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न्यूज क्लिपिंग्स् | क्या भारत के कोविड डेटा पर विश्वास किया जा सकता है? देखिए यह आंकड़े

क्या भारत के कोविड डेटा पर विश्वास किया जा सकता है? देखिए यह आंकड़े

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published Published on Jul 21, 2021   modified Modified on Jul 20, 2021

-न्यूजलॉन्ड्री,

इस लेख में, हम हर दिन हर घंटे पैदा हो रहे कोविड से जुड़े डेटा को समझने का प्रयास करेंगे. लेकिन विस्तार में जाने से पहले आइए समझने की कोशिश करें कि इस लेख का उद्देश्य क्या है?

लक्ष्य

कोविड-19 महामारी की दूसरी लहर लगता है कि बीत गई है. पिछले कुछ हफ्तों से, कोविड के रोजाना नए मामलों और प्रतिदिन होने वाली मौतों में कमी आ रही है. लेकिन दूसरी लहर का सामना करने के लिए सरकार के सभी स्तरों की अक्षमता किसी से छुपी नहीं है जबकि एक बड़ी संख्या में जान गंवाने वालों को बचाया जा सकता था.

प्रारंभ में दिए हमारे कारणों की वजह से सही डेटा को एकत्र करने में काफी मुश्किलें हैं. इसके बावजूद, सुधार के पहलुओं को पहचानने और भविष्य में आने वाली लहरों के लिए तैयार होने हेतु महामारी के प्रकोप और इसके जवाब में सरकार की प्रतिक्रिया का डेटा पर आधारित विस्तृत विश्लेषण ज़रूरी है.

यह लेख, बड़ी मात्रा में एकत्र होने वाले कोविड से संबंधित डेटा को समझने का एक प्रयास है. हम यहां पर दो मूलभूत आंकड़ों पर ध्यान देंगे: कोविड टेस्टिंग और संक्रमण पॉजिटिविटी की दर, और इन दोनों के बीच का संबंध.

कोविड का टेस्ट दो प्रकार से होता है, और दोनों ही को नाक के रास्ते से सैंपल लेकर किया जाता है: एक आरटीपीसीआर टेस्ट और दूसरा एंटीजन टेस्ट. इन दोनों में से आरटीपीसीआर टेस्ट कहीं ज्यादा विश्वसनीय है, लेकिन कोविड संक्रमण को पहचानने के लिए दोनों ही प्रकार के टेस्ट किए जा रहे हैं. रिपोर्ट किए जाने वाले डेटा में दोनों ही प्रकार के टेस्ट के परिणाम शामिल होते हैं. पॉजिटिविटी की दर, टेस्ट किए गए लोगों की कुल संख्या में से पॉजिटिव पाए गए लोगों का अनुपात है.

किसी राज्य में बड़ी संख्या में कोविड‌ के मरीज न होते हुए भी, किए गए टेस्टों की कुल संख्या एक महत्वपूर्ण आंकड़ा है. इससे संक्रमण में बढ़ोतरी को ढूंढ पाने की क्षमता का पता चलता है और संक्रमण बढ़ने की परिस्थिति में शुरुआत में आवश्यक कदम उठाने का थोड़ा समय मिल जाता है. जब टेस्टिंग की दर ज्यादा होती है तो स्वाभाविक रूप से अधिक लोगों का टेस्ट होता है. इससे कम संख्या में टेस्ट करने के विपरीत, संक्रमण बढ़ने की परिस्थिति में उसका जल्दी पता चलने के अवसर बढ़ जाते हैं. अर्थात किसी राज्य की टेस्टिंग दर को उस राज्य के सतर्क रहने के एक मापदंड के रूप में देखा जा सकता है, या फिर कोविड के फैलने पर उसे जल्दी पकड़ पाने की क्षमता की तैयारी के रूप में देखा जा सकता है.

