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न्यूज क्लिपिंग्स् | सरकार का खान ‘दान’- शिरीष खरे

सरकार का खान ‘दान’- शिरीष खरे

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published Published on Mar 22, 2013   modified Modified on Mar 22, 2013
अपने रिश्तेदारों और करीबियों को खदान आवंटित करने का मामला राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उनकी सरकार के गले की हड्डी बन सकता है. शिरीष खरे की रिपोर्ट.

राजस्थान में इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव के घमासान से ठीक पहले राज्य में कांग्रेस सरकार के मुखिया अशोक गहलोत अपने करीबी रिश्तेदारों को खान आवंटित करने के मामले में बुरी तरह फंस गए हैं. गहलोत पर आरोप है कि उन्होंने बतौर मुख्यमंत्री अपने पद का दुरुपयोग किया और तब जब उनकी सरकार का कार्यकाल पूरा होने में एक साल से भी कम समय बचा था, अपने गृहनगर जोधपुर में नियमों को ताक पर रखकर डेढ़ दर्जन से अधिक सगे-संबंधियों को सैंड स्टोन की कई बेशकीमती खदानें बांट दीं. हालांकि गहलोत ने मामले को बेबुनियाद बताते हुए कहा है कि खान बांटने के लिए उन्होंने नहीं बल्कि कैबिनेट ने हरी झंडी दिखाई थी और कैबिनेट के किसी भी फैसले को चुनौती नहीं दी जा सकती. लेकिन इस पूरी कवायद में जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन हुआ है और जिस हड़बड़ी से गहलोत सरकार ने राज्य में खुद की बनाई नई खनन नीति को पलटते हुए केवल एक इलाके में मुख्यमंत्री के परिवारवालों को सीधा फायदा पहुंचाया है उससे गहलोत की भूमिका संदेह के घेरे में है.

दरअसल इस कथित खान घोटाले की नींव जोधपुर और नागौर के रास्ते में पड़ने वाले मंडोर स्थित उस स्टोन पार्क से जुड़ी है जिसका शिलान्यास भी खुद गहलोत के ही हाथों सितंबर, 2008 यानी उनके इसी कार्यकाल के शुरुआती दिनों में हुआ था. जोधपुर का यह इलाका सैंड स्टोन यानी बलुआ पत्थर बहुल इलाका है और यहां सबसे कठोर और बढि़या किस्म का वह पत्थर मिलता है जिससे जोधपुर के किले के अलावा राजस्थान के कई पुराने और नए भवन बने हैं. बीते कुछेक सालों के दौरान भवन निर्माण से लेकर पत्थर की नक्काशी से जुड़े कामों में यहां के पत्थरों की मांग तेजी से बढ़ी है. लिहाजा गहलोत सरकार ने पत्थर कारोबार को बढ़ावा देने के मकसद से पांच साल पहले मंडोर स्टोन पार्क बनाया और उसमें पत्थर कारखानों की 87 इकाइयां लगाने की अनुमति दी. ऊपरी तौर पर मंडोर स्टोन पार्क सरकार की कथित सही नीयत वाली परियोजना दिखती है, लेकिन इसमें भी कई गड़बड़झाले हुए हैं. पत्थर कारखाना लगाने की अनुमति एक खास समूह के लोगों को ही दी गई है. इस मामले की छानबीन कर चुके आईबीएन-7 के वरिष्ठ संवाददाता भवानी सिंह देवड़ा बताते हैं कि यहां मुख्यमंत्री गहलोत के चहेतों को फायदा पहुंचाने का खेल स्टोन पार्क बनने के साथ ही शुरू हो गया था. वे बताते हैं, ‘स्टोन पार्क में अब तक इकाइयां लगाने वाले जिन 50 लोगों को छूट दी गई है उनमें भी आधे या तो गहलोत के परिवार-वाले ही हैं या उनके करीबी और रिश्तेदार.\'

