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चर्चा में.... | कोरोना के प्रकोप से बचने के लिए 'वर्क फ्रॉम होम' जैसे उपाय भारतीय श्रमिकों के लिए नहीं हैं मददगार
कोरोना के प्रकोप से बचने के लिए 'वर्क फ्रॉम होम' जैसे उपाय भारतीय श्रमिकों के लिए नहीं हैं मददगार

कोरोना के प्रकोप से बचने के लिए 'वर्क फ्रॉम होम' जैसे उपाय भारतीय श्रमिकों के लिए नहीं हैं मददगार

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published Published on Mar 21, 2020   modified Modified on Mar 21, 2020

साल 2020 से पर्दा उठते ही इसके शुरुआती जनवरी महीने में चीन जैसी महाशक्ति को COVID-19 के व्यापक प्रकोप से झूझते हुए पाया, जोकि कुछ दिनों के भीतर ही वैश्विक स्तर पर फैल गया. COVID-19 की तीव्र प्रसार क्षमता के अध्ययन के बाद, स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने बाकी की आबादी के बीच तेजी से इसके प्रसार को रोकने के लिए कुछ तरीके सुझाए हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने इंटरनेट कनेक्टिविटी के युग में, वर्क फ्रॉम होम यानी घर से काम करने और लोगों से सामाजिक दूरी सुनिश्चित करने और बड़े पैमाने पर सामाजिक समारोहों से बचने के समाधान के रूप में सलाह दी गई है. विशेषज्ञों ने सरकारों और निजी उद्यमों को उनके कर्मचारियों को घर पर रखने के लिए कहा है ताकि असामाजिकरण करके रोगसूचक व्यक्तियों से इस रोग को फैलने से रोका जा सके और स्वास्थ्य अधिकारियों को भी इसके इलाज के लिए उपलब्ध सीमित संसाधनों में रोग के प्रकोप को रोकने के लिए पर्याप्त समय मिल सके.

टॉमस पुइयो सिलिकॉन वैली के एक उद्यमी हैं, जो हाल ही में कोरोनवायरस: व्हेन यू मस्ट एक्ट नाउ (10 मार्च, 2020 को प्रकाशित) नामक अपने लेख के लिए चर्चा में हैं. उनके लेख को 18 मार्च, 2020 तक 2 लाख 24 हजार से अधिक लाइक मिले हैं. उन्होंने अपने लेख में रोजगारदाताओं और सरकारों से अच्छे इरादों के साथ 'घर से काम' सुनिश्चित करने के लिए कहा है, लेकिन उनके अधिकांश सुझाव हमारे देश के अनौपचारिक क्षेत्र से संबंधित वास्तविकताओं के आगे धराशाही होते नजर आते हैं.

हमारे देश में लेबर चौक के बिना किसी भी शहर या कस्बे की कल्पना नहीं की जा सकती. शहरी-कस्बाई इलाकों में बने इन लेबर चौकों पर दिहाड़ी मजदूरों की भीड़ हर प्रभात इस उम्मीद के साथ वहां आकर खड़ी हो जाती है कि उन्हें किसी ठेकेदार से काम मिल जाएगा. इसी तरह, हमारी कृषि मंडियों (यानी कृषि उपज विपणन समिति बाजारों) में भी ये दिहाड़ी मजदूर भार ढोने का अनौपचारिक रूप से (एक बोरी दर के आधार पर) काम करते हैं. हमारे आसपास कूड़ा बीनने वाले और रिक्शा चलाने वाले स्व-पोषित व्यक्ति भी दिहाड़ीदारों की तरह ही कमाते हैं. कोरोनोवायरस, जिसे 11 मार्च, 2020 को विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा एक महामारी घोषित कर दिया है, को फैलने से रोकने के लिए यूं अचानक ही उनके काम पर रोक लगाकर उनके हर रोज के खाने-कमाने पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता. अन्यथा अधिकांश अनौपचारिक और दिहाड़ी मजदूरों के लिए पेट भरने तक की समस्या खड़ी हो जाएगी. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि हमारे देश की वास्तविकताएं कई अग्रिम पूंजीवादी देशों और चीन जैसे साम्यवादी देशों से मेल नहीं खातीं.

