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साक्षात्कार | नयी सरकार सहारा नहीं, साथी बने

नयी सरकार सहारा नहीं, साथी बने

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published Published on May 22, 2014   modified Modified on May 22, 2014

अमर पिछले 42 सालों से ग्रामीण क्षेत्रों में विकास के प्रति हमेशा कार्य करते रहे हैं. पहली बार सन् 1972 में इन्होंने इस क्षेत्र में बेहतरी के लिए कदम रखा और तब से लगातार गांव-पंचायतों के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं. पूर्वी चंपारण के निवासी आमर को लालबहादुर शास्त्री प्रशासनिक अकादमी, मसूरी द्वारा भूमि सुधार के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य के लिए मोमेंटो और प्रमाणपत्र देकर सम्मानित किया गया है. आपदा प्रबंधन क्षेत्र में कार्य करने वाली संस्था ‘रेडार इंडिया’ ने भी अमर को सम्मानित किया है. जयप्रकाश नारायण से प्रेरित अमर आपातकाल के दौरान नौ महीनों तक जेल में भी रहे हैं. ग्रामीण क्षेत्रों के हालात पर पैनी नजर रखने वाले अमर से सुजीत कुमार ने बात की.

नयी सरकार बनने जा रही है. ग्रामीण विकास के लिए कौन-कौन से मुद्दे ऐसे हैं, जिनसे इस सरकार को निपटना होगा?

ग्रामीण विकास के लिए सरकार को कई मुद्दों पर काम करना होगा. कई मुद्दे हैं जो इन क्षेत्रों के विकास के लिए बहुत आवश्यक हैं. सरकार इसे प्राथमिकता के आधार पर चुने. सबसे पहले ग्राम स्वराज के लिए त्री-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को असरदार करने की जरूरत है. इस व्यवस्था को केवल चुनाव तक के लिए ही सीमित ना रखा जाये बल्कि ग्राम विकास से जुड़ी योजनाओं को पूर्ण करने के लिए छूट दी जाये. सरकार और पंचायती राज संस्थान मिल कर काम करे. 73वें संशोधन के बाद पंचायती राज व्यवस्था को अधिकार देने की बात कही गयी लेकिन आज तक अधिकार नहीं मिला. इस अधिकार को देना होगा. योजना राशि का सदुपयोग हो, इसके लिए भी व्यवस्था करने की जरूरत होगी. इसमें लचीलापन लाना होगा कि दूसरी योजनाओं के लिए आवंटित राशि का उपयोग जरूरत पड़ने पर किसी और विकास कार्यो में उपयोग हो सके. एक आंकलन के अनुसार वैसी योजनाएं जिनके लिए पैसा आवंटित होता है, उसमें मात्र 27 फीसदी राशि ही खर्च हो पाती है. बाकी की बंदरबांट हो जाती है. सरकार ऐसे मामलों में कुछ कदम उठा के काबू पा सकती है. इसके लिए उसे पंचायतों को अधिकार के साथ दायित्व भी देना होगा. पंचायतें यह देखे कि स्थानीय स्तर पर संसाधन क्या है? राजस्व को लेकर सीधे तौर पर जिलों या राज्य की जिम्मेवारी तय करनी होगी. पंचायतों को यह अधिकार दिया जाना चाहिए कि वह स्थानीय संसाधन के दम पर विकास कार्य करे. ग्राम के संपूर्ण विकास के लिए ग्राम विकास योजना लानी होगी. जरूरत को जाने तब काम करने पर जोर देना होगा. मनरेगा महत्वाकांक्षी योजना है. इसमें सौ दिनों के रोजगार देने की बात कही जाती है लेकिन किसी भी जरूरतमंद को सात दिनों से ज्यादा काम की गारंटी नहीं हो पा रही है. नतीजा पलायन नहीं रुक रहा है. पलायन का मैं विरोधी नहीं हूं लेकिन रोटी के लिए पलायन हो, यह अच्छी बात नहीं है. मनरेगा पलायन रोकने में सक्षम है. पूरे सूबे में सूखे के हालात बन रहे हैं. पानी को लेकर नयी सरकार काम करे. परंपरागत तरीके से नदियों, तालाबों की उडाही करने की जरूरत होगी. नदियां, तालाब, कुएं सूख रहे हैं. कुछ दिन पहले एक योजना शुरू हुई थी. प्रमंडल वृक्षारोपण कार्यक्रम. इसमें जहां ईमानदारी से काम हुआ, वह इलाका हरा-भरा है. अन्य जगहों पर यह फिसड्डी साबित हो गया. इसके अलावे मछलीपालन, डेयरी, पशुपालन जैसे और भी बहुत काम धंधे हैं जिसके  प्रोत्साहन के लिए सरकार को अपना ध्यान केंद्रित करना होगा.