हालांकि हर परिस्थिति में टेस्टिंग बढ़ाना एक अच्छा कदम है, बढ़ते हुए कोविड-19 के मामलों को देखते हुए यह कहीं ज्यादा आवश्यक हो जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि ज्यादा बढ़ी हुई पॉजिटिविटी की दर यह दर्शाती है कि संभवत: केवल उन्हीं लोगों का टेस्ट हो रहा है जिनमें संक्रमण के काफी ज्यादा लक्षण दिखाई दे रहे हैं. जिसके परिणामस्वरूप, काफी लोग जो संक्रमित तो हैं लेकिन उनको बहुत कम या फिर कोई लक्षण नहीं दिख रहा है, उनका टेस्ट नहीं हो पा रहा है. यह अज्ञात संक्रमण वायरस को तेजी से फैला सकता है क्योंकि संक्रमित लोग खुद को अकेले रखकर सभी से दूरी नहीं बनाते क्योंकि वे जानते ही नहीं कि वे संक्रमित हैं और वायरस के वाहक हैं.

अतः जैसा कि हमने भारत में दूसरी लहर के चरम को देखा, एक राज्य जिस तरह से पॉजिटिविटी की दर तेजी से बढ़ने पर प्रतिक्रिया देता है उससे हम यह जान सकते हैं कि प्रतिक्रिया देने में वह कितना सजग था. एक आदर्श परिस्थिति में, पॉजिटिविटी की दर में बढ़ोतरी होने के कुछ ही दिन के भीतर टेस्टिंग की दर भी काफी मात्रा में बढ़नी चाहिए. इससे हम यह जानते हैं कि सरकार मौजूदा परिस्थिति को लेकर सजग है और उसके विषय में कुछ करने का प्रयास कर रही है.

राज्यों से 1 जनवरी 2021 से 10 जून 2021 तक इकट्ठा हुए डेटा का इस्तेमाल कर हमने टेस्टिंग के आंकड़ों और पॉजिटिविटी की दरों का विस्तृत विश्लेषण किया. हमने राज्यों के बीच इन दो मापदंडों में बड़े अंतर पाए, चाहे वह कुल संख्या हो या उनमें समय के साथ होने वाली बढ़ोतरी, जिसपर हम आगे विस्तार से विमर्श करेंगे.

एक रोचक तथ्य यह है कि ऐसा नहीं की सभी राज्य जो सतर्क थे वह जवाब देने में भी चपल रहे, और वे सभी राज्य जिन्होंने तेजी से बढ़ते हुए मामलों का प्रत्युत्तर सजगता से दिया, ऐसा भी नहीं की वे बहुत सजग थे. इसमें कोई शक नहीं कि इतने विस्तृत और भूल-भुलैया जैसे आंकड़ों के आधार पर इतने बड़े वक्तव्य देना खतरे से खाली नहीं. विश्लेषण कुछ राज्यों के डेटा पर प्रश्नचिन्ह भी खड़ा करता है क्योंकि उसमें और राष्ट्रीय औसत में बड़ा अंतर है जो संभावित छेड़खानी की तरफ इशारा करता है. कोविड डेटा के मामले में, गलतियों को उजागर करना चाहे वह जानबूझकर हुई या नहीं, शायद इस प्रकार की आदतों को कम कर सकता है.

डेटा में गड़बड़ी करने के विषय पर हाल ही में कई बड़ी रिपोर्ट प्रकाशित हुई हैं, जिनमें कई राज्यों से कोविड से मरने वालों की संख्या को बड़े रूप से छुपाया जा रहा है. पत्रकार रुकमणी एस व आईआईएम अहमदाबाद के चिन्मय तुम्बे के द्वारा की गई जांच पड़ताल, राज्यों के द्वारा कोविड मौतों की संख्या में बड़े स्तर पर छेड़खानी उजागर करती है. इससे प्रेरणा लेकर कई और मीडिया रिपोर्ट आई हैं, जिनमें और कई राज्यों के द्वारा इसी प्रकार से आंकड़ों में गड़बड़ी उजागर हुई है. इसपर हमने एक पूर्व लेख, "लेकिन आप मौतों को छुपाएं कैसे?" में चर्चा की थी.