अनौपचारिक लेबर मार्किट और दिहाड़ी मजदूर: PLFS 2017-18

आधिकारिक रिपोर्ट बताती है कि अधिकांश भारतीय मजदूरों (औपचारिक क्षेत्र में भी) के पास श्रम अधिकारों का अभाव है. मई 2019 में जारी पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे वार्षिक रिपोर्ट’ (PLFS) (जुलाई 2017 - जून 2018) में यह बताया गया है कि गैर-कृषि क्षेत्र में नियमित वेतन / वेतनभोगी कर्मचारियों में आधे से अधिक (यानी 54.2 प्रतिशत) कर्मचारियों को वैतनिक अवकाश नहीं मिलता है. ऐसे कर्मचारियों में 55.2 प्रतिशत पुरुष और 50.4 प्रतिशत महिलाएं थीं.

राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) द्वारा तैयार की गई इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि गैर-कृषि क्षेत्र में नियमित वेतन/वेतनभोगी कर्मचारियों में लगभग आधे (यानी 49.6 प्रतिशत) कर्मचारियों को वर्ष 2017-18 में किसी भी तरह का कोई सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं दिया गया. ऐसे कर्मचारियों में 49.0 प्रतिशत पुरुष और 51.8 प्रतिशत महिलाएं थीं.
गैर-कृषि क्षेत्रों (यानी 71.1 प्रतिशत) में नियमित वेतन/वेतनभोगी कर्मचारियों में करीब तीन-चौथाई के पास कोई लिखित नौकरी अनुबंध नहीं था. ऐसे कर्मचारियों में 72.3 प्रतिशत पुरुष और 66.8 प्रतिशत महिलाएं थीं.

हमारे देश में जब नियमित वेतनभोगी कर्मचारियों की स्थिति इतनी निराशाजनक है, तो दिहाड़ीदार मजदूरों और स्व-पोषित श्रमिकों का क्या हाल होगा, यह आसानी से समझा जा सकता है! PLFS की रिपोर्ट बताती है कि 68.4 प्रतिशत मजदूर गैर-कृषि क्षेत्रों के अनौपचारिक दायरे में आते हैं. रिपोर्ट यह भी बताती है कि गैर-कृषि क्षेत्रों के अनौपचारिक दायरे में 71.1 प्रतिशत पुरुष और 54.8 प्रतिशत महिलाएं काम करती हैं.

हमारे ज्यादातर मजदूर अपनी रोजमर्रा की दिहाड़ी के आधार पर ही अपना जीवन यापन कर रहे हैं. उनके पास थोड़े से पशुधन के अलावा बहुत कम जमीन है और कइयों के पास तो किसी प्रकार की कोई जमीन नहीं है. दिहाड़ी मजदूरों (प्रवासी श्रमिकों सहित) का केवल एक छोटा हिस्सा ही सामाजिक सुरक्षा के कुछ प्रबंधों के दायरे में आ पाता है या सामाजिक सुरक्षा संबंधी किसी योजना या कार्यक्रम का हिस्सा बन पाता है. शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन जैसी आवश्यक सेवाओं के निजीकरण के कारण, रोज़मर्रा की कमाई की तुलना में जीवन-यापन और रोजमर्रा के खर्च बहुत अधिक हो गए हैं. राज्य, बिरले ही औपचारिक और अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों में श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान सुनिश्चित कर पाते हैं. उदाहरण के लिए, दिहाड़ी मजदूरों या श्रमिकों द्वारा की गई कमाई को ही लें. रिपोर्ट यह बताती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जुलाई से सितंबर 2017, अक्टूबर-दिसंबर 2017, जनवरी-मार्च 2018 और अप्रैल-जून 2018 की समयावधि के दौरान जो दिहाड़ीदार मजदूर सरकारी कामों के अलावा अन्य क्षेत्रों में कार्यरत थे, उनमें पुरुष मजदूरों की औसत आय प्रति दिन 253 रुपये से लेकर 282 रुपये और महिला मजदूरों की औसत आय प्रति दिन 166 रुपये से लेकर 179 रुपये तक थी. इसके विपरीत, इस अवधि के दौरान शहरी क्षेत्रों में, सार्वजनिक कामों के अलावा अन्य कार्यों में लगे दिहाड़ीदार मजदूरों में पुरुष मजदूरों की प्रति दिन औसत मजदूरी 314 रुपये से लेकर 335 रुपये तक थी और महिला मजदूरों की आय 186 रुपये से लेकर 201 रुपये तक थी.