केंद्र सरकार की मनरेगा समेत करीब ढ़ाई दर्जन योजनाएं ग्रामीण विकास में जुटी है, लेकिन उनका पूरा लाभ ग्रामीणों को नहीं मिल रहा है. नयी सरकार से इस मामले में किस तरह के हस्तक्षेप की उम्मीद की जानी चाहिए?

हस्तक्षेप या देख-रेख के दो स्तर हो सकते हैं. केंद्र सरकार नीति बना सकती है. योजनाओं में कहां और किस तरह के व्यवधान आ रहे हैं? उनके लिए एक तय समय सीमा के अंदर जांच कर के पहचान की जाये. ऐसे व्यवधानों को दूर करने के लिए ठोस नीति बने. इन सारे मामलों में स्थानीय जनों की भागीदारी हो. केंद्र सरकार सीधे तौर पर गांव और ग्रामीण विकास के लिए हस्तक्षेप नहीं करती है. यह राज्य सरकार का मामला है. योजनाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है तो इसके लिए राज्य सरकार को भी जवाबदेह बनाया जाये. सोशल ऑडिट एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है. इसे शुरू करने के साथ इसकी पूरी जानकारी ग्राम पंचायत को दे दी जाये. इस बात पर नजर रखी जाये कि मापदंड के अनुरूप खर्च हुआ या नहीं? इन सारी प्रक्रियाओं से लोगों की जिम्मेदारी बढ़ेगी. पंचायत के विकास संबंधी काम का क्रियान्वयन हो. नाली, सड़कें, बनने के अलावे पीडीएस से अनाज मिल रहा है या नहीं यह भी ऑडिट हो. कुपोषण दूर करने के लिए आंगनबाड़ी बहुत बढ़िया कार्यक्रम है लेकिन अभी भी यह लक्ष्य से दूर है.

निर्मल ग्राम पंचायत को लेकर बड़ी-बड़ी बातें हुई, कुछ पंचायतों को इसके लिए पुरस्कार भी मिले लेकिन धरातल पर जांच की जाये तो अलग ही वस्तुस्थिति देखने को मिलेगी. इन मामलों में सरकारी हस्तक्षेप रहेगा तो परिणाम में सुधार आ सकता है. सबसे अहम है जनता की भागीदारी. सरकारी स्तर पर ऐसे लोगों को चिन्हित करने की पहल हो, जो ग्रामीण विकास के कार्यक्रम, योजनाओं को लेकर जागरूक रहते हो. नयी सरकार ऐसी योजनाओं को लेकर जागरूक हो, कड़ाई से पालन करे, सोशल ऑडिट करे और जहां भी जरूरत हो, वहां हस्तक्षेप करे. सुधार अवश्य होगा. अब दूसरी बात, हमारे गांवों में आज भी काफी प्रतिभाशाली लोग रहते हैं. जो कुटीर उद्योग के साथ पशुपालन, कृषि, डेयरी, मधुमक्खीपालन जैसे कार्य करते रहे हैं. इन कार्यो के लिए प्रशिक्षण देने की भी कोई जरूरत नहीं है. इसलिए ऐसे गांवों को सरकार रेखांकित कर के उत्पादन कराये. गांव की जुड़ी योजनाएं गांव को उन्नत करने में सक्षम है. सूबे के कई इलाके अपनी अपनी उत्पादन क्षमता के लिए विख्यात हैं. ऐसे इलाकों में बेहतर उत्पादन क्षमता के लिए सरकार हस्तक्षेप करे. जब दूध, कृषि के क्षेत्र में सुधार हो सकता है तो लीची और बाकी अन्य में क्यों नहीं? इससे रोजगार मिलने के साथ-साथ गांव की उन्नति हो सकती है. आय का साधन बढ़ सकता है. केंद्र सरकार सभी योजनाओं की पूरी समीक्षा करे. जिन उद्देश्यों को लेकर योजनाएं बनी, उनका लाभ लोगों को मिला या नहीं? सिंगल विंडो सिस्टम लागू हो. दस जगह के बदले एक ही जगह से समाधान निकालने की कोशिश होनी चाहिए. योजनाओं का क्रियान्वयन तात्कालिक करने की जरूरत होगी. प्रभावी तौर पर जवाबदेही तय हो साथ ही जो लोग इन योजनाओं में लगे हैं, उनकी पारदर्शिता और जिम्मेवारी तय करने की पहल हो. जिनके ऊपर केंद्र सरकार की योजनाओं को लागू कराने की जिम्मेवारी तय है, वो खरे नहीं उतरते तो दंड का प्रावधान किया जाये. जैसे आंगनबाड़ी में अगर चालीस बच्चों को जोड़ना है और कम बच्चे जुटे तो इसके संचालन में लगे लोगों को तुरंत हटाने का प्रावधान हो. 