बहरहाल ताजे विवाद की जड़ बीते साल नवंबर में गहलोत सरकार के उस फैसले से जुड़ी है जिसमें उसने मंडोर स्टोन पार्क के 37 लोगों को यहां से चालीस किलोमीटर दूर बड़ा कोटेचा नाम की जगह पर सैंड स्टोन की खान आवंटित की. यह भी दिलचस्प बात है कि इसके ठीक पहले ही कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आदेश पर मुख्यमंत्री गहलोत ने खान मंत्री राजेंद्र पारीक से खान आवंटन का अधिकार छीन लिया था. दरअसल तब कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की सोच थी कि जिस तरह देश भर में खदान आवंटन में भ्रष्टाचार के मामले उजागर हुए है कहीं वैसा ही राजस्थान में घटित न हो जाए. लेकिन अब जिस तरीके से खान आवंटन का खुलासा हुआ और जिस संख्या में गहलोत के करीबी रिश्तेदारों के नाम बाहर आए, उसने सभी को चौंका दिया है. खान आवंटन का सरकारी दस्तावेज गहलोत के रिश्तेदारों से भरा पड़ा है. इसमें अशोक गहलोत के बड़े भाई अग्रसेन गहलोत की पत्नी मंजुलता गहलोत का नाम भी शामिल है. इसके अलावा मुख्यमंत्री के बड़े भाई के बेटे की पत्नी शालिनी गहलोत (अनुपम स्टोन) और भांजे की पत्नी वीना कच्छावा (जेएम सैंड स्टोन) सहित अब तक इस मामले में उनके 16 रिश्तेदार और तीन करीबी लोगों के नाम सामने आ चुके हैं.

यह जमीन राजस्व विभाग में चरागाह की जमीन के तौर पर चिह्नित है जिस पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार खदानें आवंटित नहीं की जा सकतीं

पूरे घटनाक्रम पर नजर दौड़ाएं तो राजस्थान के खनन विभाग का रवैया स्पष्ट रूप से पक्षपाती दिखता है. 2007 से अब तक इस विभाग के पास खदानों के पट्टे के लिए 1,150 से अधिक आवेदन आए, लेकिन विभाग ने उन पर कभी गौर नहीं किया. यह और बात है कि उसने बड़ा कोटेचा की खदानों के लिए 2009 से आए 87 आवेदनों में खास दिलचस्पी दिखाई और राज्य की गहलोत सरकार ने इनमें भी केवल मंडोर स्टोन पार्क के ही 37 लोगों के पक्ष में फैसला लिया. सवाल है कि राज्य सरकार ने 2011 की नई खनन नीति को अनदेखा करते हुए आखिर इन्हीं लोगों पर इतनी मेहरबानी क्यों दिखाई.

2011 की खनन नीति में ‘पहले आओ पहले पाओ\' के आधार पर आवंटन होता है. किंतु इस मामले में पांच साल पहले आए आवेदकों को छोड़कर तीन साल पहले आए आवेदकों को वरीयता दे दी गई. राजस्थान की नई खनन नीति में किसी इलाके की खदानों के आधे पट्टे आदिवासियों और दलितों के लिए आरक्षित हैं, जबकि आधे पर नीलामी का प्रावधान है, लेकिन इस आवंटन में यह नियम नहीं अपनाया गया. नई नीति में एक नियम यह भी बनाया गया कि कोई भी पट्टा कम से कम पांच हेक्टेयर पर ही दिया जाएगा. किंतु 2009 में मंडोर स्टोन पार्क से आए आवेदकों में ज्यादातर ने केवल एक हेक्टेयर के लिए पट्टे मांगे थे. लिहाजा गहलोत ने 23 नवंबर, 2012 को कैबिनेट की बैठक बुलाकर यह शर्त जोड़ दी कि बड़ा कोटेचा की खदानें पांच हेक्टेयर के बजाय एक हेक्टेयर के लिए दी जाएं. हद तो तब हो गई जब उन्होंने इसी बैठक में और एक शर्त जोड़ दी कि बड़ा कोटेचा की खदानें केवल मंडोर स्टोन पार्क के लोगों को दी जाएं.

मंडोर स्टोन पार्क में जिन लोगों को गहलोत सरकार की विशेष रियायत नसीब नहीं हो पाई उनमें शामिल कैलाश गहलोत (बलदेव सैंड स्टोन) हमें बताते हैं कि यहां जमीन की बंदरबांट में मुख्यमंत्री के कई रिश्तेदारों को एक से अधिक भूखंड बांटे गए हैं. इन्हीं में मुख्यमंत्री के भांजे जसवंत कच्छावा की पत्नी वीनी कच्छावा (जेएम सैंड स्टोन) भी शामिल हैं. इसी कड़ी में कांग्रेस के कार्यकर्ता और मुख्यमंत्री के करीबी संजय पुरोहित (स्टोन पेराडाईज) भी हैं जिन्हें लोहे जैसे दूसरे उद्योगों से जुड़े होने के बावजूद स्टोन पार्क में पत्थर कारखाने के नाम पर न केवल भूखंड दिया गया बल्कि बड़ा कोटेचा की खदान भी दे दी गई.

