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न्यूज क्लिपिंग्स् | सोच और धारणा को नियंत्रित करती डिजिटल दुनिया-- ब्रेट फिचमैन

सोच और धारणा को नियंत्रित करती डिजिटल दुनिया-- ब्रेट फिचमैन

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published Published on Dec 16, 2016   modified Modified on Dec 16, 2016
गूगल कंपनी की जबसे शुरुआत हुई है, तभी से इसके सर्च इंजन की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी विद्वानों के बीच चिंता का विषय रही है। स्वचालित कार, स्मार्टफोन और सर्वव्यापी ईमेल के क्षेत्र में उतरने के बहुत पहले से गूगल से यह पूछा जाता रहा है कि वह उन सिद्धांतों और विचारधाराओं की व्याख्या करे, जिनके आधार पर वह यह तय करती है कि सूचनाएं किस रूप में हम तक पहुंचें? और आज 10 साल बाद यह साफ महसूस किया जा रहा है कि वेब पर परोसी जाने वाली लापरवाह, व्यक्तिपरक और भड़काऊ झूठी सूचनाओं का जो असर पड़ रहा है, डिजिटल युग में वैसा पहले कभी नहीं हुआ।

गूगल ने इस हफ्ते कुछ झिझक के साथ नकारात्मक सामग्रियों की बात भी मानी और कुछ आक्रामक ‘ऑटो-सजेस्ट' परिणामों को खास सर्च नतीजों से बाहर भी किया। जैसे गूगल में ‘जू आर' टाइप करते ही सर्च इंजन अपनी तरफ से जोड़ देता था- ‘जू आर एविल'। इससे पहले कि यूजर आगे किसी दक्षिणपंथी यहूदी विरोधी वेबसाइट का लिंक टाइप करता, इसमें एविल शब्द अपने आप सामने आ जाता था। यह वेबसाइट (गूगल) बुरी खबरों, बल्कि यहां तक कि व्यंग्य और झूठी खबरों के बीच कोई फर्क नहीं कर पाती। फेसबुक वेबसाइट उस समस्या के समाधान में जुट गई है, जिसके पैदा होने में वह भागीदार है। फिर भी मीडिया साक्षरता को प्रोत्साहित करने में या यूजर्स में यह विवेकपूर्ण समझ विकसित करने के लिए कि वे जो पढ़ और साझा कर रहे हैं, उससे क्या-क्या समस्याएं पैदा हो सकती हैं, फेसबुक कंपनी अपने विशाल संसाधनों का इस्तेमाल करने की बजाय एल्गोरिथम-पद्धति वाले हल पर भरोसा कर रही है।

दीर्घकालिक सामाजिक परिणामों के लिहाज से यह अहितकर हो सकता है। जिस बड़े पैमाने पर और जिस प्रभाव क्षमता के साथ फेसबुक काम करती है, उसका सीधा-सा अर्थ है कि यह वेबसाइट अपने यूजर्स को प्रभावशाली तरीके से इस बात के लिए तैयार करती है कि वे अपने फैसले एक कंप्यूटरीकृत विकल्प से आउटसोर्स करें। और वह 21वीं सदी के डिजिटल कौशल को हासिल करने के मौके बहुत कम उपलब्ध कराती है। तकनीक कैसे हमारे रिश्तों और विश्वास को आकार देने लगी है, इस डिजिटल कौशल को समझने के लिए फेसबुक कोई खास मौके नहीं दे रही। फेसबुक, गूगल और दूसरी साइटों द्वारा डिजाइन किए गए वातावरण ने हमें सार्थक बौद्धिक रास्तों से दूर कि या है। हम अपनी मूर्खता या आलसीपने में झूठी खबरों पर यकीन नहीं करते; हमने उसी पर विश्वास किया, जिस पर भरोसा करने की ओर हमें प्रवृत्त किया गया।

पिछले दशक में उभरा इन्फो-मीडिया परिवेश लोगों को इस बात के लिए प्रोत्साहित करता है कि वहां जो सामग्री परोसी जा रही है, उसे वे बगैर विमर्श के स्वीकार कर लें। खासकर जब यह किसी ऐसे शख्स द्वारा प्रस्तुत की गई हो, जिस पर हम भरोसा करते हैं या वह विश्वसनीय खबरों के इर्द-गिर्द हो। दोस्तों में प्रसारित होने वाली सूचना में अंतर्निहित मूल्य होता है, जिसका दोहन फेसबुक करती है, लेकिन यह झूठी सूचनाओं के प्रसार को गति दे देती है, जैसे अच्छी सामग्रियों के मामले में भी होता है।

सूचना के हरेक टुकड़े को हमें समान रूप से परखना चाहिए। हमारे समक्ष निपटाने के लिए आज काफी सूचनाएं हैं। पहले ऐसा नहीं था। लेकिन हम एक निष्क्रिय आत्म-संतोष के शिकार बन रहे हैं। हम निष्क्रिय, नियंत्रित हो सकने वाले इंसान के रूप में तराशे जाने लगे हैं। एक उदार लोकतंत्र के लिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हम अच्छी तरह से समझें कि किस तरह ये ताकतवर वेबसाइटें हमारे सोचने-समझने के तरीकों, आचार-व्यवहार को बदल रही हैं? लोकतंत्र सिर्फ सूचनाओं से लैस नागरिकों पर निर्भर नहीं रह सकता, उसे ऐसे नागरिकों की जरूरत होती है, जो विचारशील हों और स्वतंत्र राय रखते हों।

यह क्षमता एक मानसिक ताकत है, इसका बार-बार इस्तेमाल ही इसे मजबूत बनाती है। और जब हम लंबे वक्त तक एक ऐसी जगह पर कायम रहते हैं, जो विवेकशील सोच को जान-बूझकर हतोत्साहित करती है, तो हम इस क्षमता को मजबूत करने का अवसर गंवा देते हैं।
साथ में इवान सेलिंगर
साभार: द गार्जियन
(ये लेखक के अपने विचार हैं)


http://www.livehindustan.com/news/guestcolumn/article1-google-company-search-engine-transparency-automatic-car-smart-ubiquitous-email-631789.html


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