वैसे मुद्दे जो ग्रामीण विकास से जुड़े हैं और केंद्र सरकार के स्तर पर लंबित हैं? केंद्र राज्यों को पैसा देता है. राज्य खर्च नहीं कर पाते. ऐसे में किस तरह का रास्ता निकालना चाहिए?

जो योजनाएं लंबित हैं और जो सही तरीके से लागू नहीं हो रही हैं, उन्हें बंद कर देना चाहिए. बंद करना उचित नहीं है लेकिन योजनाओं के नाम पर पैसे की लूट भी सही नहीं है. केंद्र, राज्य सरकार के पास मॉनिटरिंग एजेंसियों की कमी नहीं है लेकिन केवल खानापूरी होती है. एजेंसियां खानापूरी ना करे और अगर अपनी जिम्मेदारी निभाएं और उसके  आधार पर दंडित करने का प्रावधान हो तो नतीजा निकल सकता है. योजनाओं में खर्च की गयी राशि की वापसी के लिए राज्य सरकार पर जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. जब योजनाएं बनती है तो साधन तलाशे जाते हैं. योजनाओं के लिए समय सीमा और जवाबदेही तय होने के साथ पारदर्शिता और जनभागीदारी तय हो. जांच की प्रक्रिया मजबूत कर के उचित कार्रवाई की पहल हो.

नयी सरकार से पंचायती राज संस्थान को कितनी और किस तरह की पहल की उम्मीद है?

पंचायतों के लिए 29 तरह के जो अधिकार देने की बात कही गयी है. उसे अविलंब पंचायतों को दिया जाना चाहिए. सही तरीके और स्तरीय काम के लिए संसाधन की व्यवस्था, आवश्यकता पर ध्यान देने की जरूरत है. नयी सरकार के गठन के तुरंत बाद चुने हुए पंचायत प्रतिनिधियों का सम्मेलन आयोजित कर उनसे सुझाव मांगे. उनकी परेशानियों को समङो. उसे दूर करने का प्रयास करे. सम्मेलन में चर्चा के दौरान ग्रामीण विकास के लिए सर्वसम्मति से कार्यक्रम बनाने की उम्मीद है. दिखावे के लिए ग्रामसभा की चार बैठकें होती हैं. नतीजा कुछ नहीं निकलता. जब बैठक हो तो नतीजा भी निकलना चाहिए. 

ग्रामीण इलाकों में विकास को लेकर समस्याओं की लंबी सूची है. नयी सरकार को किस तरीके से काम करना होगा कि समस्याओं का निराकरण कर सके?

ग्राम-पंचायतों में समस्याओं का समाधान करना है तो सबसे पहले पंचायती राज संस्था को दुरुस्त करना होगा. यह भी स्थानीय सरकार है. इसे मजबूत और जवाबदेह बनाने की जिम्मेवारी बनती है. पंचायती राज संस्थान को मूलभूत सुविधा प्रदान करे. पंचायती राज व्यवस्था से जुड़े कर्मियों को समय समय पर योजनाओं को जानकारी दी जाये. योजनाओं के हिसाब से प्रशिक्षण देने की पहल होनी चाहिए. पंचायती राज संस्थान मजबूत होगा तो इन क्षेत्रों में हो रहे विकास कार्यो को गति मिल जायेगी.

झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए नयी सरकार को किस तरीके से पहल करनी होगी? दोनों राज्यों के हालात में बहुत अंतर है.

झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों का विकास बिहार के ही संदर्भ में करना होगा. नयी सरकार इस बात को समङो कि हर राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों में कई तरह की विभिन्नता है लेकिन समानता एक ही है कि विकास को लेकर सब पिछड़े हैं. झारखंड के ननसिड्यूल क्षेत्रों के लिए पेसा कानून है, जो मूल निवासी संचालित करते हैं. उसी के अनुरूप कार्य हो. यहां पंचायती राज व्यवस्था का चुनाव तो हुआ लेकिन वह कारगर नहीं रहा. जैसे सिड्यूल क्षेत्रों के विकास के लिए मूल निवासियों द्वारा संचालित करने की व्यवस्था होती है. वैसी ही व्यवस्था ननसिड्यूल क्षेत्रों के लिए होनी चाहिए. सरकार ग्रामीण इलाकों में विकास के लिए पंचायत प्रतिनिधियों को मिला कर एक समन्वय समिति गठित करे. उस समिति को पूर्ण अधिकार हो कि वह योजनाओं को आवश्यकता और प्राथमिकता के आधार पर चयनित कर के अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करे. उसके बाद राज्य, केंद्र की सरकार या जो भी संबंधित विभाग हो.

