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न्यूज क्लिपिंग्स् | झारखंड में आज भी सपना है बेहतर इलाज

झारखंड में आज भी सपना है बेहतर इलाज

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published Published on Sep 19, 2012   modified Modified on Sep 19, 2012
रांची से 32 किमी दूर रांची-पुरुलिया रोड से एक किमी बायें हटकर पहाड़ी की तलहटी में बसा चमघटी पाहनटोली गांव अपनी खूबसूरत भौगोलिक स्थिति व भरपूर हरियाली के कारण लोगों का मन मोह लेता है.

पर इस गांव के लोगों की बदहाल जिंदगी व उनका दुख दिल को झकझोर देता है. 31 अगस्त को रांची के अनगड़ा प्रखंड के इस गांव की बीमार आदिवासी महिला लीलावती देवी की मिरगी या फिर ऐसी ही किसी अनजान बीमारी के कारण मौत हो गयी. दिहाड़ी मजदूर लीलावती देवी ही अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी का जुगाड़ करती थी. उसके पति बुतरू महली मेहनत-मजदूरी कर पाने में सक्षम नहीं हैं.

दरअसल साल भर पहले तक बुतरू रांची आकर रिक्शा चलाते थे और कुछ पैसे कमा लेते थ़े पर मिरगी का दौरा आने व उसके बाद आग में बुरी तरह जल जाने के बाद वह रिक्शा चलाने में सक्षम नहीं रहे. आग में बुरी तरह झुलसने के कारण बुतरू का आधा मुंह नहीं खुलता., चेहरे के 75 प्रतिशत हिस्से पर जले के निशान हैं और हाथों में जख्म़ बुतरू एक घंटे की दूरी पर स्थित रिम्स जैसे राज्य के बड़े चिकित्सा संस्थान में भी अपना इलाज नहीं करा सके आसपास से ही हल्की-फुल्की दवा ली.

अब डॉक्टर नस के खींच जाने के कारण इलाज में असमर्थता जताते हैं. बुतरू की वृद्घ मां भुखनी देवी अपनी स्थानीय भाषा में बहू की कहानी कहती हैं : मंगल दिन बुखार आया, बुध दिन जोन्हा डॉक्टर के यहां ले गय़े सूई व दवा दी. उसके बाद छुट्टी दे दी. झाड़-फूंक किया. देहात वाली दवा नहीं बन सकी और अंत में उसकी मौत हो गयी. भुखनी बताती हैं कि उनके बड़े बेटे शामू की मौत भी इसी तरह की किसी बीमारी से हो गयी थी.

लीलावती के छह बच्चों में सबसे छोटी पांच साल की बेटी अनीता आश्चर्य व सवालिया भाव से आने वालों का चेहरा ताकती है. उसे पढ़ाई से ज्यादा पेट भरने आंगनबाड़ी केंद्र भेजा जाता है. 15 साल का बेटा छोटे लाल न पढ़ता है और न ही कोई काम करता है. उसका भाव विहीन चेहरा देख ऐसा लगता है कि गरीबी, परेशानी ने उसकी संवेदना को भोथरा कर दिया है.

इस परिवार के पास एक झोपड़ीनुमा इंदिरा आवास है. बुतरू को न तो विकलांगता पेंशन का लाभ मिल रहा है और न ही उनकी मां का नाम वृद्धावस्था पेंशन की सूची में है. बीपीएल परिवार के व्यक्ति की आकस्मिक मौत पर तत्काल मिलने वाली सहायता राशि से भी यह परिवार घटना के 13 दिन बाद तक वंचित है.

