक, किसानों को एक आर्थिक बेलआउट पैकेज तुरंत दिया जाए। अगर बैंकों को 20 हजार करोड़ रुपए का बेलआउट पैकेज दिया जा सकता है और उद्योगों को निर्यात समेत हर किस्म की रियायत दी जा सकती है तो किसानों को कम से कम 3 लाख करोड़ रुपए का बेलआउट पैकेज क्यों नहीं दिया जा सकता? दो, किसान आय समिति का गठन हो जो किसान के घर तक पहुंचने वाले न्यूनतम सुनिश्चित मासिक आय पैकेज पर काम करे। अगर सातवें वेतन आयोग के तहत एक चपरासी का मासिक वेतन 29 हजार रुपए प्रस्तावित किया जा सकता है तो मुझे कोई कारण नहीं दिखता कि किसानों को दैनिक मजदूरों के लिए निर्धारित भुगतान से कम आय क्यों होनी चाहिए?

-लेखक कृषि मामलों के विश्‍लेषक हैं।

 


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