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न्यूज क्लिपिंग्स् | किसान आंदोलन: दायरा बढ़ाकर राष्ट्रीय मंच बनाने की जरूरत

किसान आंदोलन: दायरा बढ़ाकर राष्ट्रीय मंच बनाने की जरूरत

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published Published on Nov 5, 2021   modified Modified on Nov 6, 2021

-रूरल वॉइस,

किसान नेता राकेश टिकैत ने कुछ महीने पहले कहा था कि अगर उनकी मांगों को नहीं माना गया तो साल 2024 तक किसान दिल्ली के बॉर्डरों पर धरने पर बैठने को तैयार हैं ।  टिकैत ने यह बयान तब दिया था जब किसान नेताओं औऱ सरकार  के बीच  लगातार बढ़ती  तनातनी के बीच जनवरी के बाद से सरकार  की तरफ  से औपचारिक बातचीत भी बंद हो गई । लेकिन सरकार को लगता है कि किसानों की मांगों को फिलहाल नजरअंदाज किया जा सकता है ,उनको थकाया जा सकता है।  इसलिए उनका मांगों में से कुछ भी मानने की जरूरत नहीं है ।

लखीमपुर खीरी की शर्मनाक घटना भी सरकार को इस मुद्दे को सुलझाने के लिए अपना रुख बदलने के लिए तैयार नहीं मजबूर नहीं कर सकी। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) ने किसानों में बढ़ते असंतोष पर चिंता व्यक्त की है औऱ वह चाहते हैं कि सरकार औऱ किसानों के बीच कोई समझौता हो जाय और उसके लिए किसी समझौते पर पहुंचने का रास्ता तैयार हो जाय । क्योंकि किसानों के आंदोलन से सरकार के खिलाफ उपजा अंसतोष कहीं उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद 2024 में होने होने वाले लोकसभा चुनाव पर न भारी पड़ जाय. जो उत्तर प्रदेश चुनावों से भी महत्वपूर्ण है । मेघालय के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा है कि किसान आंदोलन बड़े पैमाने पर सत्ताधारी पार्टी के वोट में सेंध लगाएगा इसलिए सरकार को इस मामले को सौहार्दपूर्ण तरीके से सुलझाने की जरूरत है।  इससे  कोई असर पड़ेगा,  नहीं तो फिर किसान क्या कर सकते है?

सरकार की योजना

सरकार का रुख उसकी इस समझ पर आधारित है कि वह किसान आंदोलन बारे में कैसे सोचती है। पहला मत है कि सरकार की समझ रही की किसान आंदोलन देश के दूसरे हिस्सों में नहीं फैल रहा है, दूसरा सरकार के लिए अमीर और व्यापारी उसके लिए महत्वपूर्ण है। तीसरा सरकार के दिमाग में बातें बैठ गई हैं कि तीन नये कृषि कानूनों में जो भी  प्रावधान हैं  उनमें से  अधिकांश किसानों को लाभ देने वाले हैं ।

देश के हर क्षेत्र  में सरकार  किसान समुदाय के बीच में विभाजन पर भरोसा कर रही है। जैसे बिहार या केरल की तुलना में पंजाब में खेती बहुत अलग है । जैसे कि उगाई जाने वाली फसलें, फसल पैटर्न, सिंचाई की उपलब्धता, जोतों का आकार ,भूमि का वितरण, व्यापार की प्रकृति और सरकारी सहायता की सीमा इत्यादि । सरकार अधिकांश किसानों को इन तीन कानूनों  के  दीर्घकालिक फायदों को स्पष्ट करने  या इन तीन कानूनों से किसानों को  मिलने वाले लाभ के प्रभाव को समझा नहीं पा रही है। सरकार  इस बारे में बहाना बना रही है कि किसान इसको समझने में असमर्थ है । वह  इस बात पर भरोसा कर रही है। सरकार को विश्वास है कि अगर सरकारी चैनलों और मीडिया के माध्यम से इस लाइन को बार-बार दोहराया जाता है तो किसानों की भलाई के लिए अधिकतर किसान इन तीन कानों को स्वीकार कर लेंगे।

