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चर्चा में.... | किसान-आत्महत्या : सबसे ज्यादा परेशान सीमांत और छोटे किसान !
किसान-आत्महत्या : सबसे ज्यादा परेशान सीमांत और छोटे किसान !

किसान-आत्महत्या : सबसे ज्यादा परेशान सीमांत और छोटे किसान !

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published Published on Jan 28, 2017   modified Modified on Jan 28, 2017
मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की ! देश में खेती-किसानी का हाल कुछ ऐसा ही है. किसान-आत्महत्या के नये आंकड़े संकेत करते हैं कि बीते 2 सालों में देश में कृषि-संकट और ज्यादा गहरा हुआ है.

 

खेतिहर मजदूर से ज्यादा किसानों की आत्महत्या

एनसीआरबी की नई रिपोर्ट के मुताबिक एक साल के भीतर(2014 से 2015) किसान-आत्महत्या की संख्या में 41.7 फीसद का इजाफा हुआ है जबकि आत्महत्या करने वाले खेतिहर मजदूरों की संख्या में तकरीबन एक चौथाई(31.5%) की कमी आई है.

 

आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या साल 2015 में 8,007 रही जो कि इस साल आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की संख्या का 5.99 फीसद है.


साल 2015 में कुल 4595 खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की जो 2015 में आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की संख्या का 3.44 फीसद है.


अगर किसान और खेतिहर मजदूरों की संख्या को आपस में जोड़ें तो कहा जा सकता है कि 2015 में खेतिहर काम में लगे कुल 12,602 लोगों ने आत्महत्या की जो आत्महत्या करने वाले कुल लोगों(2015) की संख्या का 9.43 फीसद है.


इस घट-बढ़ के बावजूद रिपोर्ट के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि 2014 से 2015 के बीच खेती-किसानी से जुड़े लोगों(किसान और खेतिहर मजदूर) की आत्महत्या में 2 फीसद की बढ़त हुई है.


गौरतलब है कि 2014 में कुल 5650 किसानों के आत्महत्या के मामले प्रकाश में आये थे जबकि 2015 में यह तादाद बढ़कर 8007 हो गई है. 2014 में कुल 6710 खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की, 2015 में यह संख्या कुछ घटकर 4595 हुई है. दूसरे शब्दों में, दो सालों के दौरान खेती-किसानी से जुड़े लोगों के आत्महत्या के मामले 12,360 से बढ़कर 12,602 हो गये हैं.


सबसे ज्यादा चोट सीमांत किसानों पर

एनसीआरबी के नये आंकड़ों से झांकता है कि सीमांत और छोटी जोत के किसानों की हालत सबसे ज्यादा नाजुक है.


2015 में जिन 8007 किसानों के आत्महत्या के मामले प्रकाश में आये उनमें 27.41 फीसद सीमांत किसान थे जबकि ऐसे 45.41 फीसद किसान छोटे किसान की श्रेणी में आते हैं. यानी 2015 में आत्महत्या करने वाले कुल किसानों में 72.79 फीसद(कुल 5813) सीमांत और छोटी जोत के किसान थे.


2015 में आत्महत्या करने वाले किसानों में 160 किसान(लगभग 2%) बड़ी जोत के मालिक थे. इस साल मंझोले दर्ज के आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या कुल किसान-आत्महत्याओं का 25.4 फीसद है. मंझोले दर्जे के 20132 किसानों के आत्महत्या के मामले 2015 में प्रकाश में आये हैं.


गौरतलब है कि कृषि-गणना(एग्रीकल्चरल सेन्सस्) में 1 हैक्टेयर से कम जोत वाले किसानों को सीमांत-किसान कहा गया है. कृषि-गणना में 1 हैक्टेयर से ज्यादा लेकिन 2 हैक्टेयर से कम जोत वाले किसानों को छोटे किसान के दर्जे में रखा गया है. 2 हैक्टेयर से ज्यादा लेकिन 10 हैक्टेयर से कम बड़ी जोत के मालिक किसानों को मंझोले दर्ज का किसान करार दिया गया है और 10 हैक्टेयर या इससे ज्यादा बड़ी जोत के मालिक किसानों को बड़ा किसान कहा गया है.