ग्रामीण क्षेत्र में, मनरेगा(महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार) के तहत जो दिहाड़ीदार मजदूर जुलाई-सितंबर 2017, अक्टूबर-दिसंबर 2017, जनवरी-मार्च 2018 और अप्रैल-जून 2018 के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के कार्यों में लगे थे, उनमें पुरुष मजदूरों की आय प्रति दिन 141 रुपये से लेकर 171 रुपये तक और महिला मजदूरों की 131 रुपये से लेकर 165 रुपये तक थी. इसी समयावधि के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में, जो मजदूर मनरेगा के अलावा सार्वजनिक क्षेत्र के कार्यों में मजूरी कर रहे थे, उनमें एक पुरुष मजदूर औसतन 138 रुपये से लेकर 158 रुपये प्रतिदिन कमा रहा था और महिला मजदूर 119 रुपये से 144 रुपये तक प्रतिदिन कमा रही थी.

औपचारिक और अनौपचारिक दोंनो तरह की लेबर मार्किट में, सभी तरह के व्यवसायों में मजदूरों की आय में लिंग आधारित भेदभाव व्यापक रुप से मौजूद हैं. दरअसल सिर्फ लिंग ही नहीं, जाति, जातीयता, भाषा, धर्म और क्षेत्र आधारित भेदभाव और श्रम विभाजन लेबर मार्किट को व्यापकता से जकड़े हुए है.

यहां यह गौरतलब है कि PLFS 2017-18, एनएसओ रिपोर्ट में कर्मचारियों को स्व-पोषित, नियमित वेतन/वेतनभोगी कर्मचारी और दिहाड़ीदार मजदूरों के रूप में वर्गीकृत किया गया है. सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) की रिपोर्ट के अनुसार, एक व्यक्ति जो दूसरों के खेत या गैर-कृषि उद्यमों (घरेलू और गैर-घरेलू, दोनों) में दिहाड़ी पर काम कर रहा था और बदले में दैनिक या आवधिक कार्य अनुबंध की शर्तों के अनुसार मजदूरी पा रहा था, उसे एक दिहाड़ी मजदूर माना जाता है. 

नियमित वेतन/वेतनभोगी कर्मचारी ऐसे व्यक्ति थे जो दूसरों के खेत या गैर-कृषि उद्यमों (घरेलू और गैर-घरेलू दोनों) में काम करते थे और बदले में, नियमित आधार पर वेतन या मजदूरी पाते थे (अर्थात दैनिक या दैनिक आधार पर नहीं) काम के अनुबंध की आवधिक इस श्रेणी में न केवल समय पर वेतन पाने वाले व्यक्ति बल्कि पूरे समय और अंशकालिक दोनों तरह के वेतन या वेतन और भुगतान पाने वाले प्रशिक्षुओं को भी शामिल किया गया था.

PLFS रिपोर्ट 2017-18 के अनुसार, अनौपचारिक रोजगार (श्रम सांख्यिकीविदों-आईसीएलएस फ्रेमवर्क के 17 वें अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन, नवंबर-दिसंबर 2003 के अनुसार) में शामिल नौकरियां:
* अपने स्वयं के अनौपचारिक क्षेत्र के उद्यम में काम करने वाले श्रमिक;
* परिवार के श्रमिकों का योगदान, चाहे वे औपचारिक या अनौपचारिक क्षेत्र के उद्यमों में काम करते हों;
* ऐसे कर्मचारी जिनके पास अनौपचारिक नौकरियां हैं (परिभाषा के लिए, अनुबंध- IV में पैराग्राफ 3 में आइटम (5) देखें) जोकि औपचारिक क्षेत्र के उद्यमों, अनौपचारिक क्षेत्र के उद्यमों या घरेलू श्रमिकों के तौर पर कार्यरत हैं.
* अनौपचारिक उत्पादक सहकारी समितियों के सदस्य;
* व्यक्ति जो अपनी जरूरत के हिसाब से घरेलू उत्पादन में लगे हुए हैं, जैसे कि जीवन यापन के लिए खेती या स्वयं के आवास के निर्माण में लगे हुए हैं. 