एक प्रकार से हमारा यह विश्लेषण मीडिया के द्वारा दूसरे डेटा और अन्य सबूतों के आधार पर बढ़ी हुई मौतों की पुष्टि करता है.

क्योंकि आखिरकार हमारे पास केवल डेटा ही है, आइये शुरू करते हैं.

****

डेढ़ महीने से अधिक समय तक देश को पंगु बना देने वाली कोविड की दूसरी लहर अब कम होती जा रही है. पूरे देश में एक दिन में आने वाले नए मामलों की संख्या 6 मई 2021 को 4,14,280 के शिखर से घटकर 28 जून 2021 को 37,070 पर आ गई, जो कि Covid19india.org के अनुसार दो महीने से कम में 91 प्रतिशत की गिरावट है. दूसरी लहर की गंभीरता को समझने के लिए यह याद रखना आवश्यक है कि पहली लहर में एक दिन में अधिकतम मामलों की संख्या 17 सितंबर 2020 को 97,680 थी. पिछले कुछ हफ्तों के दौरान नए संक्रमणों की संख्या में आई तेज गिरावट उत्साहवर्धक है.

बहुत से लोगों के दिमाग में एक बड़ा सवाल है: क्या कोविड डेटा पर विश्वास किया जा सकता है? कोविड डेटा के प्रति कोई भी संशय और उसकी वजह से डेटा पर आधारित महामारी के विश्लेषण की उपयोगिता पर संशय, समझा जा सकता है. विभिन्न कारणों से, कोविड संक्रमण को लेकर डेटा एकत्रित करने की हमारी क्षमता में बड़ी कमियां हैं. उन्हें एक-एक करके सूचीबद्ध करते हैं.

पहला, जैसा कि अब तक हम सभी जान चुके हैं कि हर संक्रमित व्यक्ति रोग के लक्षण नहीं दिखाता. वे लोग जो संक्रमित होने के बाद कोविड के लक्षण दिखाते हैं उन्हें लक्षणयुक्त या लक्षण दिखाने वाले मरीज़ कहा जाता है, वहीं वे लोग जो संक्रमित होने के बावजूद रोग के कोई लक्षण नहीं दिखाते उन्हें लक्षणमुक्त मरीज़ कहा जाता है. संक्रमित होने के बावजूद लक्षण न होने की इस परिस्थिति की वजह से एक बड़ी संख्या में संक्रमण के मामले स्वत: ही पता नहीं चल पाते. वे लोग जो बीमार महसूस नहीं करते वे आमतौर पर अपना टेस्ट नहीं कराते और परिणामस्वरूप संक्रमितों की गिनती में नहीं आते.

हमारे लिए समझना बहुत आवश्यक है, क्योंकि बिना लक्षण वाले मरीज भी कोविड को फैलाते हैं. अनिर्बन महापात्रा कोविड-19: सेपरेटिंग फैक्ट फ्राॅम फिक्शन में लिखते हैं, "इस महामारी के दौरान यह स्पष्ट हो गया कि वे लोग जो संक्रमित तो थे लेकिन बीमार नहीं थे, बीमारी को चुपके से फैला रहे थे. कोविड के वायरस SARS-CoV-2 के फैलाव में एक बड़ा हिस्सा लक्षणमुक्त वाहकों का है, जो वायरस के कण हवा में संक्रमित होने के 3 से 12 दिनों के बीच कभी भी फैला सकते हैं."

दूसरा, कोविड की दूसरी लहर से आई बीमारी की बाढ़ हमारे स्वास्थ्य तंत्र, जिसमें टेस्ट करने की क्षमता भी शामिल थी को‌ उसकी क्षमता से कहीं ज्यादा सराबोर कर दिया. व्यवस्था जिनको सेवा नहीं दे सकती, उनको वह दर्ज नहीं करती. यह बात कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है जब कुछ राज्यों में नौकरशाही नियमों के कारण अस्पताल में भर्ती होना तक मुश्किल हो गया था.

उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश में अस्पताल में भर्ती होने के लिए, एक मरीज को मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी या सीएमओ से एक निर्देश पत्र लेना जरूरी था, "जो सरकार के द्वारा स्थापित किए गए संघटित कमांड और कंट्रोल सेंटर का नेतृत्व करता है." इस नियम की वजह से मरीजों को अस्पतालों से लौटा दिया गया. और अगर ऐसा कोई मरीज मर जाता है तो उसकी गिनती कोविड से हुई मौतों में नहीं गिनी जाएगी. जाहिर सी बात है, कि यह सब स्वास्थ्य व्यवस्था के ढांचे की उपलब्धता और मरीज के उस ढांचे तक पहुंचने की क्षमता से परे है.

तीसरा, जहां शहरी और उपनगरीय इलाकों में कोविड टेस्ट करने के ढांचे पर क्षमता से कहीं अधिक बोझ पड़ गया था, वहीं कई राज्यों के ग्रामीण क्षेत्रों में यह व्यवस्था या तो बिलकुल अपर्याप्त थी या थी ही नहीं. इसकी वजह से भारत के अंदरूनी इलाकों में वायरस का फैलाव सही तरीके से आंकड़ों में नहीं दिखाई देता है.

जैसा कि दिल्ली के एक एपिडेमियोलॉजिस्ट या महामारी विशेषज्ञ और लोक नीति व स्वास्थ्य तंत्र विशेषज्ञ डॉक्टर चंद्रकांत लहरिया ने इंडिया टुडे को जून में बताया, "ग्रामीण भारत से विश्वसनीय कोविड निगरानी और डेटा के अभाव में, हम महामारी के प्रकोप के फैलाव और गंभीरता को सही तरीके से नहीं आंक सकते. महामारी के फैलाव का राष्ट्रीय औसत नगरीय व्यवस्था में भले ही कम दिखाई दे रहा हो, लेकिन यह संभव है कि वायरस अभी भी ग्रामीण भारत में फैल रहा है."

चौथा, उन जगहों पर भी जहां टेस्ट करने की व्यवस्था उपलब्ध है लोग पॉजिटिव पाए जाने के बाद लगाई जाने वाली पाबंदियों के डर से टेस्ट कराने से बचते हैं. इसके अलावा कई तरह के पूर्वाग्रह और विचारों पर असर डालने वाले व्हाट्सएप फॉरवर्ड भी इस समीकरण में शामिल हैं. इन सब चीजों के साथ, एक छोटी सी (लेकिन नगण्य नहीं) संभावना यह भी है कि संक्रमित ना होते हुए भी टेस्ट पॉजिटिव आ सकता है, जिसे फॉल्स पॉजिटिव कहा जाता है. यह सब मिलकर लोगों के बीच जब तक बिलकुल आवश्यक न हो तब तक टेस्ट करवाने का संकोच पैदा करते हैं.

और आखिर में, इस संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि प्राधिकारी वर्ग अपनी किरकिरी होने या सार्वजनिक और राजनैतिक गुस्से से बचने के लिए डेटा में गड़बड़ी कर रहे हैं. (जिसको हमने अपने पिछले लेख में उल्लेखित किया.)

इन सब वजहों से कोविड-19 के टेस्ट और संक्रमणों के डेटा पर आधारित विश्लेषण की अपनी कई सीमाएं हैं. फिर भी यह लेख ऐसा करेगा. हमारा एक सरल तर्क है. हालांकि आंकड़े शत प्रतिशत जमीनी सच्चाई नहीं दिखाते, लेकिन वह एक उपयोगी झलक है. डेटा को लेकर उपरोक्त सीमाएं समय के साथ ज्यादा नहीं बदलती हैं. इसलिए एकत्रित किया हुआ डेटा बीमारी के प्रकोप की गंभीरता, रोकथाम के लिए उठाए गए कदम, सरकार की प्रतिक्रिया की सफलता और शायद डेटा में गड़बड़ियों की घटनाओं, इन सब चीजों में एक उपयोगी दृष्टि देता है.