(एनसीआरबी की रिपोर्ट में स्यूसाइडस् इन फार्मिंग सेक्टर' नाम के अध्याय को पढ़ने के लिए कृपया यहां क्लिक करें)

 

कर्जदारी है बड़ी वजह

एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक किसान-आत्महत्याओं के सबसे ज्यादा(38.7%) मामलों में कर्जदारी प्रमुख वजह रही. 2015 में कुल 3097 किसान कर्ज के भार से आत्महत्या करने को मजबूर हुए.


इनमें से 3097 किसानों ने बैंक या फिर पंजीकृत माइक्रो फाइनेंन्शियल संस्थाओं से कर्जा लिया था जबकि ऐसे 302 किसान सूदखोर महाजनों के कर्जदार थे और ऐसे 321 किसानों पर वित्तीय संस्थानों जैसे बैंक और माइक्रो फायनेन्शियल इंस्टीट्यूशन के साथ-साथ महाजनों का भी कर्जा था.


आम मान्यता है कि सूदखोर महाजन किसानों का कहीं ज्यादा शोषण करते हैं लेकिन एनसीआरबी के ये आंकड़े इस मान्यता को झूठलाते हैं.

 

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की नई रिपोर्ट एक्सीडेन्टल डेथ्स् एंड स्यूसाइड इन इंडिया(2015) के कुछ प्रमुख तथ्य निम्नलिखित हैं—

 

• साल 2015 में भारत में कुल 1,33,623 लोगों ने आत्महत्या की.

 

•  आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या साल 2015 में 8,007 रही जो कि इस साल आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की संख्या का 5.99 फीसद है. साल 2015 में कुल 4595 खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की जो 2015 में आत्महत्या करने वाले कुल लोगों की संख्या का 3.44 फीसद है. अगर किसान और खेतिहर मजदूरों की संख्या को आपस में जोड़ें तो कहा जा सकता है कि 2015 में खेतिहर काम में लगे कुल 12,602 लोगों ने आत्महत्या की जो आत्महत्या करने वाले कुल लोगों(2015) की संख्या का 9.43 फीसद है.

 

• साल 2015 में आत्महत्या करने वाले किसानों में पुरुषों की संख्या 7,566 थी जबकि आत्महत्या करने वाली महिला-किसानों की संख्या 441 रही यानी आत्महत्या करने वाले किसानों में पुरुषों की संख्या प्रतिशत पैमाने पर 94.49 फीसद और महिलाओं की संख्या 5.51 फीसद है.

 

•  आत्महत्या करने वाले किसानों में 27.41 फीसद सीमांत किसान थे जबकि ऐसे 45.41 फीसद किसान छोटे किसान की श्रेणी में आते हैं यानी 2015 में आत्महत्या करने वाले कुल 8007 किसानों में 72.79 फीसद(कुल 5813) सीमांत और छोटी जोत के किसान थे.

 

•  किसान-आत्महत्या की सबसे ज्यादा घटनाएं महाराष्ट्र से प्रकाश में आयीं. महाराष्ट्र में 2015 में कुल 3030 किसानों ने आत्महत्या की. इसके बाद तेलंगाना का स्थान है जहां आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 1,358 रही. कर्नाटक में 1197 किसानों ने 2015 में आत्महत्या की. प्रतिशत पैमाने पर देखें तो कुल किसान-आत्महत्या में महाराष्ट्र की किसान-आत्महत्या की संख्या 37.8 फीसद रही, तेलंगाना की 17.0 फीसद और कर्नाटक की 14.9 प्रतिशत. छत्तीसगढ़ (854 किसान-आत्महत्या), मध्यप्रदेश (581 किसान-आत्महत्या) तथा आंध्रप्रदेश (516 आत्महत्या) में कुल किसान-आत्महत्या का क्रमशःr 10.7 फीसद, 7.3 फीसद और 6.4 फीसद केंद्रित रहा. 2015 में इन छह राज्यों से कुल किसान-आत्महत्याओं का 94.1 फीसद हिस्सा(8,007 में 7,536) केंद्रित रहा. 