यह बात साफ होने पर भी कि सरकार ने इस मामले में एकतरफा आवंटन किया है, राजस्थान के खान मंत्री राजेंद्र पारीक अपनी सरकार का बचाव करते हुए कहते हैं, ‘मंडोर स्टोन पार्क के कारखाना मालिकों के सामने पत्थर का संकट देखते हुए यह फैसला लिया गया है.\' लेकिन पत्थर कारोबारी उनकी मंशा पर सवाल खड़े करते हैं. जोधपुर के भरत सिंह (आयरन सैंड स्टोन) आरोप लगाते हैं, ‘गहलोत सरकार ने जिन पत्थर कारखाना मालिकों को बड़ा कोटेचा में 50-50 लाख रुपये की खदानें बांटी हैं उनमें से सभी के पास पांच से लेकर चालीस खदानें तो पहले से ही हैं.\'

वहीं राजस्थान में भाजपा के उपाध्यक्ष अरुण चतुर्वेदी को पारीक की दलील पर आपत्ति है. उनकी राय में यदि सरकार की रियायत देने की यही कसौटी है तो इस कसौटी पर जहां एक ओर कुछ पत्थर कारखाना मालिकों को फायदा पहुंचाया गया वहीं दूसरी ओर बाकी को खारिज कैसे किया गया. वे कहते हैं, ‘राज्य सरकार कोई काम कराने के लिए जब अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करती है तो यह देखा जाता है कि उसमें राज्य का कितना हित है. मगर इस मामले में गहलोत यह बताने की हालत में नहीं हैं कि उनके फैसले से राज्य का कितना हित है.\' इसी कड़ी में एक बात यह भी है कि राज्य सरकार के इस कदम से न तो राजस्थान के बाकी पत्थर कारोबारियों का कोई सरोकार है और न ही जोधपुर जिले के पत्थर कारोबारियों का ही. यदि इससे किन्हीं का हित जुड़ा है तो वे हैं केवल मंडोर स्टोन पार्क के ऐसे कारखाना मालिक जो गहलोत के रिश्तेदार भी हैं.

खदानों के इस आवंटन में अनियमितताओं की सूची काफी लंबी है. इन्हीं में एक बड़ी अनियमितता यह है कि बड़ा कोटेचा में खदान पाने वालों में से किसी ने भी पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं लिया है. वहीं कई जानकारों की राय है कि न्यायिक नजरिये से भी जमीन का यह आवंटन जायज नहीं है. असल में सुप्रीम कोर्ट का आदेश है कि चरागाह की जमीन पर किसी को भी खान आवंटित नहीं की जा सकती. राजस्थान सरकार इसी आधार पर 2007 से 2012 के बीच 4,000 से ज्यादा खदानों की लीज के आवेदन रद्द कर चुकी है. यह भी ध्यान देने वाला तथ्य है कि बड़ा कोटेचा की जमीन राजस्व विभाग में चरागाह की ही जमीन के तौर पर चिह्नित है और गहलोत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को नकारते हुए इस जमीन पर खदानें आवंटित कर दीं. इतना ही नहीं, राजस्थान हाई कोर्ट ने 2003 में राज्य सरकार को आदेश दिया था कि वह सूबे के तमाम नदी-नालों, तालाबों और जलग्रहण क्षेत्रों को 15 अगस्त, 1947 की स्थिति में बहाल करे. गौर करने लायक बात यह है कि जब बड़ा कोटेचा की जमीन पर एक तालाब भी है तो किसी का ध्यान इस तरफ क्यों नहीं गया.