इतना सब कहने के बाद, आइये कुछ आंकड़ों को यह समझने के लिए देखें कि वह दूसरी लहर में विभिन्न राज्यों और इलाकों की परिस्थितियों के बारे में हमें क्या बताते हैं. खास तौर पर हम टेस्टिंग, पॉजिटिव संक्रमण और उन दोनों को जोड़ने वाली चीजों का विश्लेषण करेंगे.

आइए पहले कुछ सकल रूप में डेटा के विश्लेषण से शुरुआत करते हैं. वैसे तो कुल डेटा आंकने के लिए राज्यों को समूहों में रखने के कई तरीके हैं, लेकिन हमने दो चुने.

1 - भौगोलिक विभाजन: एक तरफ हमने देश के कम विकसित भागों उत्तरी और पूर्वी भाग, के डेटा को एकत्र किया. वहीं दूसरी तरफ देश के बेहतर विकसित क्षेत्रों दक्षिण और पश्चिमी भागों को एक साथ रखा.

2 - राजनैतिक विभाजन: एक तरफ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन या एनडीए के प्रशासन वाले राज्य, वहीं दूसरी तरफ गैर एनडीए प्रशासन वाले राज्य. स्वाभाविक है कि बिहार को छोड़कर, जहां भाजपा सरकार में जनता दल यूनाइटेड के साथ गठबंधन में है, एनडीए के प्रशासन वाले सभी बड़े क्षेत्र भारतीय जनता पार्टी के द्वारा ही प्रशासित होते हैं.

इस तरह से बांटे जाने पर डेटा बहुत चौंकाने वाला है.

(1)- भौगोलिक विभाजन

उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, पश्चिम बंगाल, असम, उत्तराखंड, जम्मू और कश्मीर, झारखंड और छत्तीसगढ़ मिलकर उत्तर और पूर्व का समूह बनाते हैं.

महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, कर्नाटका, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना और केरला मिलकर दक्षिण व पश्चिम का समूह बनाते हैं.

दोनों ही उदाहरणों में हमने केवल उन्हीं राज्यों को गिना जिनकी जनसंख्या एक करोड़ से अधिक है.

सबसे पहले इन दोनों समूह के द्वारा 1 जनवरी 2021 से 10 जून 2021 तक की गई संपूर्ण टेस्टिंग को देखें.


जनसंख्या के हिसाब से समायोजित करने के बाद दक्षिण और पश्चिम की कुल टेस्टिंग उत्तर और पूर्व से कहीं ज्यादा है. इसे रोजाना टेस्टिंग के आंकड़ों में भी नीचे दिए गए चित्र क्रमांक एक में देखा जा सकता है.


जैसा कि चित्र क्रमांक एक में दिखाई पड़ता है, दोनों ही समूह के ग्राफ दूसरी लहर के जवाब में अप्रैल महीने की शुरुआत के दिनों में बढ़ती हुई टेस्टिंग को लेकर एक दूसरे के समानांतर चलते हैं. दक्षिण और पश्चिम भारत में मई की शुरुआत में अपने शिखर पर पहुंचने के बाद, रोजाना होने वाले टेस्टों में थोड़ी गिरावट आई और फिर तब से यह आंकड़ा स्थिर है.

अब इन दोनों समूहों में पॉजिटिव मामलों की कुल संख्या (प्रति एक लाख जनसंख्या पर) देखते हैं.


जैसा कि टेबल क्रमांक दो दिखाती है, दोनों समूहों में जनसंख्या के हिसाब से समायोजित करने पर कुल पॉजिटिव केसों की संख्या में बड़ा अंतर है. दक्षिण और पश्चिम में जनसंख्या के हिसाब से गणना करने पर पॉजिटिव मामलों की संख्या उत्तर और पूर्व की संख्या के दोगुने से भी ज्यादा है. इससे भी यही तथ्य पता चलता है कि देश के दक्षिणी और पश्चिमी भागों के राज्यों में टेस्ट ज्यादा किए गए जिसके परिणामस्वरूप ये राज्य कोविड के कहीं ज्यादा मामलों की पहचान करने में सफल रहे.