 

' कर्जदारी' और 'खेती-बाड़ी से जुड़ी परेशानियां' किसान-आत्महत्याओं की सबसे बड़ी वजह रही. 2015 में कुल 8,007 में 3,097 यानी 38.7 फीसद मामलों में किसान-आत्महत्या की वजह कर्जदारी या खेती-बाड़ी से जुड़ी परेशानियां साबित हुईं. 2015. किसान-आत्महत्या की अन्य बड़ी वजहों में शामिल हैं 'पारिवारिक समस्याएं' (933 किसान-आत्महत्या), ' बीमारी' (842 किसान-आत्महत्या) और ' नशाखोरी' (330 किसान-आत्महत्या), क्रमश 11.7 फीसद, 10.5 फीसद तथा 4.1 फीसद किसान-आत्महत्याओं की वजह साबित हुए.

 

• साल 2015 में पुरुष किसानों की आत्महत्या की सबसे बड़ी वजह रही कर्जदारी. कर्जदारी के कारण 2978 पुरुष किसानों ने आत्महत्या की. पुरुष किसानों की आत्महत्या की दूसरी बड़ी वजह रही खेती-बाड़ी से जुड़े मामले. खेती-बाड़ी से जुड़ी परेशानियों के कारण 1494 किसानों ने आत्महत्या की.

 

•  महिला किसानों के मामले में कर्जदारी और पारिवारिक समस्याएं आत्महत्या की प्रमुख वजह रही. 2015 में महिला किसान-आत्महत्या के कुल 441 मामले प्रकाश में आये. इसमें 119 मामलों में आत्महत्या की वजह कर्जदारी रही जो कि 27 फीसद है. महिला किसान-आत्महत्या के 80 मामलों में प्रमुख वजह पारिवारिक समस्याएं रहीं जो 18.1 फीसद है.

 

•  2015 में खेतिहर मजदूरों के आत्महत्या के मामलों में सबसे बड़ी वजह' पारिवारिक समस्या ' और बीमारी ' साबित हुई. खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या के कुल 4595 मामलों में 1843 यानी 40.1 फीसद मामलों में कारण पारिवारिक समस्याएं साबित हुई जबकि आत्महत्या के 872 यानी 19.0 फीसद मामलों में बड़ी वजह बीमारी साबित हुई.

 

•  कर्नाटक में किसान-आत्महत्या की 79.0 फीसद घटनाओं में मुख्य वजह कर्जदारी रही. महाराष्ट्र में 26.2 फीसद किसान-आत्महत्याओं की वजह खेती-बाड़ी से जुड़ी समस्याएं साबित हुईं. इन समस्याओं का मुख्य अर्थ है- किसी कारण से फसल का मारा जाना..

 

•  किसान-आत्महत्याओं के 71.6 घटनाओं में मृतक की उम्र 30 से 60 साल के बीच थी.

 

• आत्महत्या करने वाले 9 फीसद किसान 60 साल या इससे ज्यादा उम्र के थे.

 

• बिहार, गोवा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, मिजोरम, नगालैंड, उत्तराखंड तथा पश्चिम बंगाल से किसान-आत्महत्या की कोई घटना प्रकाश में नहीं आई. देश के 7 केंद्रशासित प्रदेशों में भी 2015 में किसान-आत्महत्या की कोई घटना प्रकाश में नहीं आई.

 

• गोवा, मणिपुर, नगालैंड तथा पश्चिम बंगाल से 2015 में किसी भी खेतिहर मजदूर की आत्महत्या की घटना प्रकाश में नहीं आई. केंद्रशासित प्रदेशों में पुद्दुचेरी से 12 खेतिहर मजदूरों के आत्महत्या की घटनाएं दर्ज हुईं जबकि शेष केंद्रशासित प्रदेशों से ऐसी कोई घटना प्रकाश में नहीं आई.

 

  स्यूसाइड इन फार्मिंग सेक्टर शीर्षक से अध्याय 2ए में किसानों और खेतिहर मजदूरों की आत्महत्या के व्यापक आंकड़े दर्ज हैं. आंकड़ों को कृषि-मंत्रालय तथा गृहमंत्रालय की देखरेख में तैयार और प्रस्तुत किया गया है. नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो के 2013 तक के एडीएसआई रिपोर्ट में सिर्फ किसान-आत्महत्याओं का जिक्र रहता था. 



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