वैसे परिवारवालों को फायदा पहुंचाने का आरोप मुख्यमंत्री गहलोत पर पहली बार नहीं लग रहा. 2011 में जब 2जी स्पेक्ट्रम से लेकर राष्ट्रमंडल खेल घोटालों के चलते केंद्र में यूपीए सरकार कठघरे में खड़ी थी तभी राजस्थान में गहलोत ने अपने बेटे, बेटी और दामाद को फायदा पहुंचाने के मामले में पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी थीं. उन पर आरोप है कि तब उन्होंने अपने बेटे वैभव को कानूनी सलाहकार बनाने वाली दो निजी कंपनियों के लिए राज्य का सरकारी खजाना खोल दिया था. इसमें पहली कंपनी ट्राइटन होटल्स है. जयपुर में इस कंपनी का होटल खोलने के लिए गहलोत सरकार ने खेती वाली जमीन का भूउपयोग बदलकर उसे व्यावसायिक कर दिया. गौर करने वाला तथ्य यह भी है कि ट्राइटन के मालिक रतनकांत शर्मा की वैभव गहलोत की कंपनी सनलाइट कार रेंटल सर्विसेज में 50 फीसदी की हिस्सेदारी है. इसी कड़ी में दूसरी कंपनी ओम मेटल्स है जिसे जैसलमेर में 160 मेगावाट के पावर प्रोजेक्ट का ठेका तो दिया ही गया, सड़क बनाने और पानी की योजनाओं से जुड़े एक हजार करोड़ रुपये के ठेके भी दिए गए. इसके अलावा एक मामला ऐसा भी है जिसमें गहलोत को पुत्रीमोह के चलते भी शर्मिंदा होना पड़ा है. 2011 में गहलोत पर आरोप लगा कि उन्होंने अपनी बेटी सोनिया और दामाद गौतम अनखंड को तरक्की और उन्हें मुंबई के पॉश इलाके परेल में करोड़ों रुपये का फ्लैट देने वाली कंपनी कल्पतरू ग्रुप ऑफ इंडस्ट्रीज को विशेष छूट दी और उसे जयपुर के जलमहल की करीब तीन हजार करोड़ रुपये की साढ़े चार सौ एकड़ जमीन रिजॉर्ट बनाने के लिए सिर्फ ढाई करोड़ रुपये की सालाना लीज पर दे दी.

जाहिर है कि गाहे-बगाहे गहलोत अपने परिवारवालों पर मेहरबानी दिखाने को लेकर चर्चा में आते रहे हैं, लेकिन ताजा मामला पहले से अधिक संगीन है. यह पहला ऐसा मामला है जिसमें मुख्यमंत्री ने खुद माना है कि खान आवंटन में उनके परिवार के तीन लोग शामिल हैं और इस आवंटन में उनकी सरकार ने विवेकाधिकार का इस्तेमाल करके नियमों में ढील दी है.

केंद्रीय राजनीति में कांग्रेस के लिए यह परेशानी की बात है. वजह यह है कि अशोक गहलोत की ‘मिस्टर क्लीन\' छवि को गहरा धक्का लगा है और आने वाले पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर यह कांगेस के लिए नुकसानदायक प्रकरण साबित हो सकता है. कांग्रेस की मुश्किल यह है कि यदि उसने अपने चुनावी अभियान में कर्नाटक में भाजपा के पूर्व मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा के खनन घोटाले को मुद्दा बनाया तो जवाब में भाजपा गहलोत के खनन घोटाले को मुद्दा बना सकती है. भाजपा कह भी चुकी है कि वह इस मुद्दे को सदन से लेकर सड़कों तक उठाएगी. भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर कहते हैं, ‘यह अपनी तरह का एक अलग और गंभीर मामला है कि राज्य के एक मुख्यमंत्री ने जिस खनन घोटाले में नियमों को ताक पर रखा उसमें कोई और नहीं बल्कि उनके ही घर के लोग शामिल हैं.\'

दूसरी तरफ अशोक गहलोत को भी अब पार्टी के भीतर और बाहर जूझना पड़ेगा. वजह यह है कि इस तरह के मामलों के बाद अब राजस्थान से आने वाले कांग्रेस के दो बड़े नेताओं केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट और सीपी जोशी की सूबे के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने की दावेदारी मजबूत हो सकती है. वहीं राजस्थान में विधानसभा के चुनावी वर्ष में भाजपा के पास भी पहली बार गहलोत के खिलाफ एक स्थापित मामला आ गया है. 2008 के विधानसभा चुनाव में गहलोत ने राजस्थान में भाजपा की तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया के भ्रष्टाचार को निशाना बनाते हुए उनकी हवेलियों से जुड़े घोटालों को लेकर जबरदस्त घेराबंदी की थी. किंतु इस बार गहलोत भ्रष्टाचार के मामले में खुद ही घिर गए हैं. वरिष्ठ पत्रकार लोकपाल सेठी कहते हैं, ‘भाजपा चाहेगी कि वह गहलोत के भ्रष्टाचार को चुनाव तक जिंदा रखे.\' सूबे में भाजपा की कमान संभाल रही वसुंधरा राजे के लिए गहलोत से पुराना हिसाब चुकता करने के लिए इससे बेहतर मौका क्या होगा?


http://www.tehelkahindi.com/indinoo/national/1716.html


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