यह अपनी तरह का इकलौता मामला नहीं है, जब सामान्य बीमारी से लोग असामान्य तरीके से मौत के आगोश में समा जाते हैं. राज्य में गंभीर बीमारियों की बजाय सामान्य व मामूली बीमारियों से लोगों की अधिक मौतें होती हैं. टीबी, मलेरिया, ब्रेन मलेरिया, डायरिया, दूषित जल जनित बीमारियां व कुपोषण लोगों की मौत के कारण बनते हैं. संताल परगना क्षेत्र में टीवी, ब्रेन मलेरिया, कालाजार, फलेरिया, डायरिया सामान्य बीमारियां हैं. उस क्षेत्र में टीबी का प्रकोप कुछ इस कदर है कि पहाड़िया आदिम जनजाति का एक औसत आदमी 35-40 साल की उम्र में 55-60 साल की उम्र का दिखता है. कोयलांचल-उत्तरी छोटानागपुर में मलेरिया का प्रकोप गंभीर है. कोल्हान क्षेत्र में भी मलेरिया व ब्रेन मलेरिया का प्रकोप है. इस कारण यहां जानें भी जाती हैं. पलामू व दक्षिणी छोटानागपुर में मलेरिया व टीबी का प्रकोप है. बारिश के महीने में पूरे राज्य में डायरिया होना व उससे जान जाना साधारण-सी बात हो गयी है.

योजना आयोग के सदस्य के श्रीनाथ रेड्डी ने हाल में एक लेख में चिंता व्यक्त करते हुए लिखा : सरकारी अस्पतालों में दाखिल मरीजों की दवा आपूर्ति में गिरावट आयी है. साल 1987 में यह 31 प्रतिशत थी और 2004 में गिर कर नौ प्रतिशत हो गयी. बाहरी मरीजों (जो भर्ती नहीं होते हैं) के लिए इसी अवधि में यह आपूर्ति 18 प्रतिशत से गिर कर पांच प्रतिशत हो गयी. उनका आकलन है कि मरीजों की जेब से 72 प्रतिशत खर्च दवाओं पर होता है और महंगी स्वास्थ्य सेवा के कारण लोग बीपीएल श्रेणी में चले जाते हैं.

दरअसल टीबी, मलेरिया, ब्रेन मलेरिया, डायरिया व प्रसव के दौरान होने वाली मौतों से निबटना ज्यादा आसान है. इसके लिए सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने के साथ ही गांव में स्वच्छता व प्राथमिक स्वस्थ्य केंद्रों को मजबूत करने की जरूरत है. पंचायती राज निकायों की स्वास्थ्य सेवाओं में सक्रिय भागीदारी व दवाओं के नियामक, नियंत्रण व वितरण तंत्र को मजबूत कर इससे निबटा जा सकता है. राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) के सामुदायिक स्वास्थ्य विंग की समन्वयक अकय मिंज कहती हैं : गांव में बीमारियों से निबटने के लिए ग्राम स्वास्थ्य स्वच्छता एवं पोषण समिति गठित की गयी है.

इसके माध्यम से समुदाय को बीमारियों को लेकर जागरूक करने व सरकार की ओर से उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ उठाने के लिए प्रेरित किया जाता है. कागजी तौर पर राज्य में 30012 ग्राम स्वास्थ्य समितियां गठित हैं और लोग उसके फायदे उठा रहे हैं. लेकिन जमीनी हकीकत जुदा है. अनगड़ा प्रखंड के ही राजाडेरा पंचायत में अबतक पंचायत की स्वास्थ्य समिति नहीं गठित की गयी है. लीलावती देवी को ग्राम स्वास्थ्य समिति का कोई लाभ नहीं मिला. पंचायत स्तर पर स्वास्थ्य एवं महिला एवं शिशु से संबंधित दो अलग-अलग समितियां बननी चाहिए. पर जिन पंचायतों में इस तरह की समितियां बनी भी हैं, वहां भी ये ठीक से काम नहीं कर रही हैं.

-झारखंड में जन्म लेने वाले हर 15 में से एक बच्चा एक साल के भीतर अकाल कलवित हो जाता है
-11 में से एक बच्चा पांचवें साल की देहरी पार नहीं कर पाता.
-हर एक लाख में से 278 औरतें बच्चों को जन्म देने के दौरान जान से हाथ धो बैठती हैं.
-इसके बावजूद 17 फीसदी औरतें ही अस्पताल में प्रसव कराती हैं, शेष औरतें घरों में अप्रशिक्षित दाइयों के भरोसे बच्चों को जन्म देती हैं.
-राज्य की 70 फीसदी महिलाएं और उतने ही बच्चे रक्त अल्पता के शिकार हो जाते हैं.
।।राहुल सिंह।।


http://prabhatkhabar.com/node/208470?page=show


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