डिजिटल डिवाइड और वर्क फ्रॉम होम (घर से काम)

COVID-19 के प्रकोप को रोकने के लिए दुनियाभर में अपनाए जा रहे वर्क फ्रॉम होम जैसे तरीके, हमारे देश में मौजूद डिजिटल डिवाइड के कारण फीके पड़ जाते हैं. मौजूदा डिजिटल डिवाइड के कारण भारत के अधिकांश श्रमिक डिजिटल उपकरणों (जैसे कंप्यूटर, स्मार्ट फोन, टैबलेट, आदि) और इंटरनेट कनेक्टिविटी का उपयोग करके घर से काम करने में सक्षम नहीं हैं.

शिक्षा पर 75वें दौर के नेशनल सैंपल सर्वे (एनएसएस) की रिपोर्ट में पाया गया है कि साल 2017-18 में देश में कंप्यूटर का उपयोग करने वाले परिवारों का कुल अनुपात 10.7 प्रतिशत था और मोटे तौर पर एक-चौथाई भारतीय घरों (यानी 23.8 प्रतिशत) में इंटरनेट की सुविधा है. इतना ही नहीं, भारत में कंप्यूटर उपयोग करने में सक्षम 5 वर्ष या उससे अधिक आयु के पुरुषों (ग्रामीण+शहरी) का अनुपात 20.0 प्रतिशत है, जबकि महिलाओं के लिए यह आंकड़ा 12.8 प्रतिशत है. इंटरनेट का उपयोग करने में 5 वर्ष और उससे अधिक आयु के 25.0 प्रतिशत पुरुष और 14.9 प्रतिशत महिलाएं सक्षम हैं. इसी तरह, पिछले 30 दिनों के दौरान इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले 5 साल और उससे अधिक उम्र के भारतीयों का अनुपात 2017-18 में 17.6 प्रतिशत ही है.

भारत में डिजिटल डिवाइड के अधिक विस्तृत विश्लेषण के लिए, 29 जनवरी, 2020 को im4change.org द्वारा जारी किए गए 'Digital divide' persists despite country's desire to become a digital giant नामक न्यूज अलर्ट को पढ़ सकते हैं.

References

NSS 75th Round Report: Key Indicators of Household Social Consumption on Education in India, July 2017 to June 2018, released on 23rd November 2019, please click here to access

Annual Report on Periodic Labour Force Survey (July 2017 - June 2018), produced by the National Statistical Office, released in May 2019, please click here and here to access

Social Inclusion of Internal Migrants in India (2013), by UNICEF, UNESCO and Sir Dorabji Tata Trust, please click here and here to access

Coronavirus disease (COVID-2019) situation reports, World Health Organisation (WHO), please click here to access

Coronavirus disease (COVID-19) news release, World Health Organisation (WHO), please click here to access

Coronavirus disease (COVID-19) outbreak, World Health Organization (WHO), please click here to access

Novel Coronavirus (COVID-19) Situation, World Health Organisation (WHO), Visualisation map, please click here to access

World Health Organisation Health Emergency Dashboard for Coronavirus (COVID-19), Visualisation map, https://extranet.who.int/publicemergency

Coronavirus Resource Center, John Hopkins University & Medicine, Visualisation map, please click here to access

Advisory on Social Distancing Measure in view of spread of COVID-19 disease, Ministry of Health & Family Welfare, please click here to access

'Digital divide' persists despite country's desire to become a digital giant, News alert by Inclusive Media for Change dated 29 January, 2020, please click here to access

No change in MGNREGA wage rates observed between 2018-19 and 2019-20 for 4 states & 2 UTs, News alert by Inclusive Media for Change dated 16 April, 2019, please click here to access

Deflation in WPI of 8 kharif crops observed during 2016-17 to 2018-19, while their MSPs grew at a positive rate, News alert by Inclusive Media for Change dated 31 December, 2018, please click here to access

Runaway symptomatic Covid-19 patients pose serious threat -Manjeet Sehgal, India Today 17 March, 2020, please click here to access

India-Corona is already here, in the asymptomatic youth -Dr Vikram Jindal, Medium.com, 16 March, 2020, please click here to access

Super Exclusive: Tomas Pueyo, The Man Behind BIG Coronavirus Warning; His Caution Stunned The World, India Today, 16 March, 2020, please click here to access

Coronavirus: Why You Must Act Now -Tomas Pueyo, 10 March, 2020, please click here to access

Are our labour markets less segmented now? -CP Chandrasekhar and Jayati Ghosh, The Hindu Business Line, 3 February, 2014, please click here to access

 

Image Courtesy: UNDP India



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