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न्यूज क्लिपिंग्स् | कोविड-19: लॉकडाउन ने बिगाड़ी ग्रामीण भारत की दशा

कोविड-19: लॉकडाउन ने बिगाड़ी ग्रामीण भारत की दशा

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published Published on May 14, 2020   modified Modified on May 14, 2020

-डाउन टू अर्थ,

एक महीना पहले तक धनीराम साहू को नहीं पता था कि वायरस या सोशल डिस्टेंसिंग किस बला का नाम है। साहू छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले के शंकरदह में रहते हैं। वह कहते हैं, “अब हर कोई कोरोनावायरस और इससे खुद को महफूज रखने की बात करता दिख रहा है।” दुनियाभर के तमाम विज्ञानियों और एपिडेमियोलॉजिस्ट की तरह साहू को भी इस वायरस के बारे में बहुत जानकारी नहीं है। लेकिन, 24 मार्च को उनका सामना इस वायरस के क्रूर चरित्र से हुआ। उस दिन अहले सुबह धमतरी शहर के घड़ी चौक पर वह 1,500 दिहाड़ी मजदूरों के साथ काम के इंतजार में बैठे थे। राइस मिलर, दुकानदारों, बिल्डरों या धनाढ्य घरों के लोग काम करवाने के लिए यहां से मजदूरों को दिहाड़ी पर ले जाते हैं। काम देने वाले तो आए नहीं, लेकिन कुछ पुलिस कर्मचारी आ धमके। पुलिस कर्मचारियों ने मजदूरों से दो टूक लहजे में कह दिया कि सभी अपने घरों में लौट जाएं और तीन हफ्ते तक अपने गांवों से बाहर कदम न रखें। धनीराम उस दिन को याद करते हुए कहते हैं, “पुलिसवाले ने हमसे कहा कि कोरोनावायरस से निबटने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर लॉकडाउन की घोषणा की है।

पुलिस की बात सुनकर हममें से ज्यादातर लोग हक्के-बक्के रह गए। हमें समझ ही नहीं आया कि इस पर क्या प्रतिक्रिया दें।” साहू पांच सदस्यों वाले अपने परिवार में इकलौते कमाने वाले शख्स हैं। मजदूरी कर वह रोजाना 150 से 200 रुपए कमा लेते हैं, जिससे दो दिनों तक परिवार के खाने लायक चावल, दाल और सब्जियां आ जाती हैं। 24 मार्च के पुलिसिया फरमान के एक हफ्ते बाद उन्हें फ्री में अगले दो महीने का राशन मिल गया। साहू ने बताया, “राशन में 70 किलो चावल, 2 किलो चीनी और 4 पैकेट नमक के थे।” लेकिन, उनकी चिंता इससे खत्म नहीं हुई। वह सोचने लगे कि बच्चों के लिए अब दाल और सब्जियों का इंतजाम कैसे होगा।

खदादह जैसे गांवों में गोंड जनजाति की हालत भी कमोवेश साहू जैसी ही है। महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार अधिनियम के तहत 100 दिनों के रोजगार (मनरेगा) व वन्य उत्पाद मसलन महुआ, इमली और लाख की बिक्री कर गोंड जनजाति अपनी आजीविका चलाती है। धमतरी, एशिया का सबसे बड़ा लाख उत्पादक क्षेत्र है। लेकिन लॉकडाउन के चलते मनरेगा का काम ठप है। दूसरी तरफ, प्रसंस्करण सेंटर और मार्केट भी बंद है। लुप्तप्राय कमरी जनजाति से आने वाली समरी बाई कहती हैं, “महुआ के फूल पूरी तरह तैयार हो चुके हैं। मैंने कई टोकरी महुआ तोड़ कर रखा है, लेकिन बिचौलिया आ नहीं रहा है और साप्ताहिक हाट भी बंद है। महुए की बिक्री नहीं हो रही है जिस कारण मैं सब्जी या तेल खरीद नहीं पा रही हूं।” वन्य उत्पादों के स्थानीय व्यापारी दिलावर रुकारिया विस्तार से समझाते हुए कहते हैं, “साप्ताहिक हाट जनजातीय अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा है।” चूंकि अब वे सामान बेच नहीं पा रहे हैं, तो वन्य उत्पादों के लिए जंगल में जाना भी बंद कर देंगे। इससे वन्य उत्पाद जंगल में खराब हो जाएंगे और जनजातियों की आजीविका पर संकट आ जाएगा।

महाराष्ट्र के नासिक जिले में अंगूर उगाने वाले इस किसान को जब खरीदार नहीं मिले तो अंगूर की फसल को धूप में सुखा िदया ताकि कुछ आमदनी हो सके (विशेष प्रबंध)

कोरोनावायरस महामारी ने भारत में ऐसे समय (फरवरी से अप्रैल) में दस्तक दी है जब कृषि व वन्य उत्पादों की बिक्री होती है और किसानों के हाथ में पैसा आता है। हाथ में दो पैसा हो, तो ग्रामीण परिवारों में एक अलग तरह का आत्मविश्वास दिखता है। उत्तर प्रदेश के महोबा जिले के पुपवारा गांव में रहने वाले बिंद्रावन समेत अधिकांश किसानों का यह आत्मविश्वास डिगता दिख रहा है। बिंद्रावन बताते हैं कि इस साल जैसी फसल पिछले 10 साल से नहीं हुई। उम्मीद थी कि फसल बेचकर कर्ज चुका देंगे लेकिन जब बाजार में आढ़ती के पास पहुंचे तो फसल में तमाम कमियां निकाल दीं और कम दाम पर फसल लेने को तैयार हुआ। इतना ही नहीं आढ़ती फसल का मूल्य भी तत्काल नहीं दे रहे हैं। उनका कहना है कि दो से तीन महीने में फसल के पैसे मिलेंगे। यह सब देख बिंद्रावन खरेला स्थित मंडी मंे बेचने के बजाय फसल को घर ले आए।

अब उन्हें लॉकडाउन के बाद हालात सुधरने का इंतजार है। वह बताते हैं कि अगर फसल समय पर नहीं बिकी को खरीफ की फसल प्रभावित हो सकती है। उनका कहना है कि 26 अप्रैल को उनके बड़े बेटे की शादी तय हुई थी। शादी की तैयारियों में काफी पैसा खर्च हो गया। लॉकडाउन के कारण शादी कैंसल होने से उन्हें काफी नुकसान पहुंचा है। अगर फसल समय पर नहीं बिकी और उसके ठीक दाम नहीं मिले तो भारी नुकसान होने की आशंका है। हालांकि सरकार ने किसानों, कृषि संबंधी गतिविधियों और खाद्य आपूर्ति को लॉकडाउन से राहत दी है, लेकिन कोरोनावायरस से लड़ाई में सबसे ज्यादा “कोलेटरल डैमेज” देश की कृषि अर्थव्यवस्था को होता दिख रहा है। इसकी मुख्य वजहें कोरोनावायरस के संक्रमण को लेकर तेजी से फैलती अफवाह और आजादी के बाद कामगारों का शहर से अपने गांवों की ओर सबसे बड़ा पलायन हैं।

रबी फसल पर असर

गेहूं और दाल रबी सीजन की सबसे अहम फसलें हैं। मध्य प्रदेश के सेमोर जिले के बिलकिसगंज के किसान प्रवीण परमार ने कहा कि इस बार खेती के सीजन में भगवान मेहरबान रहे। लेकिन, सरकार की लचर तैयारी के कारण प्रवीण अभी परेशान हैं। मध्य प्रदेश के इस क्षेत्र में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि के बावजूद पैदावार अच्छी हुई है। प्रवीण के 8 हेक्टेयर खेत में 50,000 किलो गेहूं की पैदावार हुई है। 15 से 17 मार्च के बीच नकदी की सख्त जरूरत थी, तो उन्होंने नजदीकी मंडी में 1,750 रुपए प्रति क्विंटल की दर से 20,000 किलो गेहूं बेच दिया। हालांकि, सरकार ने गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 1,952 रुपए प्रति क्विंटल तय किया है। लेकिन, तब तक सरकार ने गेहूं की अधिप्राप्ति शुरू नहीं की थी। परमार कहते हैं, “सरकार को खाद्य पदार्थों की अधिप्राप्ति करने के बाद लॉकडाउन की घोषणा करनी चाहिए थी।” परमार ने बताया कि उनके गांव के किसानों को अनाज स्टोर कर रखने में कठिनाई हो रही है, क्योंकि उनके पास वैसी व्यवस्था नहीं है। वह उदास होकर कहते हैं, “अगर अनाज खराब हो गया, तो हमें भारी नुकसान होगा।” कुछ ऐसी ही स्थिति से बुंदेलखंड के किसान भी जूझ रहे हैं। बांदा जिले के बसहरी गांव में रहने वाले घनश्याम श्रीवास बताते हैं, “कई साल से सूखे की मार झेल रहे बुंदेलखंड में कुदरत की मेहरबानी से 20 साल बाद चने की बंपर पैदावार हुई है। एक बीघा में औसतन तीन क्विंटल चना निकला है, लेकिन उपज मंडी तक पहुंचाने में दिक्कत आ रही है। किसान लंबे समय तक उपज को घर में रखने की स्थिति में नहीं हैं।”

सप्लाई चेन बेपटरी

किसानों की चिंताओं को समझते हुए पश्चिम बंगाल सरकार ने 7 अप्रैल को फूलों की खेती करने वाले किसानों को लॉकडाउन से मुक्त कर दिया। लेकिन, इस निर्णय से पूर्व मिदनापुर के महतपुर गांव के किसान गणेश माइती को बहुत खुशी नहीं हुई। उनका कहना है कि जो नुकसान होना था, वह हो चुका। असल में नवरात्र व अन्य पर्व के चलते मार्च से अप्रैल के बीच फूलों खासकर सूरजमुखी की मांग बाजार में ज्यादा रहती है। फूलों की मांग का गणित समझाते हुए 30 वर्षीय माइती कहते हैं, “चूंकि मार्च से अप्रैल तक मौसम बेहद खुशनुमा होता है, तो लोग वैवाहिक कार्यक्रम व अन्य सामाजिक जुटान का आयोजन इसी समय करते हैं। मगर, इस बार इस सीजन में फूलों की मांग नहीं के बराबर रही। अगर फूलों को सही वक्त पर न तोड़ा जाए, तो इससे पौधों की उत्पादन क्षमता को नुकसान हो सकता है। इसलिए हमने टनों फूल तोड़कर मवेशियों को खिला दिया।” माइती को अनुमान है कि उन्हें दो हफ्ते में 15,000 रुपए का नुकसान हो चुका है।

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.


Kundan Pandey, Vivek Mishra, Bhagirath Srivas, Ajit Panda, Purushottam Thakur, https://www.downtoearth.org.in/hindistory/economy/rural-economy/Covid-19-the-condition-of-the-villages-spoiled-by-the-lockdown-71100


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