अब यह देखते हैं कि क्या यह बड़ा अंतर रोज के पॉजिटिव आने वाले आंकड़ों में भी दिखाई देता है.


चित्र क्रमांक दो दिखाता है कि दोनों ही समूह के क्षेत्रों में नए मामलों की बढ़ोतरी में तेजी से उछाल लगभग एक ही समय पर शुरू हुआ. लेकिन अपने शिखर पर रोजाना मामलों में दक्षिण और पश्चिम का समूह, उत्तर और पूर्व के दोगुने से भी ज्यादा था. यही दोगुना अंतर मई के अंत और जून की शुरुआत में बना रहा, जब रोजाना आने वाले नए मामले मई की शुरुआत के अपने शिखर से नीचे आ गए थे.

दक्षिण और पश्चिम के द्वारा कहीं ज्यादा टेस्ट किए जाने के तथ्य से परे, इस अंतर का एक संभावित कारण यह भी हो सकता है कि उत्तर और पूर्व के कुछ बड़े राज्य अपना डेटा शायद ठीक तरीके से जारी नहीं कर रहे थे. यह उस तत्व का नतीजा भी हो सकता है कि दक्षिण और पश्चिम में स्वास्थ्य व्यवस्था उत्तर और खास तौर से पूर्व (बिहार, झारखंड जैसे राज्य और उत्तर प्रदेश के बड़े इलाके) से कहीं बेहतर है. इससे यह संकेत मिल सकता है कि एक बार टेस्ट होने के बाद स्वास्थ्य व्यवस्था के द्वारा नए मामले पकड़ने की संभावना दक्षिण और पश्चिम में उत्तर और पूर्व के मुकाबले कहीं ज्यादा हैं, साथ ही यह भी घूम कर उसी तथ्य पर आता है कि कुछ राज्यों से डेटा ठीक से जारी नहीं हो रहा. इसे इस तथ्य से भी देखा जा सकता है कि दोनों समूहों में कोविड के मामलों की संख्या का अंतर, दोनों के टेस्टिंग के आंकड़ों के अंतर से ज्यादा है.

निश्चय ही इस बात को पूरी विश्वसनीयता से कहने के लिए और शोध की आवश्यकता है, लेकिन इसकी सबसे सरल व संभव व्याख्या यही लगती है.

(2) प्रशासक दल

हमने राज्यों को, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के द्वारा प्रशासित होने और नहीं होने वाले राज्यों के समूहों में अलग अलग रखा.

एनडीए वाले समूह में उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, हरियाणा, गुजरात, कर्नाटका, असम, उत्तराखंड और जम्मू व कश्मीर (क्योंकि केंद्र शासित प्रदेश का प्रशासन चुने हुए मुख्यमंत्री के बजाय राज्यपाल के हाथों में होता है) आते हैं.

गैर एनडीए समूह में महाराष्ट्र, तमिलनाडु, राजस्थान, पंजाब, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तेलंगाना, झारखंड, दिल्ली, छत्तीसगढ़ और केरला आते हैं. यह तथ्य फिर से याद दिला दें कि एक करोड़ से अधिक जनसंख्या वाले राज्य ही यहां पर गिने गए हैं.

पहले इन दोनों समूहों की 1 जनवरी से 10 जून तक किए गए टेस्टों की कुल संख्या देखते हैं.

जनसंख्या के हिसाब से नियमित कर, की गई कुल टेस्टिंग गैर एनडीए राज्यों में थोड़ी सी ज्यादा थी. यह अंतर हमें नीचे चित्र क्रमांक तीन में रोज़ होने वाले टेस्टों में भी दिखाई पड़ती है.

पूरी रपट पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


चिंतन पटेल& विवेक कौल, https://hindi.newslaundry.com/2021/07/20/can-india-covid-data-be-trusted-a-big-data-investigation-into-what-the-numbers-show-and-hide


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