विकास कार्य करें. सब साथ मिल कर काम करेंगे तब ही विकास होगा. झारखंड में पंचायत चुनाव बहुत दबाव में हुए हैं. झारखंड में पंचायत प्रतिनिधि अभी बिहार के पंचायत प्रतिनिधियों के जैसे सक्षम और एकजुट नहीं हैं. बिहार में इन प्रतिनिधियों ने लड़ाई लड़ कर अपनी एकजुटता दिखाई है. राज्य सरकार भी एक कदम उठाये और प्रतिनिधियों को प्रावधान के अनुरूप अधिकार दे. इसके लिए नयी सरकार को भी आवश्यक पहल करनी होगी. विकास की अपार संभावनाएं, संसाधन हैं लेकिन काम करने का इरादा नहीं है. बिहार से ज्यादा संपन्न झारखंड है लेकिन उत्तर बिहार से जितना पलायन होता है, उससे कही ज्यादा झारखंड से पलायन होता है. नयी सरकार संसाधनों में बढ़ोत्तरी तो करे यह जरूरी है लेकिन साथ-साथ वर्तमान में जो भी संसाधन मौजूद हैं. अगर उसी के अनुरूप कार्य करे तो बहुत अंतर आ सकता है. पंचायतें जब सक्षम होंगी तो रोजी-रोटी के लिए स्थानीय स्तर पर कदम उठा सकती हैं. एक और बात देखने को मिलती है, यहां के खनिजों को बड़ी कंपनियां कौड़ियों के दाम पर ले लेती हैं. स्थानीय लोगों को कुछ नहीं मिलता. जिससे वह अवसादग्रस्त रहते हैं. इसके लिए मूल निवासियों को विश्वास में लेकर, उनकी राय जान कर नयी सरकार को काम करना होगा. सरकार चाहेगी तो ऐसी हालात नहीं उभर पायेंगे. ग्रामीण इलाकों में पेयजल गंभीर समस्या है. स्वर्णरेखा, चांडिल, मैथन जैसे डैम हैं. इनसे फैक्ट्री को पानी मिल रहा है लेकिन ग्रामीण, पंचायतों को नहीं. नयी सरकार इसके लिए विशेषज्ञों की समिति बनाये, पंचायतों की राय लें. सबको साथ रख कर काम करे. 

खनिज से संपन्न राज्य के विपन्न गांव, राजनीतिक हालात, ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधन की कमी, नक्सल की समस्या यानि एक साथ कई बाधाएं हैं . इन सभी मामलों से नयी सरकार को कैसे निपटना होगा? 

नक्सल बड़ी समस्या है. इसके लिए हालात को समझने होंगे. जब मूल निवासियों के संसाधन पर बड़ी कंपनियां दखलंदाजी करेंगी तो स्थिति तो बेकाबू होगी. ये सारी समस्याएं सरकारी नीतियों में ढ़ीलेपन और तात्कालिक लाभ से होती हैं. केंद्र सरकार ने कुछ दिन पहले ‘वनाधिकार कानून’ बनाया लेकिन देश के किसी भी राज्य ने इस कानून को प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया. 

हर समुदाय के लोगों को बेहतर संसाधन मिले तो ऐसे हालात नहीं बनेंगे. पिछली सरकारों ने जो भी कदम उठाये थे. नयी सरकार उनकी समीक्षा करे. जहां भी गलतियां हो उन्हें सुधारने का प्रयास करें. राज्य के राजनैतिक हालात भी पिछड़ेपन के लिए जिम्मेवार हैं. स्थापना के बाद से ही अस्थिरता रही है. जिस उद्देश्य से राज्य बना, वह पूरा नहीं हुआ. स्थापना में जिनका योगदान था, वह भूमिका खो चुके हैं. पूरी राजनीति खेमे में बंट गयी है. अस्थिरता रहेगी तो विकास कार्यो पर सीधा असर पड़ेगा. नयी सरकार से यह अपेक्षा रहेगी कि ऐसे लोगों को चुने जो स्थिरता, विकास कार्यो के लिए कार्य कर रहे हो. इसमें पंचायतों की मदद ली जाये. 

वह अपनी योजनाओं को प्रस्तुत करें. फिर उसकी समीक्षा हो. उसके बाद अमल हो. केंद्र सरकार की ग्रामीण क्षेत्रों में विकास को लेकर जितनी भी योजनाएं हैं. वो सारी योजनाएं बिहार की तुलना में बिल्कुल भी प्रभावी नहीं हैं. स्थिति बदतर है. नयी सरकार से जल्द से जल्द इन योजनाओं पर हो रहे कार्यो की राज्य सरकार की रिपोर्ट पर विशेषज्ञों द्वारा समीक्षा कराये जाने की जरूरत है.  


http://www.prabhatkhabar.com/news/115214-story.html


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