किसान लंबे समय से संकट का सामना कर रहा है ।  यहां तक कि वह आत्महत्याएं कर रहे हैं । इसलिए वह हताशा में विरोध कर रहे है। अब निस्संदेह ही किसानों के हालात में सुधारों की जरूरत है। इसलिए अब मुख्य मुद्दा यह होना चाहिए कि किसानों की जो मुख्य समस्याएं हैं  उनको दूर करके उनके हालात में सुधार के लिए कदम उठाने की जरूरत है, क्योंकि अब बदलाव की बात नही चलेगी।।

सरकार का तर्क है कि तीन कानून औसत किसान की जरूरतों को पूरा करते हैं। किसानों की समस्या का पूरा दोष किसानों का खून चूसने वाले व्यापारी पर डाल दिया है। इन व्यापारियों की छवि सूदखोर साहूकार के रूप में ,छोटे और मध्यम किसान इतनी गहराई से चित्रित कर रहे है जैसे कि1950 से 1970 के बीच लोकप्रिय हिंदी सिनेमा औसत भारतीय के मन में अंकित था। दूसरी तऱफ इस छवि को प्रस्तुत किया जा रहा है कि मुक्त बाजार से किसानों की समस्याओं से मुक्ति मिलेगी और उनके हालात में सुधार होगा।  कॉरपोरेट क्षेत्र की छवि को इस तरह प्रस्तुत किया जा रहा है कि मध्यम वर्ग के लोगों को इससे अच्छी नौकरियां मिलेंगी ।

लोगों के बीच छोटे व्यापारियों को सूदखोर  साहूकार के रूप में  प्रस्तुत कर किसानों को इसते चंगुल से बचाने के लिए  सरकार यह कानून लाई है। वहीं कॉरपोरेट सेक्टर को  कृषि उपज के व्यापार में  प्रवेश कराने के लिए लोगों के सामने उनकी एक आदर्श छवि प्रस्तुत कर रहे हैं। 

किसानों का दृष्टिकोण

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ आंदोलन कर रहे किसानों का तर्क है कि यह बदलाव उनके लिए विनाशकारी होगा। पूंजी और नीतियों पर अपनी पकड़ रखने वाले कॉपोरेट्स कृषि उपज के व्यापार में आ जाने से यह किसानों की हालत व्यापारियों से भी बदतर कर देंगे। किसान तीनों कानूनों को कॉर्पोरेट समर्थक के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि आने वाले समय में इनके चलते असमानता बढ़ेगी और किसानों को डर है कि वह अपनी भूमि का मालिकाना हक खो देंगे। कारपोरेट्स बाजार की प्रतिस्पर्धा को दूर करने लिए पहले अधिक मूल्य देते हैं और इसके बाद जब उनका एकाधिकार हो जाता है तो मूल्य बढ़ाकर शोषण करते हैं । जैसे साल 2015 से टैक्सी एग्रीगेटर्स ने यही किया है। किसानों का  मानना ​​है कि शुरू में कॉरपोरेट्स मंडियों के बाहर उपज के लिए अच्छी कीमत की पेशकश कर सकते हैं जिससे सरकारी मंडियों का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा।  अगर एक बार ऐसा हो गया तो देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की व्यवस्था को लागू करना असंभव हो जाएगा, जैसा कि बिहार में हुआ। जहां 2006 में एग्रीकल्चरल प्रॉड्यूस मार्केट कमेटी (एपीएमसी) एक्ट  को समाप्त कर दिया गया था।

पूरा लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें. 


अरूण सिंह, https://www.ruralvoice.in/opinion/farmers-movement-need-to-broaden-its-scope-by-presenting-a-national